मज़दूर दिवस का महत्व, कितना सार्थक हैं मज़दूर दिवस ? Importance of Labor Day - Nazariya Now

HIGHLIGHTS

Sunday, April 30, 2017

मज़दूर दिवस का महत्व, कितना सार्थक हैं मज़दूर दिवस ? Importance of Labor Day

भारत सहित दुनिया के अधिकतर देशों में 1  मई को अंतराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। अमेरिका और कनाडा में सितम्बर महीने के पहले सोमवार को ,मज़दूर दिवस घोषित किया जाता है।  मज़दूर को आमतौर पर लोग गरीब समझकर उसके महत्व को अनदेखा करते हैं जबकि मज़दूर समाज और देश का महत्वपूर्ण हिस्सा है।  देश की तरक़्क़ी में मज़दूर का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है।  हर छोटे और बड़े किसी भी प्रकार के निर्माण में मज़दूर का योगदान महत्वपूर्ण है चाहे वो एक छोटा सा मकान हो या अंतरिक्ष में भेजे जाने वाला कोई अंतरिक्ष यान ही क्यों न हो हर काम में मज़दूर की भूमिका महत्वपूर्ण है।  मज़दूर के योगदान के बिना किसी भी तरह के निर्माण का पूरा हो पाना असंभव है। मज़दूर केवल पत्थर तोड़ने वाला, ईंटें धोने या किसी फैक्ट्री में मज़दूरी करने वाला व्यक्ति नहीं है बल्कि हर वो व्यक्ति जो शारीरिक या मानसिक श्रम के जरिये आना जीवन यापन करता है वो भी मज़दूर की श्रेणी में शामिल है। 



अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस को मनाने की शुरूआत 1 मई 1886 से मानी जाती है जब अमरीका की मज़दूर यूनियनों ने काम का समय 8 घंटे से ज़्यादा न रखे जाने के लिए हड़ताल की थी। इस हड़ताल दौरान के  शिकागो में बम धमाका हुआ था। बम धमाका किसने किया इसके बारे में कुछ जानकारी स्पष्ट नहीं थी इस धमाके की घटना के बाद पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर गोली चला दी और इससे सात मज़दूरों की मौत हो गई । शुरआत में इस घटना  का अमरीका पर  कोई खास  प्रभाव नहीं पड़ा था लेकिन कुछ समय के बाद अमरीका में मज़दूरों के लिए 8 घंटे काम करने का समय निश्चित कर दिया गया था। मौजूदा समय भारत और अन्य देशों  में मज़दूरों के 8 घंटे काम करने संबंधित क़ानून लागू है।


आठ घंटे के कार्य दिवस की जरुरत को बढ़ावा देने के लिये साथ ही संघर्ष को खत्म करने के लिये अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है। पूर्व में मजदूरों की कार्य करने की स्थिति बहुत ही कष्टदायक थी और असुरक्षित परिस्थिति में भी 10 से 16 घंटे का  कार्य-दिवस था। 1860 के दशक के दौरान मजदूरों के लिये कार्यस्थल पर मृत्यु, चोट लगना और कई प्रकार की करथिन परिस्थितियां आम बात थी और पूरे कार्य-दिवस के दौरान काम करने वाले लोग बहुत क्षुब्ध थे जब तक कि आठ घंटे का कार्य-दिवस घोषित नहीं कर दिया गया।

बहुत सारे उद्योगों में श्रमिक वर्ग लोग (पुरुष, महिला) की बढ़ती मृत्यु, उद्योगों में उनके काम करने के घंटे को घटाने के द्वारा कार्यकारी दल के लोगों की सुरक्षा के लिये आवाज उठाने की जरुरत थी। मजदूरों और समाजवादियों के द्वारा बहुत सारे प्रयासों के बाद  अमेरिकन संघ के द्वारा 1884 में श़िकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के लिये वैधानिक समय के रुप में आठ घंटे को घोषित किया गया।

मज़दूर समूह के लोगों की समाजिक और आर्थिक उपलब्धियों को बढ़ावा देने के लिये साथ ही शिकागो के हेयमार्केट नरसंहार की घटना को याद करने के लिये मई दिवस मनाया जाता है।

