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Friday, March 30, 2018

कभी-कभी (कहानी ) - लेखिका : आकांक्षा

कभी -कभी मे सोचती हूँ तो समझ नही आता की क्या ज़िन्दगी मे किसी का साथ होना इतना ज़रूरी है।क्या ज़िन्दगी बिताने के लिए प्यार इतना ज़रूरी है इसका जबाब नही हैं मेरे पास पर मेरे सारे दोस्त कहते है कि प्यार होना चाहिए हर किसी के ज़िन्दगी मे,और मेरे साथ हमेशा यही होता रहा है बचपन से की जिन चीज़ों से मे हमेशा बचना चाहती हूँ वो मेरे साथ ज़रूर होता है और प्यार भी हुआ जिस से मे हमेशा बचना  चाहती थी। वैसे मे आप सबको बता दूँ की मे किसी के करीब जल्दी जाती नही पर कोई जब मेरे दिल मे उत्तर जाए तो वो इंसान बहुत ज़रूरी हो जाता हैं मेरे लिए ।
 
 मेरी कहानी सुनने से पहले मे अपना इंट्रो तो दे दू आप सबको...मै सिमरन और मै एक बैंकर हूँ और करोलबाग के एक बैंक मे जॉब करती हूँ और इंडिया के कैपिटल दिल्ली मे रहती हूँ रोज का सफर मेट्रो से होता है मेरा .....और महीने का 40 हज़ार कमा ही लेती हूँ और आधा इनकम रेंट और ज़िन्दगी के ज़रूरतों को पूरा करते ख़तम हो जाता है और बाकी मे अपने पेरेंट्स को अपने गांव मे भेज देती हूँ ज़िन्दगी बस कट ही जाती हैं। रोज द्वारका से करोलबाग जाना मेरे रोज का काम हैं और वीकेंड मे दोस्तों के साथ आउटिंग एहि थी मेरी ज़िन्दगी ।पर मेरी ज़िन्दगी उस दिन बदल गई जब हर रोज की तरह मे बैंक गई और फिर काम ख़त्म करके वापस आ रही थी उस दिन शनिवार था इसलिए उस दिन मेरी छुट्टी जल्दी ही हो गई थी सो मे घर जल्दी ही जाना चाहती थी क्योंकि मे कुछ ज्यादा ही थक गई थी शायद पूरी रात काम करने के कारण ...मेट्रो मे जाते ही मे सीट खोज कर बैठ गई ।आधे घण्टे के सफर मे ...आधे घटे काटना आज कितना मुश्किल था और नींद भी बहुत लग रही थी पता नही कब मेरी आँख लग गई और मेरे साथ बैठे उस इंसान के कंधे पर मैने अपना सिर टिका दिया और वो उस आधे घण्टे का सफर एक घण्टे मे बदल गया और मे द्वरका  से आगे चली गई और द्वरका सेक्टर 21 आ गई जो ब्लू लाइन का आखरी स्टॉप था और जब मेरी आँख खुली तो मेट्रो मे कोई नही था मै अचानक उठ कर खड़ी हों गई और इधर उधर देखने लगी कोई नही दिख रहा था अचानक मुझे महसूस हुआ की मुझे कोई देख रहा है पीछे मुड़ कर देखा तो सीट पर कोई बैठा था कोई 24 साल का लड़का था सिर पर एक ब्लू पग था और दाड़ी ओर मूझ था कोई पंजाबी था। मेट्रो दुबारा चलने लगी और लोग धीरे -धीरे मेट्रो मे आने लगे .....मेट्रो अब वापस चलने लगी नॉएडा के लिए और मे उस सीट को झोड़ कर सामने जा कर बैठ गई और जब मेरी नींद गायब हुई तो मुझे एहसास हुआ की पुरे रास्ते मे उस इंसान के कंधे पर अपना सिर रखा था और उस को कहा उतरना था और वो उतरा क्यों नही और उस इंसान ने मुझे उठाया क्यों नही .....पता नही क्या सोच रहा होगा। जो भी हो वो इंसान देखने मे तो अच्छा ही लग रहा था। पर ऐसे ही किसी को अच्छा कहना सही नही होगा सिमरन तुझे क्या पता की उस के दिल मे क्या चल रहा होगा । एक -दो बार मेरी नज़र उस से टकराई .....