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Sunday, April 29, 2018

मौत का घर (कहानी) - लेखक : राजकमल जोलन्दावाला

आज एक बार फिर वह उन्हीं मैले-कुचैले कपड़ो में उदास, लाचारी भरा बेबस चेहरा लिए हुए इधर-उधर ताक रहा था। उसकी खामोश पथराई सी आँखें ना जाने क्या कहना चाहती थी, कोई नहीं जानता था। उसकी उम्र यही कोई 15 बरस के करीब होगी। आज उसे वहां पहली बार देखा था। शायद इसलिए उसकी आँखें किसी शुरुआत को बयाँ कर रही थी। वह थोड़ा असमंजस में नजर आया। शायद वह सोच रहा था कि कहाँ से शुरुआत की जाये। उसके लिए यह जगह कोई नई नहीं थी। हर रोज उसका ऐसी ही जगहों से पाला पड़ता था। यह जगह उसके लिए थोड़ी नई मगर जेहन में बसी जानी-पहचानी लग रही थी।

सड़क के किनारे कुछ-एक चाय की स्टॉल थी। साथ ही कुछ-एक दूसरी दुकानें भी थी। अक्सर लोगों की भीड़ रहती थी वहाँ। मगर उनमें ज्यादातर पढ़ने वाले छात्र थे। आती-जाती बसें थोड़ी देर के लिए वहाँ रुकती थी। वह एक छोटा सा बस-स्टेण्ड था। उन्हीं स्टूडेण्ट्स के साथ कुछ-एक लोग भी थे जो पहनावे से किसी कंपनी के कर्मचारी लग रहे थे। उनके एक हाथ में चाय का गिलास तो दूसरे हाथ में सुलगती सिगरेट इस बात को प्रमाणित भी करती थी। अक्सर मल्टीनेशनल कंपनी के कर्मचारी चाय के साथ सिगरेट पीने को दवा मानते हैं। उनके अनुसार इससे बढ़िया कोई दवा नहीं जो काम के प्रेशर को कम कर सके। वहीं दूसरी तरफ आजकल के युवा सिगरेट पीने को अच्छा व्यक्तित्व समझने लगे हैं। जो सरासर बेवकूफी है। उनके हाथ में सुलगती सिगरेट उन्हें अपने-आप को सभ्य दिखाने का आभास कराती है। उन्हीं में से कुछेक मुंह में गुटखा दबाये मौका देखकर इधर-उधर थूक रहे थे। गुटखे के लाल रंग से जगह भी लाल-लाल सी हो गई थी, जहाँ गुटखे का थूक पड़ा था। सब अपनी मस्ती में मस्त थे। चाय की दुकान पर लोग अक्सर जिंदगी की परेशानियों को भूलकर हंसी-ठिठोली करने के लिए आते हैं। वहां एक साथ दो काम होते हैं, एक तो इंसान अपनी सारी परेशानियाँ भूलकर दोस्तों के साथ खुलकर हंसता है और दूसरा जिंदगी को नये नजरिये से देखता है।

अक्सर हम चाय की दुकान पर ताश खेलते या गप्पे मारते या हंसी-ठिठोली करते लोगों को देखते हैं। चाय की दुकान पर कभी भी संजीदा या उबाऊ वातावरण नहीं देखते। भारत में चाय की दुकान वो जगह है जहाँ लोग जिंदगी की परेशानियों को अक्सर भूल जाते हैं। लोगों को नये विचार या तो बाथरुम में आते हैं या गप्पे मारते दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर। घर की परेशानियों से लेकर देश की आर्थिक और राजनीतिक चर्चा चाय की दुकान पर ही खुलकर होती है।

