संविधान के अनुसार भारत के राष्ट्रपति पद की योग्यता, निर्वाचन एवं शक्तियां - Nazariya Now

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Monday, May 29, 2017

संविधान के अनुसार भारत के राष्ट्रपति पद की योग्यता, निर्वाचन एवं शक्तियां

राष्ट्रपति पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है।  भारत के संविधान के अनुसार भारत में संघीय कार्यपालिका का प्रधान राष्ट्रपति है।  राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्येक 5 वर्ष में होता है।  राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं। राष्ट्रपति देश की सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी होते हैं। राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। भारत के संविधान में देश के राष्ट्रपति के निर्वाचन, योग्यता, शक्तियों के बारे में विस्तृत विवरण हैं। 


भारत में संघीय कार्यपालिका का प्रधान राष्ट्रपति है तथा संघ की सभी कार्यपालिकीय शक्तियां उसमें निहित है, जिसका प्रयोग वह संविधान के अनुसार स्वयं या, अधीनस्थ पदाधिकारियों के माध्यम से करता है, अनुच्छेद 53 (1)

राष्ट्रपति की योग्यतायें
अनुच्छेद 58 के अन्तर्गत राष्ट्रपति पद के लिए निम्नलिखित योग्यतायें विहित की गई है-
1.    वह भारत का नागरिक हो।
2.    वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, तथा
3.    लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
किंतु ऐसा कोई व्यक्ति जो भारत सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, राष्ट्रपति पद के लिए योग्य न होगा। ध्यातव्य है कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का नाम कम से कम 50 मतदाओं द्वारा प्रस्तावित और 50 मतदाओं द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। 1998 से पूर्व यह संख्या 10-10 थी। राष्ट्रपति पद के लिए जमानत की राशि 15000 रु. है। किसी उम्मीदवार द्वारा कुल वैध मतों का 1/6 भाग मत प्राप्त न करने पर उसकी जमानत की राशि  जब्त हो जाती है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल और संघ अथवा राज्यों के मंत्रियों के पद को लाभ का पद नहीं माना जाता है।
अनुच्छेद 57 में कहा गया हे कि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद पर पुनर्निर्वाचन के लिए योग्य है किंतु वह कितनी बार राष्ट्रपति चुना जा सकता है इस प्रश्न  पर संविधान मौन है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.  राजेन्द्र प्रसाद अब तक के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति है जिन्हें दो बार (1952 तथा 1957 में) इस पद हेतु चुना गया था। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में एक व्यक्ति दा बार राष्ट्रपति चुना जा सकता है। 

राष्ट्रपति का निर्वाचक मण्डल
अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे ‘निर्वाचक मण्डल’ द्वारा किया जायेगा जिसमें
(I)   संसद के दोनों सदनों (लोक सभा तथा राज्य सभा) के निर्वाचित सदस्य तथा
(II)     राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होंगे।
ध्यातव्य है कि 70वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा ‘पांडिचेरी’ संघ ''शासित राज्य के विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल कर लिया गया है।

राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति
राष्ट्रपति का चुनाव ‘अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली’ द्वारा किया जाता है। अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति दी गयी है। अनुच्छेद 55 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ‘‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’’ द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त  होगा तथा यथासम्भव विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापन में एकरूपता रखी जायेगी।
किसी राज्य की विधान सभा के एक सदस्य का मत मूल्य  :-
 राज्य की कुल जनसंख्या 
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निम्न सदन के कुल निर्वाचितसदस्यों की संख्या  x  1000
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली सिद्धांत - इस सिद्धांत के अनुसार यदि प्रत्याशियों की संख्या एक से अधिक है तो प्रत्येक मतदाता उतने मत वरीयता क्रम से देगा जितने प्रत्याशी  है अर्थात प्रत्येक मतदाता, प्रत्येक प्रत्याशी को अपना मत वरीयता क्रम के अनुसार देता है।