और बन्दे की हिम्मत तो देखो हर बार वो इंसान मुस्कुरा रहा था सही हैं क्यों न मुस्कुराये े ऐसे ही कोई लड़की उस के अंधे पर सो जाये तो इंसान मुस्कुराएगा नही तो क्या रोयेगा।उफ़ मै पागल.....ये सब बातें मे सोच ही रही थी की मेरा स्टॉप आ गया।मै उत्तर गई। मेट्रो से और मेट्रो का गेट बंद हो गया और मेट्रो चलने लगी मैंने मुड़ कर देखा तो वो इंसान मुझे देख रहा था वो गेट पर खड़ा था।कुछ तो था उस के आँखों मे कुछ अच्छा या बुरा पता नही मै कुछ समझ नही पाई की उस दिन क्या हुआ मेरे साथ....पर उस घटना को मे रात भर सोचती रही। पता नही क्या नाम था उस इंसान का ,कम से कम मुझे उसे उसका नाम पूछ लेना चाहिए था फिर मेरा दिल कहता नही क्यों मे एक अजनबी से उस का नाम पूछती और वो कौन था कि उस का नाम पूछती वो तो बस एक अजनबी था.....सिर्फ अजनबी....वैसे इतना भी बुरा नही था उसका शक्ल -सूरत तो अच्छा था ,छोटी आँखे ,रंग गोरा  और लंबी नाक जो की उस पर कुछ ज्यादा ही लंबी थी फिर भी बंदा समाट था पर उसकी वो पग और लंबी मूछ ओर दाढ़ी ही अजीब था उसके चेहरे पर। कुछ दिनों बाद मै इस घटना को बुल गई ओर अपने रोज के ज़िन्दगी मे लग गई फिर से वही काम घर से बैंक और बैंक से घर ,पर फिर मेरे ज़िन्दगी मे कुछ हुआ जो फिर से अजीब था या कहे डेस्टिनी थी ।वो बंदा दुबारा मुझे द्वारका मेट्रो पर मिला। मै पहचान गई पर मुझे लगा की उससे पहले जा कर बात किया तो कही वो बंदा इस का गलत मतलब न सोच बैठे ,ये सब सोच ही रही थी तभी वो मुड़ा ओर शायद उसने मुझे देखा और शायद पहचान भी गया और मेरे पास आ कर मुझसे कुछ कहने ही वाला था उससे पहले मैंने ही बोल दिया आप वही हैं जो मुझे शनिवार को मिले थे । उसने कहा हा मै वही हूँ।मैंने कहाँ सॉरी मुझे पता नही चला उस दिन और बिच मे मेरी बात काटते वो बोला कोई नही ....हेल्लो मेरा नाम परमजीत है आपका नाम ....मैने कहा सिमरन अच्छा लगा आपसे मिल कर उसने कहा ।मैंने कहा आप द्वारका मे रहते है ???उस ने कहा नही मै पंजाब मे रहता हूं दिल्ली कुछ काम से आया था।मैंने कहा हाँ लग ही रहा था मुझे की आप दिल्ली से नही हैं क्यों ?उस ने कहा आपको ऐसा क्यों लगा ...क्यों की आप शायद हिंदी नही बोलना जानते आपके बातो मे पंजाबी भाषा निकल ही आती है।हाँ सही कहा आपने असि हिंदी नही आती और वो हँसने लगा । कोई नही आप सिख जायेगे चलो बाय मेरी मेट्रो आ गई इतना कहते ही मै मेट्रो मे चढ़ गई जैसे ही गेट बंद हुआ ओर मेट्रो चलनेे लगी परमजीत ने मुझे अपना हाथ ऊपर करके बाय कहा मैंने भी हाथ हिला दिया अच्छा इंसान है बातो से तो यही लगा मुझे बाकी चीज़ों का पता नही, नंबर ले लेना चाहिए था पर कही वो गलत न समझ जाता और सोचता कितनी चिपकू है ये लड़की ...पर लड़का तो वो था उस को मुझसे नंबर माँगना चाहिए था पर जो भी हो ये हम दोनों की दूसरी मुलाक़ात अच्छी थी डेस्टिनी ने चाहा तो शायद हम फिर मिले तब नंबर मागले वो....परमजीत  अच्छा नाम है।