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Thursday, April 12, 2018

तोता-मैना की नई कहानी... - लेखक : आशीष श्रीवास्तव (स्वतंत्र पत्रकार)

जंगल में फलदार आम के पेड़ पर तोता-मैना प्रेम से रहते थे। कभी पेड़ पर लुकाछिपी खेलते कभी दो पैरों पर फुदककर, पंख फड़फड़ाकर चहल-पहल करते। रातभर तो तोता-मैना पेड़ के मोटे तने में दुबके रहते और सुबह होते ही तोता, अकेले ही दाना-पानी के लिए दूर तक उड़ जाता। 


मैना अधिक दूर तक उड़ने में असमर्थ थी, इसलिए तोता ही कई जगह से अनाज के दाने एकत्रित करता और दोपहर से पहले आम के पेड़ पर मैना के पास आ जाता। मैना के स्वस्थ्य होने की आस में तोता और भी फुर्ती से काम कर रहा था। जब मैना का पेट भर जाता तो वह तोते की ओर प्यार से देखती और कहती, मेरी वजह से तुमको कितनी मेहनत करना पड़ रही है। तोता अपने पंखों को खुजलाता और कहता। ऐसा क्यों सोच रही हो मैना, परिश्रम तो प्रसन्नता का मूलमंत्र है। दिन ऐसे ही बीत रहे थे।

एक दिन जंगल में घूमते हुए एक सफेद वस्त्रधारी इंसान आया, उसने यहां-वहां देखा और अनुमान लगाया कि आम के पेड़ पर पक्षी होना चाहिए। इंसान वहां आया, झोले में से कुछ दाने ज्वार के निकाले और जमीन पर बिखेर कर चला गया। जाते हुए इंसान ने कहा : किसी की सहायता से बड़ा कोई धर्म नहीं। इंसान आगे बढ़ गया।
मैना ने पेड़ के मोटे तने में बने कोटर से सिर बाहर निकाला और इंसान को जाते हुए देखा। फिर कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद मैना कोटर से बाहर निकल कर बड़े से तने पर आ बैठी, उसने पेड़ से ही नजरें दौड़ाईं, देखा नीचे ज्वार के दाने बिखरे पड़े हैं। मैना को भूख तो लगी थी, पर वह नीचे जमीन पर नहीं आयी। वह तो तोते के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। थोड़ी ही देर में हवा में तैरता हुआ तोता आ गया। मैना समझ गई कि तोते को आज भी अच्छे अनाज के दाने मिले हैं मैना अपनी पूंछ ऊपर कर और पंख फैलाकर खुशी प्रकट करने लगी। फिर तोता उसी तने पर आकर पैर जमाने लगा जहां मैना बैठी थी। तोते को आया हुआ देखकर मैना भी तोते के आपस आ गई। तोते ने मैना को दाना चुगाया और दोनों कुछ देर चहल कदमी करते हुए वापस पेड़ के मोटे तने में छिप गए। 

अगले दिन जब तोता फिर दाना लेने गया तो वही इंसान आया और इधर-उधर देखे बगैर अपने झोले में हाथ डाला और एक मुट्ठी अनाज के दाने निकालकर जमीन पर बिखेर दिये। इस बार इंसान, मक्का और बाजरे के दाने लेकर आया था। मैना ने फिर छिपकर देखा। इंसान कह रहा था- किसी की सहायता करने से बड़ा पुण्य का कार्य और कोई नहीं। इंसान गुनगुनाते हुए दूर निकल गया। ये सिलसिला कुछ दिन तक चलता रहा, सफेद वस्त्र में इंसान आता और तरह-तरह के रंग-बिरंगे अनाज-दालों के दाने पेड़ के नीचे फैलाता और ‘‘अपने लिये जीये तो क्या जीये’’ गीत गुनगुनाते हुए चला जाता। मैना ने बचपन से सुन रखा था कि ‘‘शिकारी जंगल में आता है जाल फैलाता है जाल में फंसना नहीं चाहिए’’ इसलिए मैना तो क्या कोई भी पक्षी नीचे उतरकर दाने नहीं चुगता, पर जब कुछ दिन हो गए तो पेड़ के कुछ पक्षी नीचे आकर दाना चुगने लगे। 

