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Sunday, May 27, 2018

भाग - 5 - सफरनामा - लेखक आबिद रिज़वी साहब

विलक्षणता की अगली झलक
पहली सिटिंग 9 से 12 के बीच सोलह पेज तैयार हुए यानि एक फार्म। सात फार्म के छपने वाले नाॅवल का 1/7 भाग पहली सिटिंग में। भोजनावकश। खाना घर से आया था। मेरे लिए भी मंगवाया गया था।
 खाया-पिया, कुछ टहला-घूमा एक घण्टे का लंच सबका था। मुझे पान-तम्बाकू, बीड़ी-सिगरेट का कोई शौक तब न छू गया था। मुज्जन साहब सिगरेट पीते थे। पहली सिटिंग बोलने के दौरान भी हर घण्टे बाद, तीन बार
सिगरेट पी थी। विल्स सिगरेट पीने के शौकीन थे। माचिस से सुलगाने का शौक था। डिक्टेट करने का उनका अपना अंदाज था। आंखे बंद करके, किसी योगी की तरह तन्मयता में डूबकर, बालों में  हल्की-हल्की अंगुलियां फेरते जाते थे और डिक्टेट करते जाते थे।

दोपहर के एक बजे मैंने ड्यूटी सम्भाली। पैड पर, फस्र्ट सिटिंग में लिखे कागज को नीचे सिलसिलेवार रखकर नया कागज पैड क्लिप में लगाया।

उन्होंने हाथ बढ़ाया, मुस्कराकर सारा लिखा अपने हाथों में लिया। उसे फाइल में रखा। मैंने प्रश्न भरी दृष्टि से उनकी ओर देखा। वो वैसे ही सहज मुस्कान से बोले-”अब इसका अगला काम कल।“ मेरे कहने से पहले कि ‘अब
क्या?’ उन्होंने खुद ही कह दिया-‘सोशल नाॅवल।’

कमाल-दर-कमाल बात मेरे सामने आयी। उन्होंने सोशल नाॅवल (रूमानी दुनिया) के लिए शुरू करने प्लाॅट तैयार कर रखा था। कमाल ताज्जुब बात न थीं कि एक घण्टा ब्रेक से पहले तीन घण्टा जो शख्स लगातार तिलिस्मी दुनिया के कथानक में गोते लगाता रहा हो, उससे जेहन हटाकर एक घण्टे बाद ही कैसे सामाजिक नाॅवल का ताना-बाना बनाकर, वह भी उपन्यास का शुरूआती सिलसिला, शुरू कर सकता है?

मुझसे जो कहा जा रहा था-करने को तैयार था। उन्होंने बोलना शुरू किया। वही अंदाज अपनाया जो पूर्व के तीन घण्टे में देख रहा था। पहला वाक्य था-जो मेरे जेहन में आज भी ताजा है-‘घनघोर घटाएं छाई हुई थीं। मोरों की पुकार गूंजकर  मादा मोरनियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। पनिहारिनें अपने सरों पर भटके उठा तेज कदमों से घरों के लिए रास्ता तय करने को उतावली थी, ताकि बारिश की बूंदों से, सोंधी खुशबू उठने से पहले अपने घर पहुंच जाएं। पर, शीला की रफ्तार में वह तेजी न थी। उसकी बेताब नज़रें...।’ ऊपर लिखे शब्दों में कुछ हेर-फेर हो सकता है, जो दिमाग में अक्श था, उसे लिख दिया। बगैर लिखे भी काम चल सकता था। पर भाषा-शैली का अंदाज को सामने लाने के लिए उपरोक्त लाइनों को लिखा ताकि बता सकूं कि उनके हर रूमानी (सामाजिक) उपन्यास प्राकृतिक चित्रण की नक्काशी से शुरू होते थे। एक बात और ‘शीला’ पात्र उनके रूमानी नाॅवल में अक्सर आता था। उस नाॅवल में तो नायिका ही थी।

उस तरह, पांच बजे तक एक फार्म (16 पेज) रूमानी का भी तैयार।

पहले दिन का काम पूरा। वे खुश-खुश अपने साथ अपने घर लेकर गये। घर या घर का इलाका हसन मंजिला कहलाता है। ऊपर हिस्से के अपने मेहमान खाने में लेकर गये। मेरे लिए चाय-नाश्ता का प्रबंध कराया तथा मेरी
पारिवारिक परिवेश की जानकारी ली। आॅफिस आवर्स के बाद, मुज्जन साहब घर के अपने बालाई हिस्से (ऊपरी हिस्से) या बैठक में पहुंचे नहीं कि उनके दोस्तों का आना शुरू। चाय-पानी का सिलसिला। लिटरेटरी बातें। कौन छप रहा है, कौन पढ़ा जा रहा है।

लेखक: आबिद रिज़वी

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