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Friday, March 30, 2018

शादी से मोहब्बत (कहानी ) लेखक : अम्बुज आनंद

दीप्ति मुझे पहली मुलाकात में बड़ी अजीब लगी । हां,रंग-रूप में कोई कमी ना थी, बस यूँ कह लो कि सौंदर्य के छटा की एक सजल सी प्रतिमूर्ति थी। नैन-नक्श तो माशाल्लाह कोई देख भर ले और मंत्रमुग्ध हो जाए । हम दोनों की यह पहली मुलाकात थी और पहली दफा के मिलन में कहीं न कहीं मुझे ये लड़की मुझे बावली भी लगी , पता नहीं क्या बोले जा रही थी ,कुछ चुनिंदा वाक्य छोड़कर सब बात मेरे समझ के परे था । मैं बस इस अनमोल निधि को ताके जा रहा था । कसम से कहूँ तो मेरे ओहदे से ही ये मुलाकात संभव हो पाई थी वरना पिछले दस सालों में मैनें कोई ऐसा पुण्य नहीं किया था जो इत्ती रूपवती के दर्शन मुकम्मल हो पाते ।
 
 पेशे से मैं पायलट हूँ , पहली छुट्टी में मैं घर आया और मां की जिद्द ने शादी के लिए मजबूर करके रख दिया । मेरे घरवालों को दीप्ति खूब पसंद आई और उनके घरवालों को मैं । जब तक चाय खत्म होती मैं इस सारांश तक पहुँच गया था कि वह यह शादी अपनी मर्जी के खिलाफ कर रही है। बस किसी हाल में अपने माँ बाप का दिल नहीं दुखाना चाहती थी । छत पर हो रही गुफ्तगू का समापन हुआ । नीचे से महज "दीप्ति" का नाम लेना, किसी बुआ की ये आवाज हमारे मुलाकात के समय को खत्म कर, नीचे आने का संकेत था । कमरे में दोनों हाजिर हुए । यकीन था वो शादी के लिए ना कहेगी पर हुआ विपरीत वो शरमाते हुए हाँ कह गई । अब तो उसे समझना मेरे खातिर मील का पत्थर हो रहा था । मैंने मुड़कर अपनी मम्मी की तरफ देखा, माँ ने पूछा- "तुम्हारी रजामंदी बेटा ।" 

मैंने एक पल को सोचा कि नकार दूँ ये रिश्ता, पर दीप्ति  के आखिरी सवाल ने मुझे 'नहीं' कहने की गुजांइश ना छोड़ी । कमरे में दाखिल होने से पहले सीढियों पर पूछा उसका एक सवाल-" कि आप लड़की में क्या देखने आते हैं ? बताइये ना वेद ! क्या मैं आपके पैमाने पे खड़ी उतरी या नहीं ? वैसे मुझे कोई अनुभव नहीं है ,आप मेरे लिए तो पहले ही है ,और तो और दो चार रिजेक्शन तो वैसे हर लड़की की जिंदगी में आती ही है, ना ? " इन लफ्ज़ों में वाक़ई दर्द था और आखिरी बात तो मुझे अब तक सोचने को मजबूर कर रखा था कि - "इतने बड़े ओहदे पर, आज के जमाने में भी आपको किसी से मोहब्बत नहीं हुई ? " शब्द-शब्द सच था । 

मैने भी हाँ कह दिया । दीप्ति को चारों ओर से आश्चर्य की एक दीवार ने घेर रखा था । उसे इसकी उम्मीद ना थी । उसके चेहरे , ये सब साफ बयां कर रहे थे । कहते हैं कि लोग जूठन को जीभ के स्वाद के लिए ही खाते है , आदमी की सोच उसे कह भी दे कि आपके सामने रखा खाना उसे खाना पसंद नहीं, फिर भी अगर कोई वहीं खाना आपके थाली में परोस कर सामने ले आए और भूख बड़ी तेज लगी हो तो आपको कुछ समझ में नहीं आता । मैं सुंदरता का उपासक था । इससे ज्यादा मैं एक लड़की में और कुछ देखने नहीं गया था । दीप्ति इस परीक्षा में तो पहले ही पास हो गई थी । इस मुद्दे पर मेरे "नहीं" का मतलब मेरे अंतर्मन से तकरार ही थी ।

