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Sunday, April 22, 2018

ज़मीन का ईश्वर (कहानी) - लेखिका : अपर्णा बाजपेई

एक बार फ़िर मैं वंही खड़ी हूँ जंहा से चली थी। चौराहा है ये मेरे जीवन का। आज  मैं ख़ाली हाँथ हूँ  जैसे पूरी ज़िंदगी यूं ही सी जी रही थी। कुछ भी नहीं है मेरे पास। न कपड़े ,न पैसे, न घर, न परिवार, न पति ,न बच्चे। बस एक मादा शरीर हूँ मैं और खून से सना हुआ ये चाकू है जो अभी-अभी घर के ईश्वर के रक्त का स्वाद चख कर आया है।

सड़क के उस पार जो कई घर दिख रहे हैं न उनमें से एक घर वो भी है जंहा मैं कुछ देर पहले तक अपने घर के तौर पर रह रही थी। परन्तु उस आदमी ने मुझे याद दिला दिया कि मैं कई सालों से इस ख़ुशफ़हमी में जी रही थी कि वो घर मेरा है। 

फिर उस घर के आदमी ने मुझे पड़ोस में रहने वाले एक  आदमी से बाज़ार में बात करते देख लिया । उसके बाद वो भरी बाज़ार से घसीटते हुए मुझे घर लाया और अपनी बेल्ट निकाल कर मुझे इतना पीटा कि मेरे शरीर पर कोई जगह नहीं बची जंहा से ख़ून न रिस रहा हो। ये देखिये खून के दाग अब भी मेरे माथे पर, गर्दन पर ,बाँह पर ....छोड़िये कंहा कंहा देखेंगे आप! 
हाँ ये मेरे हाँथ जरूर देखिये जिन्होंने अपना काम कर दिया है.
मैं अपना लहूलुहान शरीर ज़ख़्मी रूह  और ख़ूनी हाँथ लिए यहाँ खड़ी हूँ और सोच रही हूँ कि कहाँ जाऊं? 
माँ, बाप,भाई  है नहीं और बहन वो तो मेरी सौत है और उसी के पति को मै मार कर आ रही हूँ तो वो मुझे वापस घर कैसे ले जा सकती है ,फ़िर सौतन को घर वापस ले जाने के बारे में तो उसे सोचना भी नहीं चाहिए।
हाँ मैं अपनी बहन की सौतन हूँ क्योंकि मेरी माँ ने मरने से पहले मुझे मेरी बहन को सौंप दिया था और मुझे खिलाने पिलाने , शादी ब्याह की जिम्मेदारी अब उसकी थी। उस समय मेरी उम्र 14 साल थी। मेरी बहन मुझे बहुत प्यार से रखती थी । उसके घर में मेरे कुछ दिन बहुत खुशी से बीते । मेरे  जीजा मुझे बहुत खुश रखते। 



मेरी बहन मुझे मां जैसा ही प्यार देती थी। फ़िर एक दिन मेरे जीजा ने मुझे घुमाने ले जाने की बात कही। मैं भी तैयार हो गयी। दीदी की तबियत ठीक नहीं थी तो उन्होंने आज तुम लोग चले जाओ मैं फ़िर कभी चली जाऊंगी। मैं बहुत खुश थी कितने दिनों घूमने जा रही थी. गाँव में माँ के साथ सिर्फ घर और खेत... यही दुनिया थी मेरी.
मेरे जीजा जी मुझे एक पहाड़ी वाले मंदिर ले गए जो की घर से लगभग 20 किलोमीटर दूर था। काश मैं उस दिन उनकी मंशा समझ पाती। मंदिर से लौटते वक्त एक ढाबा के पास हम रुके और जीजा जी ने कोल्डड्रिंक मंगाई। हम दोनों ने कोल्डड्रिंक पी, कुछ देर वहीं बैठे फिर चल दिए। मुझे बहुत नींद आ रही थी और मेरे ऊपर बेहोशी तारी हो रही थी। गाड़ी में कुछ दूर  जाकर ही मैं शायद बेहोश हो गयी थी।
जब मुझे होश आया, मैं जंगल में एक पेड़ के नीचे पड़ी थी और मेरे शरीर पर एक कपड़ा नहीं था। थोड़ी दूर पर मेरा जीजा और उसका दोस्त बैठ कर दारू पी रहे थे। मेरी इज़्ज़त लुट चुकी थी । मेरे जीजा ने मेरी कुछ तस्वीरें अपने मोबाइल में ले ली थी जिनमें मैं और उसका दोस्त....

