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Friday, October 5, 2018

कृषि प्रधान देश में मजबूर और लाचार किसान

‘‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’’ इस वाक्य को अगर सही माना जाये तो कृषि का कार्य करने वाले किसानों की आर्थिक स्थिति देश में अन्य लोगों के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर होनी चाहिए थी। किसान जिसे देश का अन्नदाता कहा जाता है आज पूरे देश में सबसे ज़्यादा परेशानी के दौर से गुज़र रहा है। क़र्ज़ के बोझ से दबे किसानों की आत्महत्या की ख़बरे अकसर सुनने को मिलती रहती हैं। जो किसान सारे देश को अन्न उपलब्ध करवाता है आज वही किसान क़र्ज़ के बोझ में दबकर ख़ुद अन्न के लिए मोहताज हो गया है।

2  अक्टूबर जिसे देश के 2 व्यक्तियों महात्मा गाँधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है उसी दिन देश भर से अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आये किसानों पर पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्वक हिंसा की गई जिसमें कई किसान गंभीर रूप से घायल हुए हैं।  इससे पहले मंदसौर मध्य प्रदेश में अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे 5 किसानों की पुलिस की गोली लगने से मौत हो गई। अपनी मांगों को लेकर किसान 1 जून से प्रदर्शन कर रहे थे । किसानों के 2 मुख्य मांगे हैं फसल की सही क़ीमत मिले  और क़र्ज़ माफ़ी।  ये दोनों ही बाते बीजेपी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में प्रमुखता से शामिल की थीं ।   

महाराष्ट्र में  प्रदर्शन कर रहे किसानों की भी यही मांगें हैं।  इससे पहले नई दिल्ली में तमिनलाड़ू के किसान क़र्ज़माफ़ी और मुआवज़े की मांग के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। अपना घर, गांव छोड़कर ये किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। इन किसानों  में नौजवान से लेकर 70 वर्ष से अधिक उम्र के बुर्ज़ुग तक थे। इन किसानों प्रदर्शन राजनीतिक पार्टियों की तरह जुलूस, रैली निकालकर या चक्काजाम करने जैसा नहीं था, उन्होंने अपनी मांग के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अलग-अलग तरीक़ अपनाये। पहले अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया, जिन किसानों ने क़र्ज के बोझ से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी उन किसानों के नरमुण्ड (खोपड़ी) अपने गले में डालकर प्रदर्शन किया। उन्होंने हर दिन अलग-अलग तरीक़े से प्रदर्शन किया। कभी उनमें से कोई किसान को लाश बनाकर उसकी शवयात्रा निकाली, कभी एक किसान को प्रधानमंत्री का मुखौटा पहनाकर कोड़े मारते हुए एक नाटक प्रदर्शित किया, कभी कटोरा लेकर भिखारी बन गये, कभी आधी मूंछ मुंडवा ली, चूहा पकड़कर उसे मुंह में लेकर प्रदर्शन किया, सांप का मांस खाया यहां तक कि अपना पैशाब (मूत्र) पीकर भी प्रदर्शन किया। आखिर क्या  कारण है पूरे देश को अन्न देने वाले किसान सड़कों पर उतर आये हैं।  


देश के अलग अलग हिस्सों से अपना घर-परिवार छोड़कर ये किसान बड़ी उम्मीद लेकर दिल्ली आये होंगे की देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  जो ''सबका साथ सबका विकास'' का नारा देते हैं उनकी समस्या ज़रूर सुनेंगे, उनकी मदद ज़रूर करेंगे लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की और से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है और न ही किसी केन्द्रीय मंत्री ने कोई मदद या मदद आश्वासन दिया है। किसानों की सहायता के लिए केन्द्र/राज्य सरकारें पास पैसे की कमी है का रोना रोती हैं लेकिन उन्हीं सरकारों के पास करोड़ों की मूर्ति/स्मारक बनाने के लिए पैसा है। क्या मूर्ति/स्मारक बनाने से ज़्यादा ज़रूरी देश के अन्नदाता को आत्महत्या से बचाना ज़्यादा ज़रूरी नहीं है ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कई विदेशी दौरों में कई देशों को करोड़ों की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया क्या विदेशों को आर्थिक मदद देना अन्नदाता को सम्मान से जीने का अधिकार देने से ज़्यादा ज़रूरी था ?