लगे हाथ हमारी शादी की तारीख भी तय हो गई । छुट्टी भी काफी कम बची थी । अब दीप्ति और मैं अक्सर मिला करते थे । कभी काॅफी के बहाने , कभी रेस्तरां पे खाने के बहाने । हमारा वो समय चल रहा था जब  एक लड़की अपने पति की  हर बात मानती है , उसके गंदे व वाहियात जोक पर भी बेचारी को हँसना होता है । फिर एक बार शादी हो जाए उसके बाद काँटा किस कदर पलटता है इससे तो ख़ैर आज हर पति वाकिफ है । हमलोग ढेरों बातें किया करते । मैं अपने ट्रेनिंग के दिनों में प्लेन उड़ाने का डर बयां करता , दोस्तों के किस्से , ज्यादा एक्सप्रेसिव ना होने के नुकसान और जाने कितने उलूल-झुलुल बातें , जिसका कोई तात्पर्य भी नहीं होता और वो, वो तो बस मुझसे प्रेम की बातें किया करती। प्यार जो मैंने आज तक जिंदगी में करना तो दूर सुना भी मुश्किल से था । भला पढ़ाई में रमे रहने वाला शक्स  इन सब चीजों को कितने पास से देख पाता । हाँ, बाबा तुम कहोगे कि हर कोई पढाई पूरी करने के बाद तो मोहब्बत को ही तवज्जो देता है । अच्छे पद पे जाने का मतलब बढ़िया वाला प्यार भी तो होता है । मैं क्या करता । ये सब मेरे समझ के बाहर ही था और तो और मैं मम्मी के कसम वाला बेटा जो था । 

दीप्ति दुनिया मुझसे कुछ अलग थी । उसे शायरी पसंद थी, उसे गाने पसंद थे और मैं भला सीधा साधा आदमी मुझे बस हवाई जहाज उड़ाने के अलावा कुछ और आता ही नहीं था । अक्सर मैं कहीं से बातें शुरू करता तो  वो उसे कैसे भी किसी न किसी प्रेम की किस्से पे पहुंचा देती । आज शादी की तय तारीख से पहले शायद हमारी आखिरी मुलाकात थी । मैने उसे कॉफी पर बुलाया । दुविधावश मैंने उससे पूछा ही लिया -"क्या तुमने कभी इश्क किया है ? " और वह बावली सी लड़की यह भूल बैठी कि वो जो  जिससे यह सब बात बताने जा रही थी , वह दो दिन उसका पति बनने वाला था, पर मेरे ये शब्द ने किसी लोहे को पिघला दिया था वो बस पिघलती ही चली गई । कुछ पल बाद उसने आँसुओं से भरी आंखें बंद की और फिर शुरू की अपने इश्क की दास्ताँ - " मुझे उसके कंधे पर सिर रखकर सोना अच्छा लगता था, शांतनु पता नहीं, मुझे क्यों अच्छा लगता था।"थोड़ी रूक कर बोली - " हां, वो कोई आप जितना सुंदर भी नहीं था दिखने में , पर फिर भी मुझे वो बहुत प्यारे लगते थे । वह मोहब्बत करना जानता था उसकी नजरें हमेशा जैसे मुझे खुश देखना चाहती थी ।" मैंने बीच में अपनी आपत्ति जाहिर करते हुए कहा- "क्या मेरी नजर में तुम्हें मोहब्बत नहीं नजर आती !" वो मुस्करायी, थोड़ी झेपते हुए , फिर बेबाक से कॉफी का सीप भरते हुए बोली - "नहीं, मैने ऐसा कब कहा, भला आप इशांल्लाह मुझे बहोत प्यार करेंगें ...... आपकी नजरों में " हंसते हुए पलके नीचे फेर ली । "फिर आगे"- मैने पूछा । "क्या होता " - एकदम थमते हुए उसने जबाब दिया । "अक्सर छोटे घरों से निकली हुई लड़कियां हर चीज का इजहार नहीं करती है ना और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही समझ लो । जैसे वक्त को कुछ और ही मंजूर था । मेरे माँ-बाबा सरकारी स्कूल में मास्टर थे । उसकी बेटी भला एक -एक कदम समाज में फूंक कर ही रखती ना । " शब्द में प्रतिकार था । वो बोलती गई । मैं बच्चों सा सुनता गया । "हमने उसे भाग के शादी करने को कहा था , वो पागल मना कर गया । " जुबां लड़खड़ा गए । वेदना फूट रही थी । खुद संभलते हुए बोली-" मेरे नसीब का ही दोष कह लो कि पिछले महीने उसने अपनी शादी कर ली ।" इतना बोलते ही फफक पड़ी । मैने अपने कंधे का सहारा देकर उसे जैसे तैसे चुप कराने लगा , उसके आँसू मेरी उजली कमीज पर गिरी तो खुद को सँभालते हुए बोली-" ओह ! वेद ,आइ एम साॅरी । जाने पागल बन मैं क्या सब बक गई , वो भी आपसे । " आज मुझे दीप्ति थोड़ी समझदार लग रही थी । ये सब सुन के बस यहीं लग रहा था, चलो इतना विश्वास करती गई लड़की मुझ पे , मेरे लिए ये बड़ी बात थी ।