फ़िर हम घर आये और मै अपनी दीदी के गले लगकर इतना रोई कि जैसे मैं खुद अपनी मौत पर आंसू बहा रही थी। अब मेरे जीजा का दबाव मुझ पर बढ़ता जा रहा था। वो मुझे डराते कि अगर मैंने दीदी को कुछ बताया तो वो मेरे और उसके दोस्त वाली तस्वीरें दीदी को दिखा देंगे।
उसके बाद से मेरे जीजा मेरे साथ जबरदस्ती करते रहे और मैं कुछ नहीं कर पायी। मेरी दीदी भी ये सब जान गयी थीं लेकिन वे मौन थीं जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं है। हम दोनों बहनें उस घर में अपना- अपना नर्क भोग रहे थे।
ये बातें छुपती नहीं हैं। धीरे -धीरे जब आसपास के लोग दबी ज़बान सवाल करने लगे यो दीदी ने जीजा जी से कहा कि वे मुझसे शादी कर लें उन्हें कोइ आपत्ति नहीं होगी।
कुछ दिनों बाद एक मंदिर में मुझे ले जाकर मेरी शादी मेरे जीजा से कर दी गयी और मेरी बहन देखती रही। उसने जैसे अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया था।
और मैं! जैसे माटी की मूरत थी, सिर्फ साँसे ले रही थी... मेरा शरीर उनके इशारे पर नाच रहा था। वे कहते बैठो यो बैठ जाती, कहते खड़े हो जाओ तो खड़ी हो जाती।
जो काम कहा जाता कर देती नहीं तो अपने बिस्तर पर पड़ी रहती। हम दोनों बहनें एक दूसरे से नज़रें चुराती मानो हमने एक दूसरे की साँसों पर डाका डाला हो।
मेरा जीजा ईश्वर बन गया था हमारा। हमारी किस्मत उसकी मुट्ठी में थी। 
और फ़िर एक दिन मैं अपनी दीदी के कहने पर बाज़ार गयी थी। वहाँ राशन की दुकान पर घर के पड़ोस में रहने वाला महेंद्र मुझे मिल गया और उसने मुझे एक पैकेट सत्तू थमा दिया और बोला कि घर जाते हुए यह माँ को दे देना मुझे घर जाने में थोड़ी देर हो जायेगी।
पता नहीं मेरे जीजा ने मुझे और महेंद्र को बात करते हुए देख लिया और फिर वो मुझे भरी बाजार से घसीटते हुए घर लाये । मेरे सारे कपड़े फट गए थे और मैं ख़ुद को चीथड़ों में छुपा रही थी।उन्होंने मुझे, मेरे माँ -बाप को इतनी गालियां दीं कि मैं बर्दास्त नहीं कर पायी और ये जो चाकू आप देख रहे हैं मेरे हाँथ में, इसने मेरे गुस्से का साथ दिया .....
और उस घर की चौखट पर जो ख़ून गिरा है वो मेरे जीजा का है...  उसकी लाश आँगन में पड़ी है । आज मैंने खुद को और अपनी दीदी को आज़ाद करा लिया है उस इश्वर की कैद से.. 

ज़रा थाने का रास्ता बताएँगे..... इस चौराहे पर समझ  नहीं आ रहा किधर जाऊं? अपना गुनाह क़ुबूल करना है.

लेखिका : अपर्णा बाजपेई
(जमशेदपुर, झारखण्ड)

1 comment:

  1. मर्माहत करती व्यथा कथा.अपर्णा जी कहानी अच्छी बन पड़ी है. बधाई आपको.

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