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Wednesday, December 26, 2018

रिज़र्व बैंक और सरकार का टकराव और अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत - ✍ मुकेश असीम

आखि़र 10 दिसम्बर को रिज़र्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल के इस्तीफ़े और 11 दिसम्बर को सरकार द्वारा वित्त  मंत्रालय में पूर्व सचिव तथा नोटबन्दी में मुख्य भूमिका निभाने वाले शक्तिकान्त दास को नया गवर्नर नियुक्त कर देने से सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच अर्थव्यवस्था के संकट से निपटने के तरीक़ों पर टकराव का वह एकमात्र समाधान हो गया जो मौजूदा व्यवस्था में मुमकिन था। यह मुद्दा तब चर्चा में आया था जब 25 अक्टूबर को रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या ने एक भाषण में कह दिया कि केन्द्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान न करने वाली सरकारें देर-सबेर वित्तीय बाज़ारों के गुस्से का शिकार होती हैं, अर्थव्यवस्था के तले अग्नि प्रज्वलित करती हैं और एक अहम नियामक निकाय को कमज़ोर करने के लिए एक दिन पश्चात्ताप करने को मजबूर होती हैं। इसके जवाब में वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने भी रिज़र्व बैंक पर तीखा हमला किया और उस पर खुले हाथ क़र्ज़ बाँटकर बरबाद होती बैंकिंग व्यवस्था की ओर से आँखें बन्द करने का आरोप लगाया। यह भी सामने आया कि वित्त मन्त्रालय तीन पत्र लिखकर रिज़र्व बैंक क़ानून की धारा 7 प्रयोग कर रिज़र्व बैंक को निर्देश देने के अपने अधिकार के इस्तेमाल की धमकी दे चुका है। इससे ही ख़बरें आने लगी थीं कि सरकार ऊर्जित पटेल को बर्ख़ास्त कर सकती है या वे ख़ुद ही इस्तीफ़ा दे सकते हैं। ग़ौरतलब है कि अब तक किसी सरकार ने इस अधिकार का प्रयोग नहीं किया था। स्पष्ट है कि इससे पहले पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्विरोध कभी इतने सघन एवं तीव्र नहीं हुए थे कि सत्ता के विभिन्न अंगों में टकराव इस हद तक बढ़ जाये।


नये गवर्नर की नियुक्ति के तुरन्त बाद आने वाले पहले बयान ही विवाद की वजह के बारे में काफ़ी कुछ संकेत दे देते हैं। उद्योगपतियों की प्रमुख संस्था कन्फे़ड्रेशन ऑफ़ इण्डियन इण्डस्ट्री ने नये गवर्नर की नियुक्ति को ‘उद्योगों के मनोबल में भारी वृद्धि’ बताते हुए भरोसा जताया है कि वे ‘अर्थव्यवस्था में नक़दी की कमी दूर करने के लिए फ़ौरी क़दम उठायेंगे।’ अन्य कई विश्लेषकों का कहना है कि वे बैंकों के लिए नियमों में ढील देंगे तथा पूँजी की लागत कम करने तथा नक़दी का प्रवाह बढ़ाने के लिए ब्याज दरें कम करेंगे। फिर भी पूँजीवादी व्यवस्था के दो अंगों के बीच यह टकराव इतना उग्र क्यों हुआ, इसके लिए हमें इसमें शामिल मुद्दों को समझना ज़रूरी है।

यह बात तो अब बुर्जुआ मीडिया के लिए भी छिपानी नामुमकिन होती जा रही है कि भारत की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अति-उत्पादन और घटती मुनाफ़ा दर के भँवर में गहरे तक फँस चुकी है। इसका ही असर है कि न सिर्फ़ वित्तीय बाज़ार में भुगतान और ऋण के लिए नक़दी का संकट है बल्कि ख़ुद सरकार की वित्तीय स्थिति संकट में है। एक ओर आम मेहनतकश जनता व मध्य वर्ग पर करों का बोझ बढ़ाते जाने लेकिन पूँजीपतियों से टैक्स वसूली में कमी, दूसरी ओर अनुत्पादक प्रशासनिक ख़र्च फ़ौज-हथियारों पर ख़र्च व पूँजीपतियों को तरह-तरह की छूटों में भारी वृद्धि से पूरे साल के बजट में जितने वित्तीय घाटे (6.24 लाख करोड़ रुपये) का अनुमान था, वर्ष के पहले 7 महीनों में ही उसका 104% घाटा (6.48 लाख करोड़) हो चुका है। वजह – चुनावी साल में ख़र्च तो बढ़ा है, पर टैक्स वसूली अनुमान से बहुत कम है। टैक्स आय 7 महीने में सालाना अनुमान की सिर्फ़ 44% है। वह तो सार्वजनिक क्षेत्र की सम्पत्ति की बिक्री से ग़ैर टैक्स आय अनुमान के 52% तक हो गयी है अन्यथा हालात और भी बदतर होते। स्थिति यह है कि अक्टूबर 18 में सरकारी आय अक्टूबर 17 से भी कम हो गयी है। ये भी ख़बरें मीडिया में आयी हैं कि आयकर व जीएसटी के रिफ़ण्ड को भी रोका जा रहा है ताकि इस वर्ष वित्तीय स्थिति को सँभाला जा सके।

