अख़बार (कहानी) - Nazariya Now

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Thursday, July 6, 2017

अख़बार (कहानी)

बबलू बस स्टैंड के पीछे की एक छोटी सी झुग्गी बस्ती में अपनी माँ के साथ रहता है।  बबलू के पिता एक फैक्ट्री में मज़दूर थे, जब बबलू की उम्र 2  साल थी तब फैक्ट्री में हुए एक हादसे में उनकी मौत हो गई थी।  बहुत कम उम्र में ही बबलू के सर से पिता का साया उठ गया था।  पिता की मौत के बाद बबलू की माँ ने लोगों के घरों में काम करना शुरू किया उससे थोड़े पैसे मिल जाते थे उन्ही पैसों से किसी तरह मुश्किल से गुज़ारा हो जाता था। बबलू की माँ चाहती थी की बबलू पढ़ लिखकर क़ाबिल इंसान बने और उनका नाम रोशन करे, इसलिए उसने अपने खर्चों में कमी करके थोड़े थोड़े पैसे बबलू की पढ़ाई के लिए जमा करना शुरू किये।  जब बबलू की उम्र 5 साल हुई तो उसने पास के ही एक प्राइवेट स्कूल में उसका दाखिला करा दिया।  बबलू की माँ रात में घर में सिलाई का काम भी करती सिलाई से मिलने वाले पैसे स्कूल की फीस के लिए बचाने शुरू किये। अब बबलू स्कूल जाने लगा था।  बबलू पढ़ाई में होशियार था वो मन लगाकर पढ़ाई करता।  बबलू के स्कूल यूनिफार्म में देखकर उसकी माँ ख़ुशी से फूली न समाती ।  स्कूल और मोहल्ले में सब बबलू को पसंद करते थे।  जैसे तैसे ज़िन्दगी गुज़र रही थी।  बबलू की उम्र 12  साल हो गई थी, वो अब चौथी क्लास में पहुँच गया था। कहते हैं ग़रीब घर के बच्चे बहुत जल्दी समझदार हो जाते हैं, घर के हालात उन्हें कम उम्र में ही ज़िम्मेदारियों का अहसास दिला देते हैं।  अब भी बबलू थोड़ा समझदार हो गया था वो देखता की उसकी माँ उसकी पढ़ाई और घर खर्च के लिए दिन रात कितनी मेहनत करती है, उसने सोचा की अब उसे भी कुछ काम करके माँ का हाथ बटाना चाहिए ताकि माँ का बोझ काम हो सके, लेकिन अभी उसकी उम्र बहुत कम थी ऐसे में वो आखिर क्या काम कर पाता।  बबलू अक्सर यही सोचता की वो क्या काम करे जिससे कुछ पैसे मिल सकें।



