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Sunday, May 20, 2018

राज्यपाल वजूभाई वाला ने खुद को आदर्श राज्यपाल साबित करने का मौक़ा खो दिया

कर्नाटक में चुनाव परिणाम आने के बाद से चल रहे राजनैतिक घटनाक्रम का आखिरकार पटाक्षेप हो ही गया। बहुमत के लिए ज़रूरी आंकड़े तक न पहुँचने के कारण येदियुरप्पा ने बहुमत परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इससे पहले सत्ता हासिल करने के लिए राजनैतिक पार्टियों में जमकर नैतिकता अनैतिकता का खेल चलता रहा है। सबके अपने अपने दावे और आरोप प्रत्यारोप का दौर चला।   
चुनाव में राजनैतिक पार्टियों में आपसी खींचतान और आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा है लेकिन कर्नाटक के राजनैतिक घटनाक्रम में राज्यपाल की जो भूमिका रही है वो संविधान के लिए चिंताजनक है।  कर्नाटक में राज्यपाल वजूभाई वाला के पास एक मौक़ा था की वो संवैधानिक कार्यव्यों का पालन करते हुए एक सही निर्णय लेकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने  की एक मिसाल क़ायम करते हुए इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा सकते थे।  भविष्य में जब भी कभी कोई ऐसी स्थिति आती तो राज्यपाल वजूभाई वाला का ज़िक्र  एक आदर्श राज्यपाल के रूप  में किया जाता उनके निर्णय को ऐतिहासिक और राजनीति से ऊपर उठकर संविधान रक्षा के एक उदाहरण के रूप में जाना जाता, लेकिन राज्यपाल वजूभाई वाला ने संवैधानिक कर्तव्यों पर अपनी पार्टी को तरजीह देते हुए एक गलत निर्णय लेकर स्वयं को आदर्श राज्यपाल साबित करने का एक बेहतरीन मौक़ा खो दिया है।  अब भविष्य में उनका नाम भी उन पूर्व राज्यपालों के साथ शामिल किया जायेगा जिहोने पूर्व में असंवैधानिक निर्णय द्वारा लोकतंत्र नुकसान पहुंचने का काम किया है।  
 
कर्नाटक में वर्तमान स्थिति में येदियुरप्पा इस्तीफा दे चुके हैं और कुमारस्वामी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं। कर्नाटक की जनता को एक लम्बे चले राजनैतिक नाटक के बाद सरकार मिलने वाली है।  आगे क्या राजनैतिक परिस्थितियाँ बनेंगी ये भविष्य में ही पता चलेगा। वर्तमान में भले ही इस पूरे मसले का हल निकल आया हो लेकिन इस पूरे राजनैतिक घटनाक्रम में एक बार फिर से राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है और ये लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।  

✍  शहाब ख़ान 
©Nazariya Now

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