ठीक आम चुनाव के पहले जब ज़्यादा ख़र्च की ज़रूरत पड़ने वाली है तब सरकार की हालत यह है कि हर मुमकिन जगह से रक़म का इन्तज़ाम करने में पसीने छूटे जा रहे हैं। ओएनजीसी, आदि सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों-बैंकों के पास जो रिज़र्व थे, वे पहले ही क़ब्ज़ा लिये गये हैं या कॉर्पोरेट ऋण माफ़ी में चुक गये। अब रिज़र्व बैंक का नम्बर है – उसके पास जो रिज़र्व कोष है उसमें से एक बड़ा हिस्सा अन्तरिम लाभांश के रूप में देने को कहा गया है। हालत यहाँ तक पहुँची कि चुपचाप हुक्म बजाने वाले ऊर्जित पटेल का धैर्य भी जवाब दे गया क्योंकि उसका पूँजीवादी मौद्रिक अर्थशास्त्र भी कह रहा है कि इसके बाद संकट की रोकथाम के लिए कुछ बचेगा नहीं। यह असन्तोष ही आरबीआई के मौजूदा/भूतपूर्व प्रबन्धकों के बयानों के रूप में खुल कर बाहर आ गया। यहाँ तक कि नवउदारवादी नीतियों के हिमायती बुर्जुआ आर्थिक विशेषज्ञों का एक हिस्सा भी संकट के आकार-प्रकार तथा उससे निपटने के मोदी सरकार के नग्न लूट वाले रवैये से भौंचक्का रह गया है। यही असन्तोष आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के 25 अक्टूबर वाले बयान में सामने आया।

प्रथम मुद्दा तो लगभग ढाई लाख करोड़ के क़र्ज़ वाले विद्युत उत्पादन संयन्त्रों का था जो अपने बैंक क़र्ज़ वापस नहीं कर पा रहे हैं, मगर इन क़र्ज़ों को अभी तक भी बैंकों ने औपचारिक रूप से एनपीए घोषित नहीं किया है। 12 फ़रवरी के रिज़र्व बैंक के सर्कुलर के अनुसार 6 महीने में क़र्ज़ वसूली नियमित न होने पर इन्हें एनपीए घोषित कर बैंकों को इनके खि़लाफ़ दिवालिया क़ानून के प्रावधानों के अन्तर्गत कार्रवाई करनी थी। मगर सरकार ऐसा नहीं चाहती थी बल्कि उल्टे वित्त मन्त्रालय के निर्देशानुसार ख़ुद एसबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि वह इन क़र्ज़ों का एक हिस्सा (अदानी, टाटा और एस्सार के क़र्ज़ इसमें शामिल हैं) माफ़ करने को तैयार है।