राष्ट्रपति की पदावधि 
अनुच्छेद - 56 के अनुसार राष्ट्रपति पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करता है। किंतु वह पांच वर्ष के पूर्व कभी भी उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है। उसे संविधान का अतिक्रमण करने पर अनुच्छेद -61 में उपबन्धित महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया भी जा सकता है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रपति अपने पांच वर्ष की पदावधि की समाप्ति के पश्चात अपने पांच वर्ष की पदावधि की समाप्ति के पश्चात  भी तब तक अपना पद धारण किये रहता है जब तक कि उसका उत्तरधिकारी (नया राष्ट्रपति) अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। राष्ट्रपति जब उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देता है तब उपराष्ट्रपति तत्काल इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देता है। अनु. 57 के अनुसार राष्ट्रपति के पद के लिए पुनः निर्वाचन की प्राश्रता निर्धारित करने का प्रावधान है।

राष्ट्रपति द्वारा शपथ
अनुच्छेद 60 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के ज्येष्ठतम न्यायाधीश द्वारा भारत के राष्ट्रपति को शपथ दिलायी जायेगी, राष्ट्रपति अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन, संविधान और विधि के परिरक्षण, संरक्षण तथा प्रतिरक्षण तथा जनता की सेवा व कल्याण करने की शपथ ग्रहण करता है।

राष्ट्रपति पर महाभियोग
राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया अनुच्छेद 61 में दी गयी है। अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संविधान का अतिक्रमण किये जाने पर उसके विरुद्ध महाभियोग लगाया जा सकता है। राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग संसद द्वारा चलाई जाने वाली एक अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया है। महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रस्ताव की सूचना राष्ट्रपति को 14 दिन पूर्व प्राप्त होनी चाहिए और प्रस्ताव की सूचना पर उस सदन के कम-से-कम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि इस आशय का प्रस्ताव उस सदन में, जिसमें वह रखा गया है समस्त सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो वह आगे की जांच के लिए दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति को दूसरे सदन में स्वयं अथवा अपने किसी प्रतिनिधि के माध्यम से कोई स्पष्टीकरण देने का अधिकार है। जाचं के पश्चात यदि द्वितीय सदन भी प्रथम सदन की भांति महाभियोग के प्रस्ताव को समस्त सदस्यों के कम-से-कम दो तिहाई बहुमत से स्वीकार कर लेता है तो उसी दिन से राष्ट्रपति पद रिक्त समझा जाता है। अभी तक एक भी ऐसा अवसर नहीं आया जबकि राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाया गया हो।

राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी विवाद
अनुच्छेद 71 में कहा गया है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी विवादों का विनिश्चय  उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जायेगा, तथा उसका निर्णय अन्तिम होगां यदि उच्चतम न्यायालय किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को अवैध घोषित कर देता है तो ऐसे व्यक्ति द्वारा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में, निर्णय के पूर्व किया गया कोई कार्य या घोषणा अवैध नहीं होगा।

राष्ट्रपति की शक्तियां
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्रदान की गयी है। राष्ट्रपति की शक्तियों को दो वर्गा में विभाजित किया जा सकता है। 
(I)   शन्ति कालीन शक्तियां
(II)  आपात कालीन शक्तियां
(A)  शांति कालीन शक्तियां - शान्तिकाल में राष्ट्रपति को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होती है।
1.    कार्यपालिका शक्तियां - अनुच्छेद - 53 के अनुसार, (संघ) की इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों के माध्यम से करता है। अधीनस्थ प्राधिकारियों से तात्पर्य केंद्रीय मंत्रीमण्डल से है। भारत सरकार के समस्त कार्यपालिकीय कृत्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते है तथा सरकार के सभी निर्णय उसके निर्णय माने जाते है। राष्ट्रपति को संघ के मामलों में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। अनुच्छेद -78 के अनुसार प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयो और प्रशासन सम्बन्धी उन सभी मामलों में सूचना दें, जिसके बारे में राष्ट्रपति द्वारा ऐसी सूचना दे, जिसके बारे में राष्ट्रपति द्वारा ऐसी सूचना मांगी जाय।
अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में सलाह देने के लिए एक ‘मंत्रीपरिषद’ का गठन करता है। जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री सहित संघ के अन्य प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति करता है। जैसे - संघ के मंत्रियों की, राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायानयों के न्यायाधीश, भारत के महान्यायालय के न्यायाधीशों , भारत के महान्यायवादी, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों, राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, संघ राज्य क्षेत्रों के राज्यपाल या प्रशासक तथा मुख्यमंत्री (दिल्ली व पांडिचेरी) वित आयोग तथा राजभाषा आयोग आदि की।

