बाबाओं का मायाजाल और ज़िन्दगी बदलने की लड़ाई के ज़रूरी सवाल - ✍ अरविन्द - Nazariya Now

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Saturday, August 26, 2017

बाबाओं का मायाजाल और ज़िन्दगी बदलने की लड़ाई के ज़रूरी सवाल - ✍ अरविन्द

हमारे प्यारे भारत वर्ष को यदि कृषिप्रधान के साथ-साथ बाबाप्रधान देश भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह कहने का कारण भी बड़ा ही साफ़ है। क्योंकि यहाँ पर आपको डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ तो बसेरा करती नहीं दिखेंगी किन्तु यत्र-तत्र-सर्वत्र बाबा (और बाबियाँ भी) जरूर नज़र आ जायेंगे। आप इनके कपड़ों से धोखा खाकर इन्हें एक लकड़ी से हाँकने का प्रयास करेंगे तो गच्चा खा सकते हैं। इनकी तमाम किस्में हैं और ये किस्में एक-दूसरी से पूरी तरह अलहदा भी हैं। सभी का भक्तों का अपना-अपना साम्राज्य है तथा साम्राज्य को कायम रखने के अपने-अपने विशिष्ट किस्म के हथकण्डे।


आपको बाबाओं के जंगल में कहीं बलात्कारी आसाराम बापू व नारायण साईं दिखेंगे जो खुद तो जेल में हैं लेकिन बच्चे उनकी महानता को जानने के लिए उनके जीवन के बारे में सरकारी पाठ्यक्रम में पढ़ रहे हैं जबकि वे परदे के पीछे से अपने मुकदमों के गवाहों पर जानलेवा हमला करवा रहे हैं और उनकी हत्याएँ करा रहे हैं। कहीं आपको रामपाल दास के दर्शन होंगे जिसने ठगी को नये आयामों तक पहुँचा दिया था और हरियाणा राज्य के साथ घमासान का रण छेड़ दिया था। इनकी महत्ता आज भी बरकरार है और आप स्वयं इनकी पेशी के समय रोहतक की सड़कों पर इनके भक्तों के करुण क्रन्दन को सुन सकते हैं और अपने गुरु की गाड़ी की टायर-रज की पैकिंग करते हुए इन्हें साक्षात देख भी सकते हैं क्योंकि पद-रज तक इनकी पहुँच को सरकार ने थोड़ा मुश्किल बना दिया है। आपको कहीं आशुतोष जी महाराज दिखेंगे जिनके भक्त पिछले दिनों अपने गुरु जी की लाश इस उम्मीद के साथ लिये बैठे थे कि गुरु जी समाधि से बाहर निकलेंगे लेकिन खेद है कि उक्त महाशय समाधि से सीधे मोक्ष धाम पधार गये और भक्तों को निराश कर गये। आपको इस पवित्र भूमि पर श्री श्री रविशंकर जैसे उच्च वर्गीय बाबा भी नज़र आयेंगे जिन्होंने खाये-पिये लोगों को जीने की कला सिखाते हुए बाई प्रोडक्ट के तौर पर देश की भोली-ग़रीब जनता को पैसा कमाने की कला सिखलाने की भी पूरी कोशिश की। आपको यहाँ गुरमीत राम रहीम जी के दर्शन भी हो जायेंगे जिनके ऊपर बलात्कार, गवाहों की हत्या, 300 चेलों को नपुंसक बनाने के आरोप लगे हैं किन्तु ये महोदय अब भी ‘मैसेंजर आॅफ गाॅड’ बने हुए हैं। हमेशा नाक पकड़कर पेट को अन्दर-बाहर करते प्रतीत होेने वाले बाबा रामदेव के तो कहने ही क्या! पातंजलि ऋषि ने कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि उनका कोई शिष्य योग को कामधेनु गाय में बदलकर इससे अथाह धन दुह सकेगा। काले धन के मसले पर धरती-आसमान एक कर देने वाले बाबा रामदेव मोदी सरकार बनने के बाद लगता है मौन व्रत में चले गये हैं।