काफी धुमधाम से हमारी शादी हुई । उस आखरी मुलाकात के बाद दीप्ति अब ज्यादा खुलकर जिंदगी जीने लगी । मेरी छुट्टी अब करीब-करीब समाप्त होने को थी। मैं हर पल कोशिश करता कि उसके प्यार के खालीपन को अपनी बातों से भरा करूं। मेरा दिल तो कभी नहीं टूटा था पर मुझे किसी चीज के टूटने का अंजाम मालूम था । महसूस ना हो तो एक काँच की ग्लास महज हाथ से छिटक जाए तो चीख निकल जाती है और दिल का मामला तो सदियों से सुनता चला आ रहा था। मैं इन चीजों को समझता था ।

दीप्ति अब तो खैर मेरी जिंदगी थी । उसके अंदर एक शैतान बच्चा भी सिमटा था जो वह कभी-कभी मुझे दिख जाता था । तरह तरह की आवाज निकाल कर मुझे डराने का नाटक करती ,तकियों की लड़ाई , फ्रिज से निकाल कर दो- चार बर्फ के टुकड़े मुझ पर फेंक कर घर को ही मनाली कहने लगती , और बच्चों-सा वहाँ जाने की जिद्द करती , और मैं अगली छुट्टी का हवाला देकर बात टाल देता । कभी- कभी वो अकेलेपन में खामोश हो जाती थी और मैं अपने से कोशिश करता, कभी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता ।

मुझे मालूम नहीं था सुहागन शादी के सिंदुर खत्म होने तक उसे थोड़ा-थोड़ा लगाती है । मैं ये देखकर उससे जी भर माजाक करता- " ये एक तो मेरे खातिर और दुसरा शांतनु के तो नहीं ?" वो गुस्से में लाल होती खड़ी होकर "हुहह" करती , खुद के कमर पर जोड़ से हाथ रखती और पास के कमरे में भाग जाती । फिर मैं पास जाकर बड़े प्यार से , दुलार से उसे मानता । मैं बहुत खुश था और वो भी अब थोड़ी थोड़ी खुश रहने लगी ।

कल मेरी छुट्टी समाप्त होने वाली थी । दिप्ति बड़े आइने के सामने खड़ी होकर अपने बाल सँवार रही थी । बादामी रंग की सारी और पूरे हथ्थे की कथ्थी रंग का ब्लाउज मानो किसी चित्रकार अपनी पसंद की रंग तस्वीर में भर दिया हो । मुझे नौकरी पर जाने का दिल नहीं कर रहा था । नई शादी के तुरंत बाद भला मैं मां से कैसे कहता कि उसे साथ ले जाउँ । मैं उसके पास आकर पीछे से कमर पर हाथ रखकर कहा- "आप दुनिया की सबसे खुबसूरत पत्नी हो ।" उसने भी क्रीम के डब्बे की डक्कन को बंद करते हुए, बिना मेरे ओर देख के बोली " वेद ! दस महीने मुश्किल से गुजरेगी मेरी । आप दुनिया के बेस्ट पति हो या नहीं ,मुझे नहीं मालूम । पर मैने जैसा सोचा था उससे बेहतर तो मिल गया । फिर झटके से पीछे मुड़ी और बच्चों सा मुझसे लिपट गई । उसकी दहकती गर्म साँसे मेरे दिल को एक तपन प्रदान कर रही थी ।


