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Tuesday, April 24, 2018

निकिता (कहानी) - लेखिका : मनीषा बनर्जी

टिंग टौंग टिंग टौंग की आवाज़ ने जब निकिता की नींद मे खलल डाली तो एकबार उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। ऑफिस से वापस आने के बाद किसी भी सूरत में उसे यह बात मंज़ूर न थी कि कोई उसकी नींद खराब करे। वह मन ही मन बौखलाई पर साथ ही ऊँघते हुए किसी तरह दरवाज़ा भी खोला। घंटी  बजानेवाला तो नहीं था पर हाँ, एक बड़ा फूलों का गुलदस्ता ज़रूर जमीन पर रखा था। निकिता को पहले थोड़ा आश्चर्य हुआ पर फिर उसका मिजाज बदला, दिल की धड़कन बढी और उसने गुलदस्ते को उठाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। 

गुलदस्ते में लाल गुलाब की कलियों के बीचं एक छोटा सा कार्ड भी था। लिखा था -’हैप्पी वैलेंटाइन डे - माइ लव। सी यू इन ऐन आवर्स टाईम। बी रेडी फॉर द पार्टी’’।  एक घंटे में! पर यह कौन हो सकता है? वह बोल पड़ी। उसने गुलदस्ते को बिस्तर पर रख दिया और एक नज़र घड़ी पर डाली। शाम के छः बज चुके थे। अलमारी खोलकर उसने लाल मिनी फ्राक खींच निकाली, जिसे पहनकर वह पहली बार दो साल पहले आज ही के दिन रोहित के साथ घूमने गई थी। पर वह पोशाक कई महीनों से यूँ ही अलमारी के एक कोने में दफन थी। पर अचानक निकिता ने खुद को जब आईने में गौर से देखा तो उसे भयंकर निराशा हुई। हाथ पांव   पर बाल उग आए थे। भौहों की रेखा बेढंगी हो गई थी और चेहरा भी रूखा बेजान सा हो रहा था। वह वॉशरूम की ओर लपक़ी। 

कौन हो सकता है? निकिता ने पॉव पर हेअर रिमूवर मशीन चलाते हुए सोचा। उसे गुलाब बेहद पसंद थे पर यह बात उसके अलावा और कौन जान सकता था। रोहित, या फिर उसकी सहेली कृतिका का भाई या फिर कोई और। पर गुलाब किसे भला पसंद नहीं होते। पल भर के लिए निकिता ने खुद को ही समझाया। उसने एक बार पांव को देखा फिर हाथों के बाल भी साफ किए। चालीस मिनट अभी भी बाकी थे। वह तेज़ी से भौहें बनाने लगी पर न जाने क्यो वह फिर भी खुद से खुश नहीं थी। एक मुद्दतं पहले तक कुछ और बात थी। निकिता में एक अद्भुत आकर्षण था। मोहल्ले के मर्द उसे एक नज़र देखने को बेताब रहते थे और उनमें से कुछ ने तो उससे डेटिंग का प्रयास भी किया था। पूरे मेकअप के बाद वह किसी मॉडल सी खूबसूरत तो नहीं पर हाँ  मनमोहक जरूर दिखती थी। 

इन दिनों निकिता को अपनी एकरूखी जिंदगी से अजीब सी चिढ़ हो गई थी। वही कॉल सेंटर की बारह घंटे की नौकरी। कभी देर रात घर लौटना तो कभी भरी दोपहरी में। अपने परिवार से अलग वह मुम्बई में रोज़ी कमाने के लिए अकेली ही रह रही थी। बत्तीस साल की उम्र में भी वह अविवाहित थी। इन कुछेक दिनों से उसे किसी मर्द से नज़दीकी बनाने की बात भी बेमानी लगने लगी थी। उसे तो यह भी होश नहीं था कि आज वैलेंटाईन डे है। हालाँकि  दफ़्तर में रोज़ बनते-बिगड़ते जोड़ो की चर्चा कल से ही तेज़ थी। काम से ज्यादा पार्टी, मेकअप और तोहफ़ों की ही बातें हो रही थीं। लेकिन निकिता ने वह सब सुनकर भी अनसुना कर दिया था। 

