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Monday, April 2, 2018

इंतज़ार (कहानी) - लेखक : विकास रावल

यह बनारस शहर में दिसम्बर की एक बेहद ठंडी शाम थी और इसकी वजह उत्तर भारत में एक ही दिन पहले हुई बरसात थी। गंगा नदी के दूसरी तरफ से आ रही तेज हवाओं ने ठंडक और बढ़ा दी थी। शशि तुलसी घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए सामने बहती हुई नदी को देख रहा था। थोड़ी देर पहले ही गंगा-आरती समाप्त हुई थी। गहराती शाम के साथ नीला आसमान काला पड़ चुका था और   घाट पर लोगों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। शशि आज उदास था और शायद इसी वजह से गंगा नदी भी बहते हुए उसे उदास ही लग रही थी। शशि के बगल में ही प्रिया बैठी हुई थी। हर वक़्त दुनियाभर की बातें करते रहने वाली प्रिया पिछले बीस मिनट से बिल्कुल चुप थी। वह सोच कर आई थी कि आज सारी बातें शशि को बता देगी लेकिन किस तरह बताएगी यह उसे पता नहीं था। शशि भी यह बात जानता था कि प्रिया उसे कुछ बताना चाहती है। कोई ऐसी बात जो उन दोनों के बीच के रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है। शशि किसी अनहोनी की आशंका से भीतर ही भीतर कहीं डर रहा था और यह डर उसके चेहरे पर उदासी के रूप में झलक रहा था। शशि जानता था कि ऐसे वक्त में उसे अपनी आशंकाओं पर ध्यान नहीं देकर प्रिया जो कहना चाहती है उसे शान्त और सुलझे हुए मन के साथ सुनना चाहिए,इसलिए वह भी चुप बैठा हुआ था। उन दोनों की यह चुप्पी इतनी संक्रामक थी कि तुलसी घाट का वह प्राचीन पेड़ तेज हवाओं के बीच भी खामोश खड़ा था। नदीं की लहरे किनारे आते हुए कोई शोर नहीं कर पा रही थी। घाट से गुजरते हुए लोग इन्हें यूँ खोया देखकर अपनी आवाज को फुसफुसाहट में बदल देते और आगे बढ़ जाते। प्यार में इजहार और इनकार की बातें अगर इतनी आसानी से हो जाए तो प्यार भी बिल्कुल साधारण हो जाएगा। 
'शशि मुझे तुमसे कुछ कहना है.....!' आखिरकार प्रिया ने बात शुरू की।
'हाँ कहो ना, मैं सुन रहा हूँ।' शशि ने बिल्कुल सहज होने की कोशिश करते हुए कहा।
'देखो तुम मुझे गलत मत समझना लेकिन मैं कुछ सही करने में लगी हूँ और इसके लिए मुझे कुछ सख्त फैसले भी लेने पड़े है.......और।'
'प्रिया.....'
शशि ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा और चुप हो गया। शशि के मुँह से अपना नाम सुनकर और उसके हाथों के स्पर्श से प्रिया ने खुद को शांत महसूस किया। दो ही महीने के भीतर शशि प्रिया को समझने लगा था। जब भी प्रिया किसी उलझन में होती है, दुखी होती है, उदास होती है या फिर किसी चीज को लेकर डर रही होती है तब शशि उसे शांत करने और सहज करने के लिए उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर धीरे से उसका नाम पुकारता है और प्रिया बिल्कुल शांत हो जाती है। 
