राजनीति और अवसरवाद - Nazariya Now

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Thursday, July 27, 2017

राजनीति और अवसरवाद

बिहार में नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादब की पार्टी का चुनाव में बना गठबंधन आखिर टूट ही गया।  कभी एक दूसरे के विरोधी रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने बिहार में बीजेपी को हारने के लिए गठबंधन  करके चुनाव लड़ा था।  बिहार चुनाव से पहले नितीश कुमार और बीजेपी में काफी गतिरोध था, उस समय नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों के ही पास बीजेपी को रोकने के लिए गठबंधन ही एकमात्र विकल्प था।  गठबंधन से दोनों ही पार्टियों को राजनैतिक फायदा भी हुआ, लालू नितीश को चुनाव में जीत मिली और बिहार में गठबंधन की सरकार बनी। बिहार चुनाव के समय बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था की अगर नितीश कुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे तो पाकिस्तान में फटाके फूटेंगे, तब ये बात इसलिए कही गई थी क्योंकि तब नितीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे। नितीश कुमार ने इस्तीफा दिया और 24 घंटे के अंदर ही दुबारा बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।  वर्तमान में नितीश कुमार और बीजेपी को दोनों को  साथ आने में फायदा नज़र आ रहा है, इसलिए पुराने मतभेदों को भुला दिया गया।  एक समय नितीश कुमार ने अपनी छवि को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए मोदी और बीजेपी का विरोध किया था क्योंकि तब उन्हें खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने में राजनैतिक फायदा नज़र आ रहा था लेकिन वर्तमान में उन्हें बीजेपी से हाथ मिलाने में फायदा नज़र आ रहा है।  हालाँकि नितीश कुमार की पार्टी  जदयू के कई नेता बीजेपी से गठबंधन के पक्ष में नहीं है। जदयू के वरिष्‍ठ नेता शरद यादव नितीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल भी नहीं हुए हैं, वहीँ जेडीयू सांसद वीरेंद्र कुमार ने कहा की ''अगर उन्‍हें जबरदस्‍ती एनडीए का समर्थन करने को कहा गया तो वो इस्‍तीफा दे देंगे'' जदयू के कुछ अन्य विधायक भी इस गठबंधन के विरोध में हैं।  नितीश कुमार और बीजेपी के गठबंधन से दोनों क्या फायदा नुकसान होगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन इस सब घटनाक्रम में एक बार फिर देश के सामने अवसरवाद की राजनीति का एक और नया चेहरा नज़र आया है।  


राजनीति में  राजनैतिक फायदे-नुकसान के आधार पर गठबंधन बनते टूटते हैं। कहा जाता है राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न स्थाई दुश्मन होता है।  वक़्त और राजनैतिक समीकरण के हिसाब से राजनैतिक रिश्ते बनाये और तोड़े जाते हैं। राजनेता वर्तमान फायदे नुकसान के आधार पर पार्टी बदलते रहे हैं। कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रही पार्टियां सरकार बनाने के लिए गठबंधन कर लेती हैं।  देश की राजनीति में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनमे एक दूसरे की धुर विरोधी पार्टीयों ने सत्ता के लिए गठबंधन किया है, साथ ही ऐसे भी कई उदाहरण हैं जिनमे चुनावी समीकरण के हिसाब से गठबंधन को तोड़ा भी  है।  वर्तमान में कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी गठबंधन की सरकार है, दोनों ही पार्टियों के विचारों में कोई समानता न होने के बावजूद सत्ता के लिए गठबन्धन की सरकार चला रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव में अवसरवाद की राजनीति के कई उदाहरण नज़र आये।  कांग्रेस और समाजदवादी पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा और चुनाव के नतीजों के बाद दोनों ही पार्टियों के नेता गठबन्धन को अपनी गलती कहते नज़र आये।  गोवा के चुनावी नतीजों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन  निर्दलीय और अन्य विधायक को जोड़कर बीजेपी ने सरकार बनाई।  गोवा में निर्दलीय और अन्य विधायकों ने बीजेपी को समर्थन देकर अवसर का फायदा हासिल किया।  

गठबंधन और दलबदल के साथ विभिन्न मुद्दों को राजनैतिक फायदे नुकसान के आधार पर इस्तेमाल किया जाता है।  हर मुद्दे को अवसर के अनुसार उछाला और दबाया जाता है।  धर्म, जाति, क्षेत्रवाद विभिन्न मुद्दों को अवसर के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।  किसी मुद्दे को एक राज्य में राजनैतिक फायदा मिलने की सम्भावना के आधार पर अपने एजेंडे में शामिल किया जाता है तो उसी मुद्दे को किसी अन्य राज्य में राजनैतिक नुकसान की सम्भावना को देखते हुए छोड़ दिया जाता है, उदाहरण के तौर पर बीफ बैन का मुद्दे को ही देख लें, वर्तमान में ये राम मंदिर मुद्दे के बाद बीजेपी का दूसरा सबसे प्रमुख मुद्दा है, विभिन्न राज्यों में बीजेपी ने राजनैतिक फायदे के लिए इसे खूब इस्तेमाल किया है, वहीँ दूसरी और गोवा और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में इस मुद्दे से परहेज़ किया है।  एक तरफ बीजेपी पूरे देश में बीफ बैन की बात कहती है वहीँ दूसरी और गोवा के मुख्यमंत्री खुद कहते हैं की राज्य में बीफ की कमी नहीं होने दी जाएगी।  ये भी असरवाद की राजनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है।  बहुत से मुद्दों को सत्ता और विपक्ष अपने अपने वर्तमान राजनैतिक फायदे के आधार पर अपने एजेंडे में शामिल करते है और निकालते हैं।  विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों को देशविरोधी, जनविरोधी कहा जाता है सत्ता में आने के बाद उन्ही मुद्दों को प्रमुखता से अपने एजेंडे में शामिल कर लिया जाता है।  देश में ऐसे कई उदाहरण है जब विपक्ष में रहते हुए विरोध करने वाली पार्टी ने सत्ता हासिल करने के बाद अपने सुर बदले हों, उदाहरण के तौर पर हम FDI, GST आदि को देख  सकते हैं जिसे बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए इन्हे जनविरोधी कहते हुए सड़क से संसद तक विरोध किया था और सरकार बनने के बाद इन्हे लागू किया, इनके अलावा और भी बहुत से उदाहरण हैं। जब कोई नेता अपनी पार्टी छोड़कर अन्य किसी पार्टी में शामिल होता है तो लोग और मीडिया उसे बाग़ी कहते हैं सही मायने में उसे बाग़ी कहने के बजाये अवसरवादी कहना ज़्यादा सही है। राजनीति में फायदे और नुकसान के हिसाब से फेरबदल होते रहते।  वर्तमान में अवसर का फायदा उठाकर राज करने की नीति ही राजनीति बन गई है।  हर मुद्दे को अवसर को तौर पर इस्मेमाल किया जाने लगा है। सिद्धांतों की जगह अवसरवाद ने ले ली है।  वर्तमान में जनता अवसरवाद की राजनीतिक चक्की में जनता सत्ता विपक्ष  दो  पाटों के बीच पिसती जा रही है।  जब तक राजनेता और राजनैतिक पार्टियां अवसरवाद को छोड़कर देशहित के बारे  में नहीं सोचेंगे तब तक देश का विकास हो पाना संभव नहीं हैं ।

शहाब ख़ान  'सिफ़र'
©Nazariya Now



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