दूसरा मुद्दा, बुरी तरह संकट में घिरे 11 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का था जिनके पास पूँजी की सख़्त कमी है जिसके चलते रिज़र्व बैंक ने उन पर नये क़र्ज़ देने पर रोक लगा दी है। इस रोक को हटवाकर इन बैंकों द्वारा लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण दिलवाना सरकार की मंशा है। रिज़र्व बैंक के सामने समस्या है कि सरमायेदारों की लूट के बाद सार्वजनिक बैंकों की ऐसी हालत ही नहीं बची है जो वे ज़्यादा क़र्ज़ दे सकें। लेकिन नोटबन्दी, जीएसटी के असर से अर्थव्यवस्था में इजारेदारी बढ़ने से लघु-मध्यम कारोबार पर जो गहरी चोट पड़ी है उससे संघ के पुराने वफ़ादार टटपुँजिया तबक़े में बेचैनी है। मुद्रा स्कीम के जुमले से इन्हें लुभाया नहीं जा सका है। ठीक चुनाव से पहले इन्हें ख़ुश करने के लिए बीजेपी लघु-मध्यम कारोबारियों को बैंक ऋण की शर्तों में ढील देना चाहती है। 
तीसरा मसला यह है कि बैंकों से ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों तक पूरे वित्तीय क्षेत्र में ऋण व नक़दी का घोर संकट जारी है। उससे निपटने के लिए सरकार व रिज़र्व बैंक दोनों लाखों करोड़ रुपये की नक़दी उपलब्ध करा रहे हैं, पर संकट है कि बढ़ता जाता है। संकट के समाधान के उपायों पर मोदी-जेटली का कांग्रेस नियुक्त रघुराम राजन ही नहीं अपनी चहेती नियुक्ति वाले पनगढ़िया, अरविन्द सुब्रमनियम के बाद अब ऊर्जित पटेल/विरल आचार्य से भी टकराव व मनमुटाव हो चुका है, पर इलाज़ का उपाय नहीं मिला। क्योंकि पूँजीवाद में संकट की वजह नक़दी, ऋण व मुद्रा की कमी नहीं है। ये तो संकट का लक्षण तथा नतीजा हैं। संकट की वजह तो पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में है जहाँ प्रत्येक पूँजीपति अधिक मुनाफ़े के लिए अचर या स्थिर पूँजी – मशीनों/तकनीक – में अधिकाधिक निवेश कर कम चर पूँजी या श्रम शक्ति के प्रयोग से अधिकाधिक उत्पादन करने का प्रयास करता है। इसके लिए पूँजी भारी मात्रा में वित्तीय क्षेत्र से ऋण लेकर एकत्र की जाती है। लेकिन बढ़ती अचर पूँजी पर मुनाफ़ा पाने के लिए बिक्री भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए। पर सभी पूँजीपतियों के ऐसा करने पर सबकी बिक्री बढ़ना मुमकिन नहीं होता क्योंकि आवश्यकता होने पर भी लोग क्रय क्षमता के अभाव में बाज़ार में पटे पड़े माल को ख़रीद नहीं सकते। यही पूँजीवाद का अति-उत्पादन है। यही स्थिति आज सामने है। पिछले वित्तीय संकट को टालने के लिए सरकार और रिज़र्व बैंक के प्रोत्साहन पर सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय बैंकों ने पूँजीपतियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर क़र्ज़ दिये। पर इस बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता के उत्पाद बाज़ार में बिक न सके – कई साल से उद्योग लगभग 70% क्षमता पर ही काम कर पा रहे हैं, अतः उनकी मुनाफ़ा दर घटने लगी और वे क़र्ज़ की किश्त/ब्याज चुकाने में असमर्थ हो गये। यही ऋण व नक़दी संकट का मूल कारण है, जिसे सिर्फ़ रिज़र्व बैंक द्वारा मुद्रा प्रसार बढ़ाने से हल नहीं किया जा सकता। जब संकट उत्पादन व्यवस्था में हो तो ऋण व मुद्रा प्रसार से उसको कुछ वक़्त के लिए टाला तो जा सकता है, हल नहीं किया जा सकता। पर वो टालने का काम भी यूपीए के वक़्त में हो चुका, अब वह भी नहीं हो पा रहा है। अब पूँजीवादी व्यवस्था में इसका एक ही समाधान है – कुछ उद्योगों का दिवालिया होकर बन्द हो जाना, बेरोज़गारी का बेतहाशा बढ़ना।