उसने अपनी हिम्मत बढा़ई और रोज की तरह लोगों के सामने हाथ फैला एक-एक करके वह सभी के सामने हाथ फैलाता गया। कोई उसे दुतकारता था तो कोई उसे नजर-अंदाज कर देता था तो कोई उस पर तरस खाकर एक-दो रुपये की चिल्लर उसकी हथेली पर रख देता था। वह चुपचाप बिना कुछ कहे, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ जाता। उसके चेहरे पर कोई बदलाव नजर नहीं आता था। उसके खामोश चेहरे पर किसी प्रतिक्रिया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। लगता था जैसे उसका चेहरा इसी लाचारी भरे बेबस भाव में जम सा गया था। उसने वहां बैठे करीब-करीब सभी लोगों के सामने हाथ फैला दिए थे। जब वह चलता था तो उसकी जेब में रखे सिक्के खनखना उठते थे। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि आज उसे भीख में कितने रुपये मिले। इस बात का उसे कभी अफसोस नहीं हुआ। सभी के आगे हाथ फैलाने के बाद मिले सिक्कों को गिनते हुए एक दुकान वाले के पास पहुँचा और गुटखे-जर्दे के पाऊच खरीदे। बड़ी मात्रा में गुटखा-जर्दा खरीदने पर दुकानदार को अचंभा हुआ। मगर उसे क्या लेना-देना था। उसे तो अपनी कमाई से मतलब था। वह कुछ कहता मगर फिर वह अपने शब्द चबा गया। करीबन 80-100 रुपये की कीमत के उसने गुटखे, सिगरेट व जर्दा खरीदा था। फिर उसने अपनी फटी-चिथड़ी सी पेंट में अपना हाथ डाला और अपने साथ लाया दारु का पव्वा निकाला जो शायद सस्ती दारु का था। वह जाकर थोड़ी खाली सी जगह पर बैठ गया और पूरे नशीले पदार्थो का ढ़ेर लगा दिया। सभी लोग उसे कौतूहल की नजरों से देख रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करने जा रहा है। उसने वो दारु का पव्वा हाथ में लिया और उसका ढक्कन खोला। उसके ढक्कन खोलने का अंदाज ऐसा था जैसे वह रोज खोलता हो। उसकी हर क्रिया पर लोग नजर गड़ाये हुए थे। उसने वह पव्वा हाथ में लिया और भूखे इंसान की माफिक उसे घूरता रहा। उसे देखने वाले लोगों की बैचेनी बढती ही जा रही थी। गरीबी गलत आदतों एवं नशे की संगिनी होती है। सभी जानते थे इसलिए किसी ने उसे रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई। एक पन्द्रह वर्षीय नादान सा बालक इस तरह नशे का शिकार हो तो एकबारगी देखने वाले की रुह कांप जाती है। मगर गरीबी एवं अभाव से त्रस्त लोगों की जिंदगी का यह आम हिस्सा होता है।


वह कई देर तक उस पव्वे को घूरता रहा और गटागट सारे पव्वे को उन नशीले पदार्थो पर खाली कर दिया। उसे ऐसा करते देख लोगों का कौतूहल और बढ़ गया था। सब उसे टकटकी लगाये देख रहे थे। फिर उसने अपनी जेब से माचिस निकाली और एक तिल्ली सुलगाई। वह जलती तिल्ली के साथ उन गुटखे-तंबाकू को घूरे जा रहा था और फिर उसने जलती तिल्ली को उस ढेर पर छोड़ दिया। एल्कोहॉल और आग का तो जैसे याराना है। तिल्ली गिरते ही पूर ढ़ेर आग की लपटों में धधकने लगा। जिस दुकानदार से उसने यह सब खरीदा था उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। करीब सौ रूपये का गुटखा-जर्दा उसने एक ही पल में आग के हवाले कर दिया। सौ रूपये का सही उपयोग किया जाये तो एक इंसान दो वक्त भरपेट खाना खा सकता है। उस ढे़र के पूरा जलने तक वह वहीं बैठा रहा और ज्योंही वह राख में तब्दील हुआ। वह चुपचाप वहाँ से चला गया। लोग उसे जाते देखते रहे मगर किसी ने कुछ नहीं कहा ना कुछ पूछा।