अगले दिन वो बंदा दुबारा मुझे मेट्रो मे मिला..ओर उसके बाद तो मिलने का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ मानो खत्म होने का नाम नही था।हम दोनों दोस्त बन गए थे वो मुझे अपने बारे मे हर एक चीज़ बताता था , उसे खाने मे क्या अच्छा लगता हैं, उस के घर मे कौन -कौन है वो क्या करता है...हर एक बात...मानो वो कुछ भी नही छिपाना चाहता हो।हालाँ की मे उससे प्यार नही करने लगी थी पर फिर भी उससे मिलना और उससे बातें करना अच्छा लगने लगा था।हमे मिलते हुए कुछ हफ्ते ही हुए थे ओर इतना विश्वास मै उस पर करने लगी थी।उस दिन भी हम बाकि दिनों की तरह मिले थे उसने बताया कि उस का जो काम था वो खत्म हो गया हैं और अब उसे वापस घर यानि पंजाब जाना है ये तो मै जानती थी की एक न एक दिन वो चला जाएगा और आखिर कार क्यों रुके वो हम दोस्त के अलावा क्या थे । न उसने कोई वादा किया था औऱ न मैंने कोई वादा किया था औऱ आज जब वो जाने वाला हैं तो क्यों मुझे कुछ अच्छा नही लग रहा हैं क्या परमजीत भी इसी एहसाह से गुज़र रहा होगा ।मुझे उसका तो नही पता पर मेरे दिल का हाल तो बेहाल था।क्या हुआ हैं मेरे साथ ,क्यों बुरा लग रहा हैं उस के जाने से...ऐसा लग रहा था कुछ टूट रहा हैं दिल के कोने मे पर क्या शायद मै भी नही समझ पा रही थी।उस रात मै सो नही पाई पूरी रात बस करवटे ही बदलती रही।वो चला गया ओर जाते -जाते उस ने कहा कि वो जब भी दिल्ली आएगा वो मुझसे मिलेगा और उसके पास नंबर तो है ही मेरा बात होती रहेगी। पर उस पल मै बस इतना चाहती थी कैसे भी रोक लू उससे बोल दूँ की रुक जाओ पर किस हक़ से बोलती की ं रुक जाओ क्या कहती अगर वो पूछता की क्यों रुकूँ... क्या कह देती की मेरे लिए रुक जाओ पर क्यों मै क्या थी उसके ज़िन्दगी मे की वो मेरे लिए रुकता ।मै तो बस एक दोस्त थी उसके लिए न उसने कुछ कहा था न मैंने कुछ कहा था।पर क्या कहना चाहिए था मुझको ।की रुक जाओ मेरे लिए क्यों की जब तक तुम्हें देख न लूँ दिन मे एक बार तो दिन मेरा अच्छा नही बीतता हैं जब तक तुम से बात न हो जब तक कुछ भी अच्छा नही लगता,की जब तक तुम मुझे हँसाते नही मै खुल के हँसती नही...क्या मै कह देती की नही रह सकती दूर तुमसे ...क्या कह देती की शायद अनजानें मे ही सही मै प्यार करने लगी हूँ जिस प्यार से भागति रही वो मोहब्बत हो गया हैं मुझे,पता नही कैसे औऱ कब बस हो गया हैं प्यार ..कैसे कह देती और उसके लिए मै सिर्फ एक दोस्त ही तो थी और कभी उसने कहा भी तो नही की वो भी मुझे प्यार करता है। क्या ज़रूरी होता है अपने एहसास को बोल कर बताना क्या वो इंसान इस बात को नही समझ सकता जिसके लिये हम कुछ महसूस करते है। पर शायद कुछ बातों को बोलना ज़रूरी हो जाता है। मुझे भी बोल देना चाहिए था उसके बाद जो भी होता वो देख लेते पर वो हिम्मत क्यों नही थी मेरे मे की उसको अपने दिल की बात बता देती उफ़्फ़!!! क्यूँ नही बताया । जो भी हो अब कोई फायदा नही इन बातों का जो होना था वो हो गया उसे जाना था वो जा चूका हैं।