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Monday, May 21, 2018

भाग -3 : लेखक आबिद रिज़वी साहब का साठ सालों का सफरनामा उन्हीं की ज़ुबानी

प्यारे लाल ‘आवारा’ की शरण में

 इण्टर की परीक्षा देने के बाद, गर्मियों की छुट्टी तक किसी नामवर लेखक से ज्ञान हासिल करने की पिपासा में मैं एक सुबह, मई माह सन् 60 में जा पहुंचा मुट्ठी गंज, बिरहाना रोड स्थित रूपसी प्रकाशन। उस समय, कुशवाहा कांत साहित्य के बाद सबसे अधिक बिकने वाले नामवर लेखक प्यारे लाल ‘आवारा’ थे। प्रेमचन्द वाजपेयी, सोमनाथ ‘अकेला’, गोविन्द सिंह, शंकर ‘सुल्तान पुरी’ सुरेश श्रीवास्तव और भी कई नाम सामाजिक उपन्यासकारों में लोकप्रियता की ऊँचाइयों को छू रहे थे; पर उनमें से कई जुड़ चुके थे पुष्पी प्रकाशन से। जिनका जिक्र ऊपर आ चुका है। वे मैगजीनों में खूब छप चुके थे। रमेश चन्द्र ‘चन्द्रेश’ जासूसी उपन्यासों में ओम प्रकाश शर्मा तथा वेद प्रकाश काम्बोज के बाद खासे प्रसिद्ध थे। ‘चन्द्रेश’ जी कानपुर के रहने वाले थे। इलाहाबाद के कई प्रकाशकों में पूछ थी। उपरोक्त महानुभवों से मेरी भेंट सम्भव न थी क्योंकि कब कौन-किस प्रकाशन में आता-जाता हैं, इसकी कोई खबर मुझे न हो पाती थी। रूपसी प्रकाशन प्यारे लाल ‘आवारा’ का खुद का था। रूपसी में खुद प्यारे लाल ‘आवारा’ नियमित लिखते थे। रूपसी के अलावा प्यारे लाल ‘आवारा’ की दो मैगजीनें और भी थीं-गुप्तचर और रोमांच। गुप्तचर में निरंजन चैधरी नियमित लिखते थे, रोमांच में कोई मिश्रा जी। एकांध अन्य को रोमांच मैगज़ीन में राइटर के रूप में देख लिया था-सो, थोड़ी सी उम्मीद की किरण लेकर प्यारे लाल ‘आवारा’ की शरण में पहुंचने की चाह लिए पहुंच गया था।

कई चक्कर लगाने के बाद प्यारे लाल ‘आवारा’ से एक प्रातः भेंट हुई। अभिवादन, आशीष, अपना छोटा-सा परिचय के बाद उनकी सिगरेट पीने की तलब का, बाजार से जाकर सिगरेट का पैकेट ला देने के एवज में, उनका एक दिन गुरुत्व का आशीर्वाद पा लिया। जो कुछ जासूसी नाॅवल के रूप में लिखा था-उन्होंने पृष्ठ पलटें। कलम निकाली, वर्तनियों की गलतियां दुरुस्त करना बताया। इस तरह गुरुता का साधुवाद मुझे मिल गया। लम्बा प्रसंग हैं उनकी सेवा करने और उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने का जिसका जिक्र यहां विषय से हटकर है। संक्षेप में यह कि उन्होंने मुझे सिफारिशी पत्र देकर जासूसी दुनिया, स्थित, रानी मंजिल, भेज दिया। सिफारिशी-पत्र जनाब इब्ने सईद के नाम था, जो उनका पेन नेम था। नाम सैयद मुजाविर हुसैन रिज़वी, उर्फ मुज्जन साहब। मेरे बारे में मेरे गुरु ने लिखा था-‘...कुन्दए ना-तराश (बगैर तराशा हुआ हीरा) को भेज रहा हूं। आपके काम का है; तराशिए और अपने काम का पाइए...।’ बताना जरूरी है कि प्यारे लाल ‘आवारा’ और मुज्जन साहब में गहरी दोस्ती थी। यह दोस्ती काॅफी हाउस की वजह से कायम हुई थी।

मेरी पहुंच हुई जासूसी दुनिया में। मुज्जन साहब, या इब्ने सईद के पास। जरा शान से दाखिल हुआ था जासूसी दुनिया या नकहत पब्लिकेशन में। शान की बात के पीछे भी छोटा-सा फसाना है। विषय रोचक है और विषयगत है।

