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Wednesday, April 26, 2017

हैसियत - (ग़रीबी और मुफलिसी के दर्द को बयान करती कहानी - लेखक : डॉ. ज़फर खान)

       कालू तैरह साल का दुबला-पतला और अपने नाम के अनुरूप ही रंग-रूप में काला लड़का था। एक मैली सी शर्ट जो सिर्फ दो बटन के सहारे उसके बदन पर टिकी हुई थी, पेंट इतनी ढीली कि अगर उसे एक हाथ से न संभाला जाये तो पैरों में जाकर अटके और मैले पैरों में घिसी हुई चप्पलें, यही कालू का हुलिया था। कालू शहर के बीच में ग़रीबों के हमदर्द या यूं कहें कि वोट बैंक के लिए शहर के बीच में  बसाई गई बड़ी सी गंदी बस्ती में एक छोटी सी झुग्गी में अपनी माँ के साथ रहता था। कालू का बाप भी था लेकिन पिछले साल ही ज़हरीली शराब पीने से किसी ख़ैराती अस्पताल में उसकी मौत हो गई। वह जब तक ज़िन्दा रहा माल गोदाम में हम्माली किया करता था और जो भी मज़दूरी मिलती उन पैसों से सस्ती शराब पीकर बीवी के झगड़ों से बचने के लिए सड़क के किनारे पड़ा रहता। कालू की माँ दो-चार घरों में काम करके घर के गुज़ारे लायक़ कमा लेती। ग़रीबी की मार ने कालू को वक़्त से पहले ही बड़ा और समझदार बना दिया था। जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाते हैं, खेलते हैं उस उम्र में कालू अपनी बस्ती के हमउम्र लड़कों के साथ सुबह अंधेरे से बड़ा सा थैला कंधे पर लाद कर कचरा बीनने निकल जाया करता, ताकि दो लोगों का पेट अच्छे से भर सके। कालू को रास्ते में जो भी पन्नी, रद्दी, खाली बोतल या कबाड़ा मिलता वह उसे फौरन अपने थैले के हवाले कर देता और शाम को उसे कबाड़ी को बेचकर कुछ पैसे कमा लेता। कालू ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन सुबह के वक़्त जब वो बस स्टाॅप पर रंग-बिरंगी स्कूल की यूनिफार्म पहने हुए सजे-धजे बच्चों को देखता तो उसे बड़ी हैरत होती कि ये बच्चे इतनी सुबह आखि़र जाते कहां हैं ? वह कुछ देर सोचता और फिर अपने काम में लग जाता। कालू अपने काम में इतना मगन रहता कि उसे ऊंची-ऊंची बिल्डिंग, मकान और शापिंग माॅल को देखने की भी फुरसत नही रहती, उसकी नज़रें तो बस सड़कों और गली-कूचों पर ही जमी रहती कि कुछ बेचने लायक़ मिल जाये। लोगों का नज़रिया और बुरा बर्ताव कालू को कभी-कभी परेशान ज़रूर कर देता था, जब वह किसी पाॅश काॅलोनी से गुज़रता तो वहां के रहवासी उसे शक की निगाहों से देखते और फ़ौरन डांटकर भगा देते। किसी शायर ने सच कहा है :
‘‘मुफ़्लिसी सब बहार खोती है।
मर्द का ऐतबार खोती है’’
यानि ग़रीब आदमी की ज़िन्दगी से सारी बहारें और ख़ुशियां चली जाती हैं यहां तक कि लोगों का भरोसा भी उसके ऊपर ये उठ जाता है। कालू को अक्सर राह चलते लोगों की कड़वी बातें सुनने को मिलती, जैसे - ‘ ‘अबे साईड में चल’’ ‘‘अंधा है क्या’’ ‘‘गाड़ी के नीचे आएगा’’ और अगर कालू का बड़ा सा गंदा थैला किसी शख़्स को छू जाता तो फिर हज़ारों गालियां सुनना उस पर लाज़िम हो जाता था। कालू जब कचरा बीनने किसी कूड़ेदान पर जाता तो वहां पर खाना तलाश कर रहे कुत्ते और सुअर उसके हाथ का इशारा मिलते ही डरकर भाग खड़े होते और जब तक वह अपने काम की चीज़ें तलाश नहीं कर लेता तब तक उनकी पास आने की हिम्मत न होती। वे बस दूर से ही कालू को हसरत भरी निगाहों से तकते रहते और कालू के जाने का इंतेज़ार करते। कालू को कूड़ेदानों पर आकर यही काम सबसे ज़्यादा अच्छा लगता था क्योंकि यहां आकर उसे लगता था कि दुनिया में कोई तो मख़्लूक ऐसी है जो उससे डरती है। एक बार कालू की माँ को ऐसी खांसी उठी कि उसने बिस्तर पकड़ लिया। बस्ती के किसी झोलाछाप डाॅक्टर से ईलाज करवाया मगर कोई फ़ायदा न हुआ। 
