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Monday, April 23, 2018

मौन विलाप (कहानी) - लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'

चारों तरफ ख़ुशनुमा माहौल ,शोहर,गीत ढोल-बाजे के साथ पास-पड़ोस की महिलायें ,युवतियाँ और बुढ़िया काकी सभी इस जश्न के वातावरण में हास्य-व्यंग विनोद में सराबोर। भट्टे पर एक बड़ी-सी कढ़ाई ( जिसकी पेंदी संभवतः कभी उजली रही होगी ) चढ़ी थी जिसमें से ऊपर तक भरा घी बाहर निकलने का प्रयत्न कर रहा था परन्तु तैरती हुईं पूरियां घी के इस अप्रत्याशित प्रयत्न को मुँह चिढ़ा रहीं थीं ! एक कोने में गुलाबजामुन की महक तो दूसरी तरफ कचौड़ियों की सोंधी सुगंध आज घर में आने-जाने वालों को स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित करती नजर आ रही थीं।

            चौधरी सरबतीलाल जी केसरिया रंग की पगड़ी संभाले नाहक ही लोगों पर बिगड़ रहे थे। कभी मचिया को लेकर तो कभी टेन्ट हाउस से मंगाई गई कुर्सियों को पंक्तियों में सजाने की बात पर। चौधराईन धनिया नई-नवेली दुल्हन की पोशाक में एक हाथ से अपने घुँघट को पकड़े आने-जाने वाले मेहमानों के आवभगत  में अपनी तामीरदारी दिखाने में लगी पड़ी थीं।

नटवर ( चौधरी सरबती लाल का बेटा ) - अरे ओ माँ ! जरा भीतर तो आना।

धनिया ( चौधरी सरबतीलाल की पत्नी ) - क्या है ? क्यूँ गला फाड़ रहा है गधे की तरह ! कौन सा पहाड़ टूट पड़ा तुझपर !

नटवर ( पाजामे की डोरी दिखाते हुए ) -  ये देखो ! उस मंदअकल 'छनुए' दर्जी की करामात। बदअकल ने हाथी के नाप का पाजामा सिल दिया। अब क्या करूँ( बड़ी बेचारगी से ) ?  कहीं ये हल्की सी डोर पाजामा

संभालते -संभालते टूट न जाय !

धनिया ( अपनी लोमड़ी-सी अकल लगाते हुए ) - ठहर ! मैं कुछ करती हूँ।

धनिया पास पड़े सुतली के रस्सी को हाशिये की मदद से दो फाँक करती हुई पाजामे की छेद में डालने लगती है।

नटवर ( आश्चर्य से ) - अरे ! ये क्या कर रही हो ?

धनिया ( नटवर को अपने विश्वास में लेते हुए ) - अरे कुछ नहीं होगा। इत्मिनान धरो ! रस्सी कुर्ते के नीचे छिप जाएगी और पाजामा भी संभल जाएगा।

नटवर ( धनिया की तारीफ करते हुए ) - वाह माँ ! वाह ! क्या तिकड़म लगाया है।

धनिया ( इतराते हुए ) - अरे ! यूँ ही चौधरी साहब ने हमें ब्याह कर नहीं लाया था। आज जो गांवभर में वो अपनी चौधराई छाँटते फिरते हैं सब मेरा ही किया धरा है।

नटवर कृतज्ञता जताते हुए धनिया के आगे नतमस्तक हो गया। तभी धनिया चौधरी सरबतीलाल की आवाज सुनकर बाहर की ओर चली गई।

सरबतीलाल ( व्यंग करते हुए ) - अरे धनिया ! तेरा लाडला तैयार हुआ कि नहीं कब से भीतर एक पाजामे में अटका पड़ा है। न जाने क्यूँ ! इस घनचक्कर को मेरे ही घर में जन्म लेना था (सरबतीलाल अफ़सोस करते

हुए )

आजतक कोई भी काम बिना अपनी माँ की मदद से कर ही नहीं पाया और उसपर से तुम इसकी शादी कराने पर तुली हो ! न जाने क्या होगा। ईश्वर ही रखवाला है इस घर का !

मैं तो बस यही सोचकर हर घड़ी घुला जाता हूँ कि मेरे परलोक सिधार जाने के बाद इस मूरख का क्या होगा ?

