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Friday, May 18, 2018

लेखक आबिद रिज़वी साहब का साठ सालों का सफरनामा उन्हीं की ज़ुबानी - लेखक : आबिद रिज़वी (भाग -1)

क्यों आम जन में पढ़ी जाने वाली पुस्तकें लुगदी साहित्य कहलाती है?

इलाहाबाद के प्रकाशन संस्थान और लेखक बंधुओं का साथ।
आइए आपको ले चलते हैं अब से 60 साल पहले की दुनिया में। सन् 1958 का दौर! मैं उम्र के 16वें पड़ाव को पार कर 17वें में दाखिल हो चुका था। हाईस्कूल पास कर इण्टर में दाखिला ले चुका था। उस जमाने में न टी.वी. था, रेडियो का चलन का फायदा कुछ अभिजात्य वर्ग के लोगों को मयस्सर था। अखबार छपते थे, मगर कम। ब्लैक-एण्ड व्हाइट का जमाना। पढ़ने के लिए ‘हिन्दुस्तान साप्ताहिक’ और ‘धर्मयुग साप्ताहिक’ पत्रिकाओं की दीवानगी पढ़े-लिखे घरों में छायी हुई थी। ‘सरिता’ मासिक पत्रिका और कादम्बनी का बोलबाला मासिक पत्रिका के रूप में था। आम जन के हाथों में नित्य होता था लुगदी साहित्य। लुगदी साहित्य में इब्ने सफ़ी बी.ए. का बोलबाला जबरदस्त था। 
परचून की दूकान पर बैठा हुआ दूकानदार हो, पान की दूकान का पनवाड़ी, यहां तक कि चैथी-पांचवीं जमात पास मजदूर वर्ग, दस्तकार तबका। रिक्शा चालक को भी मजदूरी करने के बाद किसी पेड़ की घनी छांव में, अपने रिक्शे की सवारी गद्दी पर, साहब की तरह तनकर, अकड़कर पैर फैलाए, अधलेटी मुद्रा में लुगदी साहित्य को पढ़ते हुए मैं देखा करता था। शहरी घरेलू स्त्रियां, चूल्हा-चैका समेटकर, दोपहर आराम के क्षणों में, हाथों में इब्ने सफी के नाॅवल खोलकर पढ़ने में जुट जाती थीं। हिन्दी पढ़ी-लिखी महिलाओं में हिन्दी का, उर्दू पढ़ी-लिखी घरों में उर्दू का इब्ने सफ़ी का नाॅवल। और भी बहुत से नाॅवल छपते थे-‘भयंकर भेदिया’, ‘भयंकर जासूस’, ‘रहस्य’, ‘रोमांच’ किस-किस का नाम लिखूं। परचून की दूकान वाले लाला जी एक दिन में नाॅवल पढ़ लेते थे, पनवाड़ी बाबू, रिक्शा वाले साहब और कारीगर-मिस्त्री दो-तीन दिन लगा देते थे पढ़ने में। गृहणियां भी औसतन इसी अनुपात में। पृष्ठ ही कितने होते थे-अमूमन 112, लाइनें 27 एक पृष्ठ में। डायलाॅग युक्त नाॅवल, नजरों के सामने में यूं फिसलते चले जाते थे जैसे बर्फीले मैदानों में स्केटिंग। स्केटिंग का उदाहरण इसलिए दिया क्योंकि जैसे स्केटिंग करते औरत, मर्द, बच्चे-बूढ़े, जवान, के चेहरे पर प्रसन्नता की चमक और रोमांच की खूशबू बसी होती है, वैसे ही इब्ने सफ़ी के किरदारों की नोक-झोंक, विनोद-हमीद की, इमरान-जूलिया की चुहलबाजियों के आनन्द में डूबे डायलाॅगों की मुस्कान होंठों पर खिलती थी; अपराधी पर काबू पाने पर रोमांच की सिहरन रगों में दौड़ती थी। 
यह मंज़र सरज़मीं इलाहाबाद का है, जो उत्तर प्रदेश का एक मक़बूल ज़िला है। जिसे पावन नगरी प्रयाग भी कहते हैं। संगम नगरी भी। गंगा, जमुना, सरस्वती (अदृश्य) नदियों का मिलन यहां होता है। इलाहाबाद की तहज़ीब और भाषा-शैली भी अलग ही मुकाम रखती हैं। यह हिन्दी भाषा-विदों का, विद्वानों का, साहित्यकारों का ज़िला है। और मुझे गर्व है कि मेरा जन्म इस पवन नगरी में हुआ। 
मैं लुगदी साहित्य की ओर कुछ लाइनों के बाद आता हूं। यह बताना जरूरी है कि आखिर हिन्दी-उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकारों की धरती पर जन्म लेकर मैंने साहित्य विधा का रास्ता क्यों नहीं अपनाया। डाॅ. राम कुमार वर्मा, डाॅ. महादेवी वर्मा, डाॅ. रघुवंश, डाॅ. जगदीश गुप्त, अजीम उर्दू शायद रघुबर सहाय ‘फिराक’, डाॅ. एज़ाज़, जैसी राष्ट्रीय हिन्दी-उर्दू साहित्यिक हस्तियाँ, एक-दो, किलोमीटर के दायरे में आसपास थीं-मैं उनसे प्रेरित न होकर
लुगदी साहित्य की ओर क्यों आया?