इसी तरह वक़्त गुज़र रहा था, बबलू के एग्जाम हो गए थे और गर्मी की छुट्टियां शुरू हो गईं।  बबलू ने सोच लिया स्कूल की छुट्टियां हैं वो कोई न कोई काम ढूंढ ही लेगा।  एक दिन माँ से खेलने जाने का कहकर बबलू बस स्टैंड पहुँच गया, वहां वो दुकानों पर जाकर लोगों से काम के बारे में पूछता है।  बबलू की कम उम्र देखकर सब मना कर देते हैं।  बबलू उदास मन से आसपास की दुकानों पर जाकर काम के बारे में पूछ रहा है।  पूछते पूछते वो एक बुक स्टाल पर पहुँचता हैं।  वहां जाकर बुक स्टाल के मालिक से पूछता है ''चाचाजी मेरा नाम बबलू है में पास में ही रहता हूँ , क्या मुझे आपकी दूकान में कुछ काम मिल सकता है ?'' बुक स्टाल मालिक जावेद भाई भले आदमी हैं, वो बबलू से कहते हैं ''बेटा तुम तो अभी बहुत छोटे हो, अभी तो तुम्हारी पढ़ाई करने और खेलने की उम्र है तुम फिर काम क्यों करना चाहते हो ? बबलू कहता है ''चाचाजी अभी मेरे स्कूल की छुट्टियां हैं, आजकल मैं पूरा दिन फ्री रहता हूँ, इसलिए सोचा  कुछ काम ही कर लूँ'' बबलू की  बात सुनकर जावेद भाई पूछते हैं ''तुम्हारे घर में कौन कौन हैं ?'' बबलू कहता है ''घर में बस में और मेरी माँ'' जावेद भाई पूछते हैं  ''और तुम्हारे पिता ?'' उनकी बात सुनकर  बबलू  के चेहरे पर उदासी छा जाती है, वो जवाब देता हैं ''जब में बहुत छोटा था तभी एक हादसे में उनकी मौत गई थी, मेरी माँ घरो में काम करती है उसी से घर और मेरी पढ़ाई का खर्चा निकलता है '' बबलू की बात सुनकर जावेद भाई खामोश हो जाते हैं और दिल में सोचते हैं इतने मासूम बच्चे के सर पिता का साया उठ गया है, बच्चे की माँ मेहनत करके घर और बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी पूरी कर रही है, और ये मासूम बच्चा माँ की मदद करने के लिए काम करना चाहता है, मुझे इसकी मदद इसकी करनी चाहिए । अभी वो सोच ही रहे है की बबलू कहता है ''बताइये चाचाजी कुछ काम मिलेगा ?'' जावेद भाई  कहते हैं ''बेटा अभी तुम काम करने के लिए बहुत छोटे हो, लेकिन इतनी काम उम्र में तुम अपनी माँ की मदद करने के लिए काम करना चाहते हो, इस उम्र में तुम्हारा ये जज़्बा देखकर बहुत ख़ुशी हुई,  मैं तुमसे कोई काम तो नहीं करवा सकता लेकिन मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारी पढ़ाई के लिए हर महीने पैसों से थोड़ी मदद कर सकता हूँ'' जावेद भाई की बात सुनकर बबलू के चेहरे की उदासी और बढ़ जाती है वो कहता है ''चाचाजी आप गलत समझ रहे हैं, मैं आपसे मदद नहीं मांग रहा, मैं तो सिर्फ काम करना चाहता हूँ, मैं खुद अपनी मेहनत से पैसे कमाना चाहता हूँ, लेकिन आप काम देना नहीं कहते तो कोई बात नहीं मैं चलता हूँ, कहीं और काम ढूंढता हूँ'' इतना कहकर बबलू वापस जाने लगता है।  जावेद भाई के दिल में ख्याल आता है की ये मासूम बच्चा न जाने काम के लिए कहाँ कहाँ भटकेगा और अभी ये नासमझ है कोई इसकी मासूमियत का फायदा उठाकर कोई  इसे किसी गलत काम में न लगा दे. बबलू की बातें और उसकी खुद्दारी देखकर पहले ही उनके दिल में बबलू के लिए प्यार की भावना बन बन चुकी थी, बबलू अपनी बातों से उनका दिल जीत चूका था।  उन्होंने बबलू को वापस बुलाया और कहा ''देखो बेटा पहली बात तो ये अभी तुम्हारी उम्र बहुत कम है, तुम कोई मेहनत का कम कर नहीं सकते और में खुद नहीं चाहता की तुम कोई बहुत ज़्यादा मेहनत वाला काम करो, तुम्हारी माँ भी नहीं चाहेंगी की तुम कोई बहुत ज़्यादा मेहनत का काम करो वो तो तुम्हे पड़ा लिखाकर क़ाबिल इंसान बनाना चाहती हैं, इसलिए फिलहाल ऐसा करते हैं मेरे पास तुम्हारे लिए एक आसान काम है'' जावेद भाई बबलू को बहुत प्यार से समझा रहे थे, बबलू ध्यान से उनकी बात सुन रहा था।  जावेद भाई ने आगे कहने शुरू किया ''हमारे यहाँ रोज़ शाम के वक़्त जो अखबार आते हैं,  वो तुम बस स्टैंड के आसपास बेच सकते हो उससे तुम्हे रोज़ थोड़े पैसे मिल जाया करेंगे, ज़्यादा से ज़्यादा इसमें एक घंटे डेढ़ का ही वक़्त लगा करेगा''  जावेद भाई की बात सुनकर बबलू खुश हो गया उसने कहा ''धन्यवाद चाचाजी मैं तैयार हूँ, आप कहें तो आज से ही काम शुरू कर देता हूँ'' जावेद भाई ने कहा ''कल से शुरू करते हैं,  कल से मैं तुम्हारे लिए अलग से एक छोटा बण्डल अखबार का मंगवा लिया करूँगा, तुम कल शाम को 4 बजे आ जाना'' कहते हुए उन्होंने प्यार से बबलू का सर सहलाया और कहा ''बहुत देर से बात कर रहे हैं मैं  तुम्हारे खाने के लिए कुछ मांगता हूँ'' कहकर सामने की दूकान पर आवाज़ लगाकर कहा ''2 समोसे और एक चाय भेज दो'' बबलू ने कहा ''अरे चाचाजी इसकी ज़रूरत नहीं है'' जावेद भाई बोले ''अरे बेटा खा लो काफी देर हो गई है'' सामने की दूकान से एक लड़का चाय और समोसे लेकर आता है, जावेद भाई समोसे बबलू को देकर खुद चाय का गिलास उठा लेते हैं।  बबलू कहता है  ''चाचाजी एक समोसा आप लीजिये'' जावेद भाई कहते हैं ''नहीं बेटा मुझे डॉक्टर ने मना किया है, मैं तली हुई चीज़ कम ही खाता हूँ।  समोसा खाकर बबलू ने जावेद भाई को धन्यवाद कहा और ख़ुशी ख़ुशी घर लौट आया।  बबलू ने अभी माँ को कुछ नहीं बताया था।