2.    राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां - भारत का राष्ट्रपति संघीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ-साथ संसद का भी अभिन्न अंग है, क्योंकि संसद का गठन राष्ट्रपति, लोकसभा तथा राज्य सभा तीनों से मिलकर होता है (अनुच्छेद -79)। अतः राष्ट्रपति को व्यापक विधायी शक्तियों प्राप्त है।
राष्ट्रपति को संसद का अधिवेषन बुलाने तथा समाप्ति की घोषणा करने का अधिकार है किंतु संसद के एक सत्र की अन्तिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के मध्य 6 माह से अधिक का अन्तराल नहीं होगा।
राष्ट्रपति लोक सभा के प्रत्येक आम चुनाव के पश्चात  प्रथम सत्र के आरम्भ में तथा प्रत्येक वर्ष प्रथत सत्र के आरम्भ में संसद की दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को सम्बोधित करता है।
यदि किसी साधारण विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में मतभेदहो तो राष्ट्रपति ऐसे विधेयक को पास करानें के लिए संयुक्त अधिवेषन बुला सकता है। (अनुच्छेद 108)
राष्ट्रपति लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के दो प्रतिनिधयों को मनोनीति कर सकता है यदि उसकी राय में लोकसभा में इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्च प्राप्त न हो (अनुच्छेद 331) । इसी प्रकार राज्य सभा में साहित्य , विज्ञान, कला और समाजसेवा के क्षेत्र में विषेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा 12 सदस्य मनोनीति किये जाते है (अनुच्छेद 80)
संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के पश्चात ही कानून बनता है। धन विधेयक तथा संविधान संषोधन विधेयक को छोड़कर अन्य विधेयकों को राष्ट्रपति संसद को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। अनुच्छेद - 111 के अनुसार संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक जब राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति के लिए रखा जाता है। तब वह उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या अनुमति नहीं दे सकता है या उसे पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है। किंतु यदि संसद द्वारा विधेयक संषोधन सहित या रहित पुनः पारित कर दिया जाता है तब राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति देने के लिए बाध्य होता है।

ऐसे विधेयक जिन्हें राष्ट्रपति की पूर्वानुमति आवश्यक है, अधोलिखित है :
1.    धन विधेयक (अनुच्छेद 110)
2.  किसी नये राज्य का निर्माण या वर्तमान राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाले विधेयक(अनुच्छेद 3)
 राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गयी है। अतः राष्ट्रपति किसी अपराध के लिए दोषी ठहराये गये व्यक्ति के दण्ड को क्षमा कर सकता है अथवा प्रविलम्ब, परिहार, विराम या लधुकरण कर सकता है।
राष्ट्रपति को यह क्ति निम्नलिखित मामलों में प्राप्त है 
(I)   जबकि दण्ड सेना न्यायालय द्वारा दिया गया हों।
(II)    जबकि दण्ड संघीय विषय से सम्बन्धित विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया हो तथा
(III)  जबकि दण्डादेश मृत्युदण्ड हो।
क्षमा से तात्पर्य दण्ड की पूर्णतः मुक्ति से है। प्रविलम्ब के तहत मृत्युदण्ड को अस्थायी रूप से निलम्बित किया जाता है। परिहार के तहत दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन किये बिना, दण्ड की मात्रा को कम किया जाता है। लघुकरण में दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन करते हुए उसे कम किया जाता है, जबकि विराम के तहत किसी विशेष  कारण से दण्ड की मात्रा को कम कर दिया जाता है।
अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श  का अधिकार दिया गया है, जब राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का सार्वजनिक महत्व का कोई ऐसा प्रश्न  उत्पन्न हुआ है जिस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना आवश्यक है, तब वह उस प्रश्न को उच्चतम न्यायालय को राय के लिए भेजता है, किंतु वह उच्चतम न्यायालय की राय को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
राष्ट्रपति को अनुच्छेद 224 के तहत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद -217 के तहत उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  की नियुक्ति का अधिकार है। वह उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  का स्थानान्तरण भी करता है तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 145 के तहत निर्मित किये जाने वाले न्यायालय की पद्धति एवं प्रक्रिया से संबंधित नियमों को अनुमोदित करता है।
1.    राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियां - राष्ट्रपति को वित्तीय क्षेत्र में भी कुछ महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त है। राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ में संसद के दोनों सदनों के सम्मुख भारत सरकार की उस वर्ष के लिए आय और व्यय का विवरण (बजट) रखवाता है। (अनुच्छेद 112) । उसकी आज्ञा के बिना धन विधेयक अथवा वित विधेयक और अनुदान मांगे लोकसभा में प्रस्वावित नहीं की जा सकती।

