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Thursday, April 5, 2018

चप्पल बड़ी है (कहानी) - लेखक : धर्मेन्द्र मूलवानी

शहर की एक काॅलोनी के पास ही स्थित बस्ती में अपने परिवार के साथ रहता था ‘दीनू‘‘। वह सीधा-साधा, सच्चा और मेहनती बच्चा था। सुबह-शाम खेलना-कूदना, घर का छोटा-मोटा काम आदि करना यही दिनचर्या भर थी उसकी। 

उसकी माली हालत ज्यादा ठीक नहीं थी। उसके पास एक जोड़ी चप्पल थी जो उसके पैरो के नाप की नहीं थी वह चप्पल बड़ी थी। वह काॅलानी के बच्चों के साथ बड़ी चप्पल पहन कर ही खेला करता था। बड़ी चप्पल पहनकर खेलने में उसे काफी परेशानी होती थी। वह ठीक से दौड़ नहीं पाता। बार-बार गिर जाता। कभी खेल में पीछे रह जाता या हार जाता। सभी बच्चें उसे चिढ़ाते और उस पर हंसते रहते। लेकिन दीनू उनका बुरा नहीं मानता। साथी बच्चें उसे, उसके पैरों  के नाप की चप्पल पहनने को कहते पर वह घर की हालत को बताकर, मना कर देता। एक बार तो उन बच्चों में से एक बच्चे ने दीनू को किसी और की चप्पल मंदिर से उठा लाने के लिए बोला। बस क्या था यह सुनकर दीनू गुस्सा हो गया और इस बात को गलत एवं अपराध बताते हुए उस बच्चे को खूब डांटा। दीनू स्वभाव से ईमानदार और खुशमिजाज होने के कारण अपनी इस चप्पल से संतुष्ट रहता। चाहे उसे अपनी इस बड़ी चप्पल के कारण कितनी ही परेशानियों  या धिक्कतों का सामना करना पड़ता। 

एक दिन दीनू अपनी बस्ती से आ रहा था। रास्ते में स्थित एक मन्दिर के बाहर एक बुजुर्ग व्यक्ति को परेशान होते हुए देखा। दीनू उस बुजुर्ग के पास गया और बड़ी विनम्रता से पूछा- ‘‘बाबा, क्या हुआ? आप इधर-उधर क्यां ढूंढ रहे हैं? बुजुर्ग बोला- ‘‘अरे बेटा! मेरी चप्पल नजर नहीं आ रही। मैं मन्दिर के बाहर चप्पल उतार कर मन्दिर में दर्शन करने गया था। वापस आया तो चप्पल नहीं दिख रही। लगता है कोई मेरी चप्पल चुराकर ले गया। मुझे घर जाना है। नंगे पांव चलने में मुझे काफी धिक्कत होती है।‘‘ 

दीनू बोला- ‘‘बाबा, जो हुआ उसे जाने दो। आप मेरी चप्पल पहनकर आपके घर तक चलें, मैं भी आपके साथ चलता हूं। और वैसे भी मेरी चप्पल बड़ी है। आपके पैरों के नाप की ही है। पहन कर चले ताकि आपको नंगे पांव नहीं चलना पड़े। 

बुजुर्ग व्यक्ति ने दीनू की ओर देखा और थोड़ी देर सोचने के बाद, उसकी बड़ी चप्पल पहन ली और दीनू के साथ-साथ अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में चलते समय बुजुर्ग ने पूछाः ‘‘तुम्हारा नाम क्या है बेटा?‘‘ दीनू ने उत्तर दिया- ‘‘जी दिनेश, पर सब दीनू बुलाते हैं‘‘।



