गुलज़ार अहमद वानी 17 साल क़ैद में बेगुनाह - Nazariya Now

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Tuesday, June 13, 2017

गुलज़ार अहमद वानी 17 साल क़ैद में बेगुनाह

गुलज़ार अहमद वानी 17 साल तक जेल में क़ैद रहने के बाद रिहा हुए हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेगुनाह मानते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया है।  गुलज़ार अहमद वानी को वर्ष 2000 में साबरमती एक्सप्रेस ट्रैन में हुए बम धमाकों के झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ़्तारी के समय उनकी उम्र 26 साल थी, उस समय वो अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पी.एच.डी. के स्टूडेंट थे। गुलज़ार अहमद वानी स्कॉलर थे उन्होंने 2 बार नेट की परीक्षा पास की थी। एक बेगुनाह इंसान ने अपनी ज़िन्दगी के क़ीमती 17 साल जेल में कितनी तकलीफ से गुज़ारे होंगे उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है, वो भी आतंकवादी जैसे झूठे संगीन आरोप के साथ।  गुलज़ार अहमद वानी का जेल में गुज़ारा एक एक पल किस तकलीफ के साथ गुज़ारा होगा हम सोच भी नहीं सकते।  गुलज़ार अहमद वानी के परिवार ने उनके इन्तिज़ार में ये 17 साल कितनी मुश्किल से गुज़ारे होंगे।  गुलज़ार अहमद वानी पर आतंकवादी होने का आरोप होने के कारण जेल में उनके साथ पुलिसकर्मियों और साथी क़ैदियों का बर्ताव भी केसा रहा होगा उसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।  



17 बेगुनाह होने के बावजूद सजा सिर्फ गुलज़ार अहमद वानी ने ही काटी है बल्कि उनके परिवार ने भी ये सजा जेल के बाहर काटी है। वो इंसान जो स्कॉलर रहा हो जिससे उसके परिवार बहुत उम्मीदें हों उसे आतंकवादी बताकर गिरफ्तार कर लेना। गुलज़ार अहमद वानी के पिता का  कहना है की   "जब बेटे से मिलने जाते थे तो हमको भी शक़ की नज़र से देखा जाता था, बेटा जेल में मुजरिम था और हम बाहर मुजरिम थे, इलज़ाम साबित होने के बगैर ही उनको मुजरिम साबित करने की कोशिश की गई" । इसके अलावा भी जेल के बहार उनके परिवार को समाज का तिरस्कार झेलना पड़ा होगा, लोगों ने उनके परिवार को आतंकवादी का परिवार समझकर कितना तिरस्कार किया होगा।  

गुलज़ार अहमद वानी जेल में अपनी पीएचडी पूरी करना चाहते थे लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया।  गुलज़ार अहमद वानी कहते हैं की जेल में 17 सालों में उनकी पढ़ाई का सबसे बड़ा नुक़सान हुआ। अगर गुलज़ार अहमद वानी को झूठे आरोप में गिरफ्तार नहीं किया गया होता तो वो अपनी पड़ाई पूरी करके किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर लोगों को शिक्षित कर रहे होते, उनकी शादी हो चुकी होती अपने बीवी-बच्चों के साथ एक खुशहाल ज़िन्दगी गुज़ार रहे होते।  

गुलज़ार अहमद वानी की तरह गुजरात के मुफ्ती अब्दुल कयूम ने भी बेगुनाह होने के बाद 11 साल जेल में क़ैदी की तरह गुज़ारे हैं।  वर्ष 2002 में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।  अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी।  मुफ्ती अब्दुल कयूम ने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए लम्बी क़ानूनी लड़ाई लड़ी सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेगुनाह मानते हुए सभी आरोपों से बरी किया है। मुफ्ती अब्दुल कयूम ने ''11 साल सलाखों के पीछे'' नाम से किताब लिखकर उस किताब में अपनी जेल में गुज़ारी ज़िन्दगी के बारे में बताया है।  मुफ्ती अब्दुल कयूम का कहना है कि उन्हें पुलिस के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, और उन्होंने ऐसी किसी वजह से यह किताब लिखी भी नहीं है। बल्कि यह किताब लिखने का मकसद उनकी अपनी कहानी को बयान करना और सिस्टम को जाग्रत करना है, ताकि आइंदा किसी बेगुनाह के साथ इस तरह की हरकत न की जाए। उनका दावा है कि यह किताब देश में साम्प्रदायिक सौहार्द पैदा करेगी, क्योंकि उन्होंने किताब में बताया है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट में उनकी पैरवी गैर-मुस्लिम वकीलों ने की और कैसे गैर-मुस्लिम जजों ने उनके साथ इंसाफ किया।  

