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Thursday, March 21, 2019

नज़रिया : राजनीति में बढ़ता अवसरवाद #सिफ़र

लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है। सभी पार्टियों ने चुनाव की तैयारियां और रणनीति बनानी शुरू कर दी हैं। साथ ही राजनेताओं द्वारा दल बदल का दौर भी शुरू हो गया हैं। कांग्रेस, बीजेपी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अन्य पार्टियों में भी नेताओं का अपनी पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाने का खेल शुरू हो चूका है।  जब कोई नेता अपनी पार्टी छोड़कर अन्य किसी पार्टी में शामिल होता है तो लोग और मीडिया उसे बाग़ी कहते हैं सही मायने में उसे बाग़ी कहने के बजाये अवसरवादी कहना ज़्यादा सही है। राजनीति में फायदे और नुकसान के हिसाब से फेरबदल होते रहते।  वर्तमान में अवसर का फायदा उठाकर राज करने की नीति ही राजनीति बन गई है।  हर मुद्दे को अवसर को तौर पर इस्मेमाल किया जाने लगा है।  सिद्धांतों की जगह अवसरवाद ने ले ली है। 

जब तक राजनेता किसी पार्टी के सदस्य होते हैं अपनी पार्टी और अपने नेता को सबसे बेहतर बताते हैं। अपनी पार्टी की नीति और सिद्धांत को अन्य सभी पार्टियों से अच्छा मानते हैं। अपने पार्टी के नेतृत्व को योग्य और ईमानदार मानते हैं, लेकिन जैसे ही वो अपनी पार्टी छोड़कर कोई दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं तो फिर उन्हें अपनी पूर्व पार्टी और नेतृत्व में कमियां और बुराइयां नज़र आने लगती हैं। अपनी पूर्व पार्टी और नेतृत्व पर आरोपों की बौछार शुरू हो जाती है, और जिस नई राजनैतिक पार्टी में शामिल होते हैं उस पार्टी और उसके नेतृत्व को सर्वश्रेष्ट बताने लगते हैं भले ही पहले अपनी पूर्व पार्टी में रहते हुए इस पार्टी पर कितने भी आरोप क्यों न लगाते रहे हों। जब  कोई नेता एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है तो वो दूसरी पार्टी भी उस नेता को हाथों हाथ लेती हैं क्योंकि उसके पार्टी में शामिल होने से उस राजनैतिक पार्टी को कई तरह के फायदे मिलते हैं। उस नेता का वोट बैंक अपनी पार्टी को मिलने की सम्भावना होती है, विरोधी पार्टी पर आरोप लगाने का मौक़ा मिलता है साथ ही विरोधी पार्टी के कमज़ोर होने से राजनैतिक फायदा भी मिलता है। 


राजनीति में  राजनैतिक फायदे-नुकसान के आधार पर गठबंधन बनते टूटते हैं। कहा जाता है राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न स्थाई दुश्मन होता है।  वक़्त और राजनैतिक समीकरण के हिसाब से राजनैतिक रिश्ते बनाये और तोड़े जाते हैं। राजनेता वर्तमान फायदे नुकसान के आधार पर पार्टी बदलते रहे हैं। कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रही पार्टियां सरकार बनाने के लिए गठबंधन कर लेती हैं। बीजेपी और शिवसेना में लगातार गतिरोध चलता रहा शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं द्वारा लगातार सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना तक की गई।  कुछ समय पहले तक ऐसा प्रतीत होने लगा था की बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूट सकता है, उसके बाद भी बीजेपी ने वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए गठबंधन करना पड़ा। बिहार में बीजेपी को पिछले चुनाव में अपनी जीती सीटों में से कुछ सीटें गठबंधन के सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ी।  कभी एक दूसरे के धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी के विकल्प के रूप में खुद को देखने वाली आम आदमी पार्टी भी दिल्ली में गठबंधन करने की कोशिश में लगी है। एक तरफ़ विपक्ष संयुक्त रूप से महागठबंधन की तैयारी में लगा है।

देश की राजनीति में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनमे एक दूसरे की धुर विरोधी पार्टीयों ने सत्ता के लिए गठबंधन किया है, साथ ही ऐसे भी कई उदाहरण हैं जिनमे चुनावी समीकरण के हिसाब से गठबंधन को तोड़ा भी है।  कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी  दोनों ही पार्टियों के विचारों में कोई समानता न होने के बावजूद सत्ता के लिए गठबन्धन की सरकार बनाई बाद में बीजेपी ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी। गोवा के चुनावी नतीजों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन  निर्दलीय और अन्य विधायक को जोड़कर बीजेपी ने सरकार बनाई।  गोवा में निर्दलीय और अन्य विधायकों ने बीजेपी को समर्थन देकर अवसर का फायदा हासिल किया। कर्नाटक में विधानसभा में एक दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई।  वर्तमान में भी कांग्रेस और जेडीएस लोकसभा चुनाव में गठबंधन करके चुनाव लड़ रहे हैं।