अगले दिन बबलू माँ से खेलने जाने का कहकर बस स्टैंड पर जावेद भाई की दुकान पर पहुंचा। बबलू ने जावेद भाई को नमस्ते किया।  जावेद भाई ने मुस्कुराकर  प्यार से बबलू के सर को सहलाया और कहा ''बैठो बेटा'' बबलू चहकते हुए बोला ''चाचाजी आप तो मुझे अखबार दीजिये अभी बेचकर आता हूँ'' जावेद भाई समझ गए बबलू काम के लिए बहुत उत्साहित है।  उन्होंने मुस्कुराते हुए अखबार का एक छोटा बण्डल बबलू को देते हुए कहा ''ये लो बेटा,  देखो बस स्टैंड पर जो लोग बस में बैठते हैं वो लोग सफर में पड़ने के लिए अखबार खरीदते हैं और आसपास जो दुकाने हैं वो लोग भी ले लेते हैं तुम उनके पास जाकर पूछना, एक अख़बार 2 रुपये का बेचना है, और संभाल कर जाना, ज़्यादा दूर नहीं जाना, सड़क पर ट्रैफिक बहुत ज़्यादा होता है इसलिए सड़क के पार भी मत जाना'' सब समझकर बबलू हाथ में अखबार का बण्डल लेकर दूकान से बाहर चला गया। उसके जाने के बाद जावेद भाई सोच रहे हैं की पता नहीं मैंने उस मासूम बच्चे को काम देकर सही किया या गलत ? इस उम्र में मासूम पर काम का बोझ सही नहीं है, फिर उन्होंने सोचा की अगर वो बबलू को काम नहीं देते तो वो कही और काम ढूंढ़ने जाता और दुनिया में बहुत से लोग हैं जो लोगों की मजबूरी और मासूमियत का फयदा उठाकर उन्हें गलत कामों में लगाकर अपराधी बना देते हैं, कम से कम इस तरह बबलू उनसे रोज़ मिलता रहेगा और वो किसी न किसी बहाने से उसकी थोड़ी बहुत मदद भी कर दिया करेंगे।

थोड़ी देर बाद बबलू लौट आया उसके सारे अखबार बिक गए थे।  वो ख़ुशी से चहकता हुआ आया और बोला ''चाचाजी मैंने सारे अखबार बेच दिए, देखिये ये रहे पैसे'' इतना कहकर बबलू ने जेब से पैसे निकलकर काउंटर पर रख दिए।  जावेद भाई ने बबलू की पीठ ठोककर उसे शाबाशी दी और उन पैसों में से कुछ पैसे बबलू को दिए और कहा ''ये लो बेटा तुम्हारी पहली क़माई'' बबलू ने ख़ुशी से चहकते हुए पैसे ले लिए और जावेद भाई को धन्यवाद कहा।  जावेद भाई ने मुस्कुराकर बबलू को देखा बबलू की आँखों में एक चमक थी।  फिर बबलू ने कहा ''चाचाजी ऐसा किया कीजिये की आप मुझे रोज़ पैसे देने के बजाये हर हफ्ते पैसे दिया कीजियेगा उससे मुझे इकठ्ठे पैसे मिल जाया करेंगे'' जावेद भाई ने कहा ''ठीक है ऐसा ही करेंगे''  फिर ख़ुशी से चहकता हुआ बबलू घर चला गया। 