मैना को लगा कि कुछ दाने तो उसे भी खा ही लेना चाहिए, लेकिन वह पेड़ से नीचे नहीं उतरीं, इधर-उधर देखती रही। अनाज के दाने सामने ही बिखरे हुए देखकर मैना की भूख बढ़ती जा रही थी। उसे तोते की प्रतीक्षा लंबी लगने लगी थी। मैना बैचेन थी और आक्रोषित भी। वह पेड़ के तने पर ही कभी दुबक कर बैठ जाती तो कभी दो पैरों पर उचक-उचक कर इधर-उधर दौड़ती, पर तोता भी क्या करता कई स्थानों पर भटकता तब कहीं मौका देखकर स्वयं खाता और कुछ दाने भर कर वह मैना को लेकर आता। कभी अनाज अधिक मिला तो कभी कम। कभी फल भी मिल जाते थे। तोते ने सोचा अनाज तो कई दिन से ले जा रहा हूंॅ आज कुछ मीठे फल ले जाता हूंॅ। तोता फल लेकर आया, पर मैना तो अनाज की प्रतीक्षा में थी। जैसे ही मैना ने देखा कि तोता फल लेकर आया है। मैना बिगड़ पड़ी। बोली : मुझे तो लगा आप ज्वार या बाजरा लाओगे, मक्का या चावल लाओगे...! फल तो इस पेड़ पर भी लगे हैं। 

तोता ने इधर-उधर देखा और कहा कि गर्मी बढ़ती जा रही है जंगल में अनाज-पानी की कमी हो गई है। जंगल में पेड़ों की कटाई लगातार हो रही थी, जंगल सिमटता जा रहा है, पक्षियों की संख्या भी घट रही है, साथी पक्षी कहां लापता हो रहे हैं किसी को पता नहीं। तोता चिंतन कर ही रहा था कि मैना ने    तोते की बातों को अनसुना करते हुए नीचे देखा। सफेद ज्वार और कत्थई बाजरा खाने का उसका बहुत मन कर रहा था। उसने तोते से कहा : अधिक दूर जाने की क्या आवष्यकता है? थोड़ा पास में भी देखो तो अनाज मिल सकता है, तुम्हें तो फिजूल की मेहनत करने में मजा आता है, पता नहीं ऐसा क्या काम करते हो? मैना उलाहना दे ही रही थी कि तोते ने अपना एक पैर लाल चोंच के पास लाकर नीचे देखा। 

पेड़ के नीचे मिट्टी में ज्वार-बाजरा बिखरा पड़ा है। मैना का मन रखने के लिए तोते ने पंख उठाये और पैरों को तने से नीचे खिसकाते हुए भूमि पर उतार दिया। मैना ने मना करना चाहा, लेकिन तब तक तोता मिट्टी में से ज्वार-बाजरा के दाने चुगने लगा। मैना घबराकर दूर तक नजरें दौड़ाने लगी उसे कोई नजर नहीं आया। मैना को लगा वह इंसान बहुत परोपकारी है और उसे हमारी और इस नष्ट होते पर्यावरण की चिंता है इसलिए ये अनाज के दाने बिखेरकर जाता है। तभी जमीन से तोता फुर्ती से पंख फड़फड़ाते हुए ऊपर की ओर उड़ा और मैना के पास टहनी पर आकर बैठ गया। 

तोता बोला : तुम जल्दी अच्छी हो जाओ फिर अपनी पसंद की चीजें खा सकोगी। तोते की देखा-देखी कई पक्षी नीचे आकर अनाज खाने लगे। मैना बहुत प्रसन्न हुई और दोनों खुषी-खुषी वापस तने के मोटे खोल में छिप गये। मैना रात भर उस इंसान के बारे में सोचती रही। उसके परोपकार, सेवा से भरे गीत उसके कानों में रस घोल रहे थे। वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर इंसान ऐसा क्यों कर रहा है। उसे लगा कि इंसान हम पक्षियों को प्रेम करते हैं इसलिए ऐसा कर रहा है।


