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Saturday, April 7, 2018

पुस्तक समीक्षा - "चीख़ती आवाज़ें" - कवि - ध्रुव सिंह 'एकलव्य'

सामाजिक चेतना के मुखर कवि ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी का प्रथम काव्य संग्रह "चीख़ती आवाज़ें" हाथ में आया। पुस्तक की साज-सज्जा आकर्षक है। मुखपृष्ठ पर चीख़ती आवाज़ों का रेखांकन अर्थपूर्ण है। पुस्तक का शब्द-शिल्प क़ाबिल-ए-तारीफ़ है जो कवि का यथार्थवादी एवं प्रत्यक्षवादी  दृष्टिकोण उभारने में सक्षम रहा है।  

पुस्तक में आरम्भ से अंत तक बिषयक गंभीरता का प्राधान्य है। ध्रुव जी एक कवि होने के साथ-साथ कुशल व्यंगकार, कहानीकार,चित्रकार एवं नाट्य कलाकार भी हैं। जब एक कलाकार में विद्रोह का स्वर मुखरित होता है तो सम्वेदना की मख़मली ज़मीन पर सुकोमल एहसास जीवन को रसमय बनाते हैं और पात्र जीवंत हो उठते हैं। 

कविता "अनुत्तरित" में  असहाय,लावारिस जीवन की विवशताओं और लाचारी की झलक कवि के शब्दों में - 

"मार दिए थे उसने 
दो झापड़,
लावारिस हूँ
कहके। 
एक चीख़ती आवाज़ 
चीरने लगी थी 
प्लेटफार्म पर पसरे 
सन्नाटे को।"  

"ख़त्म होंगी मंज़िलें" कविता में  आज के सुलगते हुए सवाल की आँच हमें भी झुलसाती है - 

"मंज़िलों पर मंज़िलें
मंज़िलों के वास्ते
फुटपाथ पर पड़े हम
ज्ञात नहीं
कब आयेंगी ?
वे मंज़िलें
चप्पल उतारकर ,धुले हुए
क़दमों को आराम दूँगा !"  

किसान को अपनी लहलहाती फ़सल से अगाध प्रेम होता है जिसे वह अपनी औलाद की भांति स्नेह करता है। एक रचना फ़सल का मानवीकरण करती हुई -

"मौसमों के प्यार ने बड़ी ज़्यादती की
लिटा दिया
मेरे अधपके बच्चों को 
खेतों में मेरे"

रिश्तों में गुथे हुए समाज की बिडम्बनाएं कवि को विचलित करती हैं और दर्द उभर आता है लेखनी में -

"बिना खाए सो गई
फिर आज
'मुनिया' नन्हीं हमारी
चलो ! मेरी क़िस्मत ही फूटी"


बेघर और जीवन की मूलभूत सुबिधाओं से वंचित व्यक्ति के भीतर भी स्वाभिमान पनपता है - 

"ख़्याल रखना !
उस नीम का
नवाब साहब के आँगन में
लगा है।"

नारी स्वतंत्रता,शिक्षा और सशक्तिकरण भले ही आज के सर्वाधिक चर्चित जुमले हों किन्तु ग़ौर कीजिये कवि की नज़र कहाँ ठहर गयी है -



"वो घर था !
एक खूँटी से बंधी थी
ड्योढ़ी की सीमा
खींच दी कहकर
मेरी लक्ष्मण रेखा
यौवन आने तक।" 

गुरवत में जीने वालों की ज़िन्दगी खटमल को भी सुबिधा और सहूलियत वाली सिद्ध होती है।  कविता "खटमल का दर्द" सामाजिक असमानता के विकराल स्वरुप पर धारदार कटाक्ष करती है -  

"खटमल को शायद 
आदमी पसंद हैं 
और  वो भी 
फ़ुटपाथ के !"

सभी रचनाओं का उल्लेख संक्षिप्त समीक्षा में हो पाना मुश्किल होता है। 42 कविताओं के इस संग्रह में भाषा के प्रति कवि की सजगता स्पष्ट झलकती है। कविताओं में तत्सम,तद्भव, विदेशज, आंचलिक, स्थानीय एवं उर्दू  शब्दों का प्रयोग काव्य की व्यापकता एवं ख़ूबसूरती में वृद्धि करता हुआ सटीक बन पड़ा है। अधिकांश कविताऐं मुक्त छंद में लिपिबद्ध हैं। 

समाज का उपेक्षित तबका आये दिन हमारे समक्ष दुरूह चुनौतियों का सामना करता है। किसान, मज़दूर, स्त्री, भिखारी, वैश्या, मेहनत-कश कामगार आदि की आवाज़ को मर्मस्पर्शी लहज़े में शब्दांकित करती है पुस्तक "चीख़ती आवाज़ें"।

कवि का प्रगतिशील एवं प्रयोगवादी दृष्टिकोण कविताओं में बख़ूबी झलकता है। एक उभरते कवि ने अपना परिचय सामाजिक मूल्यों की सार्थक चर्चा के साथ दिया है। ध्रुव जी को पुस्तक की सफलता हेतु एवं उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाऐं। साहित्याकाश में ध्रुव तारे की भांति चमकते रहें। 



- रवीन्द्र सिंह यादव 
(लेखक -"प्रिज़्म से निकले रंग'' ) 
2 अप्रैल 2018 
नई दिल्ली / इटावा  
शीर्षक - "चीख़ती आवाज़ें"
विधा- कविता (काव्य संग्रह )
कवि - ध्रुव सिंह 'एकलव्य'
प्रकाशक- प्राची डिजिटल पब्लिकेशन, मेरठ  
ISBN -  978-93-87856-76-9
मूल्य - 110 रुपये 
बाइंडिंग - पेपरबैक 
भाषा - हिन्दी 
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1 comment:

  1. ग़ज़ब की समीक्षा ...
    पढ़ने को प्रेरित करती है पुस्तक ... ध्रुव जी जाना पहचान नाम हैं और उद्वेलित करती रचनाओं का ख़ज़ाना ले के आए हैं .... बहुत बहुत बधाई ...

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