'मुझे नहीं पता कि तुम अभी क्या बताने वाली हो। शायद तुम मुझे कुछ ऐसा बताओ जो बहुत दुखपूर्ण हो। लेकिन मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं कि तुम्हारे हर फैसले में मैं तुम्हारे साथ हूँ। चाहे वो कुछ भी हो। हम दोनों अच्छे दोस्त भी है। अगर तुम्हें लगता है तुम्हारी बात सुनकर मुझे दुख पहुंचेगा तो थोड़ी देर के लिए भूल जाओ कि हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते है। तुम मुझे एक दोस्त की तरह अपने मन की बात कह सकती हो और रही बात तुम्हें गलत समझने कि तो मैं तुम्हें कभी गलत नहीं समझ सकता हूँ। मैं जानता हूँ कि तुम जानबूझकर कभी कुछ गलत नहीं करोगी। तुम बिल्कुल बेफिक्र हो जाओ। जो कहना चाहती हो,बेहिचक कहो।'
शशि ने ये शब्द बिल्कुल शांत भाव से प्रिया की आंखों में देखते हुए कहे थे। प्रिया यह सुनकर आत्मविश्वास से भर गई। उसने खुद को मजबूत करते हुए आगे कहना शुरू किया।
'तुम्हें मुझसे इतना प्यार नहीं करना चाहिए। प्यार का अंत दुख पहुँचाता है।' 
'तुम्हें किसने कहा कि मै तुमसे प्यार करता हूँ। मैं कोई प्यार-व्यार नहीं करता।' शशि ने मजाक करते हुए कहा। लेकिन आज प्रिया इस मजाक पर चाहकर भी हंस नहीं पाई। 
'शशि मेरी बात ध्यान से सुनना। यह महत्वपूर्ण है। जब हम दोनों पहली बार मिले थे तब मुझे नहीं पता था कि तुम मुझसे प्यार करने लगोगे और एक दिन मुझसे इसका इजहार भी कर दोगे। हमारी टीम में कई लड़कियां थी पर पता नहीं क्यों तुम मुझी से बात करने लगे। तुम इतने अच्छे थे कि हम दोनों जल्द ही दोस्त बन गए। कुछ मुलाक़ातों और रातभर चलने वालीं हमारी बातो के बीच तुम भी मुझे अच्छे लगने लगे थे लेकिन मैं जानती थी कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती हूं। उस रात जब तुमने मुझे अचानक ही कहा कि तुम मुझसे प्यार करते हो तो मुझे एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ। तुम मेरे इतने अच्छे दोस्त थे। तुम मुझसे कैसे प्यार कर सकते थे।
इसीलिए मैंने तुमसे अगले दिन मिलने को कहा ताक़ि मैं तुम्हें साफ-साफ मना कर सकूँ। अगले दिन जब हम इसी घाट पर मिले तब मैं सुनना चाहती थी कि तुम क्या कहते हो।'
........और जब तुमने मेरी तरफ ना देखकर नदी की तरफ देखते हुए अपने दिल की बात की। तब मैंने तुम्हें बोलते हुए देखा। तुम लगातार बोलते जा रहे थे और तुम्हारी पलकें लगातार झपक रही थी। तुम्हारी हर बात मेरे दिल को छू रही थी। मुझे लगा तुम मुझसे कितना प्यार करते हो और मैंने भी तुम्हें एक छोटा सा जवाब दिया कि हाँ मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।' 
'हाँ मुझे पता है प्रिया। वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे बेहतरीन दिन था।  वो पूरा दिन हमने साथ में बिताया था। उसके बाद तो हम रोज मिलने लगे थे। हमारा रोज रोज एक दूसरे को जानना होता रहा। तब से लेकर आज तक ना जाने कितने खूबसूरत पल मेरी जिंदगी में आये है। एक-एक करके गिनाऊँ तो शायद सारी रात गुजर जाए।' शशि अपने हाथ में प्रिया के हाथों की गर्माहट महसूस कर पा रहा था।