2.    राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां - भारत का राष्ट्रपति तीनों सेनाओं (थल सेना, वायु सेना तथा नौ सेना) का प्रधान सेनापति होता है, अनु. 53 (2)। उसे युद्ध घोषित करने तथा शान्ति स्थापित करने की शक्ति प्राप्त है।

3.    राष्ट्रपति की राजनयिक शक्तियां - भारतीय संघ का संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति वैदेषिक क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व करता है । वह विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के लिए राजदूतों व कूटनीतिक प्रतिनिधियों की नियुक्ति करता हे और विदेशों  के राजदूत व कूटनीतिक प्रतिनिधियों के प्रमाण पत्रों को स्वीकार करता है। विदेशों  से संधियां और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से किये जाते है।

4.    राष्ट्रपति की अन्य शक्तियां - राष्ट्रपति को कुछ अन्य शक्तियां भी प्राप्त है, जो अधोलिखित है। यथा-
  • शासन सम्बंधी कार्यो को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथा मंत्रियों के कार्या को बांटने के लिए वह नियम बनाता है।
  • राष्ट्रपति वित-आयोंग , नियंत्रक-महालेखा परीक्षक, भाषा आयोग, संघ लोक सेवा आयोग एवं चुनाव आयोग की कार्यवाही रिपोर्ट को संसद के सामने प्रस्तुत करता है।
  • संघ लोक-सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या, सेवा शर्तो तथा पदावधि आदि के विषय में नियम बनाने का अधिकार राष्ट्रपति को है।
  •  निर्वाचन में भ्रष्ट आचरण के कारण कोई सदस्य सदन का सदस्य होने के लिए अनर्ह हो गया है या नही, इस प्रश्न  का विनिश्चय  राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय से करता (अनुच्छेद -103)
  • अनुच्छेद 160 के तहत राष्ट्रपति आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के क    ृत्यों के निर्वहन हेतु उपबन्ध कर सकता है,
(B) राष्ट्रपति की आपात कालीन शक्तियां - संविधान में तीन प्रकार के संकटकाल का अनुमान किया गया है, जिनके लिए राष्ट्रपति को विस्तृत संकटकालीन अधिकार प्रदान किये गये है। राष्ट्रपति निम्न तीन प्रकार के संकट या आपात की उद्घोषणा कर सकता है।

