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Wednesday, May 15, 2019

ऐसे हास्यास्पद दावे क्यों करते हैं मोदी ? ✍ रवीश कुमार

दुनिया में डिजिटल कैमरा कब आया, दुनिया में आने के बाद भारत कब आया, दुनिया में ईमेल कब लॉन्‍च हुआ और भारत में ईमेल कब लॉन्‍च हुआ. प्रधानमंत्री ने जब से एक इंटरव्यू में जवाब दिया है 2019 के चुनाव का आखिरी चरण क्विज़ शो में बदल गया है. जितने भी लोग इस सवाल को लेकर टेंशन में थे कि कौन जीतेगा, बीजेपी को कितनी सीटें आएंगी, यूपी में महागठबंधन का क्या होगा, वे सारे लोग डिजिटल कैमरा कब आया, यह पता लगाने में व्यस्त हैं. यही नहीं ईमेल कब लॉन्‍च हुआ इसकी भी खोज हो रही है. प्रधानमंत्री ने न्यूज़ नेशन नामक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि 'शायद देश में हो सकता है, मुझे मालूम नहीं, मैंने पहली बार डिजिटल कैमरा का उपयोग किया था. 87-88 में शायद और उस समय बहुत कम लोगों के पास ईमेल रहता था. तो मेरे यहां विरमगाम तहसील में आडवाणी जी की सभा थी, मैंने डिजिटल कैमरे से उनकी फोटो ली. तब डिजिटल कैमरा इतना बड़ा आता था. मेरे पास था. उस समय मैंने फोटो निकाली और मैंने दिल्ली को ट्रांसमिट किया. अब दूसरे दिन कलर छपी तो आडवाणी जी को सरप्राइज़ हुआ कि दिल्ली में मेरी कलर फोटो आज के आज कैसे छपी?


चूंकि प्रधानमंत्री बटुआ नहीं रखते हैं तो डिजिटल कैमरा कैशलेस ख़रीदा होगा क्योंकि तब बार्टर सिस्टम तो था ही. हिन्दी में इसे वस्तु विनिमय प्रणाली कहते हैं. आज भी है. गांव में बहुत से लोग धान देकर आइसक्रीम खरीद लेते हैं. लेकिन तब क्या क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड आ गया था. अब इस तरह से आप प्रधानमंत्री के जवाब पर रिसर्च करेंगे तो उस युग में पहुंच जाएंगे जहां से लौटना मुश्किल हो जाएगा. जितना कहा है कि उतने का ही रिसर्च होना चाहिए. और इसलिए होना चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री की बात दूर-दूर तक पहुंचती है. लोग उनकी बातों पर विश्वास करते हैं. अगर तथ्य सही नहीं रहे तो ग़लत जानकारी या ग़लती से निकली जानकारी लोगों के दिमाग़ में तथ्य बनकर रह जाएगी. ऐसे ही स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि 5वीं ता छात्र 2 दूसरी की किताब नहीं पढ़ पाता है. विरोधी और ट्विटर पर खलिहर लोग ख़ूब मज़ा ले रहे हैं. प्रधानमंत्री के विरोधी अहमद पटेल ने ट्वीट कर दिया. 'जहां तक मेरी याददाश्त जाती है, भारत में पब्लिक इंटरनेट सर्विस 1995 में ही शुरू हुआ था. मुझे नहीं पता कि 1987-88 में प्रधानमंत्री किसे और कैसे ईमेल भेज पा रहे थे.'
क्या तारीख को लेकर प्रधानमंत्री की ज़बान फिसल गई. कई बार लाइव इंटरव्यू में बोलते वक्त चीज़ें ग़लत हो जाती हैं. ये हो सकता है. अच्छा होता प्रधानमंत्री ट्वीटर हैंडल पर इसे क्लियर कर देते. लगता है कि प्रधानमंत्री भी विपक्ष को उलझा कर खुश हैं कि कम से कम डिजिटल कैमरा और ईमेल पर रिसर्च तो हो रहा है. तथ्य क्या हैं.