'हाँ,लेकिन अब से हम नहीं मिलेंगे। मैं तो तुमसे इस बारे में बात भी नहीं करना चाहती थी। लेकिन मुझे लगा कि तुम्हें बिना बताए तुमसे दूर जाना शायद सही नहीं होगा।'
'और ऐसा क्यों?' शशि ने सवाल करते हुए कहा।
'क्योंकि मैं तुमसे प्यार नहीं करती हूँ।'

प्रिया यह क्या कह रही है? शशि को उसकी बातों पर एकबार तो विश्वास नहीं हुआ। वो कहाँ जाने की बात कर रही है? आखिर ऐसा क्या हो गया है,जो प्रिया ऐसा फैसला ले रही है? शशि के दिमाग में एक साथ कई सवाल आने लगे। उसका डर उसके चेहरे पर फिर से दिखाई देने लगा। प्रिया को खोने का डर।इस डर की वजह से शशि अपने अतीत में खो गया।शशि को बचपन से ही एक सपना आता था जिसमें एक शैतान अपनी डरावनी आवाज में चीख-चीखकर उससे कहता था कि-'तुम हमेशा अकेले ही रहोगे। तुम्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिलेगा।' शशि बचपन की लगभग सारी बातें भूल चुका था लेकिन उस शैतान की बात साये की तरह उसका पीछा करती रहती थी। वह इसे कभी नहीं भूल पाया था।
शशि को उसका पहला प्यार याद आ गया। उसका पहला प्यार भी उसे एक दिन अकेले छोड़ चला गया था। ना जाने कितने दिनों तक शशि अकेले में रोता रहा था। तब बड़ी मुश्किल से वह सामान्य स्थिति में वापस आ पाया था। आज जब प्रिया ने यह कहा कि वो उससे प्यार नहीं करती है तो शशि डर गया, बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो सपने में शैतान को देखकर डर जाता था। 
'तुम हमेशा अकेले ही रहोगे। तुम्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिलेगा।' यही शब्द शशि के कानों में बार बार गूंजने लगे।
'शशि.....क्या हुआ?' प्रिया ने शशि को खोया देखकर पूछा।
'नहीं। कुछ नहीं। तुम कहो। क्या कह रही थी तुम?
हाँ....मुझसे प्यार नहीं करती हो। क्या कह रही हो प्रिया। मुझे पूरी बात बताओ। हुआ क्या है?' शशि ने वर्तमान में लौटते हुए कहा।
'बात दस महीने पहले की है। मैं हमारी कॉलेज के एक सीनियर से ऑनलाइन मिली थी। हम दोनों को ही लिखना पसंद था। फिर हमारी रोज बातें होने लगी और पता नहीं हम दोनों कब दोस्त बन गए और मैं धीरे-धीरे उससे प्यार करने लगी थी।
उसे मेरी हर बात समझ में आती थी। वो मेरी बातों से जान जाता था कि मैं कब उदास हूँ और कब खुश हूं। मैंने उससे अपने प्यार का कभी इज़हार नहीं किया था लेकिन मैं जानती थी कि वो मुझसे प्यार नहीं करता हैं। एक बार जब मैंने उसे यह बताने की कोशिश भी की थी कि मैं उससे प्यार करती हूँ। लेकिन उसने इस तरह की बात करने से ही मना कर दिया। इसी बीच दो महीने पहले मैं तुमसे मिली। मुझे नहीं पता था कि तुम मुझसे प्यार करने लगोगे और जब तुमने मुझसे इजहार किया तो उस दिन घाट पर मैंने तुम्हारा प्यार स्वीकार कर लिया था।  मुझे उस दिन तुम्हें मना कर देना चाहिए था। लेकिन मैं नहीं कर पाई। मुझसे शायद यहीं पर गलती हो गयी थी। अब मैं वही गलती सुधारना चाहती हूँ। अभी हमें ज्यादा वक्त नहीं हुआ है साथ रहते हुए। अभी तुम्हारे लिए मुझसे मूव ऑन करना आसान होगा।'
'अच्छा मुझे यह बताओ क्या तुम उस लड़के से अब भी प्यार करती हो?'
'हाँ,लेकिन वो मुझसे नहीं करता है।'
'ह्म्म्म। तब तो तुम्हें उससे मूव ऑन कर लेना चाहिए। जैसा कि तुम मुझे करने के लिए कह रही हो।'
'वही तो नहीं हो पा रहा है शशि। पहले मुझे लगा था कि मैं मूव ऑन कर चुकी हूं। लेकिन तुम्हारे साथ रहने लगी तो पता चला वो जो मैं उसके लिए महसूस करती थी वैसा मैं तुम्हारे लिए महसूस नहीं कर पा रही हूं। मैं अब भी उसके प्यार में हूँ और मैं उससे मूव ऑन करना चाहती हूँ। लेकिन इससे पहले मुझे तुमसे मिलना बन्द करना होगा।' प्रिया ने बात को समझाते हुए कहा।
'लेकिन इसकी जरूरत क्या है? क्या मैं तुम्हे रोक रहा हूँ? उल्टा हम मिलते रहे तो तुम्हें उसे भूलने में आसानी होगी। तुम सही कर रही हो लेकिन गलत तरीके से कर रही हो।' शशि ने उत्साह दिखाते हुए कहा।