कहीं निर्मल बाबा तो कहीं कृपालु महाराज,  तो कहीं भीमानन्द, कहीं सारथी बाबा तो कहीं प्रेमानन्द, कहीं बिन्दू बाबा तो कहीं नित्यानन्द; कहने की जरूरत नहीं है कि आपको अपने साम्राज्य बसाये, दन्द-फन्द और गन्द में लोट लगाते इतने बाबा मिल जायेंगे कि जिनके परिचय मात्रा से सैकड़ों पन्ने काले किये जा सकते हैं। बस कसर रह गयी थी एक राधे माँ की! खुद को दुर्गा का अवतार बताने वाली ये मोहतरमा फ़ि‍ल्मी गानों की धुन पर छोटे-छोटे कपड़ों में अश्लील किस्म का नृत्य करते हुए अपने असली रूप में भी अपने भक्तों को दर्शन देती रहती हैं। विभिन्न आरोप व छोटे-मोटे मुकदमे लगने के बाद इनके सितारे आजकल थोड़ा गर्दिश में चले गये हैं लेकिन इनके भक्तों की श्रद्धा-भक्ति-विश्वास की भावना आज भी देखते ही बनती है।

जिस तरह से हर जगह की अपनी विशेषता होती है वैसे ही पुण्य भूमि भारत खण्डे की अपनी विशेषता है। यहाँ श्रद्ध वानम् लभते ज्ञानम् और गुरु बिन ज्ञान नहीं आदि सूक्तियों को पूरी इज़्ज़त बख्शी जाती है। यहाँ अमीरों और ग़रीबों के लिए अलग-अलग किस्म के बाबा भी  हैं और बहुत सारे डेरे, आलीशान मन्दिर, आश्रम व कुम्भ मेलों जैसे आयोजन व शुभ स्नान भी हैं।

अब सवाल यह उठता है कि इतनी पुण्यात्माएँ और ईश्वर के इतने एजेण्ट होने के बावजूद हमारे यहाँ पर इतनी ग़रीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण व बदहाली का आलम क्यों है? ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में लम्बे डग भरे जाने के बावजूद आज भी हमारे यहाँ लोग झाड़-फूँक, पवित्र स्नानों, रूढ़ि‍वादी मूल्यों और अन्धविश्वास से क्यों नहीं निकल पा रहे हैं? पढ़ा लिखा तबका भी अतार्किकता व कूपमण्डूकता की गर्त में क्यों डूबा हुआ है?

पूँजीवादी व्यवस्था आज पूरी तरह से धर्म का पँूजीवादीकरण कर चुकी है। जनता को तमाम दिक्कतों के पैदा होने के असली कारण का नहीं पता चले, वह गरीबी-भुखमरी-बेरोजगारी के  लिए व्यवस्था को कटघरे में न खड़ा कर दे इसलिए उस पर भाग्यवाद का जुआठा लाद दिया गया है। तमाम पाखण्डी धार्मिक बाबा, पण्डे-पुजारी, मुल्ले-मौलवी जनता की चेतना को कुन्द करने के लिए ही काम करते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था जनता पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म का सहायक के रूप में इस्तेमाल करती है। तमाम तरह के बगुलाभक्त पाखण्डी खुद ऐशो-आराम का जीवन जीते हैं जबकि जनता को त्याग, आत्मसुधार और परलोक को सुधारने का पाठ पढ़ाते रहते हैं। वर्ग चेतना के अभाव में व्यापक मेहनतकश जनता मौजूदा व्यवस्था की जटिलता को नहीं समझ पाती। समस्याओं के असली कारणों की पड़ताल करके इन्हें हल करने के बजाय अपनी भौतिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए धर्म-कर्म के चक्कर में आ जाने, भाग्य के सामने नतमस्तक हो जाने का आधार ख़ुद यह व्यवस्था मुहैया कराती है। असुरक्षा और भय एक काल्पनिक शक्ति में विश्वास का कारण बनते हैं और जब असुरक्षा और भय के कारणों की शिनाख़्त करके इन्हें समाप्त कर लिया जायेगा तो किसी काल्पनिक शक्ति में इनके हल तलाशने की ज़रूरत भी खुद-ब-खुद समाप्त हो जायेगी और काल्पनिक शक्ति का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा।

