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Wednesday, April 4, 2018

परित्यक्ता (कहानी) - लेखक : हिमांशु मिश्र 'मानस'

"ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग........" अचानक बज उठे फ़ोन ने उसकी तन्द्रा भंग की। कुछ हर्ष की फुहारें उसके हृदय की प्रफुल्लित करने लगी ।
 "हेल्लो! " शीघ्रता में और उल्लास के आधिक्य में फ़ोन का रिसीवर उठाने का प्रयास करती वो अपनी सुधबुध खो रही थी , तभी तो रिसीवर छूट कर नीचे गिर गया फिर भी स्वभावतः उसके मुख से अनायास ही ये शब्द निकल पड़े। अपनी गलती को सुधारती हुई वो जैसे ही रिसीवर को कान के पास लायी उसे परिधि की चहकती हुई आवाज सुनाई दी "......... लौट आयी हूँ , कैसा लगा बस पूछो भी मत । अभी फ्रेश होकर कुछ रस्में करनी है फिर परसों शाम तक मैं वहां आ जाऊँगी। अपना ख्याल रखना , चलती हूँ । बाय... ।" उसके होंठ अनायास ही कुछ कहने को खुले लेकिन ह्रदय की बात मुख तक आते आते शायद निस्तेज हो चुकी थी , अतः इससे पहले की उसे कुछ कहने का समय मिलता दूसरी तरफ से फ़ोन कॉल विच्छेदित हो चुकी थी । "थकी होगी बेचारी, आराम करना चाहिए उसे ।" स्वयं को भरोसा दिलाते हुए वो निःस्पृह भाव से अपने अपूर्ण कार्यो की समीक्षा करने लगी । तभी अचानक द्वार पर दस्तक हुई , अन्मयस्क होते हुए वे द्वार की ओर बढ़ी तो द्वार पर डाकिया खड़ा था । "पूर्णिमा रॉय जी के नाम चिट्ठी है " चेहरे पर कोई भी भाव न लाकर वो बोला , शायद ये उसके व्यावसायिक प्रशिक्षण का हिस्सा था, जो उसने बिना लाग लपेट सीधे अपनी बात कह दी। "जी! मैं ही हूँ पूर्णिमा " आगे बढ़ते हुए वो बोली । "ये चिट्ठी आयी है आपके नाम पर" चिट्ठी पर अपना नाम पढ़ने को उसे चश्में की जरुरत नहीं थी । उसने अपनी उम्र को सिरे से नकार रखा था अभी तक उसका ऐनक बस कभी कभार ही प्रयोग में आता था , वो अपने सारे काम भी इतनी चुस्ती के साथ करती थी की नौजवान भी शर्मा जाये । जब तक वो अपना नाम पढ़कर पत्रवाहक से कुछ और पूछती वो जा चुका था। दरवाजा बंद करके वो उस लिफाफे को को देखने लगी और भेजने वाले का कोई चिन्ह ढूंढने लगी । डाक विभाग की ही मुहर थी ,ये पत्र उसके कार्यालय से आया था । विभाग को उसकी सुध आ ही गयी, मन ही मन सोचते हुए वो थोड़ी खिन्न सी हो गयी , जिस विभाग को उसने अपना पूर्ण जीवन दे डाला वही विभाग उसके अस्तित्व को नगण्य मान रहा है | वैसे भी अभी घर में करने को कुछ खास शेष न था , अतः उसे अपने कार्यालय की याद आ रही थी| कैसे वो अपना दिन का पूरा समय वहां बिताती थी , कभी यहाँ नहीं आना होगा ये ख्याल भी मन में न आया था उसके | खैर अब वो समय आ चुका था पूर्णिमा बसंत के मौसम में सूख गये पात के सम पास पड़ी एक कुर्सी पर ढह सी गयी जैसे किसी जर्जर इमारत के भग्नावशेष तूफानों में यकायक ही अपना आधार छोड़ देते है | उसने अपनी आदत के अनुसार तेज तेज पत्र को बांचना प्रारंभ कर दिया
 “सेवा में ,
श्रीमती पूर्णिमा रॉय ,
वरिष्ठ लिपिक, 
प्रधान डाकघर 
इलाहबाद 

