कृषि प्रधान देश में कितना मजबूर है अन्नदाता किसान - Nazariya Now

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Monday, April 24, 2017

कृषि प्रधान देश में कितना मजबूर है अन्नदाता किसान

‘‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’’ इस वाक्य को अगर सही माना जाये तो कृषि का कार्य करने वाले किसानों की आर्थिक स्थिति देश में अन्य लोगों के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर होनी चाहिए थी। किसान जिसे देश का अन्नदाता कहा जाता है आज पूरे देश में सबसे ज़्यादा परेशानी के दौर से गुज़र रहा है। क़र्ज़ के बोझ से दबे किसानों की आत्महत्या की ख़बरे अकसर सुनने को मिलती रहती हैं। जो किसान सारे देश को अन्न उपलब्ध करवाता है आज वही किसान क़र्ज़ के बोझ में दबकर ख़ुद अन्न के लिए मोहताज हो गया है।



नई दिल्ली में पिछले एक महीने से भी ज़्यादा समय से तमिनलाड़ू के किसान क़र्ज़माफ़ी और मुआवज़े की मांग के लिए को लेकर आये हुआ हैं। अपना घर, गांव छोड़कर ये किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन किसानों  में नौजवान से लेकर 70 वर्ष से अधिक उम्र के बुर्ज़ुग तक है। इन किसानों प्रदर्शन राजनीतिक पार्टियों की तरह जुलूस, रैली निकालकर या चक्काजाम करने जैसा नहीं हैं, उन्होंने अपनी मांग के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अलग-अलग तरीक़ अपनाये। पहले अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया, जिन किसानों ने क़र्ज के बोझ से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी उन किसानों के नरमुण्ड (खोपड़ी) अपने गले में डालकर प्रदर्शन किया। उन्होंने हर दिन अलग-अलग तरीक़े से प्रदर्शन किया। कभी उनमें से कोई किसान को लाश बनाकर उसकी शवयात्रा निकाली, कभी एक किसान को प्रधानमंत्री का मुखौटा पहनाकर कोड़े मारते हुए एक नाटक प्रदर्शित किया, कभी कटोरा लेकर भिखारी बन गये, कभी आधी मूंछ मुंडवा ली, चूहा पकड़कर उसे मुंह में लेकर प्रदर्शन किया, सांप का मांस खाया यहां तक कि अपना पैशाब (मूत्र) पीकर भी प्रदर्शन किया। 

देश के इतिहास में शायद ही कभी किसी व्यक्ति या संगठन ने अपनी मांग को लेकर इस तरह के अलग-अलग तरीक़ों से प्रदर्शन किया होगा। जिन-जिन तरीक़ों का किसानों ने प्रयोग किया है एक आम व्यक्ति उनको करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। सोचने की बात है आख़िर वो किसान कितने मजबूर और लाचार हैं जो यह सब करने को मजबूर हुए हैं। इतना कुछ करने के बाद भी अभी तक किसानों को सरकार की और से कोई मदद तो बहुत  दूर की बात है मदद का कोई आश्वासन भी नहीं मिला। पिछले  1 महीने से अधिक समय से किसान अपनी मांगों के लिए डटे हुए हैं। किसान ख़ुद बहुत परेशानी में हैं लेकिन उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि उनके प्रदर्शन से जनता को किसी तरह की परेशानी न हो वरना हम देखते-सुनते हैं कि जब भी कोई संगठन प्रदर्शन करता है तो चक्काजाम, बन्द जैसे तरीक़ों का प्रयोग करता है, कुछ समय पहले राजस्थान में कुछ संगठनों ने तो अपनी मांगो के लिए रेल रोक दी और रेल की पटरियाँ उखाड़ने जैसा ग़ैरक़ानूनी व असंवैधानिक तरीक़ा अपनाया था, लेकिन किसानों ने ऐसा कुछ नहीं करकर संविधान के प्रति अपना विश्वास दिखाया है। 

तमिलनाड़ू से अपना घर-परिवार छोड़कर ये किसान बड़ी उम्मीद लेकर आये होंगे की देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  जो ''सबका साथ सबका विकास'' का नारा देते हैं उनकी समस्या ज़रूर सुनेंगे, उनकी मदद ज़रूर करेंगे लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की और से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है और न ही किसी केन्द्रीय मंत्री ने कोई मदद या मदद आश्वासन दिया है। किसानों की सहायता के लिए केन्द्र/राज्य सरकारों  के पास पैसे की कमी है लेकिन करोड़ों की मूर्ति/स्मारक बनाने के लिए पैसा है। क्या मूर्ति/स्मारक बनाने से ज़्यादा ज़रूरी देश के अन्नदाता को आत्महत्या से बचाना ज़्यादा ज़रूरी नहीं है ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कई विदेशी दौरों में कई देशों को करोड़ों की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया क्या विदेशों को आर्थिक मदद देना अन्नदाता को सम्मान से जीने का अधिकार देने से ज़्यादा ज़रूरी था ?

देश में किसानो के साथ अन्याय ही होता आया है कभी कभी तो सहायता के नाम उनके साथ मज़ाक किया
जाता है। कुछ समय पहले हरियाणा में बाड़ पीड़ित किसानों को मुआवज़े के नाम पर 1 रूपये से लेकर 2 रूपये
तक के चेक वितरित किये। मध्यप्रदेश में कुछ समय पहले सूखा/ओलावृष्टि/अतिवृष्टि से पीड़ित किसानों के
साथी भी ऐसा ही हुआऔर महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बहुत ज़्यादा है। मुआवज़े
के नाम पर 1 रूपये से लेकर 2 रूपये तक की राशि देना क्या उनकी मजबूरी-लाचारी का मज़ाक़ उड़ाने जैसा
नहीं है ? 

कुछ समय पहले ‘‘दैनिक भास्कर’’ समाचार पत्र ने सूखे की मार झोल रहे किसानों के लिए एक ‘‘अन्न्दाता के लिए अन्नदान’’ नाम का अभियान चलाया। इस अभियान के अंतर्गत आम जनता से अन्नदान करने को कहा गया और उनसे प्राप्त अन्न सूखे की मार झेल रहे किसान परिवारों को उपलब्ध कराया गया। दैनिक भास्कर द्वारा चलाये गये इस अभियान से किसानों को कुछ सहायता तो मिली लेकिन साथ ही एक गंभीर चिंता का विषय भी है कि जो किसान देश का अन्नदाता था आज वो इस स्थिति में है कि उसके लिए लोगों को अन्नदान करना पड़ रहा है। एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है ?

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