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Thursday, April 19, 2018

सब ग़ायब है - #व्यंग्य

पिछले कुछ दिनों से सुनने में आ रहा है की देश में ATM से कैश ग़ायब है। देश में ग़ायब होने की बहुत पुरानी परंपरा रही है।  पुराने समय की कहानियों में भी ऐसे जासूस होते थे जिन्हें अय्यार भी कहा जाता था उनके पास ग़ायब होने की शक्ति होती थी, पलक झपकते ही गायब हो जाया करते थे।  कभी जादू से तो कभी किसी तरह धोका देकर ग़ायब होने के बहुत तरीक़े हुआ करते थे।  समय के साथ साथ ग़ायब होने की परंपरा का विस्तार होता गया।  वर्तमान में ग़ायब होना एक आम बात हो गई है भले ही उसकी वजह से कई बड़ी समस्याएं आ खड़ी हो तो क्या फ़र्क़  पड़ता है आखिर ग़ायब होना तो  प्राचीन परम्परा है इसे विलुप्त थोड़ी होने दिया जा सकता है। 
अपने आसपास नज़र दौड़ाइए आपको बहुत कुछ ग़ायब मिलेगा। ATM से कैश ग़ायब है। सरकारी स्कूल/कॉलेज में टीचर ग़ायब हैं।  टीचर इसलिए ग़ायब नहीं कि वो कामचोर हैं बल्कि इसलिए ग़ायब हैं क्योंकि टीचर के पदों पर भर्ती ही नहीं की गई।  जिन पर भर्ती करने की ज़िम्मेदारी है वो न जाने कहाँ ग़ायब हैं ? अस्पतालों से डॉक्टर और दवायें ग़ायब हैं। अस्पताल से याद आया आज भी देश में कई गांव ऐसे भी हैं जहाँ से अस्पताल ही ग़ायब हैं (क्योंकि कभी बने ही नहीं थे) । राशन की दूकान से ग़रीबों का राशन ग़ायब हो जाता है। बुज़ुर्गों को पेंशन मिलना बंद हो जाती हैं क्योंकि अचानक उनकी फाइल ग़ायब हो जाती है।  चुनाव जीतने के बाद नेताजी अपने क्षेत्र से पांच साल के लिए ग़ायब हो जाते हैं।  नेताओं द्वारा जिन परियोजनाओं का उद्धघाटन किया जाता है, नेताजी परियोजना का भूमिपूजन करने के बाद ग़ायब हो जाते हैं परियोजना पर काम तो शुरू होता नहीं है कुछ समय बाद उद्धघाटन के समय लगाया गया नेताजी के नाम वाला पत्थर भी ग़ायब हो जाता है। विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे लोग देश का पैसा खाकर ग़ायब हो रहे हैं।  दाऊद इब्राहिम तो सालों से ग़ायब है।
राजनैतिक रसूक वाले अपराधी अदालत से बरी हो जाते हैं क्योंकि गवाह और सबूत ग़ायब हो जाते हैं या शायद कर दिए जाते हैं अब ये मत पूछना की गवाह और सबूत कौन ग़ायब करता है या करवाता है।  रसूकदार व्यक्ति के खिलाफ शिकायत करने वाला व्यक्ति ही अक्सर ग़ायब हो जाता है या कर दिया जाता है।  सरकार द्वारा जनता के कल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का पूरी तरह क्रियान्वयन नहीं हो पता क्योंकि उसके लिए जो करोड़ों रुपये की निधि जारी की जाती है वो ग़ायब हो जाती है, शायद ग़ायब होकर किसी दूसरे आयाम में पहुंच जाती होगी। देश हज़ारों ऐसे परिवार हैं जिनके सर से छत ग़ायब है।  गरीब की प्लेट से खाना ग़ायब है। अन्नदाता कहलाने वाले किसान के घर  से अन्न गायब है। जनता का चैन सुकून ग़ायब है। जनता से याद आया अच्छे दिन नाम की एक चीज़ के बारे में काफी चर्चा होती थी वो भी ग़ायब है सिर्फ उसका नाम ही सुना है कभी कहीं नज़र नहीं आती। 