ना जाने क्यों कोई जगह कभी-कभी इंसान को कुछ जगह इस कदर भा जाती है कि वह वहाँ बार-बार जाने को आतुर रहता है। पता नहीं वह कौनसी ताकत होती है जो उसे बार-बार वहीं खींच ले जाती है। उस लड़के के साथ भी यही था। आज फिर वह दोबारा कल की तरह सब के सामने हाथ फैला रहा था। आज फिर उसे वही दुत्कार, तरस या हथेली पर बेबसी के चिल्लर मिल रहे थे। गरीबी में रोटी से ज्यादा गालियाँ पेट भर देती है। आज भी उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं था। वही भाव शून्य चेहरा और वही फटे-पुराने, मैले-कुचैले चिथड़े। नहाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह हाल उसकी गरीबी के पूख्ता सबूत थे और प्रमाणित करते थे कि वह एक भिखारी है। आज फिर उसने भीख में मिले पैसो से पान-गुटखा, तंबाकू और नशीली सामग्री के अन्य पाऊच खरीदे। 80-100 रूपये की कीमत के इतने सारे पाऊचों की खरीद सुनकर दुकानदार आज फिर हतप्रभ रह गया था। गरीबी नशीली होती है और आदतन ऐसे लोग किसी भी तरह का नशा करने से परहेज नहीं करते। दुकानदार ने सोचा कल शायद किसी से झगड़ा हो गया होगा इसलिए गुस्से में इसने सारा सामान जला दिया होगा। दुकानदार ने बिना कुछ पूछे उसे करीब सौ रूपये की कीमत के गुटखे-तंबाकू के पाऊच दे दिए और अपने काम में व्यस्त हो गया।

उसने आज फिर से उन नशीले पदार्थों का ढे़र लगाया और पेंट की दूसरी जेब से सस्ती दारू का पव्वा निकाला और उसे घूरने लगा। कुछ देर घूरने के बाद गटागट उसे उस ढ़ेर पर खाली कर दिया और चंद सैकण्डो में ही उन सारे नशीले पदार्थों को आग के हवाले कर दिया। वह सारा नशा धूँ-धूँ कर जलने लगा। पहले सबके सामने हाथ फैलाकर भीख माँगना फिर उन पैसों से नशीले पदार्थ खरीदना और फिर उन्हें जला देना। उसके इस कार्य ने सभी के मन में कौतूहल पैदा कर दिया था। आखिर वह ऐसा क्यों करता था। उसके इस काम से लोगों को आश्चर्य भी होता था और खुशी भी। मगर खुशी से ज्यादा लोगों को आश्चर्य ही होता था।

