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Tuesday, May 29, 2018

सफरनामा - लेखक आबिद रिज़वी साहब - भाग - 6

मैंने जाना अकरम ‘इलाहाबादी’ एम.एल. पाण्डेय तथा तीरथराम ‘फीरोजपुरी’
उस दौर के लेखकों में अकरम ‘इलाहाबादी’ , एमएल, पाडेय, तीरथराम ‘फीरोजपुरी’ पूर्व में मैं लिख न सका; भूलने जैसी बात नहीं, अनभिज्ञता थी। अकरम ‘इलाहाबादी’ का नाम हल्का-फुल्का तब जेहन में मेरे भी तैरा। नाॅवल (हिन्दी-उर्दू) इलाहाबाद के घण्टाघर से दाएं हाथ जाने वाली सड़क पर जीरो रोड़ के फुटपाथों पर लगी तरतीबवार नाॅवलों में सजी होती थी। गवाह हूं कि जीरो रोड फुटपाथों पर रूपबानी सिनेमा तक कुछ-कुछ फासले पर बीसों दूकाने थी। प्यारे लाल ‘आवारा’, कुशवाहा कान्त, प्रेम वाजपेयी, यहां तक कि शरत, बंकिम, रविन्द्रनाथ टैगोर की, सोमनाथ ‘अकेला’, चन्द्रेश, गोविन्द सिंह, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज , उपरोक्त तीनों लेखकों कुछ अन्य के साथ ही पूर्व का लोक साहित्य-लम्बी आकार की पुस्तकों के रूप में सारंगा
सदाव्रत, लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, हीर-रांझा, फिल्मी गाने की एक-एक आने वाली किताबों के गट्ठर बंधे हुए, आल्हा-ऊदल भी, दिल्ली, इलाहाबाद से छपने वाली सभी मैगजीनें नई-पुरानी। जो स्थानीय प्रकाशकों से सीधी जाकर कमीशन पर खरीदी और बाहर मथुरा, आगरा, दिल्ली की विभिन्न किस्मों वाली मैगज़ीनें और लोक साहित्य बजरिया वी.पी.पी. से मंगाई जाती थी। उस जमाने में अलबर्टो मोराविया, की ‘रोम की नारी’ ‘लोलिता’ डी.एच. लोंस की लेडी चैटर्ली की प्रेमिका भी रोमांटिक साहित्य में छपकर बनारस या आगरा इन दोनों में से कहीं से छपकर आ चुकी थीं। 

युवाओं में खूब क्रेज था इन दोनों किताबों का। चैसठ पेजी सेक्स साहित्य का भी दौर चल पड़ा था। युवा-अधेड़, वृद्ध फुटपाथी दूकान के बगल में बैठ इधर-उधर नजर बचा धीरे से कहते थे-‘गरम साहित्य’ (कोड वर्ड)। दूकानदार देखता कि सामने ग्राहक नहीं तो अलाउद्दीन के जादुई चिराग वाले जिन्न की तरह कथित ‘गरम साहित्य’ वाली किताब प्रकट कर रोल करके थमा देता था। लेने वाला झट मैंने जाना अकरम ‘इलाहाबादी’ एम.एल. पाण्डेय तथा तीरथराम ‘फीरोजपुरी’ कमीज-कुर्ते के नीचे नेफे में सरका लेता था। पकड़-धकड़ भी होती थी यदा-कदा। साल में एकाध बार, इसलिए यह सतर्कता बरती जाती थी। आज समझता हूं उस खेल को, जैसे गांजा-भांग की लाइसेंसी दूंकान की आड़ में चरस, अफीम की भी चोरी-छुपे बिक्री होती है, वैसे फुटपाथी किताबों की दूकान पर ‘गरम साहित्य’ की। कानून के रखवाले पैसा उगाते थे-सब चलता था। कथित गरम किताब की लागत दो आने आती थी, दूकानदार रूपया-बीस आना वसूलता था। देखते-देखते न्यूड अलबम वाली किताबें भी इसी तरह चोरी-छिपी दाखिल हो चुकी थीं।


