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Tuesday, January 1, 2019

श्रद्धांजलि - अभिनय और कलम के जादूगर क़ादर खान

साल 2019 का पहला दिन एक बुरी खबर साथ लेकर आया मशहूर बॉलीवुड कलाकार, लेखक/ निदेशक, क़ादर ख़ान अब हमारे बीच नही रहे, क़ादर ख़ान सिने जगत का एक सितारा नही बल्कि वह इकलौती शख्सियत थे जिन्होंने तकरीबन एक हजार फिल्मो के लिये काम किया है। एक से बढकर एक फिल्मों के डायलाग लिखे और अभिनय किया। उनके लिखे डायलाग पर अभिनय करके कई अभिनेता 'मुकद्दर का सिकंदर' बन गए। अफगानिस्तान के काबुल में पैदा हुए क़ादर खान का संघर्ष अपने आप में एक मिसाल है, काबुल से पाकिस्तान और पाकिस्तान से मुंबई और मुंबई में भी एशिया के सबसे बड़े स्लम एरिया कमाठीपुरा में अपनी जिंदगी के 18 साल गुजारने वाला यह काबुली पठान सिने जगत का मशहूर संवाद लेखक बन गया, जिंदगी जितने गम क़ादर को देती उन पर उतने ही तीखे प्रहार से उनकी कलम चलती, जिसके नतीजे में दर्शको को उनके डायलाग मुंहजबानी याद होते चले गए, मुकद्दर का सिकंदर का वह डायलाग भला कौन भूल सकता है जिसमें कब्र पर बैठा हुआ एक फक़ीर अनाथ बच्चों से कहता है कि दुःख को गले लगा, सु:ख को ठोकर मार, सुःख तो थोड़ी देर के लिये आता है और चला जाता है, लेकिन असली साथी तो दुःख है जो एक बार आता है तो फिर कभी वापस नही जाता।

क़ादर खान एक सिविल इंजीनियर थे, खाली समय में ड्रामा लिखते और थिएटर के लिये काम करते, साथ ही मुहल्ले के बच्चों को घरो से ढूंढ ढूंढकर लाते और उन्हें फ्री में पढाते, जब कादर अपनी पहली फिल्म 'खेल खेल में' के लिये डायलाग लिख रहे थे उसी दौरान वे बच्चों को ट्यूशन भी दे रहे थे, स्टूडियो से बाहर आते ही वे कभी सीधे अपने घर नही गए बल्कि पहले समाजिक जिम्मेदारी को निभाया करते थे, वे जिन छात्रो को पढाते थे उनमें से अक्सर फर्स्ट डिवीजन लाकर पास होते थे। मुंबई की एक मस्जिद में इमामत करने वाले अफगानी पठान के इस बेटे ने जिंदगी के हर उस दुःख और गरीबी को सहा है, जिसका सामना एक मुफलिसी में डूबे हुए परिवार का बच्चा करता है। कमाठीपुरा में फाक़ो में जिंदगी बसर करने वाला यह बच्चा जब भी घर में फाका देखता तो हर बार उसके बचपन की मौत हो जाती, यही बच्चा जब बड़ा हुआ तो वह इंजीनियर बना और इंजीनियर से डायलाग राईटर, और अभिनेता बना, वह जब लोगो को हंसाने पर आता तो हंसा हंसा कर दर्शको के पेट में दर्द कर देता और जब बेबसी जाहिर करने पर आता तो लोगों की आंखों से आंसू निकाल देता, और खलनायक बनता तो दर्शकों के गुस्से को उनके चेहरे पर उतार देता। यह कादर की खूबी थी, और यही उनकी कामियाबी भी, उन्होने सिने जगत को वही दिया जो उन्हें कमाठीपुरा के स्लम से मिला, उन्होंने वही संवाद सिने जगत को दिए जिनका सामना उन्होंने निजी जिंदगी मे किया था। फाकों में रहकर रोटी के लिये तरसने वाला यह लेखक जब जिंदगी के अनुभव कागज पर लिखकर पर्दे पर उतार रहा था उस वक्त उसके पास रोटी तो थी लेकिन भूख मर चुकी थी। ऐसी महान शख्सियत को सिने जगत ने आज खो दिया, कादर साहब लंबे समय तक लोगों के दिलो पर राज करेंगे। 'लोकल ट्रेन' का लेखक/ निदेशक, अभिनेता अपना सफर पूरा करके चला गया, और लोगों से कह भी गया
एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी तो कोई देर से जाने वाला।
इस महान हस्ती को खिराज ए अक्रीदत अल्लाह मरहूम की मग़फिरत फरमाए - आमीन

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