गाड़ी के आँख से ओझल होने तक वो हाथ हिलाकर बाय करती रही । पहले हफ्ते काम में मन भी नहीं  लग रहा रहा था । अपना शिफ्ट खत्म होते ही तुरंत दीप्ति को फोन लगा देता ।फिर दिन भर की सारी बातें ,उसका हँसना, नाराज होकर फोन रख देना ।मुझे बहुत मजा आ रहा था । वो जब भी मेरे पसंद के आलू पराठे बनाती ,लैपटॉप के सामने बैठ कर मुझे चिढाती ,खिलाने का नाटक करती । मैं बस इस बहाने उसकी आँखों से बहती माधुर्य को निहारता रहता । काम के वक्त हर रोज कहती -"ठीक से उड़ान भरना , तुम्हारे तीन सौ पैसेंजर के साथ तीन सौ एक जान हलक में अटकी रहती है मेरी ।" मैं वहीं पुरानी बनाबटी हँसी और घिसी-पिटी डायलाॅग "वर्क इज़ वरशिप !" कह कर फोन रख देता । समय बीत रहा था ।मैं हर रोज कैलेंडर से एक दिन बीतने पर उस तारीख़ पर गोला लगा देता । तीन महीने बीत गए । मेरी जिंदगी मुझे अब खुबसूरत लगने लगी थी ।दीप्ति भी मेरा हर कदम साथ देती । मैं हर महीने उसे कुछ ना खरीद कर गिफ्ट भेजता रहता । पहले तो मुझपे झुझलाती पर उसकी मुस्कान से मैं उसके खुशी का अंदाजा लगा देता । 

रविवार का दिन था । मैं एक सुबह उठा मौसम सुहाना देख कर नींद की आगोश में पुन: चला गया । मोबाइल की टन टन से नींद खुली । दीप्ति के मैसेज थे । उसने लिखा था -"लव यू वेद ! आय एम पैरेगनेंट ।" खुशी की लहर से मानो पुरे शरीर में करंट सी दौड़ गई । भगवान का मन ही मन शुक्रिया अदा कर रहा था । मैं पिता बन जाऊँगा । आह ! प्रकृति ने इस अहसास को महज महसूस करने के लिए ही बनाया होगा । मैं खुश होकर वापस दीप्ति को फोन मिलाया । "हैलो"- थकी हुई दीप्ति दुसरे तरफ से बोली । मेरे बधाई बोलने से पहले ही मुझे बधाई देते हुए बोली -"अम्मा के संग गई थी डाॅक्टर के पास , बाकी जो खबर आप को मिल ही गई ।" और शर्मा गई ।मैं बस आसमान में उड़ रहा था । मैने तो बच्चे का नाम भी मन में सोच रखा था । बेटा तो "शौर्य " और बेटी हुई तो .....मेरे बात को बीच में  काटते हुए उधर से बोली - " वैदेही " । "वेद और दीप्ती से वैदेही । " या खुदा मैने इतना ना सोचा था । कितना प्यारा नाम सोची उसने । साहित्य से जुडने का फायदा मुझे मालूम हुआ । 

किसी तरह साठे आठ महीने बीत गए । बस डेढ़ महीने की बात बची थी । मैं बस घर जाने को बैचेन हो रहा था ।दीप्ती से मुलाकात ,अपने सृजन के अंश को देखने को लोचन आतुर थे । सुबह से तीन बार फोन मिलाया दीप्ती फोन नहीं उठाई । शायद तबीयत नासाज हो , सो रही होगी । यहीं सोचकर मैं एयरपोर्ट को निकल पड़ा । काम के बाद वापस आकर दीप्ति को फोन मिलाने फोन हाथ में लिया तो माँ के दस मिस काॅल और दीप्ती के एक भी , ना कोई काॅल और ना मैसेज ने मुझे सकते में डाल दिया । पैसेंजर केविन में बनी बैठने की एक खाली जगह देखकर मैं वहीं बैठ गया ।हिम्मत ना हुई क्वार्टर जाने की । ढेरों सवाल से घिरे ,धीरे से माँ का  नंबर मिलाया । माँ के "बेटा" बोलने के अंदाज में शायद कुछ अंतर लगा । मैने तपाक से पूछा -माँ दीप्ति ठीक तो है । माँ मौन हो गई । मैं मानो जमीं मे धँसता जा रहा था । "माँ ,प्लीज ,बताइये ना ,क्या हुआ सब ठीक तो है ।" जैसे बिलखते हुए पूछा । माँ चीत्कार कर रो उठी । "बेटा बहु की तबियत बहुत खराब है । वो समय से पहले बच्चे को जन्म देने जा रही है । स्थिति बहुत नाजुक  ....................." । फोन हाथ से छूट गया । मैं सर पकड़ कर वहीं बैठ गया । आँसू सूख गए थे मेरे । पागलों सा फर्श पर लोटने का जी कर रहा था । आनन फानन में मैं घर को रवाना हुआ ।