फिर इसमें रिज़र्व बैंक के पूँजी कोष की मात्रा व सार्वजनिक बैंकों पर नियन्त्रण के मुद्दे भी जुड़ गये। यह ख़बर आने लगी कि वित्त मन्त्रालय के मतानुसार यह पूँजी कोष ज़रूरत के मुक़ाबले बहुत अधिक है और इसमें अधिक पैसा डालकर रिज़र्व बैंक सरकार को दिये जाने वाले लाभांश की तादाद कम कर रहा है, अतः ज़रूरत से अधिक पूँजी कोष सरकार के खाते में हस्तान्तरित किया जाना चाहिए। हालाँकि मुद्दे के चर्चा में आ जाने और फलस्वरूप काफ़ी विश्लेषकों द्वारा सरकार की वित्तीय स्थिति के संकट पर सवाल उठाने के बाद सरकार ने ऐसे किसी इरादे से इन्कार करना शुरू कर दिया। वस्तुस्थिति यही है कि वृद्धि के बड़े-बड़े दावों के बावजूद सरकार की टैक्स वसूली बढ़ नहीं रही है, जबकि चुनावी साल में भारी ख़र्च सामने है। अतः भारी वित्तीय घाटे का सामना कर रही सरकार रिज़र्व बैंक की तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की रिज़र्व पूँजी के एक हिस्से को लाभांश के रूप में दिये जाने का दबाव डाल रही है, जिससे रिज़र्व बैंक सहमत नहीं है क्योंकि उसकी राय में तब आगामी संकटों से निपटने के लिए उसके पास रिज़र्व कोष समाप्त हो जायेगा।

19 नवम्बर को बोर्ड की 9 घण्टे की लम्बी बैठक में ही मोदी-जेटली ने रिज़र्व बैंक से कई रियायतें हासिल कर लीं। रिज़र्व बैंक की रिज़र्व पूँजी के मसले पर एक संयुक्त कमिटी बना दी गयी और घाटे वाले बैंकों पर सख़्त नियन्त्रण हटाने व लघु-मध्यम उद्योगों को क़र्ज़ की शर्तों में ढील पर रिज़र्व बैंक ने विचार का भरोसा दिया। पर नक़दी की कमी से जूझ रही सरकार के लिए सबसे बड़ी राहत थी – बैंकों की 9% पूँजी आवश्यकता का 0.625% हिस्से की वृद्धि को 2020 तक के लिए टलवा देना। अब बिना नयी पूँजी डाले, जो सरकार डालने की स्थिति में नहीं है, बैंक 3.7 लाख करोड़ के नये क़र्ज़ दे पायेंगे। रिज़र्व बैंक ने ये भी मान लिया कि लघु-मध्यम उद्योगों को क़र्ज़ देने की शर्तों में ढील दी जायेगी और वसूली न होने पर भी 25 करोड़ रुपये तक के क़र्ज़ को तुरन्त एनपीए घोषित करने से बचाव के उपाय किए जायेंगे।

इसका प्रभाव क्या होगा? बैंक नये क़र्ज़ देंगे, उन्हें जल्दी एनपीए घोषित नहीं करेंगे तो कुल क़र्ज़ की तादाद बढ़ जायेगी, एनपीए की नहीं बढ़ेगी, तो एनपीए का % घट जायेगा, बैंक ऊपरी तौर पर स्वस्थ नज़र आने लगेंगे। सरकार दावा कर सकेगी कि उसने वित्तीय व्यवस्था को संकट से निकाल लिया।
उद्योग भी नयी नक़दी मिलने से कुछ वक़्त तक सेहतमन्द नज़र आने लगेंगे, क़र्ज़ की वसूली का दबाव घटने से अतिरिक्त फ़ायदा होगा। नोटबन्दी/जीएसटी के बाद से बेचैन संघ समर्थक टटपुँजिया सरमायेदार तबक़ा चुनाव के वक़्त ख़ुश और अहसान से दबा होगा।

लेकिन क्या नये क़र्ज़ देने से उद्योगों की समस्या दूर हो जायेगी?
कुछ दिन पहले ही विभिन्न बाज़ार विश्लेषकों के विश्लेषण से यह सामने आया था कि असली समस्या औद्योगिक मुनाफ़े की दर का कम होना है क्योंकि पूँजी का निवेश जिस बड़े पैमाने पर किया गया है उत्पादन का स्तर उसके मुक़ाबले नहीं बढ़ पा रहा और औसत प्रति इकाई पूँजी पर मुनाफ़ा लगातार नीचे जा रहा है। मॉर्गन स्टेनली व सीएलएसए के अनुसार निफ्टी/सेंसेक्स की कम्पनियों की कुल पूँजी पर आय अर्थात प्रति इकाई मुनाफ़ा दर गिर रही है। इस वर्ष यह पिछले साल के मुक़ाबले 5.5% और कम होगी जो 11 तिमाहियों में सबसे बड़ी गिरावट है। एक और विश्लेषक संस्था एमके ग्लोबल के अनुसार मुनाफ़ा दर पिछले दस साल से कम हो रहा है – सबसे बड़ी कम्पनियों के लिए यह दर 25% से आधी होकर 12.5% रह गयी है, लेकिन अन्य कम्पनियों के लिए तो यह जोखिम रहित निवेश जैसे बैंक में जमा पर होने वाली आय से भी कम हो चुकी है जैसे लघु-मध्यम उद्योगों के लिए तो यह मात्र 5-6% पर जा पहुँचा है। इसलिए इनका निष्कर्ष है कि यह चक्रीय नहीं बल्कि ढाँचागत समस्या है।