अब बबलू रोज़ शाम को जावेद भाई की दूकान से अखबार लेता और वही बस स्टैंड के आसपास जाकर बेच देता।  हर हफ्ते जावेद भाई बबलू को उसको उसके हिस्से के पैसों में अपनी तरफ से थोड़े और पैसे मिलाकर दे देते, इस तरह वो बबलू को बिना बताये उसकी मदद करते रहते।  जावेद भाई को  बबलू से बहुत लगाव हो गया था, वो बबलू को अपने बेटे की तरह मानते और उसका बहुत ध्यान रखते।  बबलू ने माँ को अखबार बेचने के काम के बारे मे बता दिया था, पहले तो बबलू की माँ बहुत नाराज़ हुई, वो नहीं चाहती थी बबलू इतनी कम उम्र में काम करे वो चाहती थी की अभी बबलू पूरा ध्यान पढ़ाई में ही लगाए अभी उसकी काम करने की उम्र ही कहाँ हुई है, लेकिन बबलू ने ज़िद करके माँ को मना लिया, उसने माँ से कहा ''माँ सिर्फ एक डेढ़ घंटे का ही काम है और चाचाजी भी बहुत अच्छे है वो मेरा बहुत ध्यान रखते हैं,  आप बिलकुल फ़िक्र मत करो'' बहुत मुश्किल से आखिर माँ को उसकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा।  बबलू के स्कूल की छुट्टियां ख़त्म हो गई थी।  बबलू सुबह स्कूल जाता, स्कूल से आकर थोड़ी देर घर में पड़े करता और फिर खाना खाकर अखबार लेने जावेद भाई की दूकान  पहुँच जाता।  हर हफ्ते उसे जावेद भाई से जो पैसे मिलते वो उन्हें माँ को ले जाकर दे देता माँ उसमे से कुछ पैसे बबलू को देकर और बाक़ी पैसे ये सोचकर  गुल्लक में डाल देती की आगे बबलू की पढ़ाई में काम आएंगे।  बबलू ने बचपन से माँ को पुरानी साड़ी पहने हुए ही देखा है माँ कभी अपने लिए नई साड़ी नहीं खरीदती, जिन घरों माँ काम करती हैं अक्सर वही से पुरानी साड़ी मिल जाती है वही वो पहनती है।  बबलू ने सोचा वो माँ को नई साड़ी लेकर देगा, ये सोचकर उसने पैसे जमा करने शुरू किये।

धीरे धीरे वक़्त गुज़र रहा था।  एक दिन बबलू ने अपने जमा किये हुए पैसे गए तो वो कुल 460 रुपये थे।  बबलू खुश  हो गया उसने सोचा इतने पैसों में तो नई साड़ी आ जानी चाहिए।  यही सोचकर उसने पैसे जेब में रखे और बस स्टैंड पर जावेद भाई के बुक स्टाल पहुँच गया, उसने कहा ''चाचाजी लाइए अखबार'' जावेद भाई बोले ''बेटा अभी तो 3 ही बजा है, अख़बार 330 बजे तक आते हैं, तुम आज जल्द आ गए, अभी बैठो थोड़ी देर में अखबार की गाडी आ जाएगी, समोसा खाओगे में मंगवाता हूँ'' कहकर सामने की दूकान पर आवाज़ लगाने ही वाले थे की बबलू ने कहा ''चाचाजी रहने दीजिये अभी मन नहीं है'' जावेद भाई ने पुछा ''क्या बात है'' बबलू बोला ''कोई बात नहीं बस अभी घर से खाना खाकर आया हूँ इसलिए ऐसे ही मन नहीं '' जावेद भाई ने कहा ''अच्छा ठीक है'' फिर उसकी घर और पढ़ाई में बारे में बात करते रहे। फिर बबलू बोला '''चाचाजी में अभी आता हूँ'' जावेद भाई ने पुछा ''कहाँ जा रहे हो ?'' बबलू ने कहा ''बस अभी आया थोड़ी देर मैं'' इतना कहकर बबलू मुस्कुराता हुआ चला गया।

