देश का गौरव भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) - Nazariya Now

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Monday, June 19, 2017

देश का गौरव भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत लगातार नई नई बुलंदियां की और बढ़ रहा है। फ़रवरी 2017 में भारत ने एक साथ पहले ही प्रयास में 104 सेटेलाइट अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित करके पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया था। पहले प्रयास में इतनी बड़ी सफलता प्राप्त करने वाला भारत पहला देश है। इस बड़ी सफलता के 3 महीने के अंदर ही 5 मई 2017  को आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से जीएसएलवी- 9 उपग्रह का सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने जीएसएलवी- 9 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। इसके साथ ही आधुनिकतम संचार उपग्रह जीसैट-9  को भेजा गया। इस प्रक्षेपण में भारत ने दक्षिण एशियाई उपग्रह को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसी वर्ष जून में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने देश के सबसे ज़्यादा पॉवरफुल राकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल -मार्क 3 (जीएसएलवी मार्क 3) को भी लांच किया है । यह राकेट लगभग  640 टन वज़नी है।  जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क 3 का क्रायोजेनिक इंजन देश के वैज्ञानिकों द्वारा ही विकसित किया गया है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क 3  अंतरिक्ष में लगभग 4 टन वजनी उपग्रहों को उठा सकता है।  जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क 3  संचार यान को अंतरिक्ष में 36,000 किमी दूर भू-स्थिर कक्षाओं में लॉन्च करने में सक्षम होगा।  जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क 3 का सफल प्रक्षेपण देश को अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम साबित होगा. वर्तमान में इसरो के पास 2.2 टन तक के पेलोड को लॉन्च करने की क्षमता है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क 3  के सफल परिक्षण के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पास 4 टन तक वजनी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने की श्रमता होगी। भारत को अंतरिक्षके क्षेत्र में लगातार मिल रही बुलंदियों को हासिल करने का सारा श्रेय जाता है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को।  अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के योग्य वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत और लगन से भारत अंतरिक्ष की ऊंचाइयों छु रहा है।

 




अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 1962  में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनके करीबी सहयोगी और वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के प्रयासों से 1962 से हुई । 1962 में जब भारत सरकार द्वारा भारतीय राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इन्‍कोस्‍पार) का गठन हुआ तब भारत ने अंतरिक्ष में जाने का निर्णय लिया। कर्णधार, दूरदृष्‍टा डॉ. विक्रम साराभाई के साथ इन्‍कोस्‍पार ने ऊपरी वायुमंडलीय अनुसंधान के लिए तिरुवनंतपुरम में थुंबा भूमध्‍यरेखीय राकेट प्रमोचन केंद्र (टर्ल्‍स) की स्‍थापना की।

1969 में गठित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने तत्‍कालीन इन्‍कोस्‍पार का अधिक्रमण किया। डॉ. विक्रम साराभाई ने राष्‍ट्र के विकास में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की भूमिका तथा महत्‍व को पहचानते हुए इसरो को विकास के लिए एजेंट के रूप में कार्य करने हेतु आवश्‍यक निदेश दिए। तत्‍पश्‍चात् इसरो ने राष्‍ट्र को अंतरिक्ष आधारित सेवाएँ प्रदान करने हेतु मिशनों पर कार्य प्रारंभ किया और उन्‍हें स्‍वदेशी तौर पर प्राप्‍त करने के लिए प्रैद्योगिकी विकसित की।

इन वर्षों में इसरो ने आम जनता के लिए, राष्‍ट्र की सेवा के लिए, अंतरिक्ष विज्ञान को लाने के अपने ध्‍येय को सदा बनाए रखा है। इस प्रक्रिया में, यह विश्‍व की छठी बृहत्‍तम अंतरिक्ष एजेंसी बन गया है। इसरो के पास संचार उपग्रह (इन्‍सैट) तथा सुदूर संवेदन (आई.आर.एस.) उपग्रहों का बृहत्‍तम समूह है, जो द्रुत तथा विश्‍वसनीय संचार एवं भू प्रेक्षण की बढ़ती मांग को पूरा करता है। इसरो राष्‍ट्र के लिए उपयोग विशिष्‍ट उपग्रह उत्‍पाद एवं उपकरणों का विकास कर, प्रदान करता है: जिसमें से कुछ इस प्रकार हैं – प्रसारण, संचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन उपकरण, भौगोलिक सूचना प्रणाली, मानचित्रकला, नौवहन, दूर-चिकित्‍सा, समर्पित दूरस्‍थ शिक्षा संबंधी उपग्रह।

इन उपयोगों के अनुसार, संपूर्ण आत्‍म निर्भता हासिल करने में, लागत प्रभावी एवं विश्‍वसनीय प्रमोचक प्रणालियां विकसित करना आवश्‍यक था जो ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक राकेट (पी.एस.एल.वी.) के रूप में उभरी। प्रति‍ष्ठित पी.एस.एल.वी. अपनी विश्‍वसनीयता एवं लागत प्रभावी होने के कारण विभिन्‍न देशों के उपग्रहों का सबसे प्रिय वाहक बन गया जिसने पहले कभी न हुए ऐसे अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया। भू तुल्‍यकाली उपग्रह प्रमोचक राकेट (जी.एस.एल.वी.) को अधिक भारी और अधिक माँग वाले भू तुल्‍यकाली संचार उपग्रहों को ध्‍यान में रखते हुए विकसित किया गया।

प्रौद्योगिक क्षमता के अतिरिक्‍त, इसरो ने देश में विज्ञान एवं विज्ञान की शिक्षा में भी योगदान दिया है। अंतरिक्ष विभाग के तत्‍वावधान में सुदूर संवेदन, खगोलिकी तथा खगोल भौतिकी, वायुमंडलीय विज्ञान तथा सामान्‍य कार्यों में अंतरिक्ष विज्ञान के लिए विभिन्‍न समर्पित अनुसंधान केंद्र तथा स्‍वायत्‍त संस्‍थान कार्यरत हैं। वैज्ञानिक परियोजनाओं सहित इसरो के अपने चन्‍द्र तथा अंतरग्रहीय मिशन वैज्ञानिक समुदाय को बहुमूल्‍य आंकड़ा प्रदान करने के अलावा, विज्ञान शिक्षण को बढ़ावा देते हैं, जो कि विज्ञान को समृद्ध करता है।

भविष्‍य की तैयारी प्रौद्योगिकी में आधुनिकता बनाए रखने की कुंजी है और इसरो, जैसे-जैसे देश की आवश्‍यकताएं एवं आकांक्षाएं बढ़ती हैं, अपनी प्रौद्योगिकी को इष्‍टतमी बनाने व बढ़ाने का प्रयास करता है। इस प्रकार इसरो भारी वाहक प्रमोचितों, समानव अंतरिक्ष उड़ान परियोजनाओं, पुनरूपयोगी प्रमोचक राकेटों, सेमी-क्रायोजेनिक इंजन, एकल तथा दो चरणी कक्षा (एस.एस.टी.ओ. एवं टी.एस.टी.ओ.) राकेटों, अंतरिक्ष उपयोगों के लिए सम्मिश्र सामग्री का विकास एवं उपयोग इत्‍यादि के विकास में अग्रसर है।
अंतरिक्ष में भारत की लगातार  में बढ़ती हुई  सफलता को देखते हुए यक़ीन से कहा जा सकता है की आने वाला समय भारत का होगा। भविष्य में भारत अंतरिक्ष में अग्रणी देशों की सूची में प्रथम पंक्ति में होगा।

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