पर बैंक क़र्ज़ पर ब्याज तो पूँजीपति उत्पादन से प्राप्त मुनाफ़े में से ही चुकाता है। यह ब्याज दर अब लगभग 9-10% है। उद्योग में लगी पूँजी का लगभग 80% बैंक, आदि वित्तीय पूँजीपतियों से ही आता है। मगर कुल पूँजी पर उत्पादन से लाभ दर 5-6% हो तो 80% वित्तीय पूँजी पर 9-10% की दर से ब्याज कैसे चुकाया जाये? यही औद्योगिक-वित्तीय दोनों संकट के मूल में है जिसका शिकार कुछ इजारेदार पूँजीपतियों को छोड़कर सब हो रहे हैं। 2-3 साल पहले तक अमेरिकी-यूरोपीय-जापानी केन्द्रीय बैंकों द्वारा अथाह नक़दी प्रवाह से विश्व थोक पूँजी बाज़ार में ब्याज दरें लगभग शून्य तक पहुँच गयीं थीं तब बड़े पैमाने पर भारतीय पूँजीपतियों (बैंक-उद्योग दोनों) ने विदेशी मुद्रा में सस्ते ब्याज पर ऋण लेकर संकट को टाला था, मगर अब वहाँ भी ब्याज दर बढ़ रहा है, साथ में डॉलर भी महँगा हो रहा है; दोनों के संयुक्त प्रभाव से अब उस क़र्ज़ की लागत भी 8-10% तक पहुँच रही है।
अतः सरकार बैंकों की तिज़ोरी का मुँह खोलकर जो नक़दी डालेगी और उसकी वसूली में छूट देगी, वह तात्कालिक राहत ही होगी, क्योंकि वसूली अनिश्चित काल तक तो टाली नहीं जा सकती। लेकिन उत्पादन में विस्तार की गुंजाइश कहाँ है? ख़रीदार कहाँ है? मुनाफ़ा बढ़ेगा कैसे? श्रमिकों को और कम मज़दूरी देकर, कम श्रमिकों से ही ज़्यादा उत्पादन कराकर भी मुनाफ़े को कितना बढ़ाया जा सकता है जब मज़दूरी पहले से ही बहुत कम है, पहले से ही श्रमिकों का ख़ून बेइन्तहा निचोड़ा जा चुका है।