विषय: सेवानिवृत्ति समीक्षा एवं आपकी मासिक वृत्ति स्वीकार्यता के सूचनार्थ 
 महोदया,

जैसा की आपको विदित ही होगा की आपने डाक विभाग में लिपिक के पद पर स्वेच्छा से कार्य न करने का निर्णय लिया | आपके स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के इस निर्णय का विभाग स्वागत करता है और आपके इस निर्णय को स्वीकार करता है जैसा की आपको इस से पूर्व सूचित किया जा चुका है| आपने अपनी मासिक वृत्ति हेतु जो ज्ञापन प्रधान डाक अधीक्षक इलाहाबाद को दिया था , उसे संज्ञान में लेकर विभाग द्वारा उस पर कार्यवाही की गयी है | आपका योगदान विभाग के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण है और उसे भुलाया नहीं जा सकता | 
आप को आदेश दिया जाता है , आप अपने कार्यालय में सम्बंधित अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर शेष  प्रक्रियाओं को पूर्ण करने में सहयोग करे एवं विभाग की प्रक्रिया को सुचारू रखने में सहायक हों|
हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते है |


द्वारा :
अधीक्षक 
प्रधान डाकघर 
इलाहाबाद 



“ लो इनको याद आ गयी अंततः “ वो मुस्कुरा कर सामने को देखती हुई बोली और एक क्षण को स्तंभित सी हो गयी फिर अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोली “ अब कोई नहीं है आपकी बकवास सुनने वाला पूर्णिमा जी ! अब स्वयं ही बोल लो स्वयं को ही सुना लो “ कह कर स्वयं पर ही हंसती हुई वो अपने विचारो की उस दुनिया की सैर को निकल ली जो उसके मानस पर निरंतर बिम्बित हो रहे थे |