इन सब बातों को सोचते हुए मै घर आई और गेट खोल कर बैठी ही थी तभी गेट बजा...कोई लड़का था और उसके  हाथो मे कुछ था शायद कोई बॉक्स था वो बॉक्स देते हुए बोला।मैडम आपका पार्सल हैं और वो चला गया। मैंने उस बॉक्स को खोला तो देखा की एक चिट्ठी थी लिखा था मुझे पता हैं कि हम दोनों का रिश्ता बहुत ही अच्छा है सिमरन और तुमारे जैसा दोस्त मै अगर पुरे दुनिया मे खोजता तो नही मिलता ।मै इस दोस्ती को कभी भी नही खोना चाहूंगा कभी नही। पर इस दोस्ती के आगे मै कब बड़ गया मुझे पता ही नही चला और हमारी दोस्ती के उस लाइन को मैने कैसे तोड़ दिया मै जान ही नही पाया पर  अब जब मै जा रहा हूँ तुमसे दूँर और इस दोस्ती के रिश्ते से दूर तो मुझे एहसास हो रहा हैं कि तुम मेरे लिए कितनी ज़रूरी हो और शायद तुम दोस्त से बढ़ कर  मेरे लिए हो। सिमरन मुझे पता हैं ये सब बहुत जल्दी हैं पर क्या करूँ प्यार समय नही देखता शायद  इस लिए तो तुम इतने कम समय मे ही मेरा प्यार बन गई। चिट्ठी ख़त्म हो गई थी पर मेरे आँखों के आँसू मानो ख़त्म होना का नाम नही ले रहे थे और चिट्ठी पर लिखे उन अक्षरोँ को मिटा रहे थे पर मेरे आँसू उन एहसासों को शायद नही मिटा पाए।तभी गेट की घंटी बजी मैने खुद को संभाला और गेट खोला। सामने परमजीत था उसको देख कर पहले तो मुझे हँसी आई और कुछ पल बाद रोना मेरे आँसुओ ने दुबारा मेरे आँखों के कोने मे एक जगह बना लिया। शब्द् बहुत थे उस पल कहने को पर मै कुछ कह नही पाई ।कुछ पल बाद मेरी आँखे परमजीत के शर्ट को भिगो रहे थे।


कभी -कभी मे सोचती हूँ तो समझ नही आता की क्या ज़िन्दगी मे किसी का साथ होना इतना ज़रूरी है।क्या ज़िन्दगी बिताने के लिए प्यार इतना ज़रूरी है इसका जबाब नही हैं मेरे पास पर मेरे सारे दोस्त कहते है कि प्यार होना चाहिए हर किसी के ज़िन्दगी मे,और मेरे साथ हमेशा यही होता रहा है बचपन से की जिन चीज़ों से मे हमेशा बचना चाहती हूँ वो मेरे साथ ज़रूर होता है और प्यार भी हुआ जिस से मे हमेशा बचना  चाहती थी। वैसे मे आप सबको बता दूँ की मे किसी के करीब जल्दी जाती नही पर कोई जब मेरे दिल मे उत्तर जाए तो वो इंसान बहुत ज़रूरी हो जाता हैं मेरे लिए ।मेरी कहानी सुनने से पहले मे अपना इंट्रो तो दे दू आप सबको...मै सिमरन और मै एक बैंकर हूँ और करोलबाग के एक बैंक मे जॉब करती हूँ और इंडिया के कैपिटल दिल्ली मे रहती हूँ रोज का सफर मेट्रो से होता है मेरा .....और महीने का 40 हज़ार कमा ही लेती हूँ और आधा इनकम रेंट और ज़िन्दगी के ज़रूरतों को पूरा करते ख़तम हो जाता है और बाकी मे अपने पेरेंट्स को अपने गांव मे भेज देती हूँ ज़िन्दगी बस कट ही जाती हैं। रोज द्वारका से करोलबाग जाना मेरे रोज का काम हैं और वीकेंड मे दोस्तों के साथ आउटिंग एहि थी मेरी ज़िन्दगी ।पर मेरी ज़िन्दगी उस दिन बदल गई जब हर रोज की तरह मे बैंक गई और फिर काम ख़त्म करके वापस आ रही थी उस दिन शनिवार था इसलिए उस दिन मेरी छुट्टी जल्दी ही हो गई थी सो मे घर जल्दी ही जाना चाहती थी क्योंकि मे कुछ ज्यादा ही थक गई थी शायद पूरी रात काम करने के कारण ...