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Tuesday, April 3, 2018

भूली बिसरी यादें (कहानी) - लेखिका : वर्षा गुप्ता "रैन"

आइये चलते है एक सफ़र पर, ये कहानी है प्यार की, दो भाई बहनों के, याद है मुझे अब तक भूली बिसरी यादें" (Real Story Real Characters)

 गाँव में जँहा चारो तरफ शादियों का माहौल है,सभी चौगानो में तम्बू तने है,ढोल नगाड़ो का शोरगुल और धमाचौकड़ी,गाँव दुल्हन की तरह सजा है,मेहमान इतने की जैसे मेला लगा हो, वहीँ गुप्ता जी के घर भी निमंत्रण आया है,सपरिवार...
सीमा छोटी से लाल फ़्रॉक में खूब फब रही है और राहुल वो भी कुछ महिने पहले ही लाई हुई डेनिम जीन्स में जँच रहा है। दोनों बहुत उत्साहित है,.शादी देखेंगे खाना और गाना होगा।
बड़ा परिवार है घर के आदमियों की टोली पहले निकल गई और ये औरते है कि सजने सँवरने में कुछ ज्यादा ही वक्त लेती है पर राहुल और सीमा पहले ही बाहर निकल चुके,इन्तजार करते हुए सीमा का धीरज टूट रहा था चार साल की मासूम लड़की अपने चचेरे भाई राहुल से तुतलाई आवाज में ..भैया हम कब जाऐंगे शादी देखने..?


राहुल निरुत्तर पर इंतजार उससे भी नही हो रहा था। दीवाल पर लटकी घड़ी बता रही थी की बहुत वक्त हो गया
राहुल- सीमा हम आगे चलते है सब आते ही होंगे अब
सीमा- भैया हम खो जाएंगे तो(अपनी मासूम सी आवाज में)
राहुल-तो में हूँ न तेरा भाई
सीमा चलो भैया कहकर भैया का हाथ थामकर चल दी और राहुल छोटी सी उम्र में ही बहन की जिम्मेदारी उठाने की कोशिश में चल देता है।
चलते चलते दोनों ने पलटकर देखा घर वाले पीछे ही आ रहे अब तो दोनों की रफ़्तार बढ़ गई चलते गए और दुसरी और जा रहे एक बाराती ख़ेमे में शामिल हो गए। घर की औरते सोच रही कि बच्चे गुप्ता जी के साथ,और गुप्ता जी और उनके भाई को ये ज्ञात की बच्चे घर कि औरतो के साथ..दोनों आखिर विवाह मंडल में पहुँच गए चारो तरफ देखा कोई अपना नही सभी अजनबी बाराती दोनों ही अधीर होकर अपने माता पिता को ढूंढने लगे ,बाहर निकलने पर भी कोई दिखाई नहीं दे रहा था..सकपकाए खड़े एक दूसरे को देख रहे थे सामने ढोल,नगाड़े दूल्हा,घोड़ी,नए कपड़े पहने लोग और तरह तरह के पकवान,पर अब ये सब नही भा रहा था। भीड़ के छँटने का इन्तजार कर फिर चलना शुरू किया पर दोनों पहुँच गए किसी सुनसान जगह जहाँ खेत और झाड़िया बस,और तेज गर्मी..दूर दूर तलक न कोई आता था न जाता था ये कोन सी जगह, ये मासूम क्या जाने। सीमा धीरज खोकर खाई से एक बड़े गड्ढे में बैठ गयी जो ज्यादा गहरा नही था,दोनों के कपडे धूल में सन चुके थे,भैया अब हम क्या करेंगे, राहुल रोने लगा "सीमा हम खो गए"। भाई को ढाँढस बंधाते हुए सीमा कह रही है..अरे पागल!! हम नही खोए हमें पापा लेने आएंगे..उधर गुप्ता जी और उनके भाई सब जगह उन्हें ढूंढ़ने में लगे सभी बाराती ख़ेमे,आसपास के गाँव और यहाँ तक की तालाबो और कुओं में भी न चाहते हुए झाँकना पड़ा। पास के एक कुएँ में लाल रंग का कपड़ा देख गुप्ताजी की जान हलक में आकर अटक गई। वहाँ रहना अब मुनासीभ न था सब घर आकर रोने और खुद को कोसने लगे बढ़ चढ़कर मन्नतो और चढावो से भगवान को रिझाया जा रहा था आखिर क्यों न हो बच्चे तो घर की प्राथमिकता है।
भैया प्यास लगी है..सीमा ने धीरे से राहुल से बोला। दोनों ने हाथ अभी भी पकड़े हुए है, जाने किस देवीप्रेरना से झाड़ियो के पीछे से एक बुजुर्ग निकल आया..
'तुम क्यों रो रहे हो में तुम्हे पानी पिलाता हूँ' और अपने गन्दे लोटे में से पानी पिलाने लगा, सीमा राहुल से कहना चाहती थी "भैया पानी बहुत गन्दा है" पर दोनों के गले सुख रहे थे..तो पी गए।
क्या नाम है तुम्हारा दोनों से उस देवदूत ने पूछा- 
"मेरा नाम राहुल है और ये मेरी बहन है सीमा.."
धीरे धीरे बातो बातो में उनसे माता पिता और दादा का नाम जानकर वो भलामानस जान गया की ये बहुत ही पास गाँव के गुप्ता जी के बच्चे है..ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी जब उसने बच्चों से कहा चलो में ले चलता हूँ तुम्हें तुम्हारे घर...
दोनों को एक-एक कंधे पर उठाकर चल दिया गाँव की और.. गुप्ता जी के घर भीड़ जमा हो चुकी थी। उनके छोटे भाई का भी इकलौता बेटा..रह रहकर बच्चों की बाते याद आ रही थी। सब निराशा से भर चुके थे तभी भीड़ को चीरते हुए किसी देवदूत की तरह सामने से बुजुर्ग आता दिखा।दोनों बच्चे कंधे पर से जैसे उछलकर गोद में आने को तत्पर हो सब की आँखों से अश्रुधाराए बह गई।बच्चों को गले लगा खुब प्यार किया तभी उस बुजुर्ग का ख्याल आया उसकी खूब आवभगत की फिर सवालो की झड़ी लग गई उसने भी सारा किस्सा विस्तृत में सुनाया सबके चेहरे पर हँसी और खोने का डर एक साथ आये। बुजुर्ग के जाने के बाद गुप्ता जी ने बच्चों से पूछा"शादी में जाना है ?"और सब खिलखिलाकर हँस दिए,बच्चे भी...।             

लेखिका : वर्षा गुप्ता  "रैन"
गरोठ, जिला मंदसौर (मध्यप्रदेश)

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