मैं बता दूं, हिन्दुस्तान साप्ताहिक, धर्मयुग साप्ताहिक, सरिता, कादम्बनी का मैं पाठक बन चुका था। लिखने की उमंग उठने लगी थी। उम्र की अपरिपक्वता थी, जो लिखा उसे लिखकर इतराया। कहानियां पत्रिकाओं में भेजीं। एकाध छपी भी। सरिता के ‘हमारी बेड़ियां’ स्तम्भ में एक छोटा-सा प्रसंग भी मेरा छपा और पारश्रमिक रूप में पांच रुपये की किताब आयी। मृणाल पत्रिका में कहानी छपने का पांच रुपये का मनीआॅर्डर आया तो मां (अम्मा) ने पूरी गली के लोगों में जलेबियां बंटवा दीं। 
अपरिपक्वता की उम्र-धर्मयुग और हिन्दोस्तान साप्ताहिक में कहानियां, लेख भेजना शुरू कर दिया।...‘स्थानाभाव के कारण, छापने में खेद...’ जैसे शब्दों के साथ एक-एक करके वापस आती गयीं। पत्रिकाएं गिनी-चुनी थीं और साहित्यकारों की संख्या बढ़ी-चढ़ी हुई थी। मुझ जैसे नोैसिखियों को कहां आसानी से जगह मिलने वाली थी। मुझे तो उस समय भाषा और वर्तनी का भी सही ज्ञान न था, शैली की बात तो बहुत दूर की।

अब लौटता हूँ मूल विषय पर। दो-चार कहानियां छप जाने के बाद लेखन का जुनून सवार हो चुका था। तो निगाह गयी पढ़ते हुए लोगों पर, लोगों को जो पढ़ते देखा-खुद पढ़ने लगा। पढ़ना आसान, तो लिखना भी आसान लगा। उसी ढंग से लिखने लगा। पर मिज़ाज़ सामाजिक विषयों के ताने-बाने का बन चुका था-सामाजिक नाॅवल लिखना आरम्भ किया। ‘अनजानी-अनचाही राह’, ‘धुंधला चेहरा-धुंधला रूप’, ‘अतीत की परछाईयां’ और ‘सरिता’ ये चार नाॅवल धड़ाधड़ छपे। पारश्रमिक भी मिले-तीस रूपये प्रति नाॅवल। बहुत था। इतना कि आज का तीन हज़ार रुपया भी मुकाबला न कर सके। तीन हज़ार कम लगता है... और भी ज़्यादा। अब कहां हिसाब लगाने बैठूं कि उस ज़मााने के तीस रुपये आज के कितने के बराबर हुए। सही से याद है पांच आने के एक छटांक घी आता था। घी को घी ही समझें। डालडा, तो कोई जानता ही न था। 
खैर, पढ़ाई भी करनी थी। काॅलेज भी अटेण्ड करना। इण्टर की पढ़ाई, हाईस्कूल से जरा सख्त हो गयी थी। होम वर्क भी करना होता था; अंग्रेज़ी कमज़ोर थी, इण्टर के अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले मास्टर अग्रवाल साहब बड़े सख्त थे। उनकी सख्ती के डर से अंग्रेज़ी शब्दों की स्पेलिंग की रटाई में अलग से समय लगाता था। आभार अग्रवाल साहब का कि उनकी सख्त मिजाज़ी की वजह से आज इस लायक हूं कि चार अलफ़ाज़ अंग्रेजी के लिख-पढ़, बोल लेता हूं। उर्दू मादरी ज़ुबान थी, नो टेन्शन। हिन्दी भाषा के बीज आत्मा में रोपे जा चुके थे; अतः कक्षा में बेखौफ रहता था। मैं छप चुका हूं-लिखता हूं; इसका भी कुछ जलवा क्लासमेट्स और मास्टरान साहबान पर था। 
मैंने बताया कि चार सामाजिक नाॅवल छप चुके थे-पर मन को धैर्य न था। क्योंकि जान चुका था कि ज़्यादा मार्केट नहीं मिली है। लोगों को जासूसी नाॅवल पढ़ते देखता था। मन में उथल-पुथल थी कि उसे ही लिखूं, जिसे लोगों को पढ़ते देखता हूं-अर्थात् जासूसी।

उस समय सन् 1960 के आसपास मैं ओम प्रकाश शर्मा, (बाद में जनप्रिय) वेद प्रकाश काम्बोज भी अपनी खूब पहुंच बनाए हुए थे बाजार में। इब्ने सफ़ी बी.ए. के साथ उन्हें भी पढ़ने लगा था और भी जो हाथ आता, सबको पढ़
जाता। सब मासिक पत्रिका रूप में छपती थीं। 75 पैसे और विशेषांक 1.25 पैसे कीमतें होती थीं। कीटगंज स्थित मित्रा प्रकाशन था। माया, मनोरमा, मनोहर कहानियां, मनमोहन पत्रिकाएं छपती थीं। सरिता, कादम्बनी के बाद उनका जलवा था। नामचीन लेखकों को इन पत्रिकाओं में लिखने की खूब जगह मिलती थी। जासूसी दुनिया प्रकाशक (नकहत पब्लिकेशन) की किताबों को छोड़कर शेष मैगज़ीनें केवल आवरण के कुछ हिस्से फटी हुई, तीन-चार आने में आसानी से फुटपाथों पर फैली हुई मिल जाती थीं। महीने के महीने मिल जाती थीं। इसकी भी एक कहानी हैं जिसका जिक्र करना यहां खासा रोचक है। लुगदी साहित्य की रोचकता का यही मुख्य हिस्सा है। इस हिस्से के बगैर लुगदी साहित्य का इतिहास ही अधूरा है।
लेखक: आबिद रिज़वी
सफ़रनामा जारी है अगले भाग में...

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