मेट्रो मे जाते ही मे सीट खोज कर बैठ गई ।आधे घण्टे के सफर मे ...आधे घटे काटना आज कितना मुश्किल था और नींद भी बहुत लग रही थी पता नही कब मेरी आँख लग गई और मेरे साथ बैठे उस इंसान के कंधे पर मैने अपना सिर टिका दिया और वो उस आधे घण्टे का सफर एक घण्टे मे बदल गया और मे द्वरका  से आगे चली गई और द्वरका सेक्टर 21 आ गई जो ब्लू लाइन का आखरी स्टॉप था और जब मेरी आँख खुली तो मेट्रो मे कोई नही था मै अचानक उठ कर खड़ी हों गई और इधर उधर देखने लगी कोई नही दिख रहा था अचानक मुझे महसूस हुआ की मुझे कोई देख रहा है पीछे मुड़ कर देखा तो सीट पर कोई बैठा था कोई 24 साल का लड़का था सिर पर एक ब्लू पग था और दाड़ी ओर मूझ था कोई पंजाबी था। मेट्रो दुबारा चलने लगी और लोग धीरे -धीरे मेट्रो मे आने लगे .....मेट्रो अब वापस चलने लगी नॉएडा के लिए और मे उस सीट को झोड़ कर सामने जा कर बैठ गई और जब मेरी नींद गायब हुई तो मुझे एहसास हुआ की पुरे रास्ते मे उस इंसान के कंधे पर अपना सिर रखा था और उस को कहा उतरना था और वो उतरा क्यों नही और उस इंसान ने मुझे उठाया क्यों नही .....पता नही क्या सोच रहा होगा। जो भी हो वो इंसान देखने मे तो अच्छा ही लग रहा था। पर ऐसे ही किसी को अच्छा कहना सही नही होगा सिमरन तुझे क्या पता की उस के दिल मे क्या चल रहा होगा । एक -दो बार मेरी नज़र उस से टकराई .....और बन्दे की हिम्मत तो देखो हर बार वो इंसान मुस्कुरा रहा था सही हैं क्यों न मुस्कुराये े ऐसे ही कोई लड़की उस के अंधे पर सो जाये तो इंसान मुस्कुराएगा नही तो क्या रोयेगा।उफ़ मै पागल.....ये सब बातें मे सोच ही रही थी की मेरा स्टॉप आ गया।मै उत्तर गई। मेट्रो से और मेट्रो का गेट बंद हो गया और मेट्रो चलने लगी मैंने मुड़ कर देखा तो वो इंसान मुझे देख रहा था वो गेट पर खड़ा था।कुछ तो था उस के आँखों मे कुछ अच्छा या बुरा पता नही मै कुछ समझ नही पाई की उस दिन क्या हुआ मेरे साथ....पर उस घटना को मे रात भर सोचती रही। पता नही क्या नाम था उस इंसान का ,कम से कम मुझे उसे उसका नाम पूछ लेना चाहिए था फिर मेरा दिल कहता नही क्यों मे एक अजनबी से उस का नाम पूछती और वो कौन था कि उस का नाम पूछती वो तो बस एक अजनबी था.....सिर्फ अजनबी....वैसे इतना भी बुरा नही था उसका शक्ल -सूरत तो अच्छा था ,छोटी आँखे ,रंग गोरा  और लंबी नाक जो की उस पर कुछ ज्यादा ही लंबी थी फिर भी बंदा समाट था पर उसकी वो पग और लंबी मूछ ओर दाढ़ी ही अजीब था उसके चेहरे पर। कुछ दिनों बाद मै इस घटना को बुल गई ओर अपने रोज के ज़िन्दगी मे लग गई फिर से वही काम घर से बैंक और बैंक से घर ,पर फिर मेरे ज़िन्दगी मे कुछ हुआ जो फिर से अजीब था या कहे डेस्टिनी थी ।वो बंदा दुबारा मुझे द्वारका मेट्रो पर मिला। मै पहचान गई पर मुझे लगा की उससे पहले जा कर बात किया तो कही वो बंदा इस का गलत मतलब न सोच बैठे ,ये सब सोच ही रही थी तभी वो मुड़ा ओर शायद उसने मुझे देखा और शायद पहचान भी गया और मेरे पास आ कर मुझसे कुछ कहने ही वाला था उससे पहले मैंने ही बोल दिया आप वही हैं जो मुझे शनिवार को मिले थे । उसने कहा हा मै वही हूँ।