धनिया ( तमतमाते हुए ) - क्यूँ जी ! क्या ....?  क्या समझ रखा है मेरे बेटे को ? जब देखो तब उल्टा-सीधा सुनाते रहते हो उसे। यदि वह मेरी सलाह पर चलता है तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ! और वैसे भी गांव में आपकी चौधराई भी जो बची-खुची है मेरी ही वजह से रह गई है। तुम्हारे उस कंगले भईया-भाभी का चलता तो कब का वो तुम्हें डुबा दिए होते वो तो भला हो उस ननकू पंडित का जिसने मेरा रिश्ता तुम जैसे बदअकल से करा दिया नहीं तो तुम्हरे बड़े भाई और भाभी मिलकर जीवनभर तुम्हारी ही कमाई की रोटियाँ तोड़ते रहते।

सरबतीलाल ( धनिया को संभालते हुए ) - अरे भागवान ! बस करो ! क्यूँ उनके जले पर नमक छिड़कती हो ? आखिरकार हैं तो मेरे ही सगे भईया-भाभी। माँ के देहान्त के बाद उनके सिवा मेरा कौन था ! उन्होंने मुझे पढ़ाया-लिखाया और इस सरकारी नौकरी के क़ाबिल बनाया।

आसमान की ओर सरबतीलाल एक पल निहारते हुए मानों जैसे उन बीते दिनों में प्रवेश कर गए हों ! सरबतीलाल के पिता का देहान्त बचपन में ही हो गया था तब से लेकर बाल्यावस्था तक सरबती व उनके बड़े भाई अशर्फीलाल की पढाई -लिखाई और पेट का इंतजाम उनकी माँ रूपवती के कन्धों पर आ पड़ी थी। सरबती लगभग आठ वर्ष के रहे होंगे और अशर्फी लगभग पंद्रह वर्ष के। घर की माली स्थिति बद से बत्तर होने की दशा में अशर्फी  बीच में ही पढाई छोड़ बैठे और माँ के साथ ठाकुर साहब के खेतों में काम किया करते ताकि सरबती निरंतर विद्यालय जा सके। तीनों जीवों का गुजारा इसी प्रकार चलता रहा। उन दिनों रूपवती भी कुछ बीमार-सी रहने लगी थी। गांव के वैद्य जी को दिखाया गया। उन्होंने शहर जाकर अच्छे डाक्टर से इलाज करवाने की सलाह दी परन्तु आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण रूपवती में यह क़ूबत न थी कि वह अपने इलाज पर एक भी ढेला ख़र्च कर सके। बिना इलाज के रूपवती की हालत दिनों-दिन गंभीर होती जा रही थी। रूपवती कभी -कभी खाँसते-खाँसते खेत में ही बैठ जाया करती।



अशर्फी (अपनी माँ की ये हालत देखकर बोला) - माँ ! कल से तूँ घर पर ही आराम किया कर ! मैं अकेले ही खेत पर आया करूँगा। सहसा रूपवती की आँखों में आँसू आ गए अपने पंद्रह वर्ष के बेटे को यह कहते देखकर।

रूपवती ( प्यार से अशर्फी के सिर पर हाथ फेरती हुई ) - नहीं रे ! तूँ अकेला काहे आएगा ? मुझे कुछ नहीं हुआ है तूँ बेवज़ह ही परेशान हो रहा है।

शाम हो गई थी रूपवती चूल्हे पर दाल पका रही थी और सरबती ,अशर्फी दोनों रूपवती को घेरकर बैठे-बैठे एक कहानी सुन रहे थे तभी न जाने रूपवती कहानी कहते-कहते रुक गई और अशर्फी की तरफ आशा भरी नज़रों से देखने लगी। अश्रु की धार निकल रही थी रूपवती की आँखों से ।

रूपवती ( अशर्फी से ) - बेटा ! मेरे न रहने पर तू अपने छोटे भाई का ख्याल रखना !

अशर्फी - माँ ! तूँ ऐसा काहे बोल रही है ? हाँ ! मैं जरूर रखूँगा।

संभवतः रूपवती को अपने जीवन का अंत निकट प्रतीत हो रहा था। दोपहर का मध्य पहर ,धूप तीव्र हो रही थी। चारों तरफ सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त तभी रमुआ काका चीखने लगे। अरे देखा हो ! रूपवतिया को का हुई गवा ? अशर्फी हाशिया छोड़कर चिल्लाता हुआ रूपवती के पास आया। रूपवती खेत में मुँह के बल गिरी पड़ी थी। अशर्फी की चिल्लाहट सुनकर आस-पास के मज़दूर जो खेतों में काम कर रहे थे जुटने लगे। लोगों ने खटिया पर रूपवती को लिटाकर घर तक पहुँचाया। अशर्फी जल्दी से भागकर वैद्य जी को बुला लाया। वैद्य जी ने नब्ज़ टटोला, कुछ देर विचार करते रहे और हार स्वीकार करते हुए सरबती व अशर्फी की ओर देखा। वैद्य जी उठ खड़े हुए और रमुआ काका से कान में कुछ कहा ,अपना बक्सा उठाया और चलते बने। सरबती और अशर्फी रातभर रूपवती की खाट के पास बैठे रहे। भोर का पहर मुर्गे की तान के साथ अशर्फी की नींद खुली। सरबती खाट के पास ही जमीन पर बेसुध-सा पड़ा सो रहा था। अशर्फी ने रूपवती को जगाने की कोशिश की।

अशर्फी - माँ ! ओ माँ ! तूँ ठीक तो है। देख ! खेत पर जाने का बखत हो चला है। अभी तो तुझे हमारे लिए रोटी भी बनानी है। माँ ! ओ माँ ! उठती क्यूँ नहीं ?

