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Friday, April 13, 2018

बचपन से परिवर्तन (कहानी) - लेखक : नवीन कुमार जैन

आज एक जुलाई थी । आलोक का आज पाँचवीं कक्षा में, विद्यालय में पहला दिन था । वह आज विद्यालय गया, विद्यालय में उसे और सभी बच्चों को सूचित किया गया कि विद्यालय में पन्द्रह जुलाई को 'आओ धरा का श्रृंगार करें हम' कार्यक्रम आयोजित किया जाना है । जिसमें विद्यालय के मैदान में ग्यारह पौधे लगाए जाएँगे । विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे । कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए कक्षावार छात्रों के समूह बनाकर उन्हें जिम्मेदारी सौंप दी गई । आलोक सभी बच्चों की तरह इस कार्यक्रम के लिए बहुत उत्साहित था । सारे विद्यालय को सजा दिया गया, बच्चों ने अच्छे-अच्छे नृत्य, नाटक आदि तैयार किए । पन्द्रह जुलाई भी आ गई, विद्यालय में अलग ही रौनक छाई हुई थी । कार्यक्रम प्रारंभ हुआ क्षेत्रीय विधायक जी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे उन्होंने और विद्यालय के प्राचार्य जी ने एक साथ पौधा लगाया और साथ में फोटो भी खिंचवाया । फिर अन्य शिक्षकों ने, गणमान्य अतिथियों ने, विद्यार्थी समूहों ने पौधे लगाए । इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हुए किसी बच्चे ने कविता पढ़ी, किसी ने 'वृक्ष हमारा जीवन' भाषण बोला । कुछ बच्चों ने मिलकर 'वन देवता' नाटक का सुंदर अभिनय किया । आलोक ने भी एक बहुत अच्छी कविता सुनाई -

बरसाते हैं जो बादल 
हवा बहाते हैं शीतल
मिट्टी बाँधे रखते 
खड़े-खड़े भी न थकते
हमारे प्यारे मित्र वन
देते हमें स्वस्थ जीवन


सभी ने उसके प्रयास को सराहा और खूब तालियाँ बजाईं । पर जब आलोक दूसरे दिन विद्यालय पहुँचा तो उसने देखा कि जो पौधे लगाए गए थे उनमें से चार-पाँच पौधे तो मवेशियों ने खा-उखाड़ दिए थे । आलोक को यह सब देखकर बहुत दुख हुआ उसे पता था कि पौधों में भी जीवन होता है उसे लगा कि पाँच जीव मर गए और प्रकृति का शोक कोई देख नहीं रहा क्यों । उसने देखा सब अपने-अपने काम में व्यस्त हैं । आलोक ने सोचा कि वह इन बचे पौधों को बचाएगा । आलोक मध्य अवकाश की बेला में अपने कुछ दोस्तों के साथ पौधों के पास गया । वहीं कुछ टूटे ईंटों के टुकड़ों का ढेर लगा था । उन सभी पौधों के चारों और ये टूटे ईंट के टुकड़े तरीके से जमाने शुरू कर दिए । सभी पौधों को व्यवस्थित करने लगे । इतने में ही प्राचार्य उन बच्चों को ये सब करते देख उन बच्चों के पास गए और उन्होंने बच्चों से पूँछा कि यह क्या कर रहे हो आप लोग? आलोक का दोस्त बोला कि आचार्य जी कल हमने पेड़ लगाए थे कुछ तो मवेशियों ने नष्ट कर दिए कुछ बचे हैं हम उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं । आपने हमें जिम्मेदारी जो दी थी पौधों की देखरेख की । प्राचार्य को बच्चों के मुँह से ये सुनकर बहुत दुख हुआ कि वो कार्यक्रम के रागरंग में अपने सच्चे उद्देश्य और कर्तव्य से विमुख हो गए, पर उन्हें गर्व हुआ इन बच्चों पर । उन्होंने उन बच्चों की पीठ थपथपाई और उनसे कहा आपने बहुत अच्छा काम किया । उन्होंने बालसभा में आलोक और उसके साथी मित्रों के कार्य की प्रशंसा की और उन्हें इस कार्य के लिए पुरुस्कार भी दिया और कहा कि नि:स्वार्थ भाव से अच्छे कार्य करने वाले सदैव प्रशंसा के पात्र होते हैं । प्राचार्य जी अपनी भूल भी स्वीकार की और सबके सामने कहा कि अब वो स्वयं इन पौधों की देखभाल करेंगे और जो कुछ पौधे नष्ट हुए हैं उनके स्थान पर नए पौधे भी लगाएँगे । उन्होंने कहा प्रकृति हमारी माँ है वह हमें जीवन देती है हमें उसकी सेवा करनी चाहिए । उस दिन प्राचार्य जी को मन ही मन इस बात की खुशी रही कि उनके विद्यालय के ये नन्हे पौधे अच्छे परिवेश में बढ़ रहे हैं... वास्तव में छोटे बच्चों के बड़े काम ने आज विद्यालय के संस्कारों को महान बना दिया । वास्तव में आलोक की सोच ने ग्यारह पौधों को जीवनदान दे दिया, प्रकृति को कुछ और सदस्य दे दिए ।

लेखक : नवीन कुमार जैन 
(बड़ामलहरा, जिला- छतरपुर, म.प्र)

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