मैं स्टेशन से सीधे अस्पताल को चल दिया । वहां पहुंचते ही माँ  ने गले से गला लिया । रोते हुए गले से बोली -"देखो ना मेरी बच्ची कैसी हो गई है । बेटी को जन्म दी है । ....." मैं भागकर दीप्ती के कमरे में गया । बेहोश पड़ी थी । नर्स ने मिलने से मना कर दिया और मुझे बहार जाने को कह रही थी कि मेरे मुँह से "दीप्ति" सुनकर उसने आँखे खोली । वहीं आँखे जो कभी नूर से भरी होती , आज असहाय,एक दम बेबस सा । उसने मुझे पास आने का इशारा किया । मेरे पैर लड़खड़ा रहे थे । हवाओं में उड़ान भरने वाला हौसला उसके चरणों के नीचे दम तोड़ रहा था । उसने मुझसे इशारे में आॅक्सीजन मास्क हटाने को कहा । मेरी हिम्मत जबाब दे गई । वो लचार होकर मुझे घूरने लगी । फिर फुसफुसाते हुए मुझे पास बुला कर कहा ।" वेद ! तु ...म्हा .....री .....वैदेही ....................। " बीप बीप की आवाज अचानक तेज होकर बंद हो गई । दीप्ति के आँखों से निकले दर्द कानों के बगल से उसके सिर को थामे मेरे हाथों पर लुढ़ककर ठंडी हो गई । मैं सुन्न हो गया । दीप्ति के जिस्म से लिपट कर फुट फुटकर रोने लगा । वैदेही को गोद में लेकर रोता हुआ मैं बाहर निकला । होनी ने एक बार फिर ममता को परास्त कर दिया ।

दीप्ति को मेरा साथ छोड़े सात महीने हो गए । मुझे काम पे लौटना था । छुट्टी बढने के सारे दरवाजे बंद हो गए थे । शाम को माँ ने रूखे स्वर में कहा-"अपनी कुलांक्षिणी बेटी को साथ लेते जाना । आई नहीं कि माँ को निगल गई । " ये शब्द मेरे माँ के थे मुझे यकीन ना हुआ । मैं सख्त होकर बोला-" माँ बस , आगे एक शब्द वैदेही के लिए मुझे आपके मुँह से नहीं सुनना ।" वैदेही मेरे गोद में थी । मुझे अपने लिए लड़ते देख रही थी । मेरे गुस्साए चेहरे को चुपचाप निहार रही थी । मैं उसके इस नादानी पर हँस दिया । माँ ने कहा-" प्रिया के पापा , उससे तुम्हारे शादी की पूछ रहे थे । क्या बोलूँ उन्हें बताओ ? , कर लो उसे बच्चे से कोई आपत्ति नहीं है । " मैं सोच में था क्या करूँ । इतने में वैदेही ने मेरे अँगुली को अपनी छोटी मुठ्ठी में जोर से दबा लिया । मुझे जबाब मिल गया । मैने जोर से कहा -" माँ मना कर  देना । मुझे नहीं करनी दूसरी शादी ।"  वैदेही को लेके अपने कमरे में आ गया । वैदेही सो रही थी । मैने तकिया उठाया । नीचे कागज का टुकडा था । लिखा था- "वेद ! आप इतने अच्छे क्यूँ हो । लव यू माय स्वीट हार्ट !" दीप्ती के चंद शब्द मेरी आँखें नम कर गई । मैने रिजनेशन लैटर लिख कर भेज दिया और जाॅब छोड़ दी ।

वैदेही अब छ: साल की है । स्कूल जाती है । घर में किसी से कुछ बात नहीं करती है ,बस मेरे घर लौटते ही चुप नहीं होती । दुनिया भर की बातें करके मेरी थकान मिटा देती है । मैं अब फीजिक्स की कोचिंग पढाता हूँ । खुश उस जिंदगी में हूँ - जहाँ मैं हूँ, वैदेही है, और दीप्ति की यादें । माँ तो खैर नाराज है ही आजतक । वैसे कल ही हमदोनों बाप- बेटी मनाली से आए है । वैदेही कैमरे में मुझ पर फेंकते हुए बर्फ को देख हँस रही थी और मैं वैदेही में दीप्ति की प्रतिछाया निहार रहा था । वो वादे पूरा ना होके भी कई हद तक पूरा हो गया ।

  लेखक : अम्बुज आनंद
सहरसा ,बिहार


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