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Saturday, January 20, 2018

डिजिटल दुनिया में बढ़ती अफवाहें / फेक न्यूज़

20 वीं सदी तकनीक का दौर है।  हर दिन हम किसी नई तकनीक से रूबरू हो रहे हैं।  देश दुनिया में सब चीज़ें डिजिटल होती जा रही हैं।  डिजिटिलाइज़ेशन के कारण हर काम सुबिधाजनक होता जा रहा है। संचार माध्यमों में निरंतर क्रांति हो रही है।  जहाँ एक समय एक स्थान से दूसरे स्थान सूचना पहुंचाने में वक़्त लगता था वहीँ काम अब तुरंत हो जाता है।  सोशल मीडिया के आने के बाद संचार के क्षेत्र क्रांति आ गई।  आज देश दुनिया में हुई किसी भी घटना की जानकारी को न्यूज़ चैनल/ अखबार में आने पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से जाना जा सकता है।

एक और जहाँ डिजिटिलाइज़ेशन के कारण हर काम सुबिधाजनक होता जा रहा है। वहीँ सिक्के का एक दूसरा पहलु भी है। सोशल मीडिया द्वारा फैलती अफवाहें एक गंभीर चिंता का विषय है।  हर दिन कोई नई अफवाह फ़ैल रही है।  नोटबंदी (Demonization) के समय तो देश में तरह तरह की अफवाहों की बाढ़ सी आ गई थी।  नोट में चिप की अफवाह, कहीं बोरे  में भरे नोट मिलने की अफवाह और भी कई तरह की अफवाहें ।  उसी समय एक अफवाह फैली की नमक महंगा होने वाला है, देश के किसी हिस्से से फ़ैली ये अफवाह सोशल मीडिया के द्वारा थोड़ी ही देर में पुरे देश में फ़ैल गई लोग बिना कुछ सोचे समझे बाजार में नमक खरीदने दौड़ पड़े।  दूकानदार /व्यापारियों ने इसका जमकर फायदा उठाया 10 - 20 रुपये किलो में मिलने वाला नमक 600 - 700 रुपये किलो तक बिका।  कुछ साल पहले दुनिया के ख़त्म होने की अफवाह भी खूब चली, न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में इस अफवाह का आतंक रहा।  कई बार अफवाहों की वजह से साम्प्रदायिक तनाव फैलता है।  कई बार सिर्फ अफवाहों के कारण देश में साम्प्रदायिक दंगों की स्थितियां भी बनी हैं।  


 अफवाहें क्यों फैलती हैं ? क्या कारण  है की किसी मामूली सी घटना को बड़ा चढ़ाकर बताया जाता है ? क्यों लोग बिना सोचे समझे अफवाहों को शेयर करना शुरू कर देते हैं ? इन सब बातों का विश्लेषण करें तो कुछ विशेष कारण नज़र आते हैं।

सबसे पहला और प्रमुख कारण तो आसामाजिक तत्वों द्वारा की गई शरारत है।  कई बार सिर्फ शरारत करना ही मक़सद होता है और कई अफवाहों के ज़रिये लोगों को भड़काकर माहौल ख़राब करने के लिए किया जाता है।  विभिन्न संगठनो और राजनैतिक पार्टी की आईटी सेल द्वारा झूटी ख़बरें फैलाकर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है।  कई बार पुरानी घटनाओं की तस्वीरों / वीडियो  और किसी अन्य स्थान की तस्वीर / वीडियो  को हाल की किसी मामूली घटना की तस्वीर बताकर प्रचारित किया जाता, पिछले कुछ वक़्त में ऐसा कई बार देखा गया है, एक राजनैतिक पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने तो एक फिल्म के सीन की तस्वीर को देश में एक स्थान पर हुई घटना के रूप में ट्वीट पर शेयर किया था।  इस तरह की अफवाहों के कारण देश में कई जगह तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई है जिसमे कई बेगुनाह लोगों की जान भी गई है।

एक कारण लोगों में मौजूद असुरक्षा की भावना भी है और ये भावना केवल उनके मन के वहम और अन्धविश्वास की वजह से है। एक मैसेज आता है की इसे 10 - 20 लोगों को सेंड करो तो ये फायदा होगा नहीं किया तो फलां नुकसान होगा, और फिर अंधविश्वासी लोग बिना कुछ सोचे समझे मैसेज मिलते ही उसे फॉरवर्ड / शेयर करना शुरू कर देते है। कई बार किसी घटना की खबर मिलते ही लोग बिना उसकी सच्चाई की पुष्टि किये उसे शेयर करना शुरू कर देते हैं इसके पीछे उनका तर्क होता है कि वो दूसरों को सतर्क करने के लिए ऐसा करते हैं।  सोचने लायक बात यह है कि समाज में इस तरह की अफ़वाहें तेज़ी से क्यों फैल जाती हैं, जबकि सही तथ्यपरक बातें नहीं फैल पातीं। इसका कारण हमारे सामाजिक ताने-बाने में मौजूद है। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ सवाल करना, तर्क करना, बहस करना, चीज़ों को वैज्ञानिक तरीक़े से समझ लेना हम नहीं सीख पाते। परिवार से लेकर स्कूल-कॉलेजों में भयंकर रूप से मध्ययुगीन पिछड़ापन मौजूद है। रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, बोलचाल इत्यादि बेशक आधुनिक हो गये हों, लेकिन सोच  विचार अभी बेहद पिछड़े हुए हैं।