मुनाफ़ा नहीं बढ़ेगा, पूँजी और बढ़ जायेगी, तो मुनाफ़ा दर और नीचे ही जायेगी, क़र्ज़ चुकाये नहीं जा सकेंगे, उद्योग व बैंक दिवालिया होंगे ही, इसको कुछ वक़्त के लिए टाला जा सकता है, अनिश्चितकाल के लिए नहीं।
इस टकराव का और एक पहलू है कि बुर्जुआ आर्थिक सिद्धान्तकारों के एक बड़े खेमे के अनुसार बाज़ार प्रतियोगिता में जो पूँजीपति कमज़ोर पड़े, पर्याप्त पूँजी न जुटा पाये, उसे डूब जाने देना बेहतर है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सरकार को बाज़ार के क्रियाकलाप में दखल नहीं देना चाहिए। उसका काम टैक्स के पैसे से पूँजीवादी वर्ग की राजसत्ता को प्रबंधित करना और कायम रखना है। उसे टैक्स वसूली की रक़म को किसी और काम में नहीं लगाना चाहिए – न तो जनकल्याण के कामों में, न ही किसी पूँजीपति विशेष के बचाव में। कमज़ोर पूँजीपतियों को किनारे करते जाने से पूँजीवाद लम्बे वक़्त तक मजबूत रहेगा। मौद्रिक अर्थशास्त्री (राजन, पटेल, आचार्या, आदि सब इसी समूह से हैं) ख़ास तौर से यही कहते आये हैं कि सरकार को वित्तीय घाटे में नहीं होना चाहिए। आचार्या से भी ज़्यादा ज़ोर से इस बात को दूसरे डिप्टी गवर्नर विश्वनाथन ने कहा कि क़र्ज़दारों को बचाने का काम रिज़र्व बैंक का नहीं है। फिर रघुराम राजन भी इनकी हिमायत में मैदान में उतरे और कहा कि यहाँ नक़दी का नहीं, दिवालिया होने का सवाल है इसलिए इसका समाधान रिज़र्व बैंक की तिज़ोरी खोलने से नहीं, पूँजीपतियों द्वारा और पूँजी लगाने से होगा जो उन्हें बाज़ार से जुटानी चाहिए या सरकार मदद करना चाहती है तो टैक्स लगाकर पैसा जुटाये। लेकिन एक दूसरा खेमा भी है। 20वीं सदी में गहराते पूँजीवादी संकट और सर्वहारा क्रान्तियों की शुरुआत के बाद जॉन मेनार्ड कींस, आदि बुर्जुआ अर्थशास्त्री नया विचार लाये। कींस का मशहूर कथन है – ‘लम्बे वक़्त में तो हम सब मर जायेंगे!’ अर्थात कुछ बड़े पूँजीपतियों को डूबने दिया गया तो पूँजीवाद की पूरी इमारत ही ढह जा सकती है। इसलिए पूँजीवादी सरकारों की ज़िम्मेदारी है कि कहीं से रक़म जुटाकर या घाटे के बजट अर्थात क़र्ज़ लेकर भी पूँजीपतियों के बचाव के कदम उठायें। वैसे असल में तीसरा रास्ता अख़्तियार किया जाता है – जब सवाल जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी सुविधाओं पर ख़र्च का हो तो पूरा पूँजीपति वर्ग एक राय से मौद्रिक नीति का समर्थक हो जाता है – ग़रीब मज़दूर-किसानों को खैरात-सबसिडी, राशन क्यों, उससे वे कामचोर बन जाते हैं, जैसा कुछ दिन पहले मद्रास हाई कोर्ट ने भी कहा! सब निजी करो, जो ख़रीद सकता है ख़रीदे। पर जब किसी सरमायेदार पर विपत्ति आए तो अर्थव्यवस्था बचाने के नाम पर नये-नये टैक्स लगाकर पूँजीवादी सरकार उसके बचाव का इन्तज़ाम करती है। इस नीति पर सरकार-रिज़र्व बैंक दोनों में सैद्धान्तिक तौर पर एकराय है। इस सैद्धान्तिक सहमति के बावजूद अब सिर फुटव्वल की वजह क्या है?

वजह है कि सरकार इस सहमति को अब तोड़ रही है; पेट्रोल-डीजल से जीएसटी तक तमाम कि़स्म के टैक्स लगाने व कर वसूली में बढ़त के सारे दावों के बावजूद सरकार पूँजीपतियों की मदद लायक़ रक़म का इन्तज़ाम नहीं कर पा रही; ओएनजीसी, एलआईसी जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को वह पहले ही दुह चुकी। अब रिज़र्व बैंक की पूँजी अर्थात नये नोट छापने की उसकी क्षमता का इसके लिए इस्तेमाल करना चाहती है। यह स्थिति सिर्फ़ भारत में ही नहीं है। कुछ दिन पहले ट्रंप भी फेडरल रिज़र्व के पॉवेल पर भड़ास निकाल चुका है, उधर थेरेजा मे बैंक ऑफ़ इंग्लैण्ड पर भड़की हुई है! क्यों?

मार्क्स ने बहुत पहले बताया था कि सारे बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट का हल मुद्रा, नक़दी, ऋण के क्षेत्र में ढूँढ़ते हैं लेकिन संकट की वजह ये नहीं है। असल संकट तो उत्पादन के क्षेत्र में है; अतिउत्पादन और मुनाफ़े की गिरती दर की प्रवृत्ति मुद्रा, नक़दी, ऋण का संकट पैदा करती है। मूल संकट का समाधान पूँजीवाद में मुमकिन ही नहीं। इसलिए किसी तात्कालिक उपाय की तलाश में ये आपसी सिर फुटव्वल हो रही है।

लेखक :  मुकेश असीम
साभार :  मज़दूर बिगुल,  दिसम्‍बर 2018 अंक  

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