हमें ख़ुद को बदलना होगा (कहानी) - Nazariya Now

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Saturday, October 28, 2017

हमें ख़ुद को बदलना होगा (कहानी)

आज सुबह से तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी।  सर में भी दर्द है और थकन भी  महसूस हो रही है इसलिए ऑफिस से हाफ डे लेकर घर के लिए निकल रहा हूँ, सोच रहा हूँ घर जाकर थोड़ी देर सो जाऊंगा तो थोड़ा आराम मिलेगा। आज गर्मी भी काफी ज़्यादा है, मेन रोड पर बहुत ट्रैफिक होगा, अगर ट्रैफिक में फंस गया तो धुप से सर दर्द और बढ़ जायेगा इसलिए दूसरे रस्ते से जाना सही रहेगा वो रास्ता आमतौर पर सुनसान रहता है, वहां ट्रैफिक न के बराबर ही होता है, मेन रोड के मुक़ाबले लगभग 1 किलोमीटर लम्बा ज़रूर पड़ेगा लेकिन ट्रैफिक में फंसने से तो बेहतर ही है, यही सोचकर बाइक स्टार्टे की और ऑफिस से घर जाने के लिए निकला।


रास्ता बिलकुल सुनसान है।  पहले इस जगह पर  सरकारी क्वार्टर बने हुए थे जिससे थोड़ी आबादी थी लेकिन कुछ साल पहले सरकार द्वारा किसी परियोजना के निर्माण के लिए सभी क्वार्टर को खाली करवा लिया गया था, परियोजना पर काम तो अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, और उन पुराने क्वार्टर की हालत टूटे फूटे किसी खण्डहर की तरह हो गई है। इस जगह को अक्सर आसामाजिक तत्व जुआ खेलने, नशा करने, जैसे गलत कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं इसलिए आम लोग इस जगह से गुज़ारना पसंद नहीं करते हैं, यही वजह है की यह इलाक़ा अक्सर सुनसान रहता है। रास्ते से गुज़रते हुए अचानक मुझे किसी के चीखने की आवाज़ सुनाई दी।  आवाज़ सुनकर मैंने गाडी रोकी आसपास देखा लेकिन कोई नज़र नहीं आया, एक बार फिर से आवाज़ आई, आवाज़ लड़की की थी और थोड़ा पीछे की तरफ से आई थी, मुझे लगा ज़रूर कोई मुसीबत में है, उसे मदद की ज़रूरत है मैं गाडी वापस  मोड़कर पीछे की तरफ गया तो देखा पीछे एक कार खड़ी हुई है, गाड़ी से उतारकर कार के पास गया तो  देखा कि कार में कोई नहीं है,  अचानक सामने जो टुटा फूटा क्वार्टर था वहां से लड़की के चीखने की आवाज़ आई।  मैं दौड़ता हुआ वहां गया तो देखा की 2 लड़कों ने एक लड़की को पकड़ रखा है,  लड़की रोते हुए मदद के लिए चिल्ला रही है।
मैंने ज़ोर से कहा ''कौन हो तुम लोग ?  छोडो लड़की को, गलत काम करते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती''  अचानक  मुझे वहां देखकर वो दोनों घबरा गए, वो लड़की रोते हुए कहने लगी ''प्लीज़ मुझे बचा लीजिये प्लीज़'' उनमे से एक लड़का  मेरी तरफ देखकर बोला ''तू कौन बे ? यहाँ  क्यों हीरो बनने चला आया ? चुपचाप निकल ले यहाँ से नहीं तो पछतायेगा'' कहते हुए उसने चाकू निकाला और मुझे दिखाकर डराने की कोशिश करने लगा।  मैंने देखा दोनों लड़के नशे धुत में हैं, दोनों ने बहुत ज़्यादा शराब पी रखी है।  मैंने कहा ''शराफत से लड़की को जाने दो, वरना मैं पुलिस को कॉल कर रहा हूँ फिर तुम दोनों पछताओगे'' उनमे से दूसरा गाली देते हुए बोला ''ये ऐसे नहीं मानेगा इसे मज़ा चखाता हूँ'' इतना कहकर वो चाकू लेकर मेरी तरफ आया, नशे में होने की वजह से उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, उसने सामने से मुझ पर चाकू से हमला किया, मैंने नीचे झुककर खुद को बचाया, तब तक दूसरा लड़का भी चाकू हवा में लहराते हुए हुआ मेरी तरफ बड़ा, नशे में होने की वजह से उसके पैर भी लड़खड़ा रहे थे, मैंने इस बार झुककर बचने की कोशिश की लेकिन ये  फिर भी उसका चाकू मेरी बाएं हाथ की बांह को हल्का छूता हुआ निकला जिससे हल्का कट लगा और खून निकल आया।  वो लड़की डरी सहमी वहीँ कोने में बैठी हुई रो रही है।  उन दोनों के हमले से मैं समझ गया की ये दोनों शराफत से नहीं मानने वाले, अब मैनें भी दो दो हाथ करने की ठान ली, वो दोनों मुझे घेरकर खड़े थे और किसी भी वक़्त फिर से मुझ पर हमला कर सकते थे,  मैंने थोड़ा झुककर एक लड़के को धक्का दिया वो नीचे  गिर गया दूसरा जैसे ही चाकू लेकर मेरी तरफ बड़ा मैंने पूरी ताक़त से एक लात उसके मुंह पर मारी, लात उसके चेहरे पर लगी वो निचे गिर गया उसकी नाक से खून निकलने लगा, मैंने जल्दी से उसके हाथ से चाकू छीन  लिया, इतनी देर में पहले वाला उठ चूका था, उसने फिर से चाकू से हमला करने की कोशिश की मैंने झुककर उसके पेट में एक ज़ोरदार घुसा मारा जिससे वो दर्द से चीखता हुआ नीचे गिर गया मैंने जल्दी से उसका चाकू भी उठा लिया, दोनों पहले ही नशे में होने की वजह से लड़खड़ा रहे थे मेरे वार के बाद उनकी हालत और ख़राब हो गई थी, दोनों ज़मीन पर पड़े कराह रहे थे ।  अब उनके पास चाकू भी नहीं थे।  मैंने उस लड़की  से कहा ''आप घबराओ नहीं, सब ठीक है,  मैं पुलिस को कॉल करता हूँ, पुलिस इनसे निपट लेगी, पुलिस में एफ.आई.आर. के बाद आपको आपके घर छोड़ दूंगा'' मैंने 100 नम्बर डायल करके पुलिस कण्ट्रोल रूम फ़ोन लगाया, उन्हें पूरी बात और लोकेशन बताई, उन्होंने कहा जल्दी ही पुलिस वहां पहुँच जाएगी। मैं फ़ोन पर बात कर रहा था इतनी देर में वो दोनों लड़के पुलिस का नाम सुनते ही उठे और बाहर भागे मैं उनके पीछे आया तब तक वो अपनी कार लेकर भाग चुके थे। 