’शायद रोहित ही हो।’ निकिता ने चेहरे पर फेस पैक लगाते हुए सोचा। ‘पिछली ही शाम तो रोहित के साथ कैंटीन में मुलाकात हुई थी। वह देखकर मुस्कुराया था। हालाँकि  उसकी ऑखों में एक उदासी ज़रूर थी। निकिता को तो ऐसा ही लगा था। ’शायद वह नेहा से ऊब गया हो। हो सकता है वह वापस मेरे पास लौटना चाहता हो। नेहा जैसी बिंदास लड़की कितने दिन भला उसके साथ रहना चाहेगी।’ निकिता ने सोचा। उसने मुस्कुराकर मुँह  धो डाला। खुद को आइने में हर कोने से निहारा। अब वह पहले से बेहतर दिख रही थी। वह रोहित को फिर से मोहित कर लेना चाहती थी। आखिर रोहित उसका सहकर्मी था। उसने ही निकिता से करीबी बनाई और फिर साथ एक साल बिताकर दोनों ने मंगनी कर ली थी। लेकिन ठीक उसी समय उनके कॉल सेंटर में नेहा दाखिल हुई। वह निकिता से ज्यादा जवान और खूबसूरत थी। रोहित ने उसमें दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। निकिता को यह बात नागवार गुजरी और उसने मंगनी तोड़ दी। इकत्तीस साल की उम्र में मिले इस झटके ने निकिता को तोड़ दिया था। उसने जिंदगी भर अकेले रहने का फैसला कर लिया था। पहले की तरह सजना संवरना छोड़ दिया था। लेकिन आज मिले इसे तोहफे ने उसमें एक नर्ह आस जगा दी थी। ’अगर वह लौट आए तो मैं उसे माफ कर दूंगी ।’ निकिता ने निश्चय किया। 



लेकिन...ऐसा हो सकता है क्या? अब निकिता में वह बात भी तो नहीं रह गई थी। इन कुछ महीनों में उसकी अपने प्रति बेरूखी के नतीज़े दिखने लगे थे। बढ़ती उम्र हर कोने से झाँकने  लगी थी। आँखों  के कोनों में उभऱी झुर्रियाँ और चेहरे पर पड़ी झाईयाँ कुछ और ही कहानी बयान कर रहीं थी। तेजी से झड़ते बालों ने तो उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। चाल में वह पुरानी नजाकत न जाने कहाँ  गुम हो चुकी थी। किशोर और बच्चे उसे आंटी कहकर ही पुकारा करते। उसने रोहित की निजी जिंदगी को खंगालने के इरादे से उसका फेसबुक एकाउंट खोल लिया। थोड़ी ही देर पहले रोहित ने एक तस्वीर चढ़ाई थी जिसमें वह और नेहा हाथों में हाथ डाले खड़े दिख रहे थे। साथ ही उसने नेहा को वैलेंटाइन डे की मुबारकबाद देकर उसका साथ जिंदगी भर पाने की तमन्ना ज़ाहिर की थी। निकिता का सारा वहम भी इसके साथ ही खत्म हो गया। रोहित की वजह से जो जगहसाई निकिता की पहले हो चुकी थी उसे भूल पाना मुश्किल था। वह तो नौकरी भी छोड़ देना चाहती थी मगर इतनी बढ़िया तनख्वाह जब तक न मिले उसने रूकने का फैसला किया था। महानगरों के खर्चे उठाने के लिए अच्छी आमदनी चाहिए यह वह बहुत पहले ही समझ चुकी थी।

’रोहित नहीं तो फिर कौन है भला?’ निकिता ने फिर नए सिरे से सोचना शुरू किया। ’शायद समीर हो। इसी रास्ते पर तो आगे उनका घर है। कृतिका की शादी में मेरे ही साथ तो उसने डांस किया था। कृतिका की शादी से पहले उसे ऑफिस छोड़ने के बहाने क्या पता मुझे ही देखने आता हो। हाय हैल्लो भी करता था। कुछ न कुछ बातें भी हमेशा किया करता था जब कभी मुलाकात होती। वह क्या ऐसे ही करता होगा। वह समीर से क्या कहेगी यह उधेड़बुन कर ही रही थी कि उसे याद आया कि समीर तो कल ही काम के सिलसिले में पूना चला गया है। कृतिका ने ही तो उसे यह बात बताई थी। अब तो यह पक्का था कि यह गुलदस्ता भेजनेवाला कोई और ही है। वह उस अनजाने राजकुमार की तस्वीर अपने दिलो दिमाग में बुनने लगी। उसके रंग रूप कद काठी को लेकर फिर से अटकलें लगाने लगी और एक नई बेचैनी का आलम फिर से छाने लगा। 