कभी एक दूसरे के विरोधी रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने बिहार में बीजेपी को हारने के लिए गठबंधन  करके चुनाव लड़ा था।  बिहार चुनाव से पहले नितीश कुमार और बीजेपी में काफी गतिरोध था, उस समय नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों के ही पास बीजेपी को रोकने के लिए गठबंधन ही एकमात्र विकल्प था।  गठबंधन से दोनों ही पार्टियों को राजनैतिक फायदा भी हुआ, लालू नितीश को चुनाव में जीत मिली और बिहार में गठबंधन की सरकार बनी। बिहार चुनाव के समय बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था की अगर नितीश कुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे तो पाकिस्तान में फटाके फूटेंगे, तब ये बात इसलिए कही गई थी क्योंकि तब नितीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे। नितीश कुमार ने इस्तीफा दिया और 24 घंटे के अंदर ही दुबारा बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।  वर्तमान में नितीश कुमार और बीजेपी को दोनों को  साथ आने में फायदा नज़र आ रहा है, इसलिए पुराने मतभेदों को भुला दिया गया।  एक समय नितीश कुमार ने अपनी छवि को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए मोदी और बीजेपी का विरोध किया था क्योंकि तब उन्हें खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने में राजनैतिक फायदा नज़र आ रहा था लेकिन वर्तमान में उन्हें बीजेपी से हाथ मिलाने में फायदा नज़र आ रहा है।  हालाँकि नितीश कुमार की पार्टी  जदयू के कई नेता बीजेपी से गठबंधन के पक्ष में नहीं है। जदयू के वरिष्‍ठ नेता शरद यादव नितीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल भी नहीं हुए हैं, वहीँ जेडीयू सांसद वीरेंद्र कुमार ने कहा की ''अगर उन्‍हें जबरदस्‍ती एनडीए का समर्थन करने को कहा गया तो वो इस्‍तीफा दे देंगे''।  इस सब घटनाक्रम में एक बार फिर देश के सामने अवसरवाद की राजनीति का एक और नया चेहरा नज़र आया है।  

गठबंधन और दलबदल के साथ विभिन्न मुद्दों को राजनैतिक फायदे नुकसान के आधार पर इस्तेमाल किया जाता है।  हर मुद्दे को अवसर के अनुसार उछाला और दबाया जाता है।  धर्म, जाति, क्षेत्रवाद विभिन्न मुद्दों को अवसर के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।  किसी मुद्दे को एक राज्य में राजनैतिक फायदा मिलने की सम्भावना के आधार पर अपने एजेंडे में शामिल किया जाता है तो उसी मुद्दे को किसी अन्य राज्य में राजनैतिक नुकसान की सम्भावना को देखते हुए छोड़ दिया जाता है, उदाहरण के तौर पर बीफ बैन का मुद्दे को ही देख लें, राम मंदिर मुद्दे के बाद बीजेपी का दूसरा सबसे प्रमुख मुद्दा था, विभिन्न राज्यों में बीजेपी ने राजनैतिक फायदे के लिए इसे खूब इस्तेमाल किया है, वहीँ दूसरी और गोवा और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में इस मुद्दे से परहेज़ किया है।  एक तरफ बीजेपी पूरे देश में बीफ बैन की बात कहती है वहीँ दूसरी और गोवा बीफ पर कोई बैन नहीं है।  ये भी असरवाद की राजनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है।  बहुत से मुद्दों को सत्ता और विपक्ष अपने अपने वर्तमान राजनैतिक फायदे के आधार पर अपने एजेंडे में शामिल करते है और निकालते हैं। विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों को देशविरोधी, जनविरोधी कहा जाता है सत्ता में आने के बाद उन्ही मुद्दों को प्रमुखता से अपने एजेंडे में शामिल कर लिया जाता है।  देश में ऐसे कई उदाहरण है जब विपक्ष में रहते हुए विरोध करने वाली पार्टी ने सत्ता हासिल करने के बाद अपने सुर बदले हों, उदाहरण के तौर पर हम FDI, GST, आदि को देख  सकते हैं जिसे बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए इन्हे जनविरोधी कहते हुए सड़क से संसद तक विरोध किया था और सरकार बनने के बाद इन्हे लागू किया, इनके अलावा और भी बहुत से उदाहरण हैं।

राजनीति में अवसर का लाभ लेने के लिए दल बदल होता रहा है, गठबंधन बनते और टूटते रहे हैं। अवसरों का लाभ लेने के लिए जनता की मांग और महत्वपूर्ण मुद्दों को दरकिनार कर दिया जाता रहा है। वर्तमान में भी यही हो रहा है। अवसरवाद की राजनीतिक चक्की में जनता सत्ता और विपक्ष के दो पाटों के बीच पिसती जा रही है। जब तक राजनेता और राजनैतिक पार्टियां अवसरवाद को छोड़कर देशहित के बारे  में नहीं सोचेंगे तब तक देश का विकास हो पाना संभव नहीं हैं ।

शहाब ख़ान  'सिफ़र'

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