भारत जैसे देश में, जो पुनर्जागरण-प्रबोधन से अछूता रहा है, ज्ञान-विज्ञान-तर्कणा के मूल्य आम मेहनतकश जनता की पहुँच से तो दूर हैं ही लेकिन यहाँ पर पढ़ा-लिखा कहे जाने वाला तबका भी इन जीवन मूल्यों से कोसों दूर है। चाहे हम यूरोप, अमेरिका, रूस, चीन कहीं का भी उदाहरण लें, हर समाज में बदलाव करने के शुरुआती प्रयासों में मध्य वर्ग की एक सकारात्मक भूमिका रही है। किन्तु हमारे यहाँ का मध्य वर्ग इतना लिजलिजा, रीढ़विहीन, ओज-तेज हीन और कायर है कि इन सब चीज़ों में दुनिया के सामने यह अपने आप में ही एक मिसाल है। भाषा से लेकर संस्कृति तक के क्षेत्र में आज भी औपनिवेशिक अतीत व गुलामी के चिन्ह आसानी से देखे जा सकते हैं। कला-साहित्य-संस्कृति व मीडिया जैसे तमाम क्षेत्रों में पैसों पर बिकने वाले भाँड भरे पड़े हैं। इन्हें जनवाद, तार्किकता, आलोचनात्मक विवेक, तर्कणा जैसी चीजें दूसरे ग्रहों से आयी प्रतीत होती हैं। जनता की ज़रूरतों का, उसकी दिक्कतों-तकलीफ़ों का इल्म करना तो दूर, उल्टा इस तरह की चीज़ों से मुँह चुरा लेने की प्रवृत्ति आम बात है। और तो और जब जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले बुद्धिजीवियों का कट्टरतावादी ताकतों द्वारा क़त्ल किया जाता है तो उसी समय विभिन्न समाचार चैनलों पर हमेशा की तरह ही राशिफल बताया जा रहा होता है, भूत-प्रेतों के किस्से-कहानियाँ चलायी जा रही होती हैं या टी.आर.पी. के लिए किसी नयी सनसनी की तलाश की जा रही होती है। हाल के दिनों में नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, एम.एम. कालबुर्गी की नृशंस हत्याएँ हुई लेकिन व्यापक जनता को तब तक पता भी नहीं चला जब तक इनका देशभर में विरोध नहीं हुआ। किन्तु सिनेमाई भाँड-भड़ुक्कों, नेताओं, क्रिकेटरों की छोटी-सी बात राष्ट्रीय ख़बर बन जाती है!

आज का दौर एक तरफ जहाँ अँधेरे-निराशा का दौर है वहीं दूसरी तरफ यह चुनौतीपूर्ण भी है। हर समाज बदलता है और बदलाव को छोड़कर कुछ भी सनातन नहीं है। किन्तु यह भी उतना ही सच है कि यह अपने आप नहीं बदलता, प्रत्येक समाज को इन्सान ही बदलते हैं। बाबाओं और इनके पैदा होने की ज़मीन को तभी समाप्त किया जा सकता है जब मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था के स्थान पर मानव-केन्द्रित व्यवस्था की स्थापना की जाये। जब लोगों की भौतिक ज़रूरतें पूरी होंगी तो अलौकिक शक्तियों का भौतिक आधार भी धीरे-धीरे समाप्त होता चला जायेगा। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन तक हाथ पर हाथ धरकर इन्तज़ार नहीं करना होगा बल्कि तुरन्त संजीदगी और धैैर्य के साथ ज्ञान-विवेक-तर्कणा और जनवादी मूल्यों का लगातार व अनथक ढंग से प्रचार-प्रसार करना होगा। अपनी ताक़त को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करते हुए अपने हक-हुक़ूक़ की प्रत्येक ज़ब्ती पर फिर से मुक्का ठोंकना होगा। अँधेेरे की ताक़तों से लगातार लोहा लेना होगा, और सच को बार-बार जनता के बीच ले जाना होगा।


लेखक :  अरविन्द
साभार :  मज़दूर बिगुल, अक्‍टूबर-नवम्‍बर 2015 अंक

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