31 मार्च 1986 में राजीव गांधी की सरकार में विदेश संचार निगम लिमिटेड लॉन्‍च हुआ था. भारत में गांधी जयंती के दिन 1991 में वीएसएनएल ने ईमेल यानी इलेक्ट्रॉनिक मेल लॉन्‍च किया था. 1991 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे. 21 जून 1991 को उन्होंने शपथ ली थी. 24 फरवरी 1992 तक भारत में मात्र 100 यूज़र थे. जिन्हें सब्सक्राइबर कहते हैं. मुंबई में 50 सब्सक्राइबर थे और दिल्ली में 25. भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर, टाटा कंसलटेंसी सर्विस जैसे चुनिंदा संस्थानों के पास ईमेल था. हमने यह जानकारी 24 फरवरी 1992 के टाइम्स ऑफ इंडिया से ली है. इस रिपोर्ट में वीएसएनएल ने कहा है कि हर महीने 25 नए सब्सक्राइबर जुड़ रहे हैं.
वैसे एक जानकारी और है. किसी भी ईमेल के साथ पहला अटैचमेंट मार्च 1992 में भेजा गया था. ये अटैचमेंट एक तस्वीर थी. भेजने वाले का नाम नथानियल बोरेंस्टाइन था जबकि बकौल मोदी वो 87-88 में फोटो अटैचमेंट भेज चुके थे. इस लिहाज़ से प्रधानमंत्री ने भी ईमेल होने की बात ग़लत बताई. 87-88 में ईमेल से कैसे भेज दिया जबकि ईमेल आया ही 1992 में. उनकी आलोचना करने वाले अहमद पटेल ने भी सही बात नहीं बताई. उन्होंने भी साल ग़लत बताए और इंटरनेट और ईमेल में फर्क करना भूल गए. भारत में इंटरनेट सेवा 15 अगस्त 1995 को लॉन्‍च हुई. विदेश संचार निगम लिमिटेड ने ही की है. रिसर्च के दौरान यह भी पता चला कि मोबाइल फोन से पहला कॉल 1995 में बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बासु ने किया था. अगस्त 1995 में ज्योति बसु ने उस समय के दूर संसार मंत्री सुखराम को फोन किया था. सुखराम जो कि बीजेपी से कांग्रेस, कांग्रेस से बीजेपी यहां से वहां जाते हुए अब कांग्रेस में आ गए हैं. लेकिन सोचिए कि ईमेल को लेकर प्रधानमंत्री इतनी बड़ी ग़लती कर जाएं वो भी उस इंटरव्यू में जिसका एक टुकड़ा लोग ट्वीट कर रहे हैं कि सवाल पहले से लिखे हुए थे ठीक नहीं है.
कांग्रेस की दिव्या स्पंदना ने ट्विट किया है कि न्यूज़ नेशन को जो इंटरव्यू दिया है उसका एक हिस्सा ज़ाहिर करता है कि सवाल पहले लिखकर भेजे गए थे. जब कविता का सवाल आता है तो प्रधानंमत्री फाइल की तरफ इशारा करते हैं, जिसमें कविता लिखी है. लेकिन अगले शॉट में दिखता है कि उनके हाथ में कविता का पन्ना है और उस पन्ने के ऊपर कविता वाला सवाल लिखा है. जवाब भी टाइप किया हुआ है. पहले ही आरोप लगता रहा है कि प्रधानमंत्री पहले सवाल मंगा लेते हैं फिर जवाब देते हैं. प्रधानमंत्री के हाथ में जो पन्ना है उस पर सवाल लिखा है कि चलते चलते मैं कवि नरेंद्र मोदी से जानना चाहता हूं कि पिछले पांच सालों में आपने कुछ लिखा है क्या. जो सवाल कागज पर टाइप है वही सवाल पूछा भी जाता है. सवाल के साथ जवाब भी टाइप है. ये टाइप है और इसी पंक्ति को थोड़े बहुत बदलाव के साथ एंकर दोहराता है. यही नहीं प्रधानमंत्री कहते हैं कि मेरी लिखावट अच्छी नहीं है मगर उसी पेज पर कविता टाइप है. लिखावट भी है.