मैं जासूसी दुनिया प्रकाशन में दर्जनों फेरा लगा चुका था; छपने के लिए नहीं साहब, इब्ने सफी के नाॅवलों को छपते ही पाने के लिए। दस्तूर था कि नाॅवल छपने से पूर्व, स्थानीय पढ़ने वालों के पैसे जमा करा लिए जाते थे। नाॅवल छपकर आया और पैसा जमा कराए लोगों को लाइन लगाकर नम्बरवार पढ़ने को (बिक्री) दे दिया गया। जब तक एडवांस जमा कराए लोगों में से प्रत्येक को नाॅवल नहीं दे दिया जाता था डिस्पैच नहीं होता था, अर्थात् जिले से बाहर नहीं भेजा जाता था। एडवांस पैसा जमा कराने वालों की तादाद भी हजारों में। नम्बरवार देना होता था तो थोड़ी राशन की दूकान की भीड़ तथा हलचल भी होती थी। नाम-नम्बर लिखने वाले और उस व्यवस्था को सम्भालने वाले मुहम्मद इब्राहीम साहब थे; जिन्हें दुनिया ‘प्रेम प्रकाश’ के नाम से जानती है। जासूसी दुनिया (हिन्दी) पढ़ने वाले हर पाठक को इब्ने सफी बी. ए. के नाम के साथ अनुवादक प्रेम प्रकाश का नाम इसी तरह याद है जैसे धीरू भाई अम्बानी के साथ ‘रिलायंस’ का नाम। पाठक उन्हें अनुवादक प्रेम प्रकाश के नाम से ही जानते हैं, इलाहाबाद के अन्य लोग इब्राहीम साहब के नाम से। जासूसी दुनिया संस्थान में उनकी बड़ी हैसियत थी। होती भी क्यों न वे इब्ने सफी के अनुवादक प्रेम प्रकाश थे, वे संस्थान के व्यवस्थापक भी। 

उस समय तक मैं यह नहीं जानता था कि प्रकाशन व्यवस्था सम्भालने वाले इब्राहीम साहब अनुवादक प्रेम प्रकाश हैं। सब लोग उन्हें इब्राहीम साहब ही कहते थे, मैं भी उन्हें इब्राहीम साहब कहता था। ‘जरा शान से दाखिल होने’ वाली बात का माजरा यूं है तब से कोई साल भर पहले एक बार मैं जासूसी दुनिया का नया अंक पाने के लिए पैसे जमा करने के बाद, प्रकाशित होने के घोषित तिथि पर पता लगाने इब्राहीम साहब के पास चला गया था। संयोग से कुछ प्रिण्टिंग दुश्वारी की वजह से उपन्यास घोषित तिथि पर न आकर दिन पर दिन आगे टल रहा था। मैं पूछने गया तो मुझसे पूर्व पूछने आने वालों (तकाजा करने आए) लोगों से शायद झुंझलाए हुए थे इब्राहीम साहब। मुझसे तल्खी से बात की, मैंने नियम-कायदे की बात की; तो उन्होंने पैसा लौटाकर रजिस्टर से मेरा नाम काट देने की धौंस दी। बेवजह की बात थी, मुझे अपना पक्ष मजबूत लगा, मैं आॅफिस में टहलते हुए अब्बास हुसैनी से जाकर सीधे अपनी बात कह दी।
अब्बास हुसैन साहब, प्रोपाइटर जासूसी दुनिया के। सेना के रिटायर्ड गजेटेड आॅफीसर। जौनपुर, बड़ा गांव के जमींदार घराने के। ए.एच. व्हीलर के जनरल मैनेजर हैदर साहब के सुपुत्र। ऐसी शानदार पर्सनैल्टी कि उस समय की कैटेक्टर रोल में आने वाले फिल्मकार से लगते थे। जैसी ग्रैण्ड पर्सनैल्टी, वैसे ही सरल स्वभाव। मेरी बात को जायज़ ठहराया। पुचकार कर भेजा और कहा कि अमुक दिन, अमुम समय आकर मुझसे ले जाना। मेरी बात जायज तो दूसरे की बिन कहे नाज़ायज़। खैर, दी गयी दिन तारीख, समय पर मैं पहुंचा तो अब्बास हुसैन साहब ने मुझे नाॅवल पकड़ा दिया। मैं नाॅवल लेकर निकला तो इब्राहीम साहब अपना चश्मा आधी नाक पर टिकाए नाखुशगवारी से फिल्मी दुनिया के ‘जीवन’ या ‘कन्हैया लाल’ की तरह देख रहे थे। उनके उस समय के देखने के अंदाज पर मेरे होंठों पर ‘जीत की मुस्कान’ खिल गयी थी। इसके लिए आज अफसोस है, मुझे ऐसा न करना चाहिए था। सिर झुकाकर जाना और बग़ैर उन पर नजरें डाले वापस आना चाहिए था। पर
उम्र जवानी की, इस तरह वो वलवले होते हैं। अल्लाह मुझे माफ करें।

तो ये माजरा था-जिसकी वजह से मैं ज़रा शान से दाखिल हो रहा था, जासूसी दुनिया कार्यालय में, क्योंकि उस दिन मैं लेखक था। मेरे पास नामवर लेखक प्यारे लाल ‘आवारा’ का मुज्जन साहब (इब्ने सईद) के नाम सिफारिश खत था। वहां के चतुर्थ श्रेणी कर्मी भाई छम्मी से जो बताया कि किसने भेजा है, किससे मिलना है तो उसने कहा-”आइए।“ वह आगे और मैं पीछे। मुज्जन साहब के सामने पहुंचा। अदब के साथ सलाम किया। खत बढ़ाया। उन्होंने मोहब्बत से सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने को कहा। भाई छम्मी को मेरे लिए पानी को कहा। फिर चाय भी आयी। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

लेखक: आबिद रिज़वी
सफ़रनामा जारी है अगले भाग में...



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