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Saturday, April 21, 2018

कलम के सहारे बचपन की सैर (कहानी) - लेखक : अंकित आज़ाद गुप्ता

कलम के सहारे आज आ पहुँचा हूँ अपने बचपन में,
कितना लगाव था गाँव की मिट्टी से खेलना-कूदना, दौड़ना-भागना और मार पड़ने पर मिट्टी में ही लोट जाना !


दिन भर चबूतरे तथा द्वार पर हमउम्र साथियों के साथ अनेकों प्रकार के खेल:-गोली,गुल्ली-डंडा, गोटी(पत्थर), बत्तीसी, लुका-छिपी,टायर को हाथ से भगाना,पतंग के लिए भागना आदि कई ऐसे खेल जिसे मेरी पीढी आखिरी बार खेल रही हैं, शायद अगली पीढी को नसीब ना हो वे सारे खेल !

पापा की सुजुकी मोटरसाइकिल को बिना स्टार्ट किए 120 के स्पीड में मुँह से आवाज करते हुए चलाना !

स्कूल जाने के नाम पर पेट दर्द तथा सर दर्द का बहाना और पापा के द्वारा घसीटते हुए स्कूल ले जा कर मास्टरजी के सुपुर्द कर आना,मानो ऐसा प्रतीत होता था कि घरवालों ने सारा रिश्ता नाता खत्म कर कही छोड़ आया हो !

1 भी मिल जाने पर लगता था मानो जाकर सारा दूकान खरीद आऊँ,  1 में ही बिस्कुट,दालमोठ,चॉकलेट(नींबू फाड़ा) आदि खरीद कर शान से बैठ कर लंगोटिए यारो को इस शर्त पर खिलाना की अगली बार वो भी खरीदेगा तो खिलाएगा !

होली में पापा से दो सफेद गंजी तथा विभिन्न प्रकार के बंदूको वाली फिचकारी खरीदवाना,और शाम तक दोनो गंजी को फाड़कर तथा फिचकारी को तोड़कर ही होली की समाप्ति करना !



वो दादी माँ के द्वारा सुनायें गयें दुर्लभ,अविश्वसनीय, अचंभित कर देने वाले किस्से, 
तो साथ ही दादाजी के द्वारा इतिहास,गाँधीजी तथा अंग्रेजो के बारें में आँखो देखा हाल जो हमारे किताबो में हैं उसको सुनकर दाँतो तले अंगुली दबाना, कहाँ से नसीब होगा अगली पीढ़ी को !

अब तो कुछ वैसा बचा ही नही !
वो गाँव तो हैं पर वो लोग, वो प्यार, वो अपनापन, वो सबो का एक-दुसरे के दुख-सुख में भागीदारी सारा का सारा अब स्वार्थ में तब्दील हो गया हैं !

कितना लिखूँ, जितना भी लिखूँगा बढ़ता ही जाएगा !
अब तो सारे दोस्त भी काफी समझदार हो गयें हैं, किसी को समय कहाँ की पीछे मुड़कर उन पलों को याद करे और बोले की  चल बैठकर गुजारते हैं कुछ पल उसी मिट्टी पर जहाँ से हमने शुरुआत की थी अपनी दोस्ती-यारी !

ऐ मेरे गाँव की मिट्टी मुझे मेरी बचपन की कहानी दे दे
सौगात में जो दिया हैं तुमने वो बेकार जवानी ले ले
लेखक : अंकित आज़ाद गुप्ता
 (पूर्वी चम्पारण, बिहार)

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