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Wednesday, May 23, 2018

सफरनामा - लेखक आबिद रिज़वी साहब - भाग - 4

सैयद मुजाविर हुसैन रिज़वी उर्फ मुज्जन साहब, पेन नेम ‘इब्ने सईद’, पश्ताकद, साधारण डील-डौल के, पर होंठों पर हर क्षण मुस्कान समेटे रहने वाले ऐसे इंसान, जिनके पास काबलियत का अथाह खाजाना हिलोरे मारता मुझे नज़र आया। उर्दू-हिन्दी में महारतदां तिलिस्मी दुनिया। हिन्दी-उर्दू उन्हीं के नामों से लगातार लिखी जा रही थी। छपती थीं, और तिलिस्मे होशरूबा के पाठक जो उस दौर के थे, उनकी संख्या हजारों-हजार में थी। ''रहस्य'' (हिन्दी), वे ही सम्भालते लिखते थे। ''रूमानी दुंनिया'' (हिन्दी-उर्दू) के नाॅवल के साल में कम-से-कम छः अंक उनके लिखे आते थे। मुश्किल से यकीन करने वाली बात किसी के लिए होगी कि वे, हिन्दी भाषा-लिपि के एक भी वर्णाक्षर को पढ़ना-लिखना न जानते थे। है न कमाल। तिलिस्मी दुनिया हिन्दी, रूमानी दुनिया (हिन्दी/उर्दू) नकहत (उर्दू), तथा रहस्य (हिन्दी) के कुछ अंक इब्ने सईद के नाम से छपकर हज़ारों-हज़ार की संख्या में पाठकों के हाथों में पहुंचते थे। पाठक ख्याली-ख्वाबी दुनिया में खोकर पढ़ते थे, उसका लेखक हिन्दी वर्णमाला का भी जानकार न था। एक रोचक बात-वे साईकिल चलाना न जानते थे। (इस विषय का ताल्लुक आगे जुड़ा हुआ है अतः अभी लिख दिया गया)।
मेरी सेवा शुरू करने की इब्ने सईद साहब तो जैसे इंतजार में बैठे थे कि कोई व्यक्ति मिले जो उर्दू-हिन्दी जानकार हो। मैं जब पहुंचा तो कुछ देर की बात के बाद इस ‘कुन्दए ना तराश’ को उन्होंने अपनी बातचीत में परख लिया था। उन्होंने मुझे गाइड किया कि वे बोलेंगे और मुझे आम जुबान हिन्दी में मुश्किल उर्दू अल्फाजों को हिन्दी में ढालते हुए लिखते जाना है। मैं तैयार। उन्होंने कुर्सी की पुश्त से टिक, आंखों बंद कर, ख्यालातों के गोते लगाते हुए तिलिस्म कथा को बोलना (डिक्टेट करना) शुरू किया। मेरे बीच तय हुआ थाकि मैं धीरे से कहूंगा ‘हूं’ जिसका आशय होगा उनका बोला हुआ लिख चुका हूं। वे उसके आगे का फसाना बोलना शुरू करेंगे और मैं लिखना।

इसे ट्रायल कहिए-यह सिलसिला लगभग एक घण्टा चला। उन्होंने ब्रेकअप किया। कुर्सी से पुश्त ढीली कर आगे झुके और कहा-”मैं पढ़कर सुनाऊं, क्या लिखा।“ मैंने पढ़ना शुरू किया। अर्द्ध विराम, अल्प विराम, पूर्ण विराम को ध्यान में रखते हुए उसी अंदाज़ से मैंने पढ़ना शुरू किया, जिस अंदाज़ से उन्होंने बोला था। प्रसन्नता और सराहना भरी मुस्कान उनके चेहरे पर यूं ही खिली थी-कल्पना में मैं कह सकता हूं जैसे महान् वैज्ञानिक आर्कमडीज ने पानी के टब में उतरकर घनत्व का फार्मूला खोज लेने में पायी होगी।

शाबाशी दीं। लिखा हुआ सब पास।



अगली सिटिंग चली। पहले से ज्यादा कामयाब, क्योंकि ‘पास’ होने से मेरा आत्म-विश्वास दूसरी सिटिंग में बढ़ गया था। दूसरी सीटिंग में पहले से अधिक पृष्ठ लिखे गये थे।



लेखक: आबिद रिज़वी
सफ़रनामा जारी है अगले भाग में...

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