अशर्फी रूपवती से उठने की मिन्नतें करते-करते जोर-जोर से रोने लगा। आवाज सुनकर आस-पड़ोस के लोग एकत्रित होने लगे। जितने मुँह उतनी बातें ! कोई कहता - बड़ी दया आती है इन बच्चों पर ! बचपन में ही माँ-बाप दोनों छोड़ गए। ईश्वर ही जाने क्या लिखा है इन अभागों के भाग्य में ! रूपवती की लाश खाट पर पड़ी थी। अशर्फी और सरबती दोनों रूपवती को पकड़कर रोए जा रहे थे और बीच-बीच में रूपवती को पुकारते, माँ ! ओ माँ ! तू उठती क्यूँ नहीं.... ?

रमुआ काका दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरने लगे यह कहते हुए तुम्हारी 'माँ' अब कभी नहीं उठेगी बेटा ! दोनों बच्चों को धीरज देते हुए रमुआ काका खाट से दूर ले गए। रूपवती की लाश को बाँस की तख्ती पर बांधा जा रहा था। दोनों भाई रोते-रोते बेहाल हो चुके थे मानों रूपवती की अर्थी के साथ ही उनका बचपन भी किसी ने बांधना शुरु कर दिया हो !

रूपवती के जाने के बाद अशर्फी अकेला ही ठाकुर साहब के खेतों में काम करने जाया करता। सुबह-सुबह रोटी बनाना,सरबती को तैयार कर पाठशाला भेजना यही नित्य का कर्म बन गया था अशर्फी का। दिन गुजरता गया अशर्फी पच्चीस वर्ष का हो गया था। रमुआ काका और पटीदारों ने अशर्फी से विवाह कर लेने की बात कही परन्तु अशर्फी ने साफ इंकार कर दिया। रमुआ काका ने अशर्फी को शांत भाव से समझाया कि विवाह करने से घर-गृहस्ती संभालने वाला कोई हो जाएगा और वैसे भी सरबती को भी भाभी से माँ का प्यार मिल जाएगा और तो और सबको सही बखत पर दाना-पानी मिल जाया करेगा। अशर्फी इन सभी बातों को अनदेखा न कर सका और विवाह हेतु तैयार हो गया। अशर्फी का विवाह पास के गांव में रहने वाले खेतिहर मज़दूर मेवाड़ी महतो की बिटिया रामप्यारी से हो गया। अब अशर्फी में जीने की इच्छा मानों दोगुनी हो गई थी। रामप्यारी ज्यादा पढ़ी-लिखी तो  नहीं थी परन्तु घर को संभालना खूब अच्छे तरीके से जानती थी। अब सरबती भी मन लगाकर पढ़ने लगा था। सही समय पर खाना-पीना और उससे भी बढ़कर तीनों के बीच एक अच्छा सामंजस्य। रामप्यारी भी सरबती को अपने भाई की तरह स्नेह किया करती और सरबती भी रामप्यारी को आदरपूर्वक भाभी माँ कहकर पुकारता। समय बीतता गया सरबती ने इंटरमीडिएट की परीक्षा अच्छे अंको के साथ उत्तीर्ण कर ली। अशर्फी बड़ा ही खुश था मानों यह परीक्षा सरबती ने नहीं उसने ही उत्तीर्ण की हो !

अशर्फी रामप्यारी के साथ घर की ड्योढ़ी पर बैठा-बैठा बातें कर रहा था।

अशर्फी (रामप्यारी से ) - आज माँ जिन्दा होती तो यह खुशी चौगुनी हो जाती कहते हुए अशर्फी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

रामप्यारी ( अशर्फी के आँसू पोंछते हुए )-  हम भी तो सरबती के माता-पिता समान हैं वह हमारा ही बच्चा है।

अशर्फी रामप्यारी के समक्ष नतमस्तक-सा इस बात को स्वीकारते हुए।

रामप्यारी -  माँ-बाबू जी नहीं हैं तो क्या हुआ ! हम अपने बबुआ की शादी बड़ी धूम-धाम से करेंगे देख लेना ! कुछ समय बाद सरबती की नौकरी गांव के ही ब्लॉक पर कार्यालय सहायक के पद पर हो गई। फिर क्या था गांव में तो जैसे हल्ला ही मच गया। अच्छे-अच्छे घरों के रिश्ते पास-पड़ोस के गांव से आने लगे। साँझ का पहर अशर्फी और रामप्यारी खाट पर बैठकर बातें कर रहे थे तभी पड़ोस के ननकू पंडित घर के बाहर से ही आवाज देते नजर आए।

ननकू पंडित - अरे ओ अशर्फिया ! घर में है का ?