देश में किसानो के  साथ अन्याय ही होता आया है कभी कभी तो सहायता के नाम उनके साथ मज़ाक किया जाता है। कुछ समय  पहले हरियाणा में बाड़ पीड़ित किसानों को मुआवज़े के नाम पर 1 रूपये से लेकर 2 रूपये
तक के चेक वितरित किये। मध्यप्रदेश में कुछ समय पहले सूखा/ओलावृष्टि/अतिवृष्टि से पीड़ित किसानों के साथ भी ऐसा ही हुआ, उत्तर प्रदेश में सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का ऐलान कर खूब वह वही लूटी लेकिन वहां भी किसानों  को 10 से 15 रुपये क़र्ज़ माफ़ी के नाम पर माफ़ किये गए।  महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बहुत ज़्यादा है। मुआवज़े के नाम पर 1 रूपये से लेकर 2 रूपये तक की राशि देना क्या उनकी मजबूरी-लाचारी का मज़ाक़ उड़ाने जैसा  नहीं है ?

सिर्फ 1 या 2 रुपये के क़र्ज़ में डूबे किसानों की बैंक द्वारा संपत्ति की कुर्की की जाती है, कई बार बैंक द्वारा किसानों को मानसिक रूप से इतना ज़्यादा प्रताड़ित किया जाता है की वो आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं वहीँ दूसरी और उघोगपति करोड़ों का क़र्ज़ लेकर देश छोड़ छोड़कर भाग जाते हैं उन पर सरकार या बैंक की और से कोई खास कार्यवाही नहीं की जाती, देश में अनेक उघोगपति जिन पर करोड़ों का क़र्ज़ है कभी नहीं सुना की सरकार उनकी संपत्ति ज़ब्त करेगी या उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही करेगी।  सरकार और बैंकों की  मार गरीब और मजबूर किसान पर ही पड़ती है।

राजनेताओं द्वारा हमेशा से किसानों के मुद्दे पर अपनी राजनैतिक रोटियां ही सेंकी जाती रही हैं।  हर पार्टी इस मुद्दे पर अपना राजनैतिक फ़ायदा  देखते हुए एक दूसरे पर कीचड उछलती रहती है।  सत्ता और विपक्ष की राजनैतिक चक्की के दोनों पाटों के बीच हमेशा किसान ही पिसते आये हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया की राजनेताओं द्वारा किसान आत्महत्या के मुद्दे पर बहुत किया घटिया और आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं।  मन्दसौर में पुलिस की गोलीबारी में मरे गए किसानों को मध्यप्रदेश के नेता द्वारा आसामाजिक तत्व और अपराधी तक कहा गया।  मध्यप्रदेश के एक राजनेता ने अपने एक बयां में कहा की किसान भूत प्रेत के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।  एक और नेता का बयान था की किसान नशे की लत के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।

कुछ समय पहले ‘‘दैनिक भास्कर’’ समाचार पत्र ने सूखे की मार झोल रहे किसानों के लिए एक ‘‘अन्न्दाता के लिए अन्नदान’’ नाम का अभियान चलाया। इस अभियान के अंतर्गत आम जनता से अन्नदान करने को कहा गया और उनसे प्राप्त अन्न सूखे की मार झेल रहे किसान परिवारों को उपलब्ध कराया गया। दैनिक भास्कर द्वारा चलाये गये इस अभियान से किसानों को कुछ सहायता तो मिली लेकिन साथ ही एक गंभीर चिंता का विषय भी है कि जो किसान देश का अन्नदाता था आज वो इस स्थिति में है कि उसके लिए लोगों को अन्नदान करना पड़ रहा है। एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है ?

 शहाब ख़ान 'सिफ़र'

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