गरीबों का गरीबी रेखा की लिस्ट  ग़ायब हो जाता है।  चुनाव में कई लोगों का वोटर लिस्ट से नाम ग़ायब हो जाता है।  कई बार तो चुनाव परिणाम के बाद उम्मीदवार ही शिकायत करते हैं की उनको मिले वोट ही ग़ायब हो गए।  मीडिया से असली ख़बरें से ग़ायब हो जाती हैं।  पहले मीडिया निष्पक्ष हुआ करता था अब वो निष्पक्षता कहाँ ग़ायब हो गई गई पता नहीं।  अख़बारों से ख़बरें ग़ायब हैं और विज्ञापन ज़्यादा हैं।  कभी कभी तो खबरों और विज्ञापनों में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है।  जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे ग़ायब हो जाते या ग़ायब कर दिए जाते हैं उनकी जगह फ़िज़ूल के मुद्दों आगे लाया जाता है। जंगल / पेड़ ग़ायब हो रहें हैं जिसकी वजह से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है।  पर्यावरण दिवस पर नेताजी पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेकर कहाँ ग़ायब हो गए पता नहीं।  इन्साफ मिलने की उम्मीद लिए ग़रीब अदालत और पुलिस थानों के चक्कर काट काटकर दुनिया से ग़ायब (अलविदा) हो जाता है।
फेसबुक, ट्विटर सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों के द्वारा देशसेवा करने वाले लोग केवल ऑनलाइन ही नज़र आते हैं वास्तविक जीवन में वो कहाँ ग़ायब हैं शायद खुद उन्हें भी नहीं मालूम। सवाल पूछकर संसद से नेता ग़ायब हो जाते हैं। जिन पर देश की ज़िम्मेदारी है वो अक्सर संकट के समय देश से ग़ायब हो जाते हैं। सरकारी नौकरी की भर्ती के लिए बेरोज़गारों से फीस लेकर फॉर्म भरवाए जाते हैं।  फार्म भरने के बाद परीक्षा ही ग़ायब हो जाती है और अगर परीक्षा हो भी जाती है ये तो उसका परिणाम ग़ायब हो जाता है। राजनीति से ईमानदारी और नैतिकता को ग़ायब हुए तो एक अर्सा बीत चूका है, थोड़ी बहुत जो शर्म बाक़ी थी अब तो वो भी ग़ायब हो चुकी है  ।  बिला वजह बड़े बड़े भाषण देने वाले अक्सर महत्वपूर्ण मुद्दों पर खामोश रहते हैं क्योंकि शायद उस वक़्त उनकी ज़बान ग़ायब हो जाती है।

ग़ायब  होना या ग़ायब करवाना एक तकनीक है कला है।  अगर आपके मन में अनिल कपूर की फिल्म मिस्टर इंडिया वाली तकनीक (Technology) होने का ख्याल आ रहा है जिसमे वो एक गैजेट की मदद से ग़ायब हो जाता था तो माफ़ कीजियेगा आप गलत सोच रहे हैं क्योंकि ये तकनीक उससे काफी अलग है।  इसमें किसी गैजेट की ज़रूरत नहीं पड़ती और न किसी तरह के जादू की ज़रूरत होती है।  इस तकनीक को सीखना हर किसी के बस की बात नहीं है।  बड़े बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं इसे सिखने के लिए।  में भी ये ग़ायब करने वाली तकनीक / कला सीखना चाहता हूँ।  देश दुनिया में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हे में हमेशा के लिए ग़ायब कर देना चाहता हूँ।  क्या क्या ग़ायब करना है उसकी पूरी लिस्ट तैयार कर रखी है मैंने। अशिक्षा, बेरोज़गारी, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, बेईमानी साम्प्रदायिकता, हिंसा, भेदभाव, अपराध, आतंकवाद, ज़ुल्म, तानाशाही ये सब चीज़ें देश और दुनिया से हमेशा के लिए ग़ायब कर देना चाहता हूँ।  काश ये ग़ायब करने वाली तकनीक कहीं सिखने को मिल जाये।  काफी समय से तलाश में हूँ अगर आपको इस तकनीक बारे में जानकारी मिले तो मुझे ज़रूर बताइयेगा खुद भी सीखकर इन सब चीज़ों को देश और दुनिया से ग़ायब करने की कोशिश कीजियेगा।  
 शहाब ख़ान  
©Nazariya Now
  

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