अशर्फी - हाँ पंडित जी ! चले आइये।

खाट से उठकर रामप्यारी घुँघट करते हुए घर के भीतर चली गई।

अशर्फी ( बड़े आदर के साथ )  - और बताइये पंडित जी ! क्या सेवा करूँ आपकी ?

ननकू पंडित - अरे कुछ नहीं ! सुना है तेरा भाई सरबतिया ब्लॉक पर नौकरी करने  लगा है।

अशर्फी ( खुशी से स्वीकारते हुए ) - हाँ पंडित जी ! ठीक सुना है।

ननकू पंडित - चलो अच्छा हुआ ! उस ठाकुर के खेत में मज़दूरी करने से तेरा पीछा छूटा।

अशर्फी ( विनम्र भाव से ) - नहीं-नहीं पंडित जी ! वे तो हमारे अन्नदाता हैं और मज़दूरी करना तो मेरा धर्म ! भला धर्मपरायणता से कौन विचलित हो सकता है।

ननकू पंडित ( कुटिल स्वर में ) - तेरी इच्छा ! इसमें मेरा क्या जाता है ? अच्छा सुन ! जरा मुँह मीठा तो करवा, एक अच्छी खबर लाया हूँ। अशर्फी ने रामप्यारी को आवाज लगाई।

अशर्फी - अरे सुनती हो ! जरा मीठा और पानी ले आना।

रामप्यारी सिर पर पल्लू संभालते हुए गुड़ से भरी कटोरी और गिलास में पानी ननकू पंडित के समक्ष रखते हुए उनके चरण स्पर्श किए।

ननकू पंडित ( दोनों हाँथों को उठाकर आशीर्वाद देते हुए ) - सदा सुहागन रहो !

ननकू पंडित ( कुछ देर पहले कही गई अपनी बातों को स्मरण करते हुए )- हाँ ! तो मैं क्या कह रहा था कि बाँसवारीपुर के चौधरी ने अपनी कन्या के विवाह का प्रस्ताव तुम्हारे भाई सरबतिया के लिए भेजा है। बड़े खाते-पीते लोग हैं।  तू हाँ कर दे ! तो मैं बात आगे बढ़ाऊँ। कोई रस्साकशी नहीं है तू आराम से विचार कर ले। मैं अब चलता हूँ शोभना बनिये के घर लड़का हुआ है वहाँ दावत है। मुझे अवश्य जाना होगा नहीं तो वो बुरा मान जाएगा। लाठी टिकाते हुए ननकू पंडित वहाँ से चलते बने। रामप्यारी और अशर्फी इस रिश्ते पर विचार-विमर्श करने लगे।

रामप्यारी ( हठ करते हुए ) - सुनो जी ! मुझे तो यह रिश्ता ठीक ही लग रहा है। अच्छा खानदान और खाते-पीते लोग। ऐसा रिश्ता कहाँ मिलेगा हमारे बबुआ को ? कहते-कहते रामप्यारी ने जिद पकड़ ली। सरबती से भी बात की गई परन्तु रामप्यारी की खुशी में ही सरबती की खुशी थी तो इंकार करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। सरबती की शादी बड़े ही धूम-धाम से हुई और शादी की दावत में कई गांव के लोग शामिल हुए। विवाह का कार्यक्रम  जैसे-तैसे निपट ही गया। अशर्फी की वही रोज़मर्रा की मज़दूरी का काम, कुछ नहीं बदला उसकी जिंदगी में परन्तु सरबती अब तनिक ठाट-बाट से रहने लगा और रहे भी क्यूँ न ! अच्छी नौकरी,जेब में पैसे।

धनिया ( चिल्लाते हुए ) - अजी सुनते हो ! आज जरा बाजार से आते बखत रसगुल्ले ले आना। बड़े दिन हो गए जब से तुम्हारी इस मड़ईया में आयी हूँ मेरे तो भाग ही फूट गए !

धनिया ( सरबती को सलाह देती हुई ) - सुनो जी ! हम अपनी खाली जमीन में एक पक्की कोठरी क्यूँ नहीं बनवा लेते ?

