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Friday, April 13, 2018

क्या इंसानियत मर चुकी है ? #JusticeForAsifa

कठुआ में 8 साल की मासूम बच्ची के साथ रेप की शर्मनाक घटना दिल दहला देने वाली है।  एक मासूम बच्ची को सुनियोजित तरीक़े अपहरण करके जिस तरह पूरी घटना को अंजाम दिया गया वो सुनकर कठोर से कठोर व्यक्ति का दिल भी दहल जायेगा।  बलात्कारी को बचाने के लिए जिस तरह कुछ लोगों ने प्रदर्शन किया वो और भी ज़्यादा शर्मसार करने वाला है।  कोर्ट में कुछ वकील और सड़क पर कुछ नेता भी आरोपियों के बचाव में उतर आये। एक नेता ने तो इस घटना के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने वाला बयान तक दे दिया।


दूसरी और उन्नाव में हुई घटना में विधायक का नाम शामिल है इसके बावजूद उसे गिरफ्तार नहीं किया जाता।  पीड़िता के पिता को इतना मारा जाता है जिससे उसकी मौत हो जाती है।  कई लोग आरोपी के समर्थन में उतर आते हैं।  कठुआ की घटना के आरोपियों में आरोपियों में रिटायर्ड अधिकारी और एक पुलिसकर्मी भी शामिल है तो उन्नाव की घटना में एक जनप्रतिनिधि सोचिये जिस पर देश और समाज की रक्षा और विकास का दायित्व है वो खुद ही रक्षक से भक्षक बन जाये तो क्या गंभीर चिंता का विषय नहीं है ?  क्या कारण ? क्यों कुछ लोगों की इंसानियत मरती जा रही है ? क्यों लोग भीड़ बनकर आरोपियों के समर्थन में उतर आते हैं ?  क्या ''बेटी बचाओ'' का नारा सिर्फ एक स्लोगन बनकर रह गया है ?  आज जिन पर रक्षा का दायित्व है वही अपनी इंसानियत भूल चुके हैं उनकी ही आत्मा मर चुकी है।  

हमारे देश में महिला को देवी का दर्जा दिया है लेकिन दुःख की बात है की महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में पिछले कुछ समय में लगातार बढ़ोतरी हुई है।  मासूम बच्ची से लेकर बुज़ुर्ग महिला के साथ भी ऐसी शर्मसार घटनायें होती रहती हैं।  गांव में घूँघट में रहने वाली महिला से लेकर मेट्रो सिटी में जॉब करने वाली महिला भी सुरक्षित नहीं है।  आखिर कब तक ऐसी घटनायें होती रहेंगी ? क्या सिर्फ सख्त कानून  बना देने से ही इन घटनाओं पर लगाम नहीं लगाई जा सकती है ?  कानून  का सही से पालन होना भी ज़रूरी है।  बहुत से घटनाओं में आरोपी इतने प्रभावशाली होते हैं की उनके खिलाफ पुलिस में एफ आई आर  भी दर्ज नहीं हो पाती। उनाव और कठुआ में जिस तरह से आरोपी को बचने की कोशिश की जा रही है वो उदाहरण हमारे सामने है।    कई बार आरोपी महिला को जान से मरने का डर बताकर उसे  एफ आई आर  दर्ज करवाने से रोक देते हैं। आसाराम और रामरहीम का केस एक उदाहरण है न जाने वो कब से और कितनी मासूम लड़कियों के साथ रैप किया होगा लेकिन उसके प्रभाव के कारण किसी ने पुलिस में एफ.आई.आर  दर्ज कराने  की हिम्मत ही नहीं की। एक लड़की ने हिम्मत की और आज आसाराम और रामरहीम जेल की सलाखों के पीछे है। उस लड़की की हिम्मत की प्रशंसा करनी होगी बिना डरे उसने बहुत हिम्मत का काम किया वरना और न जाने कितनी मासूम लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाता। 

''बेटी बचाओ'' का नारा सिर्फ एक स्लोगन बनकर रह गया है। आज जिन पर रक्षा का दायित्व है वही अपनी इंसानियत भूल चुके हैं, उनकी ही आत्मा मर चुकी है।  जो लोग ऐसे अपराधियों के पक्ष में और उनका समर्थन कर रहे हैं यक़ीनन उनकी इंसानियत मर चुकी है।
©Nazariya Now

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