अगले दिन सूरज निकलने से पहले ही तोता उठ गया और अपने एक पैर से लाल चोंच और सिर को पोंछने लगा। मैना के उठते ही तोते ने पूछा आज क्या खाने की इच्छा है? मैं वहीं लेकर आने का प्रयास करूंगा। तोते की ऐसी बातें सुनकर मैना कुछ देर चुप रही, फिर उसने पैरों के ऊपर पंखों और पेट वाला पूरा हिस्सा तेजी से दांये-बांये हिलाकर, फुरफुराते हुए कहा : जो भी आसानी से मिल जाए। कुछ दिन की बात और है फिर जब मैं उड़ने लगूंगी तो दोनों साथ में ही चला करेंगे। तोते ने मैना की ओर देखा और दोनों पैर ऊपर की ओर करके उड़ गया।
इधर सूरज निकल आया। मैना पेड़ के मोटे तने पर ही बैठी थी। कभी वह पेड़ के उस छोर तक चली जाती, कभी इस छोर पर आ जाती। कभी जंगल की खाली जमीन को देखती कभी सूरज की किरणों और पेड़ पर लग रहे कच्चे आमों को देखती। लंबी प्रतीक्षा के बाद उसे लगा कि आज कोई भी नहीं आया। थोड़ी देर बाद उसे दूर से सफेद कमीज पहने हुए एक आदमी आता दिखाई दिया। मैना, पत्तियों में छिपकर बैठ गई और उस आदमी को पास आते देखती रही। जब इंसान पेड़ के नीचे आया तो उसने झोले में से एक मुट्ठी अनाज निकाला और जमीन पर बिखेर कर चला गया। 

मैना ने देखा आज वह इंसान चावल के सुंदर-सुंदर दाने लेकर आया था। सुगंधित श्वेत चावल जमीन पर पड़ा देखते ही मैना के मुंह में पानी आ गया। मैना ने देखा कि वह इंसान दूर चला जा रहा है और पेड़ों में से कहीं निकलकर जा चुका है। सभी ओर सन्नाटा था। मैना नीचे उतरती इससे पहले ही मधुर आवाज करते हुए तोता तने के पास आ बैठा। तोते को देखते ही मैना ने मुंह बना लिया और दोनों पैरों से दूर खिसक गई। तोता भी दो पैरों से उचकते हुए मैना के पास आया तो मैना और दूर जाने लगी। तोते ने अपने साथ लाई हुई हरी मिर्च को वहीं तने पर रख दिया और नीचे देखा तो चावल पड़े हुए थे।

तोता समझ गया, उसने मैना को समझाया, पता है जंगल में पक्षियों की संख्या क्यों कम हो रही है, क्योंकि शिकारी लालच देकर पक्षियों को पिंजरों में कैद कर रहे हैं। ये शिकारी पक्षियों को पकड़ कर महानगरों में ले जाते हैं जहां की प्रदूषित वायु में पक्षी कुछ दिन में ही दम तोड़ देते हैं। फिर अपने परिश्रम से पेट भरने का मजा ही अलग है। मैना को तोते की बातें अच्छी नहीं लग रही थीं। उसके मन में तो बैठे-बैठे आराम से खाने की आदत पड़ गई थी। मैना को लगा, हो न हो वह आदमी परोपकारी है और उसके लिए ही वह अनाज यहां फेंककर जाता है। नही ंतो इतनी तरह-तरह का अनाज लेकर क्यों लाता? तोते ने मैना को सावधान करना चाहा तो मैना फुदकते हुए पेड़ के सबसे ऊपर वाले तने पर जा बैठी। तोता जब वहां मनाने पहुंचा तो दोनों में झगड़ा हो गया। कभी मैना अपनी चोंच से तोते के पंखों को नोंचती कभी तोता अपनी चोंच और पैरों से मैना पर हमला करता। पूरे पेड़ पर चहलकदमी करते शोर मचाते हुए आखिरकार दोनों जमीन पर आ गिरे। जब तक मैना के मुंह में चावल नहीं चले गए वह चुप नहीं हुई। शाम को दोनों फिर पेड़ के मोटे तने में जाकर सो गए।