कई बार अफवाहों को फैलाने का कारण कालाबाज़ारी (Black Marketing) भी होता है।  ऐसे व्यापारी जो कालाबाज़ारी करते हैं उनके द्वारा किसी वस्तु की कमी होने की अफवाह फैलाकर उसके दामों में वृद्धि कर दी जाती है। लोगों को लगता है की कहीं आगे कीमतें और बड़े उससे पहले ही खरीद लिया जाये ऐसे में लोग ज़रूरत से ज़्यादा खरीदी करते हैं, इससे व्यापारी को दुगुना या कई गुना मुनाफा होता है।  कालाबाज़ारी पूरी तरह ग़ैरकानूनी है ये जानने के बाद भी कई लोग ऐसा करते हैं।

अफवाहों और फेक न्यूज़ को फैलाने में कई बार मीडिया का भी बड़ा हाथ होता है।  विभिन्न अफवाहों की जाँच पड़ताल करके सही तथ्य को जनता तक पहुंचने के बजाये मीडिया चैनल उन अफवाहों और फेक न्यूज़ पर प्राइम टाइम में डिबेट करवाते हैं और इन डिबेट में किसी प्रकार वैज्ञानिक तथ्यों पर चर्चा होने के बजाये उन ऊल जलूल तर्कों द्वारा अफवाहों और फेक न्यूज़ को सही साबित करने की कोशिश की जाती है और ये सब सिर्फ टी.आर.पी. के लिए किया जाता है। एक न्यूज़ चैनल तो भूत प्रेत जैसी घटनाओं पर विशेष कार्यक्रम दिखाने के लिए ही मशहूर है।  कुछ वक़्त पहले देश में महिलाओं की छोटी काटे जाने की अफवाह का काफी आतंक रहा, इस अफवाह को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खूब कवर किया।  अक्सर मीडिया संस्थानों में इस बात की होड़ होती है हम इस खबर को सबसे पहले दिखायें जिसके कारण कई बार महत्वपूर्ण तथ्यों को अनदेखा कर मात्र किसी अफवाह को ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर दिखाया जाता है।  पिछले वर्ष में असम में असमिया भाषा में लिखे अपील के पोस्टर को धमकी और फतवा कहकर पूरा दिन मीडिया ने देश की जनता को गुमराह किया और ये खबर देश के सभी न्यूज़ चैनलों पर पुरे दिन छाई रही, रात में एक न्यूज़ चैनल द्वारा इस  घटना की पूरी जाँच पड़ताल करके उस पोस्टर को असमिया भाषा के जानकार से हिंदी में अनुवाद करवाया तब मालूम हुआ की उस पोस्टर में किसी तरह की कोई धमकी या फतवा नहीं है बल्कि साधारण रूप से की गई एक अपील है, सही खबर दिखने के बाद उस न्यूज़ चैनल द्वारा दिन में उसके द्वारा दिखाई गई गलत खबर के लिए माफ़ी भी मांगी, लेकिन अन्य चैनलों ने माफ़ी तो दूर अपनी गलती स्वीकार करने की ज़हमत तक नहीं उठाई।

अफवाहों और फेक न्यूज़ के फैलने के तो कई कारण हैं लेकिन अब सवाल ये उठता है की इन पर लगाम कैसे लगाई जाये ? अफवाहों पर लगाम लगाने का सबसे कारगर तरीक़ा है खुद जागरूक होना और लोगों को जागरूक करना।  बिना तथ्यों की पड़ताल किये किसी अफवाह पर यक़ीन न करना।  सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाये।  अगर कोई अनजाने में या जानबूझकर झूठी अफवाह की पोस्ट शेयर कर रहा तो उसे समझाए की ये गलत है।  अफवाहों और फेक न्यूज़ का शिकार अधिकतर अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग होते हैं, शिक्षा और जागरूकता की कमी के चलते ये लोग आसानी से इन सब चीज़ों को सच मान लेते हैं, लेकिन कई बार तो उच्च शिक्षित लोग भी अफवाहों और फेक न्यूज़ का शिकार बन जाते हैं।

देश में कई लोग और संगठन है जो जनता को अफवाहों और फेक न्यूज़ के प्रति जागरूक करने के लिए काम कर रहे है।  ये लोग विभिन्न माध्यमों से लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।  विभिन्न वेबसाइट, सेमिनार, सोशल मीडिया आदि के द्वारा लोगों को जागरूक करने का बहुत ही बेहतरीन काम कर रहे हैं। ये लोग/ संगठन जाँच पड़ताल द्वारा अफवाहों और फेक न्यूज़ का पर्दाफ़ाश करते हुए  और अपने काम को बहुत अच्छी तरह से अंजाम दे रहे हैं।  इनमे कुछ प्रमुख नाम है बैंगलुरु में काम कर रहे शम्स ओलियाथ का ग्रुप (www.check4spam.com) और अहमदाबाद में काम कर रहे प्रतीक सिन्हा (www.altnews.in). विभिन्न अफवाहों और फेक न्यूज़ की सघन जाँच पड़ताल के बाद उस का सही पहलु सामने लाते हैं।   देश में और भी लोग हैं जो विभिन्न माध्यमों से लोगों को जागरूक करने की मेहनत कर रहे हैं।  हमें भी जागरूक होना है और लोगों को जागरूक करना है। शिक्षा को बढ़ावा देना होगा, खुद में और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करना होगा तभी हम एक ज़िम्मेदार और जागरूक नागरिक बनकर देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

 शहाब ख़ान 
©Nazariya Now 


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