“ अरे सुनते हो विशेसर........... ! अरे कहाँ मर गयी रे कुलाक्षिणी ......! जा जाकर अपने बाबूजी को बुला तो ला “ अपनी खटिया पर बैठी फूलमती देवी अपने जन्मजात शान से भरे व्यवहार के साथ बोल रही थी | घर के पीछे से निकल कर सावित्री अपने पिताजी को बुलाने को लपक ली | “विशेश्वर बाबू गोपालगंज के बड़े ब्राम्हण कुल में पैदा हुए और वहां के बड़े कपडे व्यवसायी थे “ पिता की मृत्यु के समय उनकी माताजी और एक पुराने टूटे घर के अतिरिक्त उनके परिवार वालो से उन्हें कुछ न मिला किन्तु उनकी साहसी माता ने उनका अवलंब बन ज़माने से दो-दो हाथ किये और अपनी मेहनत, मिलनसार व्यक्तित्व एवं मातृप्रेम से वो सफलता की सीढियां चढ़ते गये| आज बाजार बंद था इसलिये घर की बैठक में बैठे कुछ चिंतन कर रहे थे तभी उनकी मंझली पुत्री ने उन्हें आकर दादी के बुलाने की सूचना दी | विश्वेश्वर बाबू यूँ तो बड़े सुलझे हुए व्यक्तित्व के स्वामी थे किन्तु अपनी माताजी की बात आते ही वो तर्क और विचार करना बंद कर देते थे , उनके लिये माँ की इच्छा देव इच्छा थी, माँ का आदेश जरूर पालित होना चाहिए चाहे जान भले ही निकल जाये | आज माँ की तबियत जरा ख़राब थी इस लिये अपनी दोनों बेटियों को उनका ध्यान रखने का विशेष आदेश देकर बैठे ही थे की माँ का बुलावा आ गया | तेज कदमो से अन्दर को लपके “ हाँ माँ! आप बुलाई हैं का ?” फूलमती देवी पान चबाते हुए बोली “ कहाँ व्यस्त रहते हो आज कल ? घर का कुछ खबर रहता है की नहीं तुमको ?” विश्वेश्वर बाबु इस प्रश्न से अचंभित हो गये और माँ की ओर एक प्रश्नवाचक दृष्टि बढाई जिसे समझ कर फूलमती देवी बोली “ इस कुलक्षिणी का कुछ सोचे हो ? बांस के जैसे बस बढ़ते ही चली जा रही है | सोलह बरस की हो गयी है , और इही बरस स्कूल ख़तम हो जाई फिर का करोगे इसका ?”  विश्वेश्वर बाबू इस प्रश्न से यद्यपि चौकन्ने तो हुए किन्तु माँ की बातो की सारगर्भिता का मनोनयन कर पाने में सफल नहीं हुए और माँ की चिन्ताओ से उनके मस्तक पर उभरी विषाद की रेखाओ को अनदेखा कर कर बोले “ आपकी बात तो ठीक है माँ लेकिन अभी तो अपनी बड़ी बहन के बाद सावित्री का क्रम है , लड़के देख रहे है , जैसे ही कोई ढंग का लड़का देखते है आपको बताएँगे “ विश्वेश्वर बाबू अपनी माँ की जिस बात को शब्दों में हेर फेर समझ रहे थे , वो उनकी गलती थी और उनकी इस प्रतिक्रिया से फूलमती देवी का पारा सातवें आकाश में था 
“... तो तुम चाहते हो की हमारा हाल भी रामवती जैसा हो , या महेंद्र जैसा | हम इस कुलक्षिणी के साथ इस घर में अकेले , अरे न बाबा न | अरे हम को भी खा जायेगी , यही चाहते हो का तुम ?” अरे बहुरिया तो हीरा थी हमारी और लल्ला हमारा, ...... इसके साथ जो भी रहेगा उसको ही हजम कर जायेगी ये “ विश्वेश्वर बाबू अपनी माँ की इन बातो का विरोध नहीं कर पाये “ ... हम जल्दी ही कुछ करते है , आप परेशान मत होइयेगा “ कहकर वो भी बाहर को निकल गये, और एक जोड़ी आँखे ये सब दृश्य देख रही थी , घर की पिछली कोठरी के दरवाजे से छुपकर | आँखों से एक आंसू टपक पड़ा, जिससे संभल कर वो अनमने ढंग से पुनः किसी की नजर में आये बिना ही घर के अन्य कामो में निरत हो गयी | ये आँखे किसी और की नहीं विश्वेश्वर बाबू की छोटी बेटी पूर्णिमा की थी | विश्वेश्वर बाबू की ये चौथी संतान थी जिसके जन्म के तीन महीने बाद उनकी पत्नी हैजे की चपेट में आ गयी और यमराज के सानिध्य में मृत्युलोक छोड़कर चली गयी | इस नन्ही सी जान को तब से ही हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था किन्तु इस ३ माह की बालिका को क्या पता की प्रेम और नेह के बंधन से जुड़े ये नाते झूठे है और समाज की इन झूठी मान्यताओ की शिकार होकर वह अपनी माता की मृत्यु की जिम्मेदार बना दी गयी | पूरे परिवार से नेह न मिला क्योंकी उसकी बड़ी बहनों को दादी ने विशेष सुझाव दिये थे | किन्तु उसकी दादी उससे उसके भाई का प्रेम न छीन पाई| 