मैं वापस लड़की के पास आया वो डरी सहमी बैठी थी।  मैंने कहा ''आप घबराइए  नहीं सब ठीक है, आपका नाम क्या है ? आप कहाँ रहती हैं ? ये लोग कौन थे ? क्या आप इन्हे पहचानती हैं ?'' मेरी बात सुनकर रोते कहने हुए लगी ''मेरा नाम नेहा है, मैं सुभाष नगर में रहती हूँ, ये दोनों लड़के मेरे मोहल्ले में ही रहते हैं, आज ये दोनों मेरे कॉलेज आये और मुझसे कहा मेरी माँ की तबियत बहुत खराब है वो हॉस्पिटल में हैं, इसलिए वो मुझे लेने आये हैं, माँ की तबियत की बात सुनकर में बिना कुछ सोचे समझे उनकी गाडी में बैठ गई और ये लोग मुझे यहाँ ले आये और मेरे साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की'' वो रोते हुए मुझे सब बता रही थी उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे।  मैंने उसे ढांढस बांधते हुए कहा ''घबराने की कोई बात नहीं अब सब ठीक है, पुलिस भी आती होगी, आप उन दोनों को पहचानती हैं इससे पुलिस उन दोनों को आसानी से पकड़ लेगी'' वो अभी भी रो रही थी उसने कहना शुरू किया ''अब मेरी बहुत बदनामी होगी,  बहुत मुश्किल से घरवालों ने मुझे आगे पढ़ाई के लिए कॉलेज जाने की इजाज़त दी थी, अब मेरी पढ़ाई भी छूट जाएगी'' मैंने उसे समझते हुए कहा ''इसमें आपकी बदनामी क्यों होगी, अपने कुछ गलत नहीं किया बदनामी उनकी होगी जो आपके साथ गलत काम करना चाहते थे'' उसने कहा ''आप नहीं समझते गलती चाहे किसी की  भी हो बदनाम लड़की ही होती है, यही लोगों की और समाज की सोच है'' मैंने कहा ''ये बिलकुल गलत है और ये तो ज़ुल्म है सजा सिर्फ गलती करने वाले को ही मिलनी चाहिए, बदनाम सिर्फ उसे ही होना चाहिए लोगों को और समाज को अपनी सोच बदलनी होगी, सिर्फ इसी गलत सोच की वजह से मुजरिम बच जाते हैं क्योंकि अक्सर लड़कियां बदनामी के डर से उन पर हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती हैं, आप मत घबराइए इसमें आपकी बदनामी होगी ये सोच बिलकुल गलत और जहाँ तक समाज की बात है तो समाज हम लोगों से ही बनता है जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे समाज में बदलाव नहीं आ सकता'' मेरे समझाने के बाद नेहा को थोड़ी हिम्मत बनी, उसका डर और घबराहट  भी कुछ कम हुई है। मैंने अपनी हाथ में लगी चोट को देखा बहुत मामूली सा कट लगा था मैंने उस पर रुमाल बांध लिया जिससे खून आना बंद हो गया।