'नहीं शशि। ऐसा नहीं हैं। उसे भूलना आसान नहीं है। दस महीने कोई कम वक्त नहीं है। इतना समय मैंने उससे प्यार किया है। अब अचानक कैसे उसे भूल जाऊँ?......हाँ मैं उससे मूव ऑन करने की कोशिश करूँगी लेकिन मैं भी नहीं जानती की इसमें कितना वक्त लगेगा। पिछले प्यार से पूरी तरह बाहर आये बिना मैं एक नए प्यार को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। यह बात भी है कि मैं उस पुराने रिश्ते में वापस नहीं जाना चाहती लेकिन जब तक उससे बाहर ना आ जाऊँ तुम्हारे साथ आगे नहीं बढ़ सकती।' प्रिया ने सब कुछ साफ कर दिया था। वो आज आखिरी बार मिलने आयी थी। 
'तो ठीक है मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा। लेकिन तब तक हम मिल सकते है एक दोस्त की तरह। रोज-रोज नहीं लेकिन कभी कभी तो मिल ही सकते है।'
शशि ने सुझाव देते हुए कहा।
'तुम क्यों नहीं समझ रहे हो शशि। यह इतना आसान नहीं है। हो सकता है मैं उससे कभी मूव ऑन नहीं कर पाऊं। तब क्या करोगे? मैं तुम्हें कोई उम्मीद नहीं देना चाहती हूँ। अगर हम यूँ ही मिलते रहे और बाद में मुझे तुम्हें छोड़ के जाना पड़ा तब शायद तुम उसी परिस्थिति में फंस जाओगे, जहाँ आज मैं खड़ी हूँ। अभी तुम्हारे लिए मुझको भूलना आसान होगा। यही सही भी है। मुझसे वादा करो कि तुम मुझसे इसके बाद नहीं मिलोगे। तुम मेरा इंतजार नहीं करोगे। तुम मुझे भूल जाओगे।' प्रिया ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा।
शशि ने इस बात पर और बहस करना सही नहीं समझा। प्रिया उससे दूर जाने का फैसला कर चुकी थी। इस बात पर और बहस करना प्रिया के फैसले को मजबूत ही करता। वो कहीं ना कहीं प्रिया की परिस्थिति समझ रहा था। वो बस यही चाहता था कि प्रिया अचानक से यूँ मिलना बंद ना करे। धीरे-धीरे सब सही हो जाएगा। फिर शशि ने आखिरी शब्द कहे....'तुम्हें पता है प्रिया। मैं जब तुमसे पहली बार मिला तभी से प्यार करने लगा था। तुम्हारी हर बात मुझे अच्छी लगती थी। तुम्हारा चेहरा देखकर मैं सबकुछ भूल जाता था। उस दिन जब मैंने तुमसे प्यार का इजहार किया तब मैंने अपने दिल की बात कहीं थी। तुम उस दिन हाँ कहती या चाहे ना मुझे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैंने तुम्हें अपने दिल की बात कही और तुमने मुझे सुना मेरे लिए इतना काफी था। लेकिन मैं खुशकिस्मत था। तुमने मुझे मेरे प्यार के बदले में इतना प्यार दिया कि धीरे -धीरे मेरा प्यार और बढ़ने लगा। तब से मैं रोज तुम्हारे प्यार में पड़ता हूँ। हर रोज मुझे तुम पिछले दिन से ज्यादा खूबसूरत लगती हो। हर रोज तुम मेरे थोड़ा और करीब आयी हो। आज तुम कह रही हो कि अब से हम नहीं मिलेंगे तो ठीक है, प्यार में हर वक़्त एक सा नहीं रहता है। अब हम नहीं मिलेंगे जब तक तुम ना चाहो। लेकिन कुछ फैसले मेरे भी है। और वो लेने से तुम्हे मुझे नहीं रोकना चाहिए। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे लेकिन तुमसे अपनी डायरी में हर रोज मुलाक़ात होगी। मैं वादा करता हूँ कि मैं आखिर तक तुम्हारा इंतजार करूँगा और मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं भूलूंगा।" 
शशि की आवाज में एक दर्द सा था।  उसकी आंखों में से कुछ पानी की कुछ बूंदे निकलकर गाल से होते हुए प्रिया की हथेली पर गिर गयी। शायद अब देर हो चुकी थी। प्रिया को जिस बात का डर था वही हुआ। शशि आज उसी जगह खड़ा था जहाँ प्रिया पहले से थी। 
'शशि ये सब क्या है। इसिलए मैं तुमसे इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी।' प्रिया भी रोने लगी थी।
'नहीं प्रिया अब और कुछ मत कहना।' इतना कहकर शशि ने प्रिया को गले लगा लिया। दोनो कुछ देर यूँ ही रहे। फिर शशि एकदम से अलग हुआ और कहा कि तुम्हें देर हो रही होगी वापस चलते है। दोनो घाट की सीढ़ियों से नीचे उतरे। रात के नौ बज चुके थे। सारे घाट खाली थे और अब जैसे सोने लगे थे। शशि और प्रिया दोनो वहाँ से चले आये। रास्ते भर दोनो में से किसी ने कोई बात नहीं की। इस आखिरी मुलाक़ात के आखिर में शशि ने प्रिया को हॉस्टल के दरवाजे पर छोड़ते हुए कहा,'मैं तुम्हारा आखिर तक इंतजार करूँगा प्रिया।' और प्रिया बिना कोई जवाब दिए हॉस्टल के अंदर चली गई।