1.    राष्ट्रीय आपात - अनु. 352 के अनुसार यदि राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (संविधान के 44 वें संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित) के कारण भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा संकट में है तो वह ‘राष्ट्रीय आपात’ की उद्घोषणा कर सकता है। आपात की उद्घोषण के लिए मंत्रिमण्डल की लिखित सहमति आवश्यक  है। आपात की उद्घोषणा कर सकता है। आपात की उद्घोषणा का एक माह के भीतर संसद द्वारा इसका अनुमोदन किया जाना चाहिए। अनुमोदन के पश्चात  आपात 6 माह तक लागू रहेगा। 6 माह बाद भी लागू रखने के लिए इसका पुनः अनुमोदन आवश्यक  होगा।
ध्यातव्य है कि अनु. 352 के तहत अब तक कुल तीन बार आपात काल की घोषणा की गयी है यथा-
(I)     1962 में भारत पर चीन द्वारा आक्रमण के कारण
(II)    1971 में भारत पर पाकिस्तान के आक्रमण के कारण तथा
(III)   1975 में आन्तरिक अशान्ति के आधार पर कांग्रेस सरकार द्वारा।

2.    राष्ट्रपति शासन - संविधान के अनु.356 के अनुसार यदि किसी राज्य के राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा राष्ट्रपति को समाधान हो जाये कि उस राज्य का शासन संविधान के उपलन्धों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता , तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति आपात काल की उद्घोषणा की स्वीकृति संसद से दो माह के भीतर लेना आवश्यक  है। संसद के अनुमोदन के पश्चात  भी कोई उदघोषणा एक बार में 6 माह से अधिक समय तक और कुल मिलाकर तीन वर्ष से अधिक समय तक जारी नहीं रह सकती।

वित्तीय आपात - अनु. 360 के अनुसार यदि राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाये कि ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है, जिससे भारत अथवा उसके किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व संकट में है तो वह ‘वित्तीय आपात’ की उदघोषणा कर सकता है। ऐसी उदघोषणा 2 माह के पश्चात  प्रवर्तन में नही रहेगी, जब तक कि इसके पूर्व उसे संसद द्वारा अनुमोदित नहीं कर दिया जाता हैं।

राष्ट्रपति की विवैवेकीय शक्तियां
अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। अनु. 74 में कहा गया है कि राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा। 42वें संविधान संशोधन  1976 द्वारा अनु. 74 में संशोधन  कर यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करेगा। इस प्रकार राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया गया। किंतु 44वें संविधान संशोधन  द्वारा अनु. 74 में पुनः संशोधन  कर यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है किंतु पुनर्विचार के पश्चात दी गयी सलाह को मानने के लिए वह बाध्य है। अनुच्छेद 75 (3) में कहा गया है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। किंतु संवैधानिक परम्परा के अनुसार राष्ट्रपति अधोलिखित विवैवेकीय शक्तियों का प्रयोग करता है।
(I)  यदि लोक सभा चुनाव में खण्डित जनादेश प्राप्त होता है तो राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति में अपने विवेक  का प्रयोग करता है और सामान्यतया ऐसे दल या गठबंधन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करता हे जो उसकी राय में सदन में विश्वास  मत प्राप्त कर सकता है।
(II)   सामान्यतया मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति लोक सभा का विघटन कर देता है, किंतु यदि कोई सरकार लोकसभा में अपना बहुमत खो देती है अथवा उसके विरुद्ध अविश्वास  प्रस्ताव पारित हो जाता है और मंत्रिपरिषद लोकसभा के विघटन की सिफारिश करती है तो राष्ट्रपति ऐसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यहां वह स्वविवेकानुसार कार्य करता है।
(III)    यदि प्रधानमंत्री का आकस्मिक निधन हो जाता है तथा सत्ताधारी पार्टी किसी व्यक्ति को अपना नया नेता नहीं चुन पाती है तो राष्ट्रपति अपने विवके से सत्ताधारी पार्टी के किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता हैं। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी।
(IV)    ऐसी स्थिति में जबकि मंत्रिपरिषद ने लोकसभा में अपना विश्वास खो दिया हो किंतु त्यागपत्र देने को तैयार न हो तो राष्ट्रपति स्वविवेक से सरकार को बर्खास्त कर सकता है।
(V)   अनु. 74 के तहत मंत्रिपरिषद की सलाह को तथा अनु.111 के तहत संसद द्वारा पारित विधेयक को पुर्विचार के लिए वापस करने में भी राष्ट्रपति अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करता है। जब वह जेबी बीटो का प्रयोग करता है तब भी अपने विवके का प्रयोग करता है, क्योंकि वह स्वविवेक से ही विधेयक पर अनुमति न देने या पुर्विचार हेतु वापस न भेजने का निर्णय करता है।
(VI)   संविधान के अनु. 160 के तहत राष्ट्रपति आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन हेतु उपबंध कर सकता है।
(VII)    संसद के लिये राष्ट्रपति का अभिभाषण कैन्द्रीय मंत्रीमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।