सरबती ( धनिया को लताड़ते हुए )- क्या कह रही हो ! तुम्हारा दिमाग तो दुरुस्त है। जानती नहीं यह हमारे पुरखों का घर है इसे भला हम छोड़कर कैसे चले जायें ?

धनिया ( नाराज होते हुए ) - मेरी तो कोई कीमत ही नही इस घर में ! क्या-क्या सपने देखे थे सब मटियामेट हो गया कहकर धनिया रोने लगी।

दरवाजे के बाहर झाड़ू लगाती हुई रामप्यारी सरबती और धनिया की बातें बिना आवाज किए सुन रही थी।

धनिया ( चिल्लाते हुए ) - तो क्या ! तुम चाहते हो मैं भी इन कंगलों की तरह ही इसी झोपड़े में जीवन व्यतीत करते हुए चल बसूँ। तुम्हें फैसला करना होगा !

सरबती ( समझाते हुए ) - क्या कर रही है भागवान ! भाभी बाहर ही झाड़ू लगा रहीं हैं। सुन लेंगी तो उन्हें बड़ा दुःख होगा।

धनिया ( निष्ठुर-सी ) - सुन लें ! मेरी बला से।

सरबती काम पर चला गया परन्तु धनिया निर्लज्ज-सी मुँह फाड़-फाड़कर चिल्लाती रही। साँझ को जब अशर्फी घर आया तो रामप्यारी फूट-फूटकर रोने लगी। अशर्फी ने बहुत पूछा, तुझे क्या हुआ है ? परन्तु रामप्यारी ने कोई उत्तर नहीं दिया। मध्यरात्रि का पहर सुबकने की आवाज ! अशर्फी नींद से जाग गया। देखा तो रामप्यारी रो रही है। बहुत पूछने पर रामप्यारी ने सुबह का किस्सा कह सुनाया। कुछ देर विचार करने के बाद

अशर्फी ( निराश मन से ) - सच ही तो कह रही है धनिया बहू ! आखिर हम कंगले ही तो थे। मेरे विचार से उन्हें अपना पक्का मकान बनवा ही लेना चाहिए। बबुआ अब बड़ा आदमी हो गया है और बड़े लोगों का आना-जाना तो अक्सर लगा ही रहता है उसके यहाँ और इस झोपड़ी में ! क्या इज्ज़त रह जाएगी उसकी ! हार स्वीकार करते  हुए अशर्फी ने अपना फैसला सुना दिया इन खोखले तर्कों के आधार पर। दूसरे ही दिन दोनों सहोदर आमने-सामने खाट पर बैठे-बैठे एक-दूसरे को देखे जा रहे थे संभवतः दोनों भाईयों को समझ नहीं आ रहा था कि बात कहाँ से शुरु की जाय।

अशर्फी ( संकोचाते हुए ) - मैं सोच रहा हूँ अब परिवार बढ़ रहा है और वैसे भी हमारी पुस्तैनी बखरी छोटी पड़ने लगी है और लोगों का आना-जाना भी बढ़ गया है। मेरे विचार से सामने वाली खाली जमीन पर एक पक्का मकान बनवा लिया जाय। क्यों सरबती तुम क्या कहते हो ?

सरबती ( नजरें नीची किये हुए ) - जैसा आप ठीक समझें भईया !

अशर्फी ( अपने बड़कपन का परिचय देते हुए ) - हमारा क्या ! हम तो इसी घर में रह लेंगे। माँ की यादें इस घर से जुड़ीं हैं अतः हम इस घर को छोड़ भी नहीं सकते।

सरबती ( उदास स्वर में ) - ऐसा क्यों कहते हो भईया ? नहीं-नहीं आप भी रहोगे हमारे साथ।

धनिया ( ढिठाई दिखाती हुई ) - अरे ! भईया सच ही तो कह रहे हैं। इस घर से उन्हें ज्यादा लगाव है। रहने क्यों नहीं देते उन्हें यहाँ ? वैसे भी बड़ों की बात टालनी नहीं चाहिए (व्यंग भरे शब्दों में )।