प्रधानमंत्री अपने जवाब में कहते हैं कि कविता अभी अभी लिखी है. लेकिन उसी कागज़ पर वो सवाल लिखा है जो एंकर के द्वारा पूछा गया है. इंटरव्यू लाइव हो या रिकार्डेड उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता है. फर्क इस बात से पड़ता है कि क्या सवाल पहले से तय था. क्या सवाल पहले जमा कराया गया था. प्रधानमंत्री का इंटरव्यू पब्लिक प्रॉपर्टी होती है. उन्होंने इस इंटरव्यू को अपने ट्वीटर हैंडल से भी साझा किया है. अगर सवाल पहले से तय हों तो फिर इंटरव्यू की विश्वसनीयता क्या रह जाती है.
13 मई दिल्ली का आसमान. आसमान में काले घने होने से पहले के बादल. हमारे कैमरे की नज़र में आते हवाई जहाज़. लेकिन क्या बादल होने या मौसम खराब होने से रडार काम नहीं करता है. एयर ट्रैफिक कंट्रोल में काम करने वाले लोग हैरान हैं. आप जानते हैं कि देश भर में कई जगहों पर रडार स्टेशन बना होता है. रडार स्टेशन से लगातार इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगें आसमान की तरफ जाती हैं. वहां मौजूद ज्ञात और अज्ञात टारगेट से टकरा कर वापस उसी रडार पर आती हैं. इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगें लाइट स्पीड की गति से चलती हैं. इससे होता यह है कि जहाज़ का लोकेशन पता चल जाता है. कितनी दूरी पर है और कितने एंगल पर है. प्राइमरी रडार से यह पता नहीं चलता कि विमान कौन सा है. मगर उससे अधिक क्षमता वाले रडार से पता चल जाता है कि विमान दिखने में कैसा है, किसका है. रडार अलग अलग प्रकार के होते हैं. अलग अलग रेंज के होते हैं. मेरी यह जानकारी बुनियादी है. आप दर्शक जो भी इसमें खोट निकालेंगे, मैं सुधार करने के लिए तैयार हूं. प्रधानमंत्री को भी बादलों वाले बयान को सुधार लेना चाहिए. वैसे इससे चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ता है.
प्रधानमंत्री का कहा गया कई लोग कोर्स की तरह लेते हैं. उन्हें लगता है कि यही पाठ्यक्रम है. इसलिए भी ज़रूरी है कि बोलने के दौरान उनसे जाने-अनजाने में हुई चूक को ठीक किया जाए, ताकि लोग सही जान सकें. सोचिए यही ग़लती अगर राहुल गांधी ने की होती तो प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मंत्री हर रैलियों में हंगामा खड़ा कर देते. हर अखबार में पहले पन्ने पर छपता. राहुल गांधी भी रिलैक्स होंगे कि उन्होंने ऐसी गलती नहीं की. रडार, क्लाउड, डिजिटल कैमरे की बातें करते हुए कितना अच्छा लगता है कि भारत कम से कम विज्ञान को लेकर चर्चा तो कर रहा है. मगर अफसोस जिस देश में ऐसी बातें हो कि खराब मौसम में बादलों में छिपे जहाज़ को रडार नहीं पकड़ पाता, वही वाले रडार को पकड़कर पूछना चाहिए कि साफ आसमान के बाद भी अनूसूचित जाति के दूल्हे की बारात जब रोकी जाती है तब क्यों नहीं पकड़ आता है.