अब सिर्फ दस मिनट ही बाकी थे। निकिता ने पहली बार गौर किया कि उसका घर किसी भी सूरत में मेहमाननवाज़ी के काबिल न था। उसका छोटा सा किराए का फ्लैट कचरे का ढेर मालूम दे रहा था। वह झट से बिस्तर की ओर लपकी। गंदी चादर निकालकर साफ चादर बिछाई, मेलखाते तकिए का कवर न मिलने पर झट से तकिए को चादर के नीचे ही घुसा दिया। खिड़की खोल दी। कोने में पड़े पुराने अखबारों और मैग्जिनों के ढेर को उसने पलंग के नीचे छुपा दिया। कल रात का आधा खाया पिज्ज़ा टेबल पर अभी तब पैकिंग समेत पड़ा था और पास रखी थी आधी खाली बीयर की बोतल। उसने उन सबको उठाकर कचरे के डब्बे के हवाले कर दिया। फिर बड़े ही करीने से उस अनमोल तोहफे को उस पर सजा दिया। वह अपनी सजावट पर निहाल हो चुकी थी। जब से रोहित से उसके रिश्ते खत्म हो गए थे उसने घर को सजाना ही छोड़ दिया था। वह फ्राक उठाकर तैयार होने ही जा रही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठी।

निकिता सकपका गई। इतनी जल्दी! उसके पांव  जम गए। वह तो अभी तक तैयार भी नहीं हुई थी और उसका राजकुमार उसे लेने भी आ चुका था। उसने स्कर्ट को हाथों में उठा लिया। मगर घंटी फिर से बज उठी। उसने न खोला तो घंटी फिर से बज गई। मिलने वाले की बेताबी ने उसे दीवाना बना दिया। उसने बालों को हाथों से ठीक किया। सूखे होंठो को जीभ से भिगोया फिर मोहक मुस्कान उस पर सजा ली और गाउन में खुद को अच्छी तरह से लपेटकर  दरवाज़े की ओर लपकी। 

सामने एक तीस पैंतीस साल के करीब उम्र का आदमी खड़ा था। उसने काले रंग का कोट पैंट पहन रखा था। उसके कपड़ों से विलायती इत्र की खुश्बु आ रही थी। निकिता का चेहरा लाल सुर्ख हो गया। उस छः फुट लम्बे और खूबसूरत आदमी को तो उसने पहले भी अपनी इमारत की लिफ्ट के आसपास देखा था। महसूस किया था कि वह भी एक बार उसकी ओर देख ही लेता था। मगर बात इतनी दूर तक निकल आएगी यह निकिता अपने ख्वाबों में भी सोच नहीं सकती थी। ऐसा आदमी उसे चाहेगा और प्यार का इस तरह इज़हार करेगा यह सोचकर वह रोमांचिंत हो उठी। रोहित को खो देने का अब उसे कोई गम न था। वह उसके मुंह  से कुछ अच्छा सा सुनने के लिए बेताब थी कि उस आदमी ने ही मॉफी माँगते हुए पूछा -“अभी थोड़ी देर पहले कोई फूलों का बूके आपके दरवाज़े पर रख गया था?“ 
“हॉ।“ निकिता ने आगे सुनने की आशा में हड़बड़ाकर कहा।
“दरसल गलती से, डेलीवरी बॉय आपके यहॉ दे गया।“
“गलती से?“
“मैडम वह बूके, मैंने ही आर्डर किया था। लेकिन वह फूलवाले के यहां जो गंवार सा लड़का काम करता है। वह नंबर समझा नहीं और सामनेवाले की जगह आपके यहां  रख गया। मुझे अभी पता चला कि वह सामने वाली मैडम को मिला नहीं तो फिर मैंने दुकानदार को फोन किया और ....“ 
निकिता क्या कहे। उसने लाकर वह गुलदस्ता उस आदमी को पकड़ा दिया। 
“मैडम, कार्ड।“ उसने कहा। 
निकिता बिना कुछ कहे कार्ड लेने के लिए अंदर गई और जब लौटी वह आदमी सामने वाली औरत के कमर में बाँहे डाले हँस हँसकर बातें कर रहा था। दोनों एक दूसरे में इस कदर खोए थे कि निकिता के आने का उन्हें पता ही न चला। निकिता ने कार्ड उसकी ओर बढ़ाया और उसके लेते ही तेज़ी से दरवाज़ा बंद कर दिया। वह कुछ देर खामोश रही फिर खिलखिलाकर मुस्कुरा दी। उसके बाद लाल स्कर्ट को उठाकर नीचे जमीन पर फेंक दिया और बिस्तर पर लेट गई। वह कुछ देर तक खाली दीवारों को ताकती रही फिर बिलख-बिलख कर रो पड़ी। शाम भी तब तक ढल चुकी थी। 

लेखिका : मनीषा बनर्जी 
(पालघर, महाराष्ट्र)

2 comments:

  1. प्यार के एहसास को जिंदा करने के लिए शुक्रिया...आपकी कहानी ने एक बार फिर दिल की तन्हाई को छेड़ सा दिया है....एक सुखद एहसास

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