सारे परिवार के प्रेम से विवंचित उस बालिका की इस अभीप्सा को उसके भाई और विश्वेश्वर बाबू की दूसरी संतान महेंद्र ने पूरा किया | ४ वर्ष की आयु तक उसका ख्याल रखने वाला महेंद्र भी एक दिन नदी नहाने गया और कभी नहीं लौटा लेकिन जो आया वो था बस एक अभागन होने का दाग जिससे पूर्णिमा किशोरवय तक जूझ रही थी | उसकी बड़ी बहन छाया का विवाह २ वर्ष पूर्व ही हो चुका था और विश्वेश्वर बाबू सावित्री के विवाह हेतु प्रयत्नशील थे किन्तु अब माँ का आदेश शिरोधार्य कर उन्होंने एक सजात्य कुल को ढूंढ ही निकाला | आरा के प्रसिद्ध बर्तन व्यवसायी विक्रम शील के एकलौते पुत्र के साथ सावित्री का एवं उनके चचेरे छोटे भाई कन्हैया लाल के चौथे पुत्र के सह अपनी पुत्री पूर्णिमा का विवाह करवाना सुनिश्चित किया | किन्तू दैव की प्रपंचना रची जा चुकी थी जिसमे पुनः छली गयी पूर्णिमा| विवाह के दिन डोली घर से कुछ दूर ही गयी थी की पिता हृदयाघात के कारण अन्य लोक की यात्रा पर चल दिये| अब घर पर दादी का शासन था , वोही दादी जिन्हें उसका चेहरा देखना भी नहीं स्वीकार्य था | पिता के अंतिम दर्शनों को तरसी पूर्णिमा अब कभी मायके न जाने की कसम ले चुकी थी , विवाह के कुछ ११ मास पश्चात ही उसे एक पुत्री की प्राप्ति हुई किन्तु घर में पुत्रमोही लोगो को ये बहुत ही दुखद समाचार लगा और इस दुःख से दुखित होकर उसके पति ने बहुत अधिक जहरीली मदिरा का सेवन किया और उनके प्राणों ने उनपर कुठाराघात कर दिया जो की परिलक्षित हुआ पक्षाघात के रूप में| और इसके साथ ही समाप्त हुआ पूर्णिमा का आंशिक सुख का समय | अब उसका साथ देने को उसके साथ खड़ा होने को और उसका अवलंब बनने को कोई न था | पति का उपचार आरम्भ होते होते उसे अनिष्ट का भान होने लगा था जो उस क्षेत्र के सभी के अगले दिन साकार रूप में उसके समक्ष खड़ा हो गया | “ इस कुलक्षिणी को निकालो इस घर से “ कोई कह रहा था “ ये वंश नाश कर देगी हमारा , जन्म हुआ नहीं और पिता को खा ही जाने वाली थी, डीह वाले बाबा की कृपा से बच गया है वो “ अभी उसकी पुत्री के लिये भिन्न भिन्न उपालम्भ सुनाई पड़ने लगे थे उसे “डायन बच्ची का शरीर लेकर आयी है” “गंगा में बहा दो कुलक्षिणी को” लेकिन उस नन्ही सी जान को स्वयं से दूर न होने दिया उसने क्योंकि उसे आगे होने वाली घटनाओं का आभास हो गया था| और उसकी यही कार्यप्रणाली उसके चरित्र को सहज शत्रु बना गयी इस समाज का| अपने चरित्र पर लगे लांछन भी जब वो खून के आंसू रो कर सह गयी तब उसे पुत्री को त्यागने अथवा उस घर को छोड़ देने का फरमान सुनाया गया | उसके ऊपर वज्रपात सा हो गया था , और सैकड़ो प्रश्न थे उसके समक्ष जिसका उत्तर उसके पास न थे, कहाँ जायेगी? कैसे रहेगी? क्या करेगी? मायका वो छोड़ आयी थी , ससुराल वो जा नहीं सकती थी | ऐसे में अपनी पुत्री के सहित वो गंगा की गोद में समाने आ पहुंची , किन्तु वहां उपस्थित एक संत ने न सिर्फ उसे बचाया बल्कि जीवन की एक दिशा भी दी | वे ही उसे पुत्रीवत रखने लगे और अपने सहित ही अपने निवास इलाहाबाद ले आये | डाक विभाग में एक पद की रिक्तियाँ ज्ञात होते ही उसने आवेदन किया और उसका चयन हो गया , और वो अपनी पुत्री के सहित स्वावलंबन की वो जिंदगी जीने लगी जो कुछ समय पूर्व तक वो सोच भी नहीं सकती थी | तबसे उसने जो भी किया अपनी बेटी परिधि और उसके सपनो के लिये किया | अपनी पूरी आय का सबसे बड़ा हिस्सा वो उसकी खुशियों पर खर्च करने लगी | उसके सुन्दर भविष्य को वह स्वयं से जोड़ कर देखती , और उसे संजोने का हर संभव प्रयास करती | इसीलिये जब उच्च शिक्षा को परिधि बड़े शहर में जाने की आकांक्षी हुई तो उसने एक बार भी नहीं सोचा और ऋण लेकर उसे वहां भी सभी सुविधाओं को उपलब्ध करवाने का भरसक प्रयास किया | उसका ये प्रयास रंग भी लाया , अब परिधि एक बहुराष्ट्रीय संस्था में कार्य करती थी और उसने वही पर अपना जीवन साथी भी चुन लिया | अपनी बेटी के सपनो को ही अपना स्वप्न समझने वाली पूर्णिमा ने इस पर एक बार भी सोच-विचार किये बिना इसे स्वीकृति दे दी और अपनी बेटी का विवाह धूमधाम से करवाया | यथासाध्य हर वस्तु का उत्तम प्रबंध किया, हालाँकि उसकी मासिक आय से बचत संभव नहीं थी इसलिये विवाह की पूँजी के लिये ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली जिससे उसे बहुत धन मिला जो विवाह की तैयारियों के लिये आवश्यक था किन्तु उपहारों के लिये अभी भी धन की कमी थी | इसी चिंता में वो बैठी हुई थी तभी परिधि वहां आयी और माँ से विवाह की तैयारियों की जानकारी लेने लगी और जब उसे यह पता चला की उपहारों के लिये धन नहीं बचा है तो उसका मन उचाट होने लगा और उसने एक विकल्प सुझाया जो धन की आवक सुनिश्चित कर सकता था और वो था उनके घर का विक्रय | इस बार एक बार तो पूर्णिमा भी सोच में पड़ गयी किन्तु बेटी के विवाह के लिये उसे ये बलिदान देना भी सहर्ष स्वीकार था, आखिर उसकी आशायें उसकी बेटी के साथ थी| बेटी को ब्याह कर गये एक सप्ताह हो चुका था और पूर्णिमा की निश्चिन्तिता भी बढती जा रही थी , तभी तो वह परिधि के स्वागत की तैयारियों को छोड़ कर अपनी पिछली स्मृतियों में गुम थी, और उसी कुर्सी पर निद्रा का आनंद उठाने लगी थी|