यह सब अकरम ‘इलाहाबादी’ का नाम आने पर, जिक्र आ गया; क्योंकि उनकी चर्चा इब्ने सफी के दोस्त यारों के बीच हुई थी-इसलिए मुझे पक्का हो गया था कि जनाब अकरम ‘इलाहाबादी’ आदि कोई खास लेखक हस्ती है। कम्पटीटर के तौर पर उनका जिक्र था। विनोद-हमीद या इमरान-फैयाज के टक्कर के खान-बाले पात्रों पर आधारित उस समय प्रचलित सीरीज में शाहगंज की गली में एक लब्ध प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान में वे लिखते थे। जानकारी मिलने पर दो-चार किताबें  अकरम ‘इलाहाबादी’ की किताबें भी पढ़ीं। एम.एल. पाण्डेय तथा तीरथ राम ‘फीरोजपुरी’ को भी उलटा-पलटा। नायाब थीं। पर मैं तो आली बाबा के सिमसिम वाले दरवाजे में दाखिल हो चुका था। जिस संस्थान में हिन्दोस्तान को मकबूलतरीन लेखकों की दस किताबें हर माह छपती हों-सैकड़ों-सैकड़ों किताबें गोदाम में पड़ी हो; उसे छोड़ मैं जीरो रोड़ के फुटपाथों के दूकानदारों के यहां चक्कर लगाऊं, अब मुमकिन बात न थी। शामको छुट्टी के समय मुज्जन साहब से पूछ लूं कि पढ़ने के लिए किताब चाहता हूं। वे कहते जाकर छांट लो। गोदाम से एक-दो किताब मन-पसंद इब्ने सफी की अनपढ़ी खींची, दिखायी और ले गया। पूछकर ले जाना नियम में था। जासूसी दुनिया में दाखिल होने से पहले लेखकों की किताबों को पाने का सरल-सस्ता साधन था कि पुरानी खरीदूं यह भी सुविधा थी कि किराये पर ले जाकर पढूंे और लौटा दूं। बीस आना दूकानदार को जमा कर दिया। एक आना रोज पढ़ने पर किताब मिल गयी। दो-घण्टे में भी कोई पढ़कर लौटाने और दूसरी लेने आए तो एक आना ही किराया ही कटता था। 

एक और ख़ासियत से सामना - 
मुज्जन साहब की तीसरी चमत्कारिक खासियत का पता कोई दस-पन्द्रह रूप में इस रूप में सामने आया कि तिलिस्मी दुनिया को पूरा कराने के बाद, सामाजिक शुरू कराके जरा रफ्तार धीमी की और उसके बचाए समय में उन्होंने रहस्य पत्रिका के लिए जासूसी कहानी डिक्टेट कराना शुरू कर दिया।

या खुदा, मैं सोचता हूं-किन सलाहियतों का इंसान हैं इब्ने सईद। एक वक्त में तीन अलग-अलग धाराओं के अलग-अलग नाॅवल की कहानीं, सीन, एक और खासियत से सामना- पात्र दिमाग गर्दिश करते रहते थे। मैंने उन्हें कमी तिलिस्म-होश-रूबा हाथ में, इंग्लिश नावल टेबिल या मेज की दराज को खुलते-मुंदते नहीं रखे हुए देखा। दराज सिर्फ सिगरेट के पैकेट और माचिस के लिए शट और पुल होती थी। बड़ी सी आॅफिस मेज पर बस कुछ पूर्व के अंक तिलिस्मी दुनिया उर्दू के, रूमानी उर्दू के, नकहत होते थे। कब वे पढ़ते थे? क्या पढ़ते थे?

याद पड़ता था-एक बार काम ज्यादा था तो सुबह सात बजे घर बुलाकर दो घण्टे अतिरिक्त काम लेना शुरू कर दिया था।

यहां उत्सुकता हो सकती है कि मेरे हाथ पारश्रमिक क्या आता था! आपको उत्सुकता हो न हो, मुझे तो बताने में हैं-मैं उनकी खिदमत में हाज़िर हुआ था तो पारश्रमिक की कोई बात न हुई थी। पहला नाॅवल पूरा हुआ तो लिफाफा में रखकर मेरी ओर बढ़ाकर कहा-‘रख लो।’ इसी हिसाब से हर किताब के मिला जाएंगें। लंच में वाॅशरूम में जाकर लिफाफा में झांका एक पचास का एक दस का नोट; यानि साठ रुपये। दिल की धड़कने बढ़ गयी। खुशी से कलेजा मुंह को आ गया। कल्पना में खो गया कि महीने के तीस दिन में दो, नहीं तीन सौ
रुपये। उस ज़माने में एक स्टूडेन्ट के लिए गर्मियों-गर्मियों में दो-सौ से तीन सौ कमा लेना कदम जमीन पर न पड़ने वाली बात थी।

इस तरह मैं मुलाजिम न था। कान्टेक्ट कलम घसीटू ज्ञान पिपासु था।

गर्मी की छुट्टियां खत्म होने के बाद-बी.ए. में एडमिशन लिया था। साइकिल खरीद ली थी। सी.एम.पी. डिग्री काॅलेज में दाखिला लिया था। वहां प्रसिद्ध साहित्यकार, डाॅ. लक्ष्मी नारायण लाल नाट्य लेखक हेड आॅफ
डिपार्टमेन्ट थे।
मुझ पर वरदहस्त था क्योंकि मैं जासूसी दुनिया से सम्बद्ध था।

काॅलेज अटेण्ड किया तो सुबह की दो घण्टे की ड्यूटी मुज्जन साहब के साथ घर पर, (खाना-नाश्ता सब वहीं) दोपहर बाद आॅफिस में हाज़िरी, फिर शाम दो घण्टा। कोटा पूरा। सिलसिला वहीं का वहीं।

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