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Sunday, April 1, 2018

दादी (कहानी) - लेखक : नृपेंद्र कुमार शर्मा-

चिन्टू ओ चिन्टू, अरे कहाँ गया लला।अस्सी बरस की रासमकली बिस्तर में लेटे लेटे अपने पोते चिन्टू को पुकार रही है।
रामकली बूढ़ी अवश्य हो गई ,किन्तु जीवन जीने की आशा ने उसे कभी जीर्ण होने नही दिया।
खाल सिकुड़ अवश्य गई किन्तु, मन की तरुणाई उसके मनन करते मन के किसी कोने में अभी भी जीवित है।
और जीवन की इसी आशा ने कभी उसके हाथ पांव को जड़ करने की जुर्रत नही की।
किन्तु अब उसके हाथ पांव में कंपन अवश्य होने लगा।क्या हुआ जो चन्द कदम चलने के प्रयास में सांस चढ़ जाती है। 

इससे उसके मन के दौड़ते मनोभावों को तो विराम नहीं लगता।वह पुनः अपनी खटिया में लेट कर मन की कल्पना के अश्व पर सवार होकर चल पड़ती है , अपनी विचार यात्रा पर।
उसका साथ साल का बेटा रामधन जो खुद भी बूढा हो चला है, किन्तु मैन की दृष्टि उसे अभी भी तरुण ही समझती है।
और अपनी नसीहत न मानने पर मन ही मन खीझती है।
रामकली की कल्पना उसे खेत पर ले जाती है ,जहां रामधन अपने खुद की तरह जीर्ण होते बैलों के कंधे पर जुआ रक्खे इसमे हल बांधे पीछे -पीछे हाथ मे लकड़ी लिए कभी पुचकारता का ही डाँटता कभी भद्दी भद्दी गालियां देता उन्हें तेज़ चलाने की कोशिश करता चल रहा है।
रामकली सोचती है कितने निकम्मे हो गए हैं ये बैल ,मार से भी नही बढ़ते।वेचारा रामधन इस गति से कैसे इतने बड़े खेत को जोत पायेगा अभी तो तीन हिस्सा बाकी है।
यही बैल रामधन के बापू की एक हनक पर कैसे हवा से अंधी बन जाते थे और आज देखो,,,रामधन के बापू के ख्याल आते ही रामकली के झुर्रियों भरे गाल लाल हो गए कुछ क्षण के लिए झुर्रियों के बीच से बीस बरस की लजाती सोहनलाल को छिपकर निहारती हुई रामकली प्रकट हो गई।
जो दोपहर को मटकती लहराती रोटी की पोटली बांधे, पतली मेढ़ों से होकर रास्ता छोटा करती खेत पर जा रही है उसे मन मीत से मिलने की शिघ्रता है या उन्हें जल्दी खहन खिलाने की लालसा ये तो उसका मन ही बेहतर जाने।
इसे दूर से आता देख बैल भी प्रसन्नता से पूंछ हिलाने लगते ये शायद कार्य मुक्ति की प्रसन्नता है , किउंकि रामकली के आने पर सोहन बेलों को जुए से मुक्त कर देता ,,, अरे नही ये तो रामकली द्वारा बैलों के लिए लाए गए गुड़ के ढेले पाने की प्रसन्नता है।
सोहन जब तक भोजन करता रामकली उसके मुख को प्रेमदृस्टि से ताकती लजाती  रहती।

कितना प्यार करते थे रामधन के बापू उसे ,,,वह खो जाती प्रेम मिलान के उस अद्भुत कल्पना में जिस से उसके पूरे बदन में जोश और लज्जा के साझा रक्त संचार से कुछ पल को तरुणी रामकली जीवन्त हो उठी।
उस कल्पना लोक में रामकली कभी मुस्कुराती कभी शरमाती लजाती कभी खुद में ही सिमट जाती।कितने ही भाव उसके मुख की भाव भंगिमा बदलते रहते।
अब रामकली अपनी कल्पना के घोड़े को एड लगती चल पड़ी मोहन की दुकान पर ,
मोहन रामकली का पोता और रामधन का एकलौता बेटा है। पैंतीस बरस का मज़बूत सुंदर जवान ।रामकली उसमे सोहन की छवि दिखती बो उसे निहारती बलिहारी जाती।
जुग जुग जिये मेरा मोहन , बिल्कुल अपने बाबा पर गया है।
अगर आज वह होते तो देखते रत्ती भर भी फर्क नही पड़ा है सूरत में ,वही नयन नक्शा वैसे ही छोड़े कंधे,,,
काश आज वे होते,,,,,,
सोचकर रामकली की आंखे गीली हो गईं।
यही मोहन दो वर्ष का था जब बरसात की उस मनहूस रात उसे उल्टी दस्त हो गए थे।
गांव के वैध जी ने कहा सोहन शहर ले जा बाबू को यहां अब इसका इलाज ना है।
सारे गांव में बीमारी फैली है, साफ सफाई भी ना है गांव में।
और सोहन रात ही में मोहन को छाती से लगाये दौड़ गया था शहर की और ।कोई सवारी का साधन नही था बस वही बैलगाड़ी,,और सोहन ने कहा बैलों से तेज़ तो मैं पहुंच जाऊंगा बटिया से होकर।
भीगते भागते दौड़ भाग करते उसने मोहन को तो बचा लिया ,लेकिन खुद को मियादी बुखार से न बचा पाया।और असमय काल कवलित होकर छोड़ गया रामकली को अकेला बेसहारा।
अपना सारा सुख अपनी सारी शक्ति और मन के सारे भाव लगा दिए रामकली ने परिवार को पालने में।
चिन्टू मिहान का बेटा है रामकली का पड पोता जिसके होने के बाद जैसे रामकली दोबारा जी उठी अब उसका सारा स्नेह चिन्टू पर ही बरसता है।
वह सोचती है मोहन के बाबा ही चिन्टू के रूप में लौट आये है ,,,
आज कोई उसे लड्डू दे गया है सुबह बस बही पल्लु में बंधे पुकार रही है,
चिन्टू अरे ओ चिन्टू कहा है रे चिन्टू,,,,
तभी कहीं से चिन्टू लौट आया, क्या है दादी हर वक़्त चिन्टू चिन्टू ,,,,
बोल क्या काम है।
ये बत्सल्य के पर्दे से बंद आंखों से सब अनदेखा करती टटोल कर पल्लु खोलती है लड्डू निकलती है।
हैं लड्डू !!!! कहा से लाई? 
दादी मेरी प्यारी दादी कहते हुए चिन्टू दादी की गोद मे घुस कर लड्डू में मुह मारने लगता है और उसके खाने से रामकली तृप्ति महसूस करने लगती है।

लेखक : नृपेंद्र कुमार शर्मा
(जिला मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश)

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