हमारे देश में लोग मदद करने से ज्यादा तमाशा देखना पसंद करते हैं। तंबाकू के जलने से खाँसी पैदा करने वाला धुँआ होता है। जो दमघोंटू होता है। सभी तमाशाबीन होकर यह सब देखते रहे। ना तो किसी ने उसे ऐसा करने के लिए पूछा और ना ही उस दमघोंटू धुँए से होने वाली परेशानी के लिए कुछ कहा। बस देखते और चले जाते। यह सब चार-पाँच दिन तक लगातार चलता रहा। वह आता, पैसे माँगता, उन पैसों का नशा खरीदता और उन्हें आग के हवाले कर देता। एक कच्ची उम्र के बच्चे के इस कृत्य को देखकर सभी सोच में पड़ जाते थे। मगर कहता कोई कुछ नहीं था। वहीं पर कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के रोज आते थे और चाय-सिगरेट पीकर गप्पे मारते थे। उनमें से एक गुटखा खाता था। उसके पीले दांत भी इस बात की गवाही दे रहे थे। वो रोज उस बच्चे को ऐसा करते देखते थे। शायद उनमें से एक के दिमाग में कुछ चल रहा था। जो उसके चेहरे पर उभर आये भावों से साफ झलक रहा था। वह अपनी जगह से उठा और उस गरीब बच्चे की तरफ कदम बढ़ा दिये। वह गरीब बच्चा जो सिर झुकाये उन नशीले पदार्थों को जलता देख रहा था, कदमों की आहट सुनकर उसने अपना सिर उठाया।  देखा तो उसके सामने कोई खड़ा था। उस लड़के को सामने देखकर उस बच्चे के चेहरे के भाव शून्य रहे। उसके चेहरे पर डर का कोई भाव नहीं आया था। वह लगातार आँखों में आँखे डालकर उस कॉलेज के लड़के को देखता रहा। थोड़ी देर में पढ़ने वाले लड़के के दोस्त भी उसके पीछे-पीछे आ गये। उनमें से एक के हाथ में जलती हुई सिगरेट थी तो दूसरे के मुँह में गुटखा।
’’यह तुम क्या कर रहे हो।‘‘ पहले लड़के ने पूछा।’’तुम हर रोज पहले भीख माँगते हो फिर उन पैसों का यह खरीदकर जला देते हो। जलाने से अच्छा है किसी और को दो जो काम तो आयेंगें।‘‘ उनमें से दूसरे ने कहा जिसके मुँह में गुटखा था। इतने में तीसरा लड़का बोला जिसके हाथ में सिगरेट थी, ’’तुम्हारे तंबाकू जलाने की वजह से श्वास लेने में दिक्कत होती है। किसी को मारना चाहते हो क्या?‘‘ उसकी आवाज में रोष था।      
उसके इस रवैये का उस बच्चे पर कोई असर नहीं हुआ। उसने सिगरेट वाले की तरफ देखा और बोला, ’’यह भी तो एक दिन आपकी जान ले लेगी, कभी सोचा है।‘‘ बच्चे ने सुलगती सिगरेट की तरफ इशारा किया। उस बच्चे की बात सुनकर सिगरेट वाला लड़का निःशब्द हो गया। उसके बाद वह छोटा लड़का पहले लड़के की तरफ मुड़ा और बोला, ’’आई एम बर्निंग माय ड्रीम्स। आई एम सीइंग देट माय फ्यूचर इज बर्निंग। अपने सपने जला रहा हूँ, साहब।‘‘
लड़के के मुँह से अंग्रेजी सुनकर तीनों के चेहरे घोर आश्चर्य से भर गये। उनका मुँह खुला का खुला रह गया। एक भिखारी के मुँह से अंग्रेजी सुनकर उन्हें लगा जैसे दुनिया का कोई अजूबा सुन लिया हो। उसकी धारा प्रवाह अंग्रेजी सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई थी। उन तीनों ने अपने-आप को संभाला और बड़े ही प्यार से पूछा, ’’क्या नाम है तुम्हारा? और तुम रोज ऐसा क्यों करते हो?‘‘ कहकर तीनों उसके मुँह की तरफ ताकने लगे। सच कहते हैं लोग शिक्षा इंसान का सबसे खूबसूरत गहना है जो उसे सुंदर बनाती है। बच्चे के मुँह से अंग्रेजी सुनकर उन लड़को के निष्ठुर और बेरुखी के भाव बच्चे के प्रति दया और आत्मीयता में बदल गये थे। वह कुछ कहता इससे पहले उसकी आँखों में आँसूओं की छोटी-छोटी बू़ँदे निकल आई और उसके गालों पर लुढ़कती चली गई। उसकी आँखे अंधेरों को चीरती हुई भूतकाल में उसका वजूद टटोलने लगी। उस दिन उसने स्कूल से घर आते ही अपनी ट्रॉफी पापा के हाथों में रख दी थी। उसकी ट्रॉफी देखकर उसके पापा खुशी से झूम उठे थे। उन्होंने खुशी से झूमते हुए भविष्य को अपने हाथों में उठाकर कंधे पर बिठा लिया था और किचन की तरफ दौड़ पड़े।