परिधि को अकेला आया देख वो विस्मित रह गयी “ जमाई बाबू नहीं आये बेटा!” परिधि का 
 मन थोडा खिन्न था , तभी वो भावरहित होकर अपने विषाद को छुपाती हुई बोली “नहीं माँ वो महीप को कुछ काम था इसलिये वो नहीं आ पाये| छुट्टी तो मेरी भी नहीं थी लेकिन कुछ सामान यहाँ छूटा हुआ था उसे ले जाना आवश्यक था|” 
“क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है ना?” पूर्णिमा परिधि के मनोभावों को पढ़ती हुई बोली 
परिधि के मानस में भरा हुआ विषाद अब चरम पर पहुँच चुका था जो ज्वालामुखी के लावे की भांति पूर्णिमा की भावनाओ को जलाने को बह निकला “ माँ आप ने बचपन से कभी मेरी खुशियों का ख्याल नहीं रखा, सदैव पैसो के पीछे भागती रही आप“
पूर्णिमा का मुख खुला का खुला रह गया था “ क्या बोल रही हो बेटा? हुआ क्या आखिर?” उसकी बेटी ने उसकी तपस्या को कटघरे में खड़ा कर दिया था विस्मय तो होना लाजमी था उसे|
“ माँ आपने कितने घटिया उपहार भिजवाये मेरी ससुराल में, सब आपस में बाते कर रहे थे| मम्मी जी ने तो सारे नौकरों में बाँट दिये” परिधि चिल्ला रही थी|

पूर्णिमा हतप्रभ थी “ लेकिन बेटा मैंने तो सबसे अच्छा ही चुना था तुम्हारे लिये “ परिधि का आक्रोश उसके मोह से भरे हुए दंभ को प्रतिबिंबित कर रहा था “ अगर आप को पैसे बचने का इतना ही शौक था तो मुझसे कहती , अगर आप के पास पैसे नहीं थे तो मुझसे ले लेती .............” परिधि कहे जा रही थी लेकिन पूर्णिमा का ध्यान अब उसकी बातो पर नहीं था | जिस बालिका के लिये उसने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था उसकी ये बाते उसे समाज का आइना दिखा रही थी | परिधि अपना सामान लेकर निकल चुकी थी आज उसकी वर्षों की तपस्चर्या का फल उसे मिल रहा था | एक बार फिर उसका परित्याग कर दिया गया था | भले ही मानसिक सही | उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी, जिह्वा विह्वल थी, दृष्टी धूमिल हो रही थी , अब उसे सहारे के लिये छड़ी और देखने के लिये ऐनक की जरुरत थी| 

लेखक : हिमांशु मिश्र 'मानस'

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