मैना ने तोते से कहा : यदि बिना परिश्रम के यहीं मिल रहा है तो तुम्हें इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता है। तोते ने कहा : तुम समझ नहीं रही हो। खाने के लिए सुरक्षित जगह भी देखना जरूरी है। फिर पता नहीं ये कौन है जो यहां अनाज डालकर जा रहा है। उसकी मंशा क्या है? मैना ने कहा : यदि वह शिकारी होता तो उसके पास जाल होता, पिंजरा होता, कुछ औजार होते। वह तो झोले में अनाज लेकर आता है और अनाज बिखेरकर चला जाता है वह कई और जगह भी अनाज बांटकर जाता है। मैं स्वयं कई दिनों से देख रही हूं। महानगरों में भी तो सेवाभावी व्यक्ति पक्षियों के लिए दाना-पानी रखते हैं, वैसे ही ये इंसान भी सेवाभाव से हमारी सहायता कर रहा है। 

तोता ने कहा : देखो जब से वह इंसान अनाज देकर जा रहा है तब से तुम्हारा व्यवहार ही बदल गया है। न तुम्हें मेरा परिश्रम दिखाई देता है न ही मेरे द्वारा लायी हुई चीज पसंद आती है। मैना ने कहा : ठीक है तो सुबह तुम कहीं नहीं जाओगे, पहले स्वयं ही उसे देख लेना। तोते ने कहा : यदि वह नहीं आया तो हम क्या खायेंगे, फिर बारिष भी तो कभी भी हो सकती है हमें अनाज की व्यवस्था पहले से करके रखना होगी। तुम तो बीमार हो ही, कहीं मुझे भी लू लग गई तो, क्या होगा? बहस बढ़ती गई। आखिरकार तोते को लगा कि उलझने से कोई मतलब नहीं जैसा मैना कह रही है वैसा ही करके देखते हैं।

अगले दिन सूरज निकल आया। तोता कहीं नहीं गया। दोपहर होने से पहले वह इंसान फिर उसी रास्ते से आया और पेड़ के नीचे मुट्ठी भर अनाज डालता हुआ आगे निकल गया। तोते ने एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर आगे बढ़ते हुए उस इंसान का पीछा किया। इंसान आगे बढ़ता गया और तोता इस पेड़ से उस पेड़ पर बढ़ता गया। फिर ऐसा स्थान भी आया जहां दूर-दूर तक पेड़ नहीं थे। तोते ने नजरें दौड़ाईं। सूरज सिर पर था, प्यास भी लग आई थी। उसे दूर तक उड़ना था। वह इंसान पर नजरे जमाये हुआ था। पेड़ के पास लगे तारों के सहारे तोता इंसान की झुग्गी तक पहुंच गया। वहां उसने देखा कई पक्षी पिंजरे में बंद हैं। तोता काफी थक चुका था, भूख भी लगी थी वह मैना के व्यवहार से भी दुःखी था। इसलिए तुरंत वहां से लौट आया। तोता ने मैना को सारी बात कह सुनाई, पर मैना को लगा कि तोता झूठ बोल रहा है। 

अगले दिन तोता अपनी मैना को समझाते हुए अनाज लेने चला गया। तोता को लगा कि अब मैना मान गई होगी, लेकिन जब तोता चला गया तो वह फिर उसी इंसान का इंतजार करने लगी। वह अनुमान लगाने लगी कि आज इंसान उसकी पसंद का कौन-सा अनाज लेकर आयेगा? यदि हरी दाल लाया तो समझूंगी इंसान ने मुझे देख लिया है यदि लाल दाल लाया तो समझूंगी कि इंसान मुझे पसंद करने लगा है, बहुत देर तक ख्यालों में मैना खोई रही। 

इंसान नहीं आया, मैना निराश हो गई। उसे लगा जरूर तोते ने कुछ किया होगा, उसे तोते की सलाह, समझाईष चुभने लगी थी। उस दिन मैना ने कुछ नहीं खाया, मैना को लगा अब वह पहले से काफी अच्छी हो गई है इसलिए वह पेड़ को भी छोड़कर जाना चाहती थी, लेकिन मनपसंद अनाज के कारण वह रूकी रही। दो दिन ऐसे ही बीत गए। तीसरे दिन इंसान फिर आया इस बार वह पांच तरह के अनाज और दालें भी अपने साथ लाया था। जब इंसान चला गया तो उसने शोर मचाकर सारे पक्षियों को नीचे बुला लिया और सबने जी भर कर अनाज-दालें खायीं। इंसान को एकाएक इतने सारे पक्षियों की आवाज सुनाई दी तो वह घूमकर चुपके-से पेड़ के पास आया और कमर में बांधकर रखा जाल पक्षियों पर फेंक दिया। कुछ पक्षी तो सतर्क थे वह तो वापस पेड़ पर आ गए, लेकिन कुछ पक्षी जाल में फंसे हुए ही कलरव करते रह गए। इंसान सारे पक्षियों को लेकर बढ़ता जा रहा था। इंसान की पीठ पर लदी मैना अपने हरे-भरे वृक्ष के घर को अपनी आंखों से ओझल होते हुए देख रही थी। वह तोते को जोर-जोर से आवाज लगाने लगी। 