बात पूरी हुई सामने की खाली पड़ी जमीन पर निर्माण कार्य होने लगा। पाँच-छः महीनों में पक्का मकान बनकर  तैयार हो गया परन्तु आपस में सामंजस्य का महल ध्वस्त हो चला था ! सरबती धनिया को लेकर नये मकान में चला गया। थोड़ी-बहुत बातचीत कभी-कभार दोनों भाईयों में हो जाया करती साँझ के समय परन्तु धनिया का ईर्ष्यालु स्वभाव ! यह कैसे बर्दाश्त होता। सरबती और धनिया इसी बात को लेकर रोज लड़ा करते। इस लड़ाई में शकुनी का किरदार कुछ हद तक धनिया के मायके वाले निभाते। एक दिन अशर्फी  घर से बाहर बाजार जाते समय सरबती को रोका और बोला। देख सरबती ! हमारी वजह से तेरे घर में अशांति पसरी है जब धनिया नहीं चाहती कि तूँ हमसे रिश्ता रखे तो काहे रिश्ता निभाता है ? देख बबुआ ! तेरी प्राथमिकता तेरा परिवार है तूँ उसे संभाल ! मेरी और अपनी भाभी की चिंता छोड़ दे ! समझा। नजरें झुकाए सरबती सुनता रहा और रोते हुए अपने भाई की छाती से लग गया। अशर्फी ने उसे ढाँढस बंधाते हुए और वैसे भी मैं तुझसे दूर थोड़े हूँ। सरबती ने दबे  मन से ही सही अपने बड़े भाई की बात मान ली। वर्ष बीतते गए, इधर सरबती के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। लड़के के बड़े होने के साथ ही साथ दोनों परिवारों के बीच का रिश्ता घटता चला गया। दिन पर दिन अशर्फी की तबीयत भी बिगड़ने लगी थी। अशर्फी किसी तरह ठाकुर साहब के खेत में मज़दूरी करने पहुँच तो जाता परन्तु अब वो फुर्ती कहाँ ! सो ठाकुर साहब के आदमियों ने उसे खेत में काम पर रखने से मना कर दिया। अब घर तो चलाना ही था सो रामप्यारी ही सही। तबीयत ठीक न होने के कारण अशर्फी घर में ही खाट पर पड़ा-पड़ा खाँसता रहता। वैद्य जी ने बताया ! अशर्फी क्षय रोग से पीड़ित है उसे शहर ले जाकर किसी अच्छे डाक्टर से इलाज करवाने की आवश्यकता है। अब घर की माली हालत इतनी खराब थी कि खेत में रामप्यारी के काम करने से जो मज़दूरी मिलती उससे दोनों प्राणियों के दो वक़्त की रोटी का इंतजाम भी बड़ी ही मुश्किल से हो पाता था और वैसे भी समय के साथ दोनों ही बूढ़े हो चले थे।

रामप्यारी ( अशर्फी से अनुरोध करती हुई ) - क्यूँ जी ! हम अपने बबुआ से पैसे क्यूँ नहीं ले लेते ?

अशर्फी ने गुस्से में आकर रामप्यारी को डपट दिया और यह विचार कभी उसके मन में न आए ऐसी शख़्त हिदायत दे डाली। परन्तु रामप्यारी भी क्या करती उसे कोई और उपाय सूझ नहीं रहा था। दूसरे दिन रामप्यारी  बड़े ही  सवेरे चुपचाप सरबती के मकान पर पहुँच गई। सरबती का नौकर दौड़कर सरबती को बुला लाया। सरबती रामप्यारी को देखते ही दौड़ा-दौड़ा उसके पास आया और आदरपूर्वक चरणस्पर्श किए। रामप्यारी ने आशीर्वाद दिया। रामप्यारी ने अपनी सम्पूर्ण व्यथा सरबती को बताया। सरबती यह सब सुनते ही रामप्यारी को चिंता न करने का आश्वाशन दिया। जैसे ही सरबती पैसे लाने शयनकक्ष की ओर मुड़ा सामने ही धनिया खड़ी थी। मुँहफट्ट धनिया रामप्यारी के सामने ही जले-कटे व्यंगों का प्रहार करना आरम्भ कर दिया।

धनिया - अरे ! क्या पैसे मुफत में आते हैं ? और वैसे भी हम पर कितना कर्ज़ है ! कभी किसी ने जानना चाहा।  सुनो जी ! ( धनिया सरबती को चेतावनी देते हुए ) एक ढेला घर से नहीं जायेगा इन कंगलों को देने के लिए।

यह शब्द सुनते ही रामप्यारी पल्लू मुँह में दबाकर रोते -रोते अपने मड़ई में वापस आ गई। रामप्यारी के इस अपमान को देखकर सरबती का मन रो पड़ा। मन ही मन अपने कायर होने का एहसास आज सरबती को एक जीवित 'मुर्दा' घोषित कर रहा था तभी किसी ने चौधरी सरबतीलाल को आवाज लगाई मानों जैसे सरबतीलाल अपने बीते दिनों के स्वप्न की दुनिया से अभी-अभी वापस लौटे हों !