बबलू एक साड़ी की दूकान पर  पहुंचता है और दुकानदार से कहता है ''मुझे एक साड़ी खरीदनी है।'' दुकानदार बबलू को हैरत  से देखता है, पहले कभी कोई इतना छोटा बच्चा उसकी दूकान  पर साड़ी खरीदने नहीं आया।  दूकानदार पूछता है ''किसके लिए खरीदनी है, पैसे हैं तुम्हारे पास ?'' बबलू कहता है ''माँ के लिए खरीदनी है, और मेरे पास पैसे हैं, आप साड़ी दिखाइए'' दूकानदार अपने कर्मचारी से बबलू का मज़ाक़ उड़ाने वाले अंदाज़ में कहता है ''इसे अपनी माँ के लिए साड़ी खरीदनी है, सबसे अच्छी और महंगी  वाली साड़ी निकलकर लाओ'' दुकानदार की बात सुनकर उसका कर्मचारी बबलू की और देखकर ज़ोर ज़ोर से हसने लगता है, दुकानदार भी ठहाका मारकर हँसता है।  बबलू समझ जाता है वो दोनों उसका ,मज़ाक़ उड़ा रहे हैं, वो कहता ''आप मुझे थोड़ी सस्ती वाली साड़ी दिखाइये'' दूकानदार कहता है ''ठीक है अंदर आ जा बाहर से  तू कहीं साड़ी लेकर भाग गया तो चल अंदर आकर बैठ जा'' उसकी बात सुनकर बबलू को बहुत गुस्सा आता है, उसका मन ये सोचकर उदास हो जाता ही की दुकानदार उसे चोर समझ रहा है, लेकिन वो अपने गुस्से पर काबू करता हुआ कहता है ''मैं कोई चोर नहीं हूँ, मैं साड़ी खरीदने के लिए पैसे लेकर आया हूँ'' बबलू की बात सुनकर दुकानदार पूछता है ''कितने पैसे हैं तेरे पास ?'' बबलू कहता है ''460 रुपये'' दुकानदार धीरे से उसके कर्मचारी से कुछ कहता है, कर्मचारी कुटिलतापूर्ण तरीके से मुस्कुराते हुए ऊपर की अलमारी में से कुछ साड़ियां उतारकर बबलू के सामने रख देता है।  दुकानदार कहता है ''इतने पैसों में इनमे से कोई भी एक साड़ी आ जाएगी'' बबलू को साड़ी के बारे में कोई जानकारी नहीं है वो बस एक लाल रंग की साडी जिसकी बॉर्डर पर हल्का डिज़ाइन है उसे उठाकर कहता है ''ये अच्छी है यही दे दो'' इतना कहकर जेब से 460 रुपये निकलकर दूकानदार के सामने रख देता है।  दुकानदार पैसे उठाकर रख लेता है और साड़ी एक पन्नी में रखकर बबलू को देते हुए कहता है ''बिकी हुई चीज़ वापस नहीं होगी और न बदली जाएगी इसलिए वापस लेकर मत आना'' बबलू कहता है ''ठीक है'' इतना कहकर साड़ी की पन्नी हाथ में लेकर दूकान से बहार निकल जाता है, उसके जाते ही दूकानदार और कर्मचारी ठहाका मारकर हँसते है और कर्मचारी कहता है ''वह लालाजी आपका जवाब नहीं पुराने स्टॉक की डिफेक्टिव साड़ी 460 रुपये में बेच दी, ऐसे ही 2-3 बेवक़ूफ़ रोज़ आ जाएँ तो हमारा सारा डिफेक्टिव स्टॉक बिक जाये'' दोनों एक बार फिर ठहाका मारकर हँसते हैं।  

