चुनाव में मतपत्र (Ballot Paper) के इस्तेमाल की मांग कितनी सही है ? - How accurate is the demand for using ballot paper in the election? - Nazariya Now

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Sunday, May 14, 2017

चुनाव में मतपत्र (Ballot Paper) के इस्तेमाल की मांग कितनी सही है ? - How accurate is the demand for using ballot paper in the election?

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है।  चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है।  संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग को चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी दी है। 1989 तक निर्वाचन आयोग केवल एक सदस्यीय संगठन था। 16 अक्टूबर 1989 को एक राष्ट्रपतीय अधिसूचना के द्वारा दो और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई।  चुनाव के लिए अधिसूचना जारी करने से लेकर चुनाव परिणाम जारी करने तक काम चुनाव आयोग के अधीन है।  चुनाव को सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न विभागों के अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, सुरक्षा बल आदि की सहायता ली जाती है।  



वर्ष 2004 से पूर्व देश में चुनाव के लिए मतपत्र (Ballot Paper) का इस्तेमाल किया जाता था।  भारत में पहली बार EVM (Electronic Voting Machine) का प्रयोग मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में किया गया था। इसके बाद से ही चुनाव में प्रयोग के तौर पर EVM (Electronic Voting Machine) इस्तेमाल होता रहा। चुनाव आयोग ने EVM (Electronic Voting Machine) द्वारा वोटिंग को सरल और सुरक्षित माना और वर्ष 2004 से चुनाव में पूर्ण रूप से EVM का का इस्तेमाल सभी चुनावों (लोकसभा, विधानसभा, नगरी निकाय) में  किया जाने लगा है । EVM (Electronic Voting Machine) द्वारा चुनाव सुरक्षित और पारदर्शी हैं या नहीं इस पर लम्बे समय से बहस जारी है। वर्ष 2014 के चुनाव के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी  EVM  की जगह मतपत्रों द्वारा चुनाव की मांग की थी।  अन्य कई राजनैतिक दलों द्वारा भी EVM की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं। देश में 5 राज्यों में हुए चुनाव के बाद 16 राजनैतिक दलों ने EVM की विश्वसनीयता पर सवाल  उठाये हैं।  हालाँकि चुनाव आयोग ने EVM को हमेशा सुरक्षित बताया है। 

EVM कितनी सुरक्षित है ये लम्बी बहस का मुद्दा है, लेकिन पिछले कुछ समय में हुई कुछ घटनाओं ने देश की जनता के मन में एक संशय ज़रूर पैदा कर दिया है।  देश में EVM को लेकर जनता की अलग अलग राय है कुछ इसे सुरक्षित मानते है कुछ नहीं मानते।  जनता के मन में एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है।  संविधान ने देश के प्रत्येक नागरिक ( जो 18 वर्ष की आयु का है) को मतदान का अधिकार दिया है।  मतदान देश के नागरिक का मौलिक अधिकार है। वर्तमान में मतदाता अपने मौलिक अधिकार को लेकर आशंकित है, वो ये सोच रहा है जिस उम्मीदवार के लिए मतदान कर रहा है क्या उसका मत उसके द्वारा चुने हुए उम्मीदवार को ही मिला है ? मतपत्र (Ballot Paper) द्वारा मतदान में मतदाता स्वयं मतपत्र (Ballot Paper) पर अपने पसंद के उम्मीदार के चुनाव चिन्ह पर सील लगाकर निश्चित हो जाता था, लेकिन अभी उसके मन में संशय है।  देश में लोकतान्त्रिक प्रणाली सरल, सुरक्षित और पारदर्शी होना ज़रूरी है।  मतपत्र में पारदर्शिता होने से मतदाता को यक़ीन होता है की उसका मत उसके द्वारा चुने हुए उम्मीदवार को ही गया है।  

भारत में चुनाव में मतपत्र के इस्तेमाल को लेकर लोगों के विचार  अलग अलग हैं ।  कुछ लोग कहते हैं की जब देश टेक्नोलॉजी में इतना आगे बाद चूका है तो  मतपत्र (Ballot Paper) जैसे पुराने तरीके का इस्तेमाल क्यों किया जाये ? कुछ लोगों का मानना है की मतपत्र (Ballot Paper) के प्रयोग की मांग करके खुद को टेक्नोलॉजी में पिछड़ा साबित करने जैसा है।  अगर मतपत्र (Ballot Paper) से चुनाव करवाकर हम टेक्नोलॉजी में  पिछडे  या पुराने विचार वाले बन जायेंगे तो हमें ये जानना ज़रूरी है की दुनिया के विकसित  देशों में चुनाव के लिए मतपत्र (Ballot Paper) का ही इस्तेमाल होता है।  अमेरिका जैसा देश जो टेक्नोलॉजी में सबसे आगे हैं वहां भी चुनाव में मतपत्रों (Ballot Paper) का ही प्रयोग होता है। कुछ लोगों का मानना है की मतपत्र (Ballot Paper) के इस्तेमाल से काग़ज़ की बर्बादी होगी, EVM  के इस्तेमाल से काग़ज़ की बचत की जा सकती है, काग़ज़ की बचत करना अच्छी बात है लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता होना भी बहुत ज़रूरी है, कागज़ की बचत के नाम पर लोकतंत्र को खतरे में डालना कहाँ तक सही है ? मतदाता मतदान के बाद अपने मत को लेकर निश्चित रहे ये भी ज़रूरी। चुनाव रोज़ रोज़ नहीं होते हैं जितना काग़ज़ चुनाव में मतपत्र (Ballot Paper) के लिए इस्तेमाल किया जायेगा उससे कहीं ज़्यादा काग़ज़ का इस्तेमाल देश में छपने वाला अख़बारों में सिर्फ एक दिन में ही हो जाता है। मतपत्र (Ballot Paper) में काग़ज़ बचाने की बात करना ऐसा है जैसा या कहा जाये कि  काग़ज़ बचाना ज़रूरी है इसलिए अख़बारों और किताबों पर रोक लगाई जाने की बात करना।  अगर चुनाव में काग़ज़ बचाना ही है तो उसके और भी तरीके हैं उनको अपनाकर चुनाव में काग़ज़ की बचत की जा सकती है।  चुनाव में उम्मीदवार / राजनैतिक पार्टियां बहुत अधिक काग़ज़ का इस्तेमाल करते हैं जैसे  पम्पलेट, पोस्टर, ब्रोशर, घोषणा पत्र और अन्य चुनाव प्रचार सामग्री आदि अगर चुनाव में काग़ज़ की बचत ही करना है राजनैतिक पार्टिया / उम्मीदवार काग़ज़ की प्रचार सामग्री का कम से कम इस्तेमाल करके काग़ज़ की बचत कर सकते हैं। चुनाव प्रचार में काग़ज़ की जगह डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करके काग़ज़ की बचत की जा सकती है। सरकार, चुनाव आयोग, राजनैतिक दल सभी की ज़िम्मेदारी है की चुनाव प्रक्रिया को सरल, सुरक्षित, पारदर्शी बनाकर जनता के मन में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास को मज़बूत बनायें।  

चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है, चुनाव पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न हो और मतदाता अपने मतदान के मौलिक अधिकार की विश्वसनीयता को लेकर पूरी तरह से निश्चित हो तभी ये महापर्व सफल होगा। पारदर्शिता होने से मतदाता का लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में विश्वास और बढ़ेगा। जनता मतदान के महत्व को समझेगी और उसके प्रति जागरूक होगी।  

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