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Saturday, May 19, 2018

भाग -2 : लेखक आबिद रिज़वी साहब का साठ सालों का सफरनामा उन्हीं की ज़ुबानी - लेखक : आबिद रिज़वी

लुगदी साहित्य का नामकरण-

जब जासूसी-सामाजिक, जन साहित्य के रूप में चलन में आ रहे थे तो उनकी कम कीमत और जन-सामान्य तक पहुंच बनाने की लोकप्रियता ने उन्हें ‘सस्ता साहित्य’ नाम दिया गया। सस्ता साहित्य प्रकाशन संस्थान और सस्ता साहित्य बुक स्टाॅल/भण्डार इसके प्रमाणिक उदाहरण हैं। सस्ता साहित्य लिखने वाले लेखक फख्र से कहते थे हम हज़ारों में बिकते हैं जबकि नामचीन ‘साहित्यिक लेखक’ कुछ सैकड़ों में, वे भी सरकारी/गैर-सरकारी लाइयब्रेरियों में जाकर कैद हो जाते। (यहां पर साहित्यकारों से कतई मुराद नहीं। क्षमा के साथ!) नामचीन साहित्यिक लेखन उन्हें कहा जाता था जो प्रसिद्धि प्राप्त पत्रिकाओं में, अखबारों में, तथा गत्तेदार आवरण युक्त, सफेद काग़ज़ पर छोटे-छोटे प्रकाशनों में छप जाते थे। इस मामले की इलाहाबाद के सिविल, लाल गिरजाघर के निकट स्थित काॅफी हाउस मुख्य जमघट स्थल था। वहीं इस विषय पर बहसें होती थी। स्वस्थ बहसें। काॅफी हाउस में मैं भी जाने लगा था। संध्या के बाद वहां महफिलें जमती थीं। क्या शानदार स्थल है सिविल लाइन का काॅफी हाउस! बड़े-बड़े साहित्यिकारों को, नामचीन और सस्ता साहित्य लिखने वालों की अपनी-अपनी दस-दस, पांच-पांच की मण्डली अलग-अलग जमती थी। वरिष्ठ और प्रतिष्ठित साहित्यकारों का दर्शन लाभ भी हो जाता था और पैर छूकर उनका अशीर्वाद भी युवा प्राप्त करते थे। यह शिष्टाचार में बात शामिल थीं। वरिष्ठ साहित्यकार नाम और कुशलक्षेम भी पूछते थे-किस विषय में क्या लिखते हो?यह भी पूछ लेते थे। पूछने वालों के पूछने पर यूं लगता था जैसे वटवृक्ष की शीतल छांव मिल गयी है। वहां कवि, शायर, आर्टिस्ट, गायक, संगीतकार भी आते थे। कुर्सी-मोड़े, काफी लम्बी-चैड़ी बाहर की जगह, फुटपाथ तक घेर लेते थे।

इस विषय में अधिक कुछ कहना आज के परिवेश में व्यर्थ है, कल्पना में सोचा नहीं जा सकता, वहां के उस माहौल के बारे में। शांत माहौल, कोई बाहरी भीड़-भाड़ नहीं, ट्रैफिक का शोर तो कोई बात ही नहीं; कार किसी-किसी के पास पूरे शहर में होती थी, स्कूटर, मोटरसाइकिल चलन में न आयी थी। बस, रिक्शा का बोलबाला था। साइकिल आम सवारी थी।

अब निकलते हैं, सिविल लाइन के काॅफी हाउस से बाहर और आते हैं सस्ता साहित्य की ओर। अभी सस्ता साहित्य का इस्तेमाल ही मुनासिब है। शरत चन्द्र, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर की किताबें हिन्दी अनुवाद में खूब आकर छपने और बिकने लगीं थीं। गत्तेदार, आवरण युक्त। मैंने और मुझ जैसों को उस दौर में उन्हें पढ़ने का अच्छा अवसर मिल गया-क्योंकि वे सस्ता साहित्य थीं।

यकायक उभरा लुगदी (पल्प) साहित्य का नाम-
बात यूँ  हैं कि इलाहाबाद में इतने अधिक प्रकाशन संस्थान खुल गये थे-जैसे कुटीर उद्योग। एक-एक प्रकाशन से तीन-चार मैगज़ीनें आम बात। साठ-सत्तर पुस्तकें तो हर माह छपती ही थीं। जासूसी दुनिया (नकहत पब्लिकेशन) से ही पूरी दस मैगजीनें हर माह आती थीं। दिल्ली से जनाब वेद प्रकाश काम्बोज, श्री ओम प्रकाश शर्मा, एस.एनकंवल, आरिफ मारहर्वी, फारुफ अर्गली वगैरह की किताबें भी आती थीं। अन्य भी कुछ लेखकों की भी। जो कोई भी छप जाता था-बिक जाता था। लिखता रहा तो ठीक, वरना दूसरा आ जाता था। उस समय राइटर के नाम से ज्यादा म़ैगज़ीन के नाम पर जोर था। जैसे कि ‘जासूसी पंजा’ आदि।