मैंने कहाँ सॉरी मुझे पता नही चला उस दिन और बिच मे मेरी बात काटते वो बोला कोई नही ....हेल्लो मेरा नाम परमजीत है आपका नाम ....मैने कहा सिमरन अच्छा लगा आपसे मिल कर उसने कहा ।मैंने कहा आप द्वारका मे रहते है ???उस ने कहा नही मै पंजाब मे रहता हूं दिल्ली कुछ काम से आया था।मैंने कहा हाँ लग ही रहा था मुझे की आप दिल्ली से नही हैं क्यों ?उस ने कहा आपको ऐसा क्यों लगा ...क्यों की आप शायद हिंदी नही बोलना जानते आपके बातो मे पंजाबी भाषा निकल ही आती है।हाँ सही कहा आपने असि हिंदी नही आती और वो हँसने लगा । कोई नही आप सिख जायेगे चलो बाय मेरी मेट्रो आ गई इतना कहते ही मै मेट्रो मे चढ़ गई जैसे ही गेट बंद हुआ ओर मेट्रो चलनेे लगी परमजीत ने मुझे अपना हाथ ऊपर करके बाय कहा मैंने भी हाथ हिला दिया अच्छा इंसान है बातो से तो यही लगा मुझे बाकी चीज़ों का पता नही, नंबर ले लेना चाहिए था पर कही वो गलत न समझ जाता और सोचता कितनी चिपकू है ये लड़की ...पर लड़का तो वो था उस को मुझसे नंबर माँगना चाहिए था पर जो भी हो ये हम दोनों की दूसरी मुलाक़ात अच्छी थी डेस्टिनी ने चाहा तो शायद हम फिर मिले तब नंबर मागले वो....परमजीत  अच्छा नाम है।अगले दिन वो बंदा दुबारा मुझे मेट्रो मे मिला..ओर उसके बाद तो मिलने का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ मानो खत्म होने का नाम नही था।हम दोनों दोस्त बन गए थे वो मुझे अपने बारे मे हर एक चीज़ बताता था , उसे खाने मे क्या अच्छा लगता हैं, उस के घर मे कौन -कौन है वो क्या करता है...हर एक बात...मानो वो कुछ भी नही छिपाना चाहता हो।हालाँ की मे उससे प्यार नही करने लगी थी पर फिर भी उससे मिलना और उससे बातें करना अच्छा लगने लगा था।हमे मिलते हुए कुछ हफ्ते ही हुए थे ओर इतना विश्वास मै उस पर करने लगी थी।उस दिन भी हम बाकि दिनों की तरह मिले थे उसने बताया कि उस का जो काम था वो खत्म हो गया हैं और अब उसे वापस घर यानि पंजाब जाना है ये तो मै जानती थी की एक न एक दिन वो चला जाएगा और आखिर कार क्यों रुके वो हम दोस्त के अलावा क्या थे । न उसने कोई वादा किया था औऱ न मैंने कोई वादा किया था औऱ आज जब वो जाने वाला हैं तो क्यों मुझे कुछ अच्छा नही लग रहा हैं क्या परमजीत भी इसी एहसाह से गुज़र रहा होगा ।मुझे उसका तो नही पता पर मेरे दिल का हाल तो बेहाल था।क्या हुआ हैं मेरे साथ ,क्यों बुरा लग रहा हैं उस के जाने से...ऐसा लग रहा था कुछ टूट रहा हैं दिल के कोने मे पर क्या शायद मै भी नही समझ पा रही थी।उस रात मै सो नही पाई पूरी रात बस करवटे ही बदलती रही।वो चला गया ओर जाते -जाते उस ने कहा कि वो जब भी दिल्ली आएगा वो मुझसे मिलेगा और उसके पास नंबर तो है ही मेरा बात होती रहेगी। पर उस पल मै बस इतना चाहती थी कैसे भी रोक लू उससे बोल दूँ की रुक जाओ पर किस हक़ से बोलती की ं रुक जाओ क्या कहती अगर वो पूछता की क्यों रुकूँ... क्या कह देती की मेरे लिए रुक जाओ पर क्यों मै क्या थी उसके ज़िन्दगी मे की वो मेरे लिए रुकता ।