पुलिस आ गई है, 4 पुलिसवाले आये हैं उनमे एक महिला पुलिसकर्मी हैं , आते ही उन्होंने पूछताछ शुरू कर दी और थोड़ी पूछताछ के बाद एफ.आई.आर. के लिए पुलिस स्टेशन चलने के लिए कहते हैं, पुलिस  नेहा को अपने साथ गाड़ी में ले जाती है और मुझे भी साथ आने के लिए कहते हैं,  मैं भी अपनी गाड़ी लेकर उनके साथ चल देता हूँ। पुलिस स्टेशन पहुंचकर एफ.आई.आर. के बाद निशा से उन दोनों लड़कों का पता लेकर 3 पुलिसवाले उन्हें गिरफ्तार करने के लिए जाते हैं,  नेहा के घर फ़ोन से खबर करके उसके घरवालों को  पुलिस स्टेशन बुला लिया जाता है।  नेहा के माता पिता और पडोसी पुलिस स्टेशन आते हैं और वो वहां आकर जो बताते हैं वो सुनकर सब चौंक जाते हैं, उन्होंने बताया कि वो दोनों लड़के थोड़ी देर पहले उनके घर आये और बताया की नेहा किसी लड़के के साथ भाग गई है, उन दोनों ने जब उसे समझाकर रोकने की कोशिश की तो जिस लड़के के साथ वो भागी है उसने उन दोनों के साथ मारपीट की, पुरे मोहल्ले में यही बताकर नेहा पर झूठा इलज़ाम लगाकर उसे बदनाम करने की कोशिश की। उनकी बात सुनकर नेहा रोने लगती है। मैं ये सोचकर हैरान था कि लोग अपना गुनाह छुपाने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं, खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए एक मासूम के कैरेक्टर पर कीचड़ उछालने से भी नहीं चूकते। थोड़ी देर में पुलिस उन दोनों लड़कों को गिरफ्तार करके पुलिस स्टेशन ले आती है, दोनों को लॉकअप में बंद कर दिया जाता है और कुछ क़ानूनी  कार्यवाही के बाद निशा को भी घर जाने के लिए कह दिया जाता है। मैं नेहा के माता पिता को समझाता हूँ की आपको घबराने और डरने की ज़रूरत नहीं है इसमें आपकी और नेहा की बदनामी नहीं है,  नेहा की कोई गलती नहीं है, नेहा के पडोसी जो उसके माता पिता के साथ आये थे वो भी मेरी हाँ में हाँ मिलते हुए उसके माता पिता को समझते हैं।  नेहा और उसके माता पिता मुझे धन्यवाद कहकर अपने घर चले जाते हैं।  मैं भी अपने घर आ जाता हूँ।

अगले दिन अखबार में दूसरे शहर में हुए एक लड़की के रैप के बाद हत्या की खबर छपी है, पुलिस को आरोपियों के बारे में कोई सुराग़ नहीं मिला है।  खबर पड़ते ही कल की पूरी घटना मेरी आँखों के सामने घूम रही है।  मैं यह सोंचकर काँप उठा कि अगर कल मैं सही वक़्त पर न पहुंचा होता तो क्या होता ? सोचकर ही मेरी रूह तक काँप उठी। मैं सोच रहा हूँ की अगर लोग सही वक़्त पर मदद के लिए आगे आएं तो बहुत से अपराधों को रोका जा सकता है, लोगों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी तभी इस तरह के अपराधों को काफी हद तक रोका जाना आसान हो सकता है, एक और बात जो ज़हन में कि आखिर इस तरह के मामलों में समझ की सोच ऐसी क्यों है कि लड़की और उसके परिवार की बदनामी होगी, सिर्फ इसी गलत सोच की वजह से मुजरिम बच जाते हैं क्योंकि अक्सर लड़कियां बदनामी के डर से उन पर हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती हैं,  इसमें मासूम लड़की का क्या क़सूर, वो तो खुद ज़ुल्म की शिकार हुई है उसे इन्साफ मिलना चाहिए और बदनामी तो उसकी होनी चाहिए जिसने अपराध किया है। अपराधी खुद को बचाने के लिए ज़ुल्म की शिकार लड़की पर झूठा इलज़ाम लगाकर उसके कैरेक्टर पर ही कीचड़ उछालने की कोशिश करते हैं। हम लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी तभी समाज में बदलाव आ सकता है, समाज हम लोगों से ही बनता है हम बदलेंगे तभी तो समाज बदलेगा ।

।। समाप्त ।।

लेखक : शहाब ख़ान  'सिफ़र'
©Nazariya Now 



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