साँझ का पहर ! तिलकहारु दरवाजे पर थे। बैंडबाजों की कानफाड़ू आवाज मृत सन्नाटों को धता बताते हुए सभी के मन में एक नई उमंग की लहर बनकर दौड़ रही थी परन्तु तीव्र और तीक्ष्ण खाँसने की एक मार्मिक ध्वनि लोगों के रंग में भंग डालने का अचूक शस्त्र साबित हो रही थी।

रुक-रुककर खाँसना और शांत हो जाना ! एक महिला का विलाप करना अपने खाँसते हुए बृद्ध पति को लेकर। बार-बार पानी पिलाना ताकि उस बृद्ध को तनिक आराम मिल जाय। 

यह बृद्ध और कोई नहीं ! सरबतीलाल के भाई अशर्फीलाल थे। पैसों के अभाव में इलाज न करा पाने से इनकी यह हालत हो गई थी। कहते हैं रिश्तों  के मायने चंद सिक्कों से बढ़कर होते हैं परन्तु अशर्फीलाल की यह दुर्गति उन सभी दार्शनिक विचारों को धता बता मुँह चिढ़ा रही थी !

एक तरफ बैंडबाजों  में गुम सरबती का भरा पूरा परिवार तो दूसरी तरफ असहाय-सी बृद्धा रामप्यारी अपने बीमार पति अशर्फीलाल के मरणासन्न सरीख़े खाट के पास बैठकर जोर-जोर से विलाप करती हुई। दुनिया का भी अजब खेल है। मौक़ापरस्त मानव !

चहल-पहल के बीच दावत का आरम्भ। एक ओर पत्तल पर परोसी जा रही गरमा-गरम पूरियाँ तो दूसरी तरफ चीनी की चासनी में पगे काले-काले गुलाबजामुन ! सभी दावत के ज़ायकों का आनंद लेने में व्यस्त परन्तु अंदर ही अंदर जागृत होता सरबती का भ्रात-प्रेम। आखिर सरबती करते भी क्या ? घर में रामायण पसंद हो जिसे महाभारत कराने का जोख़िम काहे उठाये ! एकाएक जोर-जोर से रोने और चीखने की आवाज से वातावरण ही परिवर्तित-सा नजर आने लगा। संभवतः अशर्फीलाल ने अपने पुस्तैनी कच्चे मकान में ही अपने प्राणों का त्याग कर दिया था। पगली-सी हुई बृद्धा रामप्यारी केवल चीख-चीखकर रोये जा रही थी। सरबतीलाल के घर बैंडबाजे वालों ने बैंडबाजा बजाना बंद कर दिया जो संभवतः सरबतीलाल के परिवार वालों से ज्यादा संवेदनशील प्रतीत हो रहे थे। शायद सरबतीलाल को यह भान हो चुका था कि उसका बड़ा भाई अब इस दुनिया में नहीं रहा ! सामने ही सरबतीलाल के समधी जी खड़े थे और ठीक पीठ पीछे धनिया सो औपचारिकता दुनिया का परम कर्त्तव्य ! सरबतीलाल अपने समधी के गले लगकर रोने लगे। संदेह होता है आज भी ! निकलने वाले अश्रु क्या किसी भाई का अपने भाई के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी अथवा नये रिश्ते गढ़ने का आरम्भ !   

लेखक  : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'
(वाराणसी, उत्तरप्रदेश)

24 comments:

  1. बहुत ही बढिया कहानी लिखी आप ने एक एक पात्र जैसे जीवित हो उठा ...और उनके नाम दिल में घर कर लेते है ... आप की कहानी समाज के उस तबके से निकलती है जहां पे सभी परिचित लगते है ... लाजवाब कहानी

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    1. आदरणीया नीतू जी आपकी टिप्पणी हमारा मनोबल बढाती है। आपकी अनमोल प्रतिक्रिया का स्वागत है। आभार 'एकलव्य'

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  2. बहुत मार्मिक कहानी।
    समाज में धनिया जैसे लोगों की ही भरमार है आज.

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    1. आदरणीया सुधा जी आपकी टिप्पणी हमारा मनोबल बढाती है। आपकी अनमोल प्रतिक्रिया का स्वागत है। आभार 'एकलव्य'

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  3. हृदय विदारक कथा ! निर्मम भौतिकवादिता की अत्यंत करुण परिणति ! आपकी कहानी पढ़ कर कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानियों के पात्र सजीव हो गए ! हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ध्रुव जी ! आपकी ऐसी ही मर्मस्पर्शी और कहानियाँ भी पढ़ने को मिलती रहेंगी यही आशा है !

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    1. आदरणीया साधना जी आपकी गहन वैचारिक टिप्पणी सदैव हमारा मनोबल बढाती है। कहानी की समीक्षा हेतु आपका हृदय से धन्यवाद ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया का स्वागत है। आभार 'एकलव्य'

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  4. हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँँ..
    कहानी के पात्र सजीव हो उठे जिनसे रोजाना मिलते है..
    बहुत बढिया।

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    1. आदरणीया पम्मी जी आपकी प्रतिक्रिया हेतु आपका हृदय से आभार। 'एकलव्य'

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  5. बहुत ही मार्मिक कहानी पड़ते -पड़ते किरदार जीवन्त हो उठे ,
    ध्रुव जी आपका लेख दिल की गहरायी से निकल कर सामाजिक यथार्थ को जीवन्त करने में सक्षम हैं ।
    बहतरीन .....