बबलू जावेद भाई की दूकान की तरफ जा रहा है,  दुकानदार ने उसे चोर समझा ये सोचकर वो थोड़ा उदास है।  फिर उसे ख्याल आता है की जब वो माँ को साड़ी ले जाकर देगा तो माँ कितनी खुश होगी ये सोचकर उदासी खत्म हो जाती हैं, वो मुस्कुराता हुआ जावेद भाई की दुकान में दाखिल होता है।  वो देखता है दूकान में अखबार के बंडल भी आ चुके हैं। जावेद भाई पूछते हैं ''बेटा कहाँ चले गए थे, और ये हाथ में क्या है'' बबलू ख़ुशी से चहकता हुआ कहता है ''चाचाजी माँ के लिए साड़ी लेने गया था, मेरे पास पैसे जमा हो गए थे मैने सोचा माँ के पास एक भी नई साड़ी नहीं है इसलिए उनके लिए नई साड़ी ले लेता हूँ'' जावेद भाई आगे बढ़कर बबलू को गले लगाकर बोले ''बेटा तुम्हारी माँ बहुत खुशनसीब है जो खुदा ने उन्हें तुम्हारे जैसा बेटा दिया'' बबलू ने कहा ''चाचाजी आप ये साड़ी यही रखिये में अभी अखबार बेचकर आता हूँ, आज मुझे जल्दी घर पहुंचना है '' इतना कहकर साड़ी काउंटर पर रखकर अखबार का बण्डल उठाकर दूकान से बाहर  निकल जाता है। जावेद भाई मुस्कुराते हुए बबलू को जाते हुए देखते हैं।  

थोड़ी देर में बबलू के आधे से ज़्यादा अखबार बिक चुके हैं, बस थोड़े से और बाक़ी हैं बबलू सोच रहा है जल्दी से सारे अखबार बिक जाये तो वो जल्दी से घर पहुँच जाये।  बबलू माँ को साड़ी देने के लिए बहुत उत्साहित है, वो जल्दी से जल्दी घर पहुंचकर माँ को साड़ी देना चाहता है। अब बस 10 -12 अखबार और बचे हैं, वो वापस जावेद भाई के बुक स्टॉल पर आता है और कहता है ''चाचाजी सारे  अखबार बिक गए हैं बस 10 -12 और बचे हैं, मैं ऐसा करता हूँ कि इन बचे हुए अख़बारों को साथ ले जाता हूँ रास्ते में ही बेच दूंगा'' जावेद भाई कहते हैं ''अरे बेटा कोई बात नहीं, ये बच गए तो इन्हे छोड़ दो, परेशान मत हो, तुम घर चले जाओ आज तुम्हे जल्दी घर जाना चाहते थे'' बबलू जवाब में कहता है ''नहीं चाचाजी घर तो में जा ही रहा हूँ, रास्ते में बहुत लोग मिलते हैं ये अखबार रास्ते  में बिक ही जायेंगे'' इतना कहकर बबलू साड़ी और अखबार लेकर चला जाता है।

बबलू बस स्टैंड की मुख्य सड़क के पास से गुज़र रहा है, वो देखता है की सड़क के दूसरी तरफ कुछ चाट और चाऊमीन के 2 -3 ठेले हैं, उनके पास चाट/चाऊमीन खाने के लिए बहुत से लोग खड़े हैं, बबलू सोचता हैं वहां जाता हूँ, वहां बहुत से लोग हैं, बचे हुए सारे अखबार वहां  बिक सकते हैं।  फिर उसे ख्याल आता है की चाचाजी ने सड़क के दूसरी तरफ जाने से मना किया था क्योंकि सड़क पर ट्रैफिक बहुत ज़्यादा होता है, फिर वो सोचता है आज चला जाता हूँ फिर नहीं जाऊंगा चाचाजी को बताऊंगा ही नहीं की मैं सड़क के पार गया था तो उन्हें पता भी नहीं चलेगा।  यही सोचते हुए जल्दी से सड़क पर पहुँच जाता है।  अभी वो सड़क के बीच में था की एक तेज़ रफ़्तार से आ रही कार की ज़ोरदार टक्कर लगती है, कार की रफ़्तार बहुत ज़्यादा थी जिसकी वजह से टक्कर बहुत ज़ोरदार लगी, बबलू उछाल कर डिवाइडर से टकराता है, उसके सर में बहुत चोट आती है। कार वाला बिना रुके गाडी और तेज़ करके भाग जाता है।  बबलू सड़क पर तड़प रहा है, सर से बहुत ज़्यादा खून बह रहा है। बबलू के आसपास भीड़ इकठ्ठी हो गई है, लोग आपस में बात कर रहे हैं, कोई कह रहा है पुलिस को बुलाओ, कोई एम्बुलेंस को बुलाने के लिए कह रहा है, सब एक दूसरे से कह रहे हैं कोई आगे बढ़कर बबलू के पास नहीं जा रहा है।  थोड़ी देर में पुलिस आ जाती है, पुलिस भीड़ से पूछताछ करती है, ''टक्कर किसने मारी ? किसी ने गाडी का नंबर नोट किया था क्या ? ये बच्चा कौन है ? कोई इसे जनता है क्या ?'' भीड़ में कुछ लोग बताते हैं की गाडी का नंबर नोट नहीं कर पाए क्योकि गाडी बहुत स्पीड में थी, सिर्फ इतना, मालूम चलता ही की गाड़ी  लाल रंग की कार थी।  थोड़ी देर में एम्बुलेंस भी आ गई, बबलू को उठाकर एम्बुलेंस से हॉस्पिटल ले जाया जाता है। अखबार वहीं सड़क पर फैले हुए हैं, माँ के लिए जो साड़ी ली थी वो खून से लथपथ बबलू के पास ही पड़ी हुई है।