’’देखा, सुधा। हमारा भविष्य पूरे स्टेट में पहली रैंक आया हैैै।‘‘
’’आखिर बेटा किसका है।‘‘ सुधा ने तारीफ करते हुए कहा जो किचन में उस वक्त चाय बना रही थी। अपने पापा के कंधो से उतरकर भविष्य अपनी माँ से जा लिपटा। माँ  ने उसे बांहे फैलाकर अपने आलिंगन में भर लिया और जीभर लाड़ किया। बस इन तीनों की छोटी सी दुनिया थी। जिसमें तीनों बहुत खुश थे। सुधा और कबीर भविष्य जैसा बेटा पाकर खुश थे तो भविष्य उन्हें अपने मां-बाप के रुप में पाकर बहुत खुश था। इतने में कबीर हाथ में शराब का गिलास ले आया था।
’’आज तो खुशी में दो पैग ज्यादा पीऊँगा।‘‘ इतना कहकर कबीर ने एक सिगरेट भी जला ली और ड्रेसिंग रूम में पड़े सोफे पर पसर गया और शराब की बोतल सामने पड़ी मेज पर रख दी।
’’आपको कितनी बार मना किया है, शराब-सिगरेट छोड़ दो। मगर आपको कोई फर्क ही नहीं पड़ता है।‘‘ किचन से सुधा बड़बड़ाती हुई आई।
’’अरे! बाबा। जिंदगी में क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जायेंगे। सब यहीं का यहीं रह जायेगा। जिंदगी एंजॉय करने के लिए होती है। मजे करने दो।‘‘ सुधा ने सिगरेट खोंसने की नाकाम कोशिश की।
’’अरे! यार तुम तो लड़ने पर उतारु हो गई। आज तो खुशी का दिन है। आज तो पीने दो। आज के बाद कभी नहीं पीऊँगा, सच्ची।‘‘ कबीर ने अपना अपराध स्वीकारते हुए कहा।
’’अपने बारे में नहीं तो कम से कम अपने बेटे के बारे में तो सोचो।‘‘ सुधा ने कबीर को समझाने की कोशिश की। ’’भगवान ना चाहे कहीं कुछ अनर्थ हो गया तो.......।‘‘
’’क्या तुम भी फालतू की बातें दिमाग में लाती हो। कुछ नहीं होगा मुझे और मेरे बेटे को, क्या कमी है। राज करेगा मेरा बेटा राज। मैं अपने बेटे को डॉक्टर बनाऊँगा, खूब पढ़ाऊँगा इसे।‘‘ कहते हुए कबीर के लफ्ज लड़खड़ाने लगे।
’’हाँ .....पापा। मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा और सबका इलाज करूंगा और आपका भी।‘‘ कहते हुए भविष्य अपने पापा के सीने से चिपक गया और कबीर ने उसे अपनी बांहों में समेट लिया।
’’पापा, मम्मी आपको रोज मना करती है। आप शराब और सिगरेट क्यों नहीं छोड़ देते। मुझे डर लगता है कहीं यह आपको मुझसे दूर ना ले जाये।‘‘
’’क्या तुम भी अपनी मम्मी की तरह डरते हो। मुझे कुछ नहीं होगा। देखो, मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ।‘‘
कबीर हर बार यही कहता आज के बाद फिर नहीं पीऊँगा। मगर फिर शराब पीने लगता। इंसान को किसी चीज की लत लग जाये तो वह फिर कभी नहीं छूटती। दिन-ब-दिन कबीर ज्यादा शराब और सिगरेट पीने लगा था। इसी वजह से अक्सर बीमार रहने लगा था। डॉक्टर रिपोर्ट से पता चला उसे कैंसर है और अंतिम स्टेज पर है। इंसान का मोह इतना ज्यादा होता है कि पता होने के बावजूद भी हम उसे बचाने में लगे रहते हैं जिसके बचने की कोई उम्मीद नहीं होती। कबीर के इलाज में सुधा ने पूरा पैसा लगा दिया था। उसने अपने गहने और घर तक भी बेच दिया था। इतना कुछ करने के बाद भी वह कबीर को नहीं बचा पाई। कैंसर की वजह से कबीर असमय ही काल का ग्रास बन गया था। कबीर के मरने के बाद सुधा उसका गम सहन नहीं कर पाई और जल्द ही एक दिन वह भी भगवान के पास चली गई।