आज कालू ने शाम तक बहुत सारा कबाड़ा जमा कर डाला था। वह आते हुए रास्ते में एक बड़े से मेडिकल पर रूका और सोचा क्यों न माँ के लिए यहां से खांसी की अच्छी सी दवा ले ली जाये। काउंटर पर पहुंचकर उसने खांसी की दवा मांगी, दुकानदार ने एक सरसरी निगाह उस पर डाली और एक शीशी उसके सामने रखते हुए बोला ‘‘साठ रूपये’’। कालू ने अपनी दोनों जेबों को टटोला लेकिन किसी भी हालत में चालीस रूपये से ज़्यादा बरामद नहीं हुए। कालू ने दुकानदार से बड़ी मिन्नत से कहा ‘‘भैय्या मैं बीस रूपये दे दूंगा ’’ ये सुनते ही दुकानदार ने झट से दवा की शीशी वापस रख ली और दुकान पर चिपके हुए एक स्लोगन की तरफ़ इशारा करते हुए कहा ‘‘तुझे पढ़ना तो आता नहीं होगा, इसलिए मैं ख़ुद ही बता देता हूं कि इस पर लिखा है - ‘‘आज नग़द, कल उधार’’। यह सुनकर भी कालू इस उम्मीद में खड़ा रहा कि शायद उसके एक-दो बार कहने से दुकानदार उधार करने को तैयार हो जाए और वह यह भी नहीं चाहता था कि उसकी माँ आज रात भी खांस-खांसकर सुबह कर दे। कालू अपनी इसी उधेड़बुन में था कि अचानक एक चमचमाती हुई कार मेडिकल स्टोर के सामने आकर रूकी, उसमें से एक ख़ूबसूरत लड़की उतरी जो पिंडलियों तक जींस और छोटी सी टी-शर्ट पहने हुई थी। उस लड़की के हाथों में एक छोटा सा पपी था, जिसके बाल रूई जैसे सफ़ेद और मुलायम थे और वो बड़ी बैचेनी से अपनी गुलाबी लंबी जीभ को बैचेनी से अंदर-बाहर कर रहा था। उस लड़की ने अपनी नाज़ुक उंगलियाँ अपने पपी के बालों में फिराते हुए दुकानदार से कहा Excuse me मुझे अपने पपी के लिए एक बिस्किट का पैकिट चाहिए। उस दुकानदार की सारी तवज्जोह उस लड़की की तरफ़ थी उसने फ़ौरन ही ब्रांडेड कंपनी का कुत्तों के खाने वाला बिस्किट का पैकिट सामने रख दिया। लड़की ने कहा ‘‘कितने पैसे हुए ?’’ ‘‘मैडम सिर्फ़ 200 रूपये’’ दुकानदार ने शरीफ़ाना मुस्कुराहट के साथ कहा। लड़की ने पैसे देने के लिए अपना हैण्डबैग खोला लेकिन उसे शायद पैसे मिल नहीं रहे थे। दुकानदार ने कहा ‘‘मैडम कोई परेशानी है क्या’’ लड़की ने अपने पर्स में झांकते हुए जवाब दिया ‘‘शायद आॅफिस जाने की जल्दी में मैं  रूपये रखना भूल गई आप ये बिस्किट वापस रख लीजिए मैं यह कल ले जाउंगी’’। दुकानदार ने बड़े शांत लहजे में कहा ‘मैडम पैसे कहां भागे जा रहे हैं आप ये बिस्किट ले जाईये पैसे तो बाद में आते रहेंगे। लड़की ने दुकान को लंबा सा Thank you so much  कहा और कार में बैठकर चली गई। फिर दुकानदार की नज़र उधार की आस में खड़े कालू पर गई और उसने बड़ी नफ़रत से कहा ‘‘मेरे बाप तू अभी तक यहां खड़ा है जा यहां से, कहा न उधार नहीं होता यहां पर‘‘। कालू ने अब कुछ और कहना मुनासिब नहीं समझा, उसने एक निगाह उस स्लोगन पर डाली जिस पर लिखा था ‘‘आज नग़द कल उधार’’ और थके क़दमों से अपनी झुग्गी की तरफ़ चल दिया। चलते-चलते उसके दिमाग़ में वही सफ़ेद बालों वाले पपी का चेहरा घूम रहा था। कालू को ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह कुत्ता अपनी लंबी गुलाबी जीभ से उसकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते हुए उसको चिढ़ा रहा हो।
अगली सुबह हमेशा की तरह कालू ने अपना थैला कांधे पर डाला और कूड़ेदान पर पहुंच गया। रोज़ाना की तरह आज भी कुत्ते और सुअर कूड़ेदानप में खाना ढूंढ रहे थे लेकिन हमैशा की तरह आज कालू ने उनको डराकर  नहीं भगाया। शायद उसको अब अपनी हैसियत का सही मायनों में अंदाज़ा हो चुका था।




लेखक : डॉ. ज़फर खान







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