इलेक्ट्रोनिक व सोशल-मीडिया पर चल रहे कारनामे - अभिषेक - Nazariya Now

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Tuesday, July 11, 2017

इलेक्ट्रोनिक व सोशल-मीडिया पर चल रहे कारनामे - अभिषेक

आजकल व्हाट्सऐप, फेसबुक ‍ट्विटर, यूट्यूब इत्यादि के ज़रिए तरह-तरह की झूठी खबरें फैलाने और लोगों के बीच नफ़रत को बढ़ाने के लिए कैसे-कैसे कारनामे चलते हैं, आइये उन पर एक नज़र डालते हैं। राजनैतिक पार्टियों ने तो अपने मुताबिक़ हवा तैयार करने के लिए ख़ुद के आई.टी. सेल्स भी बना रखे हैं। आपको मालूम ही होगा कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश से भाजपा के आई.टी. सेल के प्रमुख ध्रुव सक्सेना व अन्य का पाकिस्तान के ख़ुफि़या विभाग – आईएसआई से सम्बन्ध होने की ख़बरें आयी थीं। यहाँ हम इसी तरह के आई.टी. सेल्स की बात कर रहे हैं। आई.आई.टी. जैसे देश के उच्चतम संस्थानों में से कुछ छात्र पास होने के बाद ऐसी कम्पनियों का स्टार्ट-अप (कोई नई कम्पनी खोलना) भी शुरू कर रहे हैं जो किसी राजनैतिक पार्टी से पैसे लेकर विभिन्न तकनीकों के व्यवहार से उसके लिए प्रचार को व्यापक रूप दे। इसके लिए वे सोशल-मीडिया का काफ़ी इस्तेमाल करते हैं। किसी नेता के भाषण में आये लोगों की भीड़ को फ़ोटोशॉप द्वारा कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना। किसी नेता के भाषण या पार्टी की रैलियों के वीडियो को एडिट करके और प्रभावशाली बनाके पेश करना। विरोधियों के वाक्यांश को इस तरह से काट-छाँट कर पेश करना जिससे कि वे लोगों के मन में नकारात्मक प्रभाव डाले। इनके अलावा भी बहुत तरह से वे इन कामों को अंजाम देते हैं जिसके लिए 10 से 12 लाख तक की सालाना तनख्वाह देकर वे अपनी कम्पनी के लिए एनालिस्ट के पोस्ट पर इंजीनियर्स को रखते हैं। हमारे पहचान का एक बीटेक का छात्र है जिसने ऐसी ही एक कम्पनी में इण्टर्नशिप (ट्रेनिंग) की थी। उस समय वे लोग 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी के लिए काम कर रहे थे।


इस काम में फासिस्ट ताक़तें सबसे आगे हैं। सोशल-मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया के भरपूर इस्तेमाल से वे आम जनमानस के दिमाग़ के साथ खिलवाड़ करने और मनचाही दिशा में उनकी सोच को मोड़ने में फिलहाल सफल हो रहे हैं। अब हम सोशल-मीडिया पर चल रहे फ़ेक (फ़र्ज़ी) न्यूज़ के कुछ उदाहरण दे रहे हैं जिन्होंने पिछले दिनों काफ़ी प्रभाव डाला :

1. कुछ दिनों पहले भारतीय सेना के दो जवानों के सर कलम कर पाकिस्तान द्वारा हत्या किये जाने की ख़बर आयी। उसके बाद सोशल-मीडिया पर ऐसे वीडियो को शेयर किया जाने लगा जिसमें खुलेआम एक व्यक्ति का सर कलम किया जा रहा था। कुछ दिनों बाद मुम्बई के पंकज जैन ने पता लगाया कि यह वीडियो 2011 का था और जिस व्यक्ति को मारा गया है वो स्पेन का एक ड्रग डीलर था। ठीक इसी प्रकार का एक और वीडियो भी आया जिसमें दिखा कि किसी आर्मी के यूनिफार्म में कुछ लोग किसी व्यक्ति के गर्दन पर कुल्हाड़ी से बार-बार वार करके सर को अलग कर देते हैं। इस वीडियो की कलई खोली अहमदाबाद के प्रतीक सिन्हा ने और बताया कि वो वीडियो ब्राज़ील का है।

2. 2000 रुपये के नोट में नैनो-चिप के होने की ख़बर को ले लीजिए। इस ख़बर को तो मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी बढ़-चढ़कर दिखाया। जबकि कोई भी व्यक्ति रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया की वेबसाइट पर नये नोटों का सही विवरण साफ़-साफ़ देख सकता था जिसमें ऐसी कोई बात नहीं थी। आम लोग इन वेबसाइट्स के बारे में नहीं जानते होंगे, लेकिन हर रोज़ काफ़ी शोध करके ख़बरों का ‘ताल ठोंक के’, ‘डीएनए’ दिखाने का दावा करने वाले देश के बड़े-बड़े तथाकथित ‘देशभक्त’ पत्रकारों ने इण्टरनेट की सारी सुविधाएँ होने के बावजूद भी क्या ये सर्च नहीं किया होगा? और तो और वे ये विस्तार से समझाने में लगे हुए थे कि सैटेलाइट से नोट का सम्पर्क कैसे होगा जिससे कि धरती के 120 मीटर भीतर भी अगर काला-धन छिपाया गया हो तो उसका पता आसानी से चल जायेगा।

3. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में पाकिस्तान जि़न्दाबाद के नारे लगाये जाने की ख़बर आयी। इसमें तो कुछ मीडिया घरानों ने हद ही कर दी। एक वीडियो क्लिप को दिखाकर ये कहे जा रहे थे कि जेएनयू में पाकिस्तान जि़न्दाबाद के नारे लगाये जा रहे हैं। लेकिन कुछ ही दिनों बाद जेएनयू के छात्रों ने एक वीडियो निकाला जिसमें उन्होंने बताया कि उस क्लिप में जो छात्र नारे लगाते दिख रहे हैं, वे असल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हैं। इसके बाद न्यूज़ चैनलों ने अपने वाक्य बदले और कहा कि वे लोग ‘पाकिस्तान जि़न्दाबाद’ नहीं बल्कि ‘भारतीय कोर्ट जि़न्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। बाद में दिल्ली पुलिस ने भी जाँच के बाद कहा कि वीडियो क्लिप फ़र्ज़ी थी। इन सबके बाद भी वहाँ के छात्रों को तरह-तरह से बदनाम करने और देशद्रोही प्रमाणित करने का सिलसिला चलता रहा। जिसके अन्तर्गत एक छात्र उमर ख़ालिद का कभी लश्करे-तैयबा से सम्बन्ध तो कभी बस्तर में नक्सलियों के साथ छुपे होने की झूठी ख़बरें दिखाई गयीं। अभी हाल में हुए नक्सल हमले में सेना के जवानों के मारे जाने पर जिस फ़ोटो को दिखाकर कहा गया कि जेएनयू में इस घटना के बाद जश्न मनाया गया, वो फ़ोटो असल में साल 2015 में छात्र यूनियन के चुनाव में जीतने की ख़ुशी मनाते समय की तस्वीर थी।

4. उत्तर प्रदेश के दादरी में मुहम्मद अख़लाक़ नामक एक व्यक्ति की भीड़ के द्वारा घर में घुसकर पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। इसके पीछे भी व्हाट्सऐप पर भेजी गयी फ़र्ज़ी तस्वीर थी जिसमें दिखाया गया था कि वे एक गाय का क़त्ल कर रहे थे, लेकिन उस मांस के टुकड़े की फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद पता चला कि वो गाय का मांस नहीं था। अहमदाबाद में भी साल 2015 में एक आदमी को सोशल-मीडिया द्वारा फैलायी गयी झूठी ख़बरों के झाँसे में आकर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था।
मुज़फ़्फ़रनगर के भीषण दंगे भड़काने में भी भाजपा नेताओं ने झूठे वीडियो क्लिप का इस्तेमाल किया था।
इनके अलावा भी कई सारे उदाहरण मिल जायेंगे, जैसे कि दाउद इब्राहिम की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी, पश्चिम बंगाल में एक हिन्दू आदमी को मुसलमानों ने मिलकर मारा, शाहरुख़ ख़ान का हाफि़ज़ सईद से सम्बन्ध इत्यादि।
इस तरह के भी मैसेज आते हैं जो अन्धविश्वास और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देते हैं, जैसेकि :
“ये मैसेज अभी-अभी किसी फलाने धार्मिक-स्थल से आया है। इसे 20 लोगों को फॉरवर्ड करो तो आपका दिन बन जायेगा। अगर नहीं किया तो कोई दुर्घटना घटेगी।”
बहरहाल, अब जब इतना कुछ चल रहा है तो कुछ ऐसे लोग भी दिख रहे हैं जिन्होंने सामने आकर इन फेक न्यूज़ का पर्दाफ़ाश करने का जि़म्मा लिया है और बहुत ही बेहतरीन काम कर रहे हैं। उनमें से कुछ लोगों का नाम भी ऊपर आ चुका है। इन लोगों द्वारा चलाई जा रही कुछ वेबसाइट्स के लिंक नीचे दिये जा रहे हैं।
1. बैंगलुरु में काम कर रहे शम्स ओलियाथ का ग्रुप : https://check4spam.com/
2. अहमदाबाद में काम कर रहे प्रतीक सिन्हा : https://www.altnews.in
अगर इतना काफ़ी न लगे तो और भी कई सारे उदाहरण दिये जा सकते हैं, ताकि आप ये समझ पायें कि इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया का इस तरह से इस्तेमाल क्यों हो रहा है। हमलोग साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि इस तरह के जो भी मैसेज या ख़बरें होती हैं, उनमें कुछ चीज़ें समान नज़र आती हैं, जैसेकि लोगों में आक्रामकता, धार्मिक-कट्टरता, अन्धविश्वास जैसी चीज़ों को बढ़ावा देना जबकि विज्ञान की दुनिया में रहने वाले हम प्रगतिशील लोग ये दावा करते हैं कि ये सब तो कब के पीछे छोड़ आये हैं। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि अगर लोग आपस में बँटे रहे और रोज़मर्रा की विभिन्न समस्याओं के बावजूद सरकार पर या व्यवस्था के मालिक – पूँजीपतियों पर अपना रोष निकालने के बजाय आपस में ही लड़ते-भिड़ते रहें तो इससे यही होगा कि इस तरह के प्रतिक्रियावादी विचार समाज के शासक वर्ग को मज़बूत करने का काम करते रहेंगे और इसीलिए आर्थिक संकट की मार झेलता पूँजीवाद, जो कि फासीवाद के रूप में आ चुका है, मीडिया का इस्तेमाल और भी गन्दे व नंगे तरीक़े से करेगा और लोगों की आवारा भीड़ के माध्यम से समाज में अपनी सोच को अंजाम देता रहेगा। ऐसे में अगर आप इस आवारा भीड़ में शामिल नहीं होना चाहते हैं तो किसी भी ख़बर या सूचना को तर्क के माध्यम से अपने पहचान के लोगों से विचार-विमर्श करके उसकी वास्तविकता को खंगालने की कोशिश करें और कोई फेक न्यूज़ का पता चलते ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को बतायें।
लेखक : अभिषेक
 आलेख सौजन्य : साभार मज़दूर बिगुल समाचार

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