यहां तक की भूमिका को पेश करने के बाद अब सस्ता साहित्य (मैगजीनों) को लुगदी साहित्य के बदलने की कहानी आसानी से समझ मंे आ जाएगी। मैंने सिविल लाइन काॅफी हाउस की बैठकों का ज़िक्र किया; वहीं बहसों में यह बात मेरी समझ में आयी थी। होता यह था कि इलाहाबाद, दिल्ली की मैगज़ीनें (अब यहां फिल्मी मैगजीनों को भी शामिल करने का वक़्त आ गया है) की संख्या सौ से ऊपर होती थी। बिक्री का मुख्य स्थान रेलवे स्टेशनों के ए.एच. व्हीलर के बुक स्टाॅल, बस अड्डे, शहरों के मैगज़ीन बुक स्टाल होते थे। मुख्य बिक्री केन्द्र रेलवे के ए.एच. व्हीलर के, हिन्दोस्तान भर में फैलें बुक स्टाल्स थे। संख्या में 17 हिंगम बूथम के भी बुक स्टाल अंग्रेज़ों के ज़माने से स्थान बनाए हुए थे; वे तब भी मैगज़ीनों के सप्लाई के केन्द्र थे। यहां पर हिंगम बूथम बुक स्टालों का मात्र जिक्र किया गया है। आगे उनका मेरे सफ़रनामा में कोई रोल नहीं।

तो जनाब, ए.एच. व्हीलर सबसे बड़ा उपन्यासों सहित फिल्मी पत्रिकाओं का मुख्य केन्द्र था और उसका मुख्यालय भी इलाहाबाद में ही था। जब मैंगज़ीनों की बाढ़ व्हीलर स्टालों पर बढ़ी तो ईमानदारी से सभी प्रकाशकों की मैगज़ीनों को स्थान देने का अनुबंध प्रकाशक, इलाहाबाद स्थित व्हीलर मुख्यालय में जाकर करते थे। बिकी हुई किताबें का चेक द्वारा ईमानदारी से पेमेण्ट, अनबिकी किताबें की वापसी का विवरण हर माह। जरूरी था यह; क्योंकि तीस दिन के बाद व्हीलर बुक स्टाल किताबों से फिर अट जाता था। मैंगज़ीन थी। महीना, सन् पड़ा होता था। नयी आ गई तो न रखने की जगह न पढ़ने वालों की कदर! नई आयी तो पुरानी गट्ठर बंधकर अलग। अब उन गट्ठरों को उठाना एक समस्या । प्रकाशक उठाकर ले जाकर अपना गोदाम भरे-पर उनका भी क्या फायदा?तो तय हुआ प्रकाशकों और व्हीलर मैनेजमेन्ट के बीच कि अन बिकी मैगज़ीन आवरण के शीर्षक वाले हिस्से काटकर रख लिये जाएंगे व्हीलर द्वारा टोकन रूप में, शेष अनबिकी पुस्तक के गट्ठर, जो ट्रक भर-भरकर जमा हो जाते थे उन्हें कबाड़ी को तौलकर बेच दिए जाएंगे। टोकन रूप में एकत्र मैगजीनों की संख्या गिन ली जाएगी, उनकी संख्या के आधार पर रद्दी का मूल्य तथा बिकी हुई मैगजीनों का अलग मूल्य-तयशुदा पालिसी के आधार पर कम्पनी द्वारा अदा कर दिया जाएगा। इस मामले में कम्पनी (व्हीलर) को भी सुविधा थी, प्रकाशकों को भी।

ट्रकों में रद्दी हो चुकी मैंग़ज़ीनों को, कान्टेक्टर से कुछ फुटपाथ के दूकानदार नग के हिसाब से (फी अदद) आना-दो आना की खरीद लेते थे; बाकी टीटागढ़ पेपर फैक्टरी के लिए, ट्रक रवाना हो जाते थे। टीटागढ़ पेपर बनाने का ख्याति प्राप्त कारखाना था। वहां रद्दी पहुंचते ही उन्हें पल्प (लुगदी) शक्ल देकर नया पेपर बनाया जाता था।

नतीज़ा निकला था कि मासिक छपने वाली पत्रिका (जिनकी मुख्य संख्या, इलाहाबाद, दिल्ली के नाॅवलों की होती थी) पल्प बनती थी। वे रखी नहीं जातीं थीं, पुनः उनका मूल्य नहीं होता था। शो केश में सजती नहीं थीं, लायब्रेरियों में उनकी जगह नहीं बनती थी। महीने के महीने वे पल्प की भेंट चढ़ जाती थीं; तो और क्या कहलाएंगी-पल्प या लुगदी साहित्य! सस्ता साहित्य के अन्तर्गत शरतचन्द, बंकिम चन्द्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर की किताबें चूंकि गत्ता चढ़ी, आवरण युक्त होती थीं, वे पल्प होने से बची रहकर सस्ता साहित्य में मुकाम बनाने में कामयाब रहती थीं।

उसी दौर में इलाहाबाद के कटरा में जनाब सुरेन्द्र अग्रवाल, लक्ष्मी टाॅकीज में गानों की किताबें बेचते-बेचते प्रकाशन क्षेत्र में आ चुके थे। पुष्पी प्रकाशन संस्थान खोल लिया था। अच्छी सोच लेकर आये थे। उन्होंने उस समय जो लुगदी साहित्य के लेखन प्रसिद्ध हो गये थे, उन्हें जिल्द युक्त, बेहतर कागजों में छापने की पहल की और कामयाब हुए।
(दिनांक-20 अप्रैल, 2018)
लेखक: आबिद रिज़वी
सफ़रनामा जारी है अगले भाग में...


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