सड़क पर अखबार बेचते बच्चे के एक्सीडेंट की खबर जावेद भाई तक भी पहुँचती है।  खबर सुनते ही जावेद भाई घबरा जाते हैं और भागकर वहां पहुंचते है तो देखते हैं सड़क पर खून फैला है, खून से सने कुछ अखबार भी सड़क पर फैले हुए हैं और खून से लतपथ साड़ी भी वहीँ पड़ी हुई है, आसपास मालूम करते हैं तो पता चलता है बबलू को एम्बुलेंस में सरकारी अस्पताल ले गए हैं।  जावेद भाई जल्दी से बुक स्टॉल पहुंचकर अपनी स्कूटर लेकर अस्पताल के लिए निकल जाते हैं हड़बड़ाहट में वो दूकान बंद करना भी भूल जाते हैं।  दिल ही दिल में बबलू की सलामती की दुआ करते हुए वो अस्पताल की तरफ बढ़ रहे हैं, उनके दिल में बहुत बैचेनी और फ़िक्र है। जावेद भाई अस्पताल पहुँचते हैं तो उन्हें पता चलता है की बबलू की मौत हो गई है, पोस्टमार्टम के बाद बॉडी उसके घरवालों को दे दी जाएगी ।  उनका प्यारा बबलू नहीं रहा जानकार जावेद भाई सहम जाते हैं, वो सदमे में वहीँ बैठ जाते हैं, उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।  पुलिस ने बस स्टैंड के आसपास पूछताछ करके बबलू के घर पता लगा लिया है और बबलू की माँ को अस्पताल बुलवा लिया है।  बबलू की माँ रोते हुए अस्पताल पहुँचती हैं उनके साथ उनके आसपड़ोस के कुछ लोग भी हैं।

बबलू की माँ की हालत बहुत ख़राब है वो बहुत रो रही हैं, लोग उन्हें समझने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन रो रोकर उनका बुरा हाल है, उन्होंने अपनी सबसे क़ीमती चीज़ खो दी है, जिसके लिए उन्होंने दिन-रात सपने देखे और उन सपनो सच करने के लिए दिन रात मेहनत की वो बबलू आज अचानक उन्हें अकेला छोड़कर चला गया है, वो इस बात पर यक़ीन ही नहीं कर पा रही हैं। पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने कुछ कागज़ी कार्यवाही करके बबलू की लाश बबलू की माँ को सौंप दी गई है।  अस्पताल की एम्बुलेंस बबलू की लाश, उसकी रोती बिलखती माँ और उसके पड़ोसीयों को लेकर उसके घर की तरफ जा रही है, जावेद भाई भी आँखों में आंसू लिए अपनी स्कूटर से एम्बुलेंस के पीछे पीछे जा रहे हैं। अगले दिन अख़बार में बबलू की मौत की खबर छपी है।  

लेखक : शहाब ख़ान  'सिफ़र'

©Nazariya Now

हैसियत  - (ग़रीबी और मुफलिसी  के दर्द  को बयान करती कहानी - लेखक : डॉ. ज़फर खान)



 

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