आज का इंसान इतना निष्ठुर है। जब तक मां-बाप जिंदा है। हर रिश्तेदार बच्चे पर बहुत प्यार उड़ेलते है और मां-बाप का साया उठने के बाद कोई भी रिश्तेदार उस बच्चे का दामन थामने नहीं आता। सब बेचारा कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। अब तो भविष्य का भविष्य ही खत्म नजर आता था। उसके सारे सपने, सारे अरमान, हंसती-खेलती जिंदगी अंधेरे से घिर गई थी। वह खुद भविष्य था मगर उसके भविष्य का कुछ पता नहीं था। कुछ ही वक्त में उसकी जिंदगी अर्श से फर्श पर आ गई थी। उसकी आँखों से अब तो आंसू भी निकलना बंद हो चुके थे।
’’बस, साब। रोज इसी आग में अपने सपनों को जलता देखता हूँ। अपने भविष्य को जलता देखता हूँ। अपने-आप को जलते देखता हूँ। इसी नशे ने मेरे पापा को मुझसे छीन लिया। इसी नशे ने मेरी मां को छीन लिया। इसी नशे ने मेरी हंसती-खेलती जिंदगी को दर-दर की ठोकरे खाने को सड़क पर लाकर छोड़ दिया। लोगों को यही समझाने की कोशिश करता हूँ कि आपका नशा किसी के सपनों की जान ले रहा है। आपकी और आपके अपनों की जान ले रहा है।‘‘ कहते हुए उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे और आँखों से आज बेहिसाब आंसू झरने की तरह बह रहे थे।
उसकी कहानी सुनने के लिए वहां भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। सभी के हलक सूख गये थे। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था सिर्फ नम आंखों के सिवाय। सभी की आंखों के सामने अपनों का भविष्य दिखाई देने लगा था। कैंसर जैसी भयानक बीमारी इंसान की जिंदगी को त्रस्त कर देती है। खत्म कर देती है। जो लोग नशा करते थे उन्होंने अपना नशीला पदार्थ निकाल कर उस आग के हवाले कर दिया था। जिससे वह आग अब और धधक उठी थी। जिस लड़के ने अपने हाथों में सिगरेट ले रखी थी। उसने अपने पेंट की जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल कर आग के हवाले कर दिया था। उसे ऐसा करते देख कर एक बार फिर से भविष्य के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई।
लेखक  : राजकमल जोलन्दावाला
(सवाई माधोपुर, राजस्थान)

12 comments:

  1. Bahut badiya kahani likhi hain Rajkamal Ji, Shubhkamanaya

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  2. बहुत सुन्दर सन्देश देती कहानी

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  3. Thank you...Manisha ji and Ritu ji

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  4. अनिल कुण्डलवालMay 5, 2018 at 7:20 PM

    एक भाव विभोर...दिल को छू लेने वाली कहानी लिखने के लिए शुक्रिया...

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  5. आपकी अनमोल टिप्पणी के लिए सहृदय धन्यवाद।।

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  6. बहूत खूब राजकमल भाई जी।।

    अंशुल पारीक

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  7. बहुत बढिया कहानी है राजकमल जी

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  8. Raj kamal aage bhi aise hi story hume milegi padhne ko
    Or movies ki script likho koi movie ki story bhi likho hum chahte hai ki movie main tumhari story ho

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