अगर यह कोई कहानी होती तो कुछ महीनों में इंतजार खत्म हो चुका होता। प्रिया शशि के पास लौट आती। दोनो साथ-साथ रहते और कहानी का हैप्पी एंडिंग हो जाता। 
लेकिन ऐसा सिर्फ कहानियों में होता है। असल जिंदगी इन कहानियों से अधिक जटिल है। शशि उस दिन के बाद से प्रिया का इंतजार लगा। एक महीना बीता, दो महीने बीते, छह महीने, एक साल,तीन साल बीत गए लेकिन प्रिया वापस नहीं आयी। शशि भी बस उसका इंतजार करता रहा। इस बीच वो कभी कभी प्रिया के नाम खत लिखता रहा उस डायरी में जो प्रिया ने उसे दी थी। एक दिन वो डायरी भी भर गई लेकिन प्रिया नहीं आई। कुछ दिनों पहले उसी डायरी का आखिरी पन्ना मुझे पढ़ने को कहीं से मिला। इसमें प्रिया के नाम एक कविता लिखी थी। 

6 मार्च , 2010
प्रिया,
इंतज़ार एक शब्द है,
या उससे भी कुछ बढ़कर है,
कभी तो पल दो पल का है,
कभी यह जीवन भर का सच है, 
इंतज़ार अकेला है,
पर खाली नहीं,
यह उम्मीद लिए है,
उम्मीद तुम्हारे लौट आने की, 
कि अभी भी तुम भूली नहीं होगी मुझे,
तुम रात तारों को जब,
चमकते हुए देखती होगी,
तब उत्तर में एक तारे को देखकर तुम्हें,
कुछ याद मेरी भी आ जाती होगी।
पर हक़ीक़त कोई उम्मीद नहीं जानती है,
हाँ, हक़ीक़त अभी और इंतज़ार मांगती हैं।
वक़्त गुजरता हैं तो,
इंतज़ार बढ़ता है, गहराता है,
और एक टीस पैदा होती है,
क्यों नहीं हो पाता हूँ मैं तुम जैसा,
क्यों छोड़कर चले जाना बस तुम्हें आता है,
मेरे हक़ मैं क्यों बस इंतजार लिखा है।
इंतजार केवल इंतजार भर नहीं है,
इसमें तुम हो,हम हैं,और एक ख्वाब,
जो देखा था हमने साथ में,
कि एक घर होगा पहाड़ो पर,
हर शाम जाया करेंगे समुद्र किनारे,
वक़्त-बेवक़्त मुस्कुराने की आदतें होगी,
रात की चादर ओढ़ के सो जाया करेंगे।
इंतजार बहुत खलता है,
जब घाट किनारे मैं अकेला होता हूँ,
जब कभी रात में चुपचाप रोता हूँ,
जब तुम्हारें लिखे कुछ पत्रों को,
पढ़ा करता हूँ,तो सोचता हूँ,
तुम्हारा ये सब मुझे लिखना,
क्या ये भी झुठ था,
उन झूठें वायदों की तरह,
जो कभी तुमने किये थे।
सुनों,
अब वापस आ भी जाओ,
इससे पहले कि खत्म हो जाये इंतजार,
या इंतज़ार करते-करते खुद मैं।

लेकिन प्रिया कभी लौट कर नहीं आई। शशि का भी कुछ पता नहीं चला। इस तरह उस बूढ़े शैतान की सपने वाली बात सच हो गई।

 लेखक : विकास रावल
ग्राम- देलवाड़ा, तह- ब्यावर 
जिला- अजमेर (राजस्थान)


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