गुलज़ार अहमद वानी और मुफ्ती अब्दुल कयूम ये सिर्फ दो ही उदाहरण नहीं बल्कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेगुनाह होने के बावजूद भी जेलों अपराधियों की तरह सजा काट रहे हैं।  ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नामक संस्था के मुताबिक भारत की जेलों में बन्द 80 प्रतिशत लोग बिना मुक़दमे का निर्णय हुए ही जेल-जीवन और उसकी प्रताड़नाओं को भोगने के लिए अभिशप्त हैं, इन्हें विचाराधीन क़ैदी कहा जाता है। यानी हर पाँच में चार लोग बिना अपराध साबित हुए ही जेलों में बन्द है।  अपने घर-परिवार से दूर तन्हाई, अपमान, शारीरिक-मानसिक अत्याचार, बीमारी के बीच आशा और निराशा में गोते लगा रहे हैं। संसद में एक सवाल के जवाब में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू द्वारा दिये गये सरकारी आँकड़े के मुताबिक साल 2012 के अन्त तक भारत विचाराधीन क़ैदियों यानी मुक़दमे के दौरान जेलों में बन्द क़ैदियों की संख्या 2,54,852 (दो लाख चौवन हजार आठ सौ सत्तावन) है। इनमें से 2028 विचाराधीन क़ैदी पाँच साल से ज़्यादा समय से जेल-जीवन की यातनाएँ भोग रहे हैं। 

इस साल अक्षय कुमार की एक फिल्म आई थी ''जॉली LLB2'' जिसमे बताया गया था कि किस तरह से पुलिस एक बेगुनाह को आतंकी बताकर उसे एनकाउंटर में मार देती है।  बाद में अक्षय कुमार उसे बेगुनाह साबित करने के लिए उसका केस लड़ते हैं।  इस फिल्म में बताया गया है की एक फ़र्ज़ी एनकाउंटर को सही साबित करने के खेल में पुलिस के आला अधिकारी से लेकर वकील तक सब शामिल हैं।  फिल्म में आख़िरकार सच्चाई की जीत होती है और जॉली फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति को बेगुनाह साबित करने में कामयाब हो जाता है। यह तो फिल्म की बात हुई लेकिन हक़ीक़त भी ऐसा ही  हो रहा है।   सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है, समाज में जो कुछ हो रहा है वही परदे पर दिखाया जाता है।   

हम  अक्सर सुनते और पड़ते हैं की किसी राजनेता द्वारा किसी अन्य राजनेता या व्यक्ति पर सिर्फ एक टिपण्णी या शब्द के लिए मानहानि का मुक़दमा कर देते हैं और इस तरह के मुक़दमों में हर्जाने की रक़म करोड़ों में होती है, एक तरफ सिर्फ एक टिपण्णी को मानहानि मानकर करोड़ों के हर्जाना दिया जा सकता है वहीँ दूसरी और एक बेगुनाह इंसान अपनी ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा वक़्त जेल में गुज़ार देता है क्या ये उस इंसान की मानहानि नहीं हुई ? क्या उसके परिवार ने अपराधी के परिवार होने के झूठे आरोप में समझ का जो तिरस्कार झेला है ये मानहानि नहीं है ? क्या उस बेगुनाह इंसान को हर्जाना मिलने का अधिकार नहीं है ? उस इंसान ने बेगुनाह होने के बावजूद जो सजा भुगति है उसके लिए किसे ज़िम्मेदार माना जायेगा ? जो ज़िम्मेदार हैं उनके खिलाफ क्या कार्यवाही की जाएगी ? सवाल तो बहुत से सारे हैं लेकिन एक का भी जवाब न तो पुलिस के पास है और न ही सरकार के पास होगा।  

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