कुछ देर बाद पेड़ पर तोता आया तो पेड़ पर बहुत शांति देखकर घबरा गया। उसने मैना को खोजा, लेकिन वह नहीं मिली। उसने जमीन पर देखा। प्रतिदिन की अपेक्षा आज अधिक अनाज-दालें थीं। तोते को समझते हुए देर नहीं लगी। वह षिकारी के डेरे पर पहुंच गया। देखा मैना कई पक्षियों के साथ जाल में फंसी है। मैना ने तोते को देखा और बचाने की गुहार लगाई। तोता वहीं तार पर बैठा रहा। रात में उसने जाल काटने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सका। कुछ और लोग डेरे पर आ चुके थे। 

तोते ने देखा जाल में से पक्षियों को निकालकर पिंजरे में भरा जा रहा है। पिंजरे एक गाड़ी में लादे जा रहे हैं। मैना अब तोते से बहुत दूर जा चुकी थी। तोता कुछ दूर तक तो उड़ता रहा फिर गाड़ी पर ही आकर बैठ गया। सुबह होते-होते गाड़ी बहुत बड़े पक्षी बाजार में पहुंच गई। तोते ने ऊपर की ओर देखा और एक पेड़ पर जा बैठा। बाजार में कई ग्राहक थे जो पिंजरा सहित पक्षियों को खरीद रहे थे। एक कार में से एक महिला उतरी और उसने मैना वाला सुनहरा पिंजरा खरीद लिया। तोते ने देखा तो कार का पीछा किया। वह महिला उस मैना को एक बड़े से बंगले में ले आई और वहां छत के नीचे पिंजरा टांग दिया। बंगले में छोटा-सा बगीचा भी था, तोता वहीं छिप गया। तोते ने देखा मैना को खाने-पीने की सभी चीजे पिंजरे में ही दी जा रही हैं। महिला और उसके बच्चे बहुत खुष होकर मैना से बातें कर रहे हैं। 

रात में जब सब सो गये तो तोता, मैना के पास पहुंचा। मैना अपने आपको बंद पिंजरे में देखकर सिसक उठी। जैसे कह रही हो, मुझे यहां से ले चलो। तोते को भी रोना आया, लेकिन वह कुछ कर न सका। तोते ने मैना को देखा जैसे कह रहा हो, मिलने आता रहूंगा। उसने मैना से कहा : तुम भी तो यही चाहती थीं!! इसी बीच घर में कुछ आहट हुई तो तोता उड़ने को पंख फैलाने लगा। मैना ने रोका और कहा : अब जब कभी भी अनाज न मिले तो ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं, मेरे पास आ जाना। तोते ने एकटक मैना की ओर देखा और फिर अपने सिर को सीधा कर लिया, बोला। परतंत्र बने रहकर खाने से अच्छा परिश्रम करना है...। यह कहते हुए तोते ने अपने पंख फड़फड़ाये और दूर गगन में उड़ चला......।
लेखक : आशीष श्रीवास्तव
स्वतंत्र पत्रकार
(भोपाल, मध्यप्रदेश)

 

9 comments:

  1. Congratulation sir.....Aapko badhai bahut bahut

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    1. dhanyawad.....shubhkamnao aur ashirwad ka sadeiv aakanshi

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    1. dhanyawad.....shubhkamnao aur ashirwad ka sadeiv aakanshi

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    1. dhanyawad.....shubhkamnao aur ashirwad ka sadeiv aakanshi

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  4. un sabhi pathako ke prati bhi bahut bahut dhanyawad jo kisi karanvash pratikriya vyakt nahi kar paaye.....shubhkamnao aur ashirwad ka sadeiv aakanshi

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  5. bahut sundar kahani hei....bachho aur bado ke liye pathniye meri hardik badhai

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