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    1. आदरणीया ऋतु जी आपकी अनमोल प्रतिक्रिया हमारा मनोबल बढ़ाती है। कहानी की न्यायपरक समीक्षा हेतु आपका हृदय से आभार। 'एकलव्य'

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  6. बहुत ही मार्मिक कहानी है हर किरदार जैसे जीवंत हो उठा हो
    बहुत बधाई हो

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    1. आदरणीया शकुंतला जी आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने कहानी के मर्म को समझा और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त की। सादर 'एकलव्य'

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  7. वाह!!ध्रुव जी ,बहुत ही सुंदर कथा लेखन ।ए्क-एक पात्र मानो सजीव होकर चलचित्र सा आँखोंं के आगे मौजूद हो ..बधाई ..।

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    1. आदरणीया शुभा जी आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने कहानी के मर्म को समझा और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया व्यक्त की। सादर 'एकलव्य'

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  8. वास्तविक परिवेश में रची गई जीवंत भावपूर्ण मार्मिक लघु-कथा।
    👌👌👌

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    1. आदरणीय राही जी आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। 'एकलव्य'

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  9. बहुत सुन्दर। कहानी बाँधे रखती है।

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    1. आदरणीय सुशील जी आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। 'एकलव्य'

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  10. बहुत ही हृदयस्पर्शी कहानी....हर पात्र मानो सजीव हो उठा ......आज समाज में माता पिता हों या भाई भाभी रिश्तों की कदर ही कहाँ रह गयी है....धनिया जैसे स्वार्थीलोग सभी जगह देखने को मिल रहे हैं बहुत सुंदर सार्थक कहानी के लिए ढे़रों शुभकामनाएं एवं बधाई ध्रुव जी! ।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका सुधा जी। सादर 'एकलव्य'

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  11. बेहद प्रभावशाली कहानी है। पात्रों के बीच संवाद संप्रेषण का रेखांकन बहुत अच्छा लगा।
    गंवई भाषा में की गयी अभिव्यक्ति विशेष आकर्षण है।
    बधाई और शुभकामनाएँ आपको ध्रुव जी।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका श्वेता जी। सादर 'एकलव्य'

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  12. कहानी प्रतियोगिता में कहानी के चयन पर बधाई एवं शुभकामनाऐं ध्रुव जी। कहानी पढ़कर इसके कारुणिक अंत पर सोचने पर विवश हुआ।मर्मस्पर्शी का सृजन दिल को छू गया। रिश्तों का माधुर्य और कसैलापन दोनों ही बख़ूबी किरदारों को जीवंत बनाते हैं। बड़े भाई का दायित्वबोध और छोटे भाई की सम्वेदनहीनता , छोटे भाई की पत्नी का स्वार्थी, निर्मम स्वभाव कहानी के पात्रों का यथासम्भव चरित्र-चित्रण करते हैं।

    ग्रामीण जीवन के सरोकारों और ताने-बाने को आपने कुशलतापूर्वक कहानी में उभारा है। हास्य-विनोद के साथ यथार्थवादी दृष्टिकोण और आँचलिकता का समावेश कहानी को उत्कृष्ट बनाते हैं।

    "हाशिये" (हंसिये, हंसिया - एक कृषि औज़ार ), बत्तर (बदतर ) जैसे शब्द पाठक को भ्रमित कर सकते हैं जबकि लेखक स्थानीय बोली के प्रति पाठक को आकर्षित करता है। कहानी का प्रभावशाली प्रवाह पाठक को बाँधे रखता है।

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  13. पात्रों कि सजीवता और कथ्य की प्रांजलता में अद्भुत प्रतियोगिता! आम जीवन के सरोकारों को कथाकार की संवेदना का समुचित संबल!अशर्फीलाल की दुर्गति सचमुच रिश्तों की समकालीन सच्चाई की कलई खोलती हुई!कहानी के अंत में समधी के आलिंगन में सरबती के आंसू में कहानीकार ने जो अर्थ ढूंढा है वहीं कहानी अपने उद्देश्य का स्पर्श पा लेती है। वाकई अंतिम पंक्तियां गागर में सागर है। आदर्श और यथार्थ के संघर्ष में लहूलुहान होते मानवीय मूल्यों का सुन्दर, सरस और सजल शब्दांकन! बधाई और आभार!!!

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