मै तो बस एक दोस्त थी उसके लिए न उसने कुछ कहा था न मैंने कुछ कहा था।पर क्या कहना चाहिए था मुझको ।की रुक जाओ मेरे लिए क्यों की जब तक तुम्हें देख न लूँ दिन मे एक बार तो दिन मेरा अच्छा नही बीतता हैं जब तक तुम से बात न हो जब तक कुछ भी अच्छा नही लगता,की जब तक तुम मुझे हँसाते नही मै खुल के हँसती नही...क्या मै कह देती की नही रह सकती दूर तुमसे ...क्या कह देती की शायद अनजानें मे ही सही मै प्यार करने लगी हूँ जिस प्यार से भागति रही वो मोहब्बत हो गया हैं मुझे,पता नही कैसे औऱ कब बस हो गया हैं प्यार ..कैसे कह देती और उसके लिए मै सिर्फ एक दोस्त ही तो थी और कभी उसने कहा भी तो नही की वो भी मुझे प्यार करता है। क्या ज़रूरी होता है अपने एहसास को बोल कर बताना क्या वो इंसान इस बात को नही समझ सकता जिसके लिये हम कुछ महसूस करते है। पर शायद कुछ बातों को बोलना ज़रूरी हो जाता है। मुझे भी बोल देना चाहिए था उसके बाद जो भी होता वो देख लेते पर वो हिम्मत क्यों नही थी मेरे मे की उसको अपने दिल की बात बता देती उफ़्फ़!!! क्यूँ नही बताया । जो भी हो अब कोई फायदा नही इन बातों का जो होना था वो हो गया उसे जाना था वो जा चूका हैं।इन सब बातों को सोचते हुए मै घर आई और गेट खोल कर बैठी ही थी तभी गेट बजा...कोई लड़का था और उसके  हाथो मे कुछ था शायद कोई बॉक्स था वो बॉक्स देते हुए बोला।मैडम आपका पार्सल हैं और वो चला गया। मैंने उस बॉक्स को खोला तो देखा की एक चिट्ठी थी लिखा था मुझे पता हैं कि हम दोनों का रिश्ता बहुत ही अच्छा है सिमरन और तुमारे जैसा दोस्त मै अगर पुरे दुनिया मे खोजता तो नही मिलता ।मै इस दोस्ती को कभी भी नही खोना चाहूंगा कभी नही। पर इस दोस्ती के आगे मै कब बड़ गया मुझे पता ही नही चला और हमारी दोस्ती के उस लाइन को मैने कैसे तोड़ दिया मै जान ही नही पाया पर  अब जब मै जा रहा हूँ तुमसे दूँर और इस दोस्ती के रिश्ते से दूर तो मुझे एहसास हो रहा हैं कि तुम मेरे लिए कितनी ज़रूरी हो और शायद तुम दोस्त से बढ़ कर  मेरे लिए हो। सिमरन मुझे पता हैं ये सब बहुत जल्दी हैं पर क्या करूँ प्यार समय नही देखता शायद  इस लिए तो तुम इतने कम समय मे ही मेरा प्यार बन गई। चिट्ठी ख़त्म हो गई थी पर मेरे आँखों के आँसू मानो ख़त्म होना का नाम नही ले रहे थे और चिट्ठी पर लिखे उन अक्षरोँ को मिटा रहे थे पर मेरे आँसू उन एहसासों को शायद नही मिटा पाए।तभी गेट की घंटी बजी मैने खुद को संभाला और गेट खोला। सामने परमजीत था उसको देख कर पहले तो मुझे हँसी आई और कुछ पल बाद रोना मेरे आँसुओ ने दुबारा मेरे आँखों के कोने मे एक जगह बना लिया। शब्द् बहुत थे उस पल कहने को पर मै कुछ कह नही पाई । कुछ पल बाद मेरी आँखे परमजीत के शर्ट को भिगो रहे थे।

लेखिका : आकांक्षा
(नई दिल्ली )

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