HIGHLIGHTS

Monday, December 4, 2017

इक चाह-इक आग - ✍ प्रिया खत्री

जीवन बदलने के लिए बस एक विचार, एक चाह की चिंगारी ही तो चाहिए। जन्म से सामाजिक बोझ को ढ़ोती महिलाओं की हिम्मत की उड़ान। जिसने दिल से चाहा वो बंदिशें लांघ कर उड़ गयी और जिसने हालातों की दुहाई दी वो इंतज़ार करती रह गयी। हिम्मत जुटा रही लड़कियों, महिलाओं पर कवयित्री प्रिया खत्री के विचार। 




इक चाह जगी है सीने में,
इक आग लगी है सीने में,
कुछ करने की जागी है लगन,
इक प्यास जगी है सीने में। 

थिरकूं मैं अब हो मगन-मगन,
अब रोको ना मेरी राहों को,
कोई टोको ना मेरी चाहो को!
करके मन की पाऊँगी शिखर,
दृढ़ निश्चय कर खाती हूँ कसम। 

इक चाह जगी है सीने में,
इक आग लगी है सीने में,
दिल में कुछ अरमा पनपे थे,
जिनकों ना मैंने बढ़ने दिया,
दिल की ना सुनी बस उतनी करी,
जितना सबने मुझे करने दिया। 

मैं टूट गयी मैं रूठ गयी, 
खुद से ही मानो छूट गयी,
अरमा यूँ सारे दिल में दबे,
ख़्वाबों की माला टूट गयी,
अब जागी तो सपना जागा ,
साड़ी संशाएं दूर हुयीं। 
दिल को मैंने फौलाद किया,
डर की सीमाएं भूल गयी। 

आगे बढ़ना बढ़ते जाना,
जग को है अब ये दिखलाना। 
ना अबला है, ये नारी है!
ये आगे बढ़ दिखलायेगी 
इन पुरुषों की दुनिया में,
देखो ऊँचा नाम कमायेगी। 
ये पुरुष प्रधान समाज है,
नारी तो बस मोहताज है,
बदलूँ इन सोच विचारों को,
बदलूँ हाँ बदलूँ अब ये चलन। 

इक चाह जगी है सीने में,
इक आग लगी है सीने में,
कुछ करने की जागी है लगन,
इक प्यास जगी है सीने में। 

✍ प्रिया खत्री

1 comment:

Join Amazon Prime 30 Days Free Trial