गुजरात में पिछले कुछ दिनों में चार ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसमें अनुसूचित जाति के दूल्हे की बारात रोकी गई है. घोड़ी चढ़ने से रोका गया है. बारात इस रास्ते से न निकले इसलिए अगड़ी या प्रभावी जाति की औरतें सड़क पर बैठकर भजन कर रही हैं. यज्ञ किया जाने लगा. आप सोचिए कि दूल्हे के भीतर अपमान की कैसी परतें बनी होंगी. दुल्हन को कैसा लगा होगा कि सबका दूल्हा घोड़ी चढ़ कर आता है, उसके दूल्हे को जाति के कारण नहीं चढ़ने दिया गया. भजन करते हुए रोकने बैठी औरतों में अनुसूचित जाति को लेकर कितनी नफरत होगी. कायदे से रास्ता रोकने वाली सभी महिलाओं पर केस तो होना ही चाहिए. इन सभी को एक क्लास रूम में बिठाकर संविधान पढ़ाया जाना चाहिए. जब तक गुजरात में लगन चले, अनुसूचित जाति के दूल्हों का रास्ता रोकने वालों को संविधान पढ़ाया जाना चाहिए. पहले दिन शादी नहीं हुई. दूसरे दिन हुई. गांव पुलिस छावनी में बदल गया तब जाकर शादी हुई. संविधान सबको बराबर मानता है मगर संविधान की भावना लोगों में बराबर नहीं उतरी है. गुजरात के अरवल्लि जिले के मोडासा के खभिसर गांव में ऐसी घटना हुई है. यह पहली घटना नहीं है. हर साल होती है. गुजरात में ही नहीं, मध्यप्रदेश और यूपी में भी होती है. कायदे से रास्ता रोकने वालों की जेल के अलावा दूसरी जगह नहीं होनी चाहिए मगर उन्हें पता है कि वे ताकतवर हैं. वे जो चाहें कर सकते हैं, कर सकती हैं. यही नहीं साबरकांठा ज़िले के प्रातिज के शितवाड़ा में भी अनुसूचित जाति के दूल्हे को धमकी दी गई कि लगन में वरघोड़ी नहीं निकलेगी. यानी दूल्हा घोड़ी पर नहीं जाएगा. मय पुलिस सुरक्षा में बारात निकाली गई और प्रशासन ने शादी करा दी. मगर आप सोचिए कि किसकी शादी पुलिस सुरक्षा में होती है. हज़ारों बारात निकलते रहती है. किसी को फर्क नहीं पड़ता मगर अनुसूचित जाति के दूल्हे की बारात निकलने पर कुछ लोगों को क्यों फर्क पड़ा. कुछ जगहों पर पुलिस ने अच्छा काम किया तो एक जगह पर पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत हुई है कि उसने अनुसूचित जाति को गालियां दी हैं. गांधीनगर रेंज के आईजी मयंक सिंह ने कहा है कि कार्रवाई करेंगे.
क्या हम सभी को ऐसे प्रकरणों से शर्म आती है, आनी चाहिए. यह अहंकार और अधिकार बोध आ कहां से रहा है कि अनूसूचित जाति‍ के दूल्हे की बारात का रास्ता रोका जा रहा है. मध्य प्रदेश से भी ऐसी घटना सामने आई है. वहां तो पहले आदेश आया कि शादी से तीन दिन पहले अनूसूचित जाति के परिवार को सूचना देनी होगी मगर यह आदेश वापस ले लिया गया.

यह हमारी सहयोगी हर्षा कुमारी सिंह की रिपोर्ट है. अलवर के थाना ग़ाज़ी में 26 अप्रैल को पांच लोग एक महिला को अगवा कर उसका बलात्कार करते हैं. वीडियो बनाते हैं और ब्लैकमेल भी करने का प्रयास करते हैं. 30 अप्रैल को महिला और उसका पति अलवर एसपी के पास जाते हैं. मगर चुनाव के कारण 2 मई को एफआईआर होती है. अलवर में 6 मई को मतदान