राष्ट्रपति चुनाव और दलित राजनीति - Nazariya Now

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Friday, June 23, 2017

राष्ट्रपति चुनाव और दलित राजनीति

देश में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव के लिये विपक्ष ने संयुक्त रूप से  पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है। राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए NDA की और से पहले ही रामनाथ कोविंद का नाम घोषित किया जा चूका है।  सरकार और विपक्ष दोनों ने ही दलित उम्मीदवार चुना है।  मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद  दोनों ही उच्च शिक्षित और योग्य उम्मीदवार हैं।  रामनाथ कोविंद  वकील रह चुके हैं, राज्यसभा संसद और बिहार के राज्यपाल भी  रहे हैं।  मीरा कुमार भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रही हैं।  लम्बा राजनैतिक अनुभव है,  केंद्रीय सरकार में मंत्री भी रही हैं,  लोकसभा अध्यक्ष के पद पर भी रह चुकी हैं। राजनेताओं द्वारा, मीडिया/सोशल मीडिया सभी जगह मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद  दोनों उम्मीदवारों की योग्यताओं से ज़्यादा उनकी जाति  की चर्चा की जा रही है।  

देश की राजनीती जहाँ हर मुद्दे को राजनैतिक चश्मे से देखा जाता है, हर मुद्दे पर राजनैतिक फायदा उठाया जाता है यही सब देश के प्रथम नागरिक के चुनाव के लिए हो रहा है।  पहले जाति/धर्म जैसे मुद्दे सिर्फ लोकसभा / विधानसभा चुनाव तक ही सीमित थे लेकिन वर्तमान में राष्ट्रपति चुनाव को भी जाति आधारित चुनाव बनाया जा रहा है।  शुरुआत NDA  की और से हुई जब उन्होंने रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार घोषित किया तो उनकी योग्यताओं को सामने लाने के बजाये उनकी जाति को महत्त्व दिया गया।  NDA के सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने तो यहाँ तक कह दिया की जो रामनाथ कोविंद का विरोध करे वो दलित विरोधी है।  केंद्रीय मंत्री ने ये बात किस आधार पर कही ये सोचने वाली बात है ? राष्ट्रपति चुनाव एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है देश का कोई भी नागरिक जो राष्ट्रपति पद की संविधान में दी गई योग्यताओं को पूरा करता है वो राष्ट्रपति के चुनाव में शामिल हो सकता है, इसमें वो दलित विरोधी क्यों कहलायेगा ? बहुजन समझ पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भी पहले दलित उम्मीदार होने के कारण रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की बात कही थी, लेकिन अब विपक्ष की और से भी दलित उम्मीदवार होने के कारण अब वो मीरा कुमार के समर्थन में हैं।  दोनों ही उम्मीदवारों की योग्यताओं को दरकिनार करके सिर्फ जाति के आधार उम्मीदवार बनाया गया है।  बेहतर ये होता की सरकार जाति को प्रमुख रूप से प्रचारित करने के बजाय योग्यता को प्रचारित  करती तो कम से कम देश के प्रथम नागरिक के चयन की प्रक्रियालोकसभा / विधानसभा चुनाव की तरह जाति आधारित मुद्दा नहीं बनती। 

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