भारत के अभी तक के राष्ट्रपति और उनका कार्यकाल

डॉ. राजेंद्र प्रसाद   - जनवरी 26, 1950 - मई 13, 1962
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन  -  मई 13, 1962 - मई 13, 1967
डॉ. जाकिर हुसैन मई   -  13, 1967 - मई 03, 1969
वराहगिरि वेंकटगिरि  (कार्यवाहक) - मई 03, 1969 - जुलाई 20, 1969
न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह (कार्यवाहक)  -   जुलाई 20, 1969 - अगस्त 24, 1969
वराहगिरि वेंकटगिरि - अगस्त 24, 1969 - अगस्त 24, 1974
फखरुद्दीन अली अहमद   -  अगस्त 24, 1974 - फरवरी 11, 1977
बी.डी. जत्ती (कार्यवाहक) -  फरवरी 11, 1977 - जुलाई 25, 1977
नीलम संजीव रेड्डी -  जुलाई 25, 1977 - जुलाई 25, 1982
ज्ञानी जैल सिंह  - जुलाई 25, 1982 - जुलाई 25, 1987
आर. वेंकटरमण   - जुलाई 25, 1987 - जुलाई 25, 1992
डॉ. शंकर दयाल शर्मा  - जुलाई 25, 1992 - जुलाई 25, 1997
के. आर. नारायणन  -   जुलाई 25, 1997 - जुलाई 25, 2002
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम  -  जुलाई 25, 2002 - जुलाई 25, 2007
श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल  -   जुलाई 25, 2007 - जुलाई 25, 2012
श्री प्रणब मुखर्जी जुलाई    - जुलाई 25, 2012 से अब तक

 उपराष्ट्रपति 

संविधान के अनुच्छेद - 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा। उपराष्ट्रपति राज्यसभा का ‘पदेन सभापति’ होता है तथा अपनी पदावधि के दौरान अन्य कोई लाभ का पद ग्रहण नहीं करता है। (अनु. 64)। भारत में उपराष्ट्रपति के पद सम्बन्धी प्रावधान अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
उपराष्ट्रपति की योग्यतायें 
अनु.66 (3) के अनुसार उपराष्ट्रपति पद के लिए किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होनी चाहिए। यथा-
(I)    वह भारत का नागरिक हो।
(II)    वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो। तथा
(III)    राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
कार्य एवं शक्तियां - 
 उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है, अतः वह राज्य सभा की कार्यवाहीका संचालन करता है, राज्य सभा में अनुशासन कायम करता है तथा राज्य सभा सदस्यों को सदन में बोलने की अनुमति प्रदान करता है। वह सदन में पेश किये विधेयको पर विचार-विमर्ष (बहस) कराता है, उस पर मतदान कराता है तथा उसका परिणाम घोषित करता है। मतों में समानता की स्थिति में राज्य सभा के सभापति के रूप उसें अपना निर्णायक मत देने का अधिकार होता है।
निर्वाचन - संविधान के अनु. 66(1) के तहत उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक गण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
- उपराष्ट्रपति को पदच्युत करने संबंधी प्रस्ताव राज्य सभा में ही प्रस्तुत किये जाते है।
- डॉ. एस. राधाकृष्णन और वी. वी. गिरि उपराष्ट्रपति बनने से पूर्व राजदूत व उच्चायुक्त थे, के.आर.   नारायण भी चीन में राजदूत रहे थे।


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