बुजुर्ग- ‘‘तुम स्कूल जाते हो बेटा?‘‘ दीनू-‘‘पहले जाता था, बस्ती के पास वाले स्कूल में, पर अब नहीं। पिछले साल पिताजी काफी बीमार हो गये थे, तब से बीमार ही है, घर पर ही रहते है, काम-धंधा छूट गया। घर की हालत खराब हो गई। तब से मेरा स्कूल जाना भी छूट गया। अब मेरी मां मजदूरी कर घर को चलाती है। 
बुजुर्ग- ‘‘क्या तुम्हारी दुबारा स्कूल जाने की इच्छा है? 
दीनू- ‘‘इच्छा तो है पर...........।

बातचीत करते करते बुजुर्ग का घर आ गया। घर पहुंचकर उस बुजुर्ग व्यक्ति ने दीनू को रूकने के लिए कहा और अन्दर चला गया। कुछ देर बाद बुजुर्ग व्यक्ति ने बाहर आकर दीनू की चप्पल लौटाई और अपने साथ घर में रखी दीनू के पैरों की नाप की एक चप्पल दीनू को भेंट की। इस पर दीनू वह चप्पल लेने से मना करने लगा और कहा कि मेरे पास मेरी बड़ी चप्पल है। यह ही काफी है। बुजुर्ग बोला-‘बेटा तुम्हारी चप्पल ही नहीं तुम्हारी सोच भी बड़ी है जो दूसरों के लिए सेाचता है वह हमेशा आगे बढ़ता है। रख लो।‘‘ साथ ही बुजुर्ग ने दीनू को अगली सुबह स्कूल समय पर बस्ती वाले स्कूल में आने के लिए कहा। दीनू हामी भरकर बुजुर्ग से वह चप्पल लेकर अपने घर चला गया। 

अगले दिन सुबह दीनू बुजुर्ग के कहे अनुसार समय पर बस्ती के पास वाले स्कूल में पहुंचा। प्रिंसिपल रूम में बुजुर्ग पहले से ही प्रिंसिपल के साथ बैठे हुए थे। वहां मौजूद प्रिंसिपल ने दीनू से कहा - ‘‘अरे बेटा दिनेश, ये बुजुर्ग व्यक्ति सेठ द्वारकादास जी है। इन्होने  तुम्हारे बारे में मुझे सब कुछ बताया कि कल तुमने कैसे इनकी मदद की।‘‘ आगे और कहा कि ‘‘ अब इन्होनें तुम्हारा इस स्कूल में एडमिशन करवा दिया है। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई और पठन सामाग्री का सारा खर्चा सेठ जी के द्वारा ही किया जावेगा।‘‘
यह सुनकर दीनू खुशी से फूला ना समाया और खुशी से झूमने लगा। बुजुर्ग व्यक्ति ने दीनू को अपने पास बुलाया और स्कूल बैग, किताबे व ड्रेस  आदि देते हुए कहा ‘‘बेटा, मन लगाकर पढ़ना और ऐसे ही आगे बढ़ते रहना। किसी भी प्रकार की कोई चिन्ता मत करना‘‘।

दीनू ने बुजुर्ग सेठ द्वारकादास से आशीर्वाद लिया और अपनी स्कूल सामाग्री लेकर चला गया। घर पहुंचकर उसने माता-पिता को पूरी बात बतलाई। दीनू के माता-पिता यह सुनकर काफी प्रसन्न हुए। शाम को दीनू अपनी नाप की चप्पल पहनकर अपने दोस्तों के पास खेलने के लिए गया। दीनू के सभी दोस्तों ने उसके पैरो में उसके नाप की चप्पल देखकर चप्पल के बारे में पूछा। इस पर दीनू ने अपने सभी दोस्तोें को पूरी बात बताई। दीनू की बात सुनकर सभी बहुत खुश हुए। इस पर सभी दोस्त एक साथ बोल पड़े-‘‘वाह! दीनू, तुम्हारी बड़ी चप्पल तो बड़ी काम की निकली‘‘। 


लेखक : धर्मेन्द्र मूलवानी  
जयपुर (राजस्थान )

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