भारत में एक मई को मज़दूर दिवस सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाना शुरू किया गया था। उस समय इसे मद्रास दिवस के तौर पर मनाया गया था। इस की शुरूआत भारतीय मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी।  मद्रास में हाईकोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन कर एक संकल्प के पारित करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये। भारत समेत लगभग 80 देशों में यह दिवस 1 मई को मनाया जाता है। इस पीछे तर्क है कि यह दिन अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर प्रवानित हो चुका है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) का गठन किया गया।  यह एक संस्था है जो संयुक्त राष्ट्र में उपस्थित है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रमिक मुद्दों को देखने के लिये स्थापित हुयी है। पूरे 193 (यूएन) सदस्य राज्य के इसमें लगभग 185 सदस्य हैं। विभिन्न वर्गों के बीच में शांति प्रचारित करने के लिये, मजदूरों के मुद्दों को देखने के लिये, राष्ट्र को विकसित बनाने के लिये, उन्हें तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिये वर्ष 1969 में इसे नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) मजदूर वर्ग के लोगों के लिये अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन की सभी शिकायतों को देखता है। इसके पास त्रिकोणिय संचालन संरचना है अर्थात् “सरकार, नियोक्ता और मजदूर का प्रतिनिधित्व करना (सामान्यतया 2:1:1 के अनुपात में)” सरकारी अंगों और सामाजिक सहयोगियों के बीच मुक्त और खुली चर्चा उत्पन्न करने के लिये, अंतरराष्ट्रीय श्रमिक कार्यालय के रुप में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन सचिवालय कार्य करता है।
अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) के कार्यों में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक सम्मेलन, स्वीकार करना या कार्यक्रम आयोजित करना, मुख्य निदेशक को चुनना, मजदूरों के मामलों के बारे में सदस्य राज्य के साथ व्यवहार, अंतरराष्ट्रीय श्रमिक कार्यालय कार्यवाही की जिम्मेदारी के साथ ही जाँच कमीशन की नियुक्ती के बारे में योजना बनाने या फैसले लेने के लिये संस्था को अधिकार प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ)  के पास लगभग 28 सरकारी प्रतिनिधि हैं, 14 नियोक्ता प्रतिनिधि और 14 श्रमिकों के प्रतिनिधि हैं। आम नीतियाँ बनाने के लिये, कार्यक्रम की योजना और बजट निर्धारित करने के लिये जून के महीने में जेनेवा में वार्षिक आधार पर ये एक अंतरराष्ट्रीय श्रमिक सभा आयोजित करता है (श्रमिकों की संसद के पास 4 प्रतिनिधि हैं, 2 सरकारी, 1 नियोक्ता और 1 मजदूरों का नुमाइंदा)।


वर्तमान में मज़दूरों के अधिकारों के लिए बहुत से संगठन कार्य कर रहे हैं साथ ही सरकार की और से भी मज़दूरों को अधिकारों की रक्षा के लिए श्रम न्यायालयों का गठन किया गया है लेकिन इन सबके बावजूद भी मज़दूरों को उनके अधिकार पूरी तरह नहीं मिल पा रहे हैं।  मज़दूर आज भी निम्न श्रेणी का जीवन जीने को मजबूर हैं।  मज़दूरों के साथ औद्योगिक क्षेत्रों में अक्सर वाली दुर्घटनाओं का मुख्य कारण उन्हें अच्छी क्वालिटी की सेफ्टी किट उपलब्ध न कराना है।  कई बार दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौत भी हो जाती है और कई मज़दूर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं और कई मज़दूरों को पूरा जीवन अपाहिज के रूप में जीना पड़ता है।  विदेशों में  एक गटर साफ़ करने वाले मज़दूर को पूरी सेफ्टी किट के साथ गटर की सफाई के लिए भेजा जाता है।  सेफ्टी किट में हानिकारक गैसों से बचने के विशेष मास्क/हेलमेट ,  हानिकारक केमिकलों से बचाव केलिए  स्पेशल सूट,  विशेष प्रकार के जूते और दस्ताने दिए जाते हैं, वहां इन कर्मचारियों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाता है जबकि हमारे देश में बिना किसी सुरक्षा उपकारण के ही मज़दूर को गटर में उतार दिया जाता जिसके इसी लापरवाही कारण कई बार मज़दूरों की मौत भी हुई है।  गटर में कई तरह के विषैले केमिकल और हानिकारक गैसें होती हैं जो स्वस्थ पर बहुत बुरा प्रभाव डालती हैं और कई बार मौत का कारण भी यही होता है।  इन सब चीज़ों पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।  

हर साल की  तरह इस साल भी 1  मई को मज़दूर दिवस मनाया जायेगा।  बहुत से आयोजन, संगोष्टी, सभायें होंगी जिनमे वक्ता मज़दूर सुरक्षा,  मज़दूर अधिकार आदि पर चर्चा करेंगे।  राजनेताओं द्वारा मज़दूर दिवस की शुभकामनायें देकर औपचारिकता  पूरी कर दी जाएगी।  लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझ लेंगे, लेकिन क्या केवल इन सब कामों से मज़दूर के जीवन में सुधर आएगा ?  क्या केवल इन सब से ही मज़दूर दिवस सार्थक माना जायेगा ? सही मायनो में मज़दूर दिवस तब सार्थक होगा जब प्रत्येक मज़दूर को पूरी सुरक्षा मिलेगी, उसके अधिकार मिलेंगे, उसके जीवन स्तर में सुधर होगा।  उसे देश और समाज  में बराबरी का दर्जा मिलेगा, देश और समाज मज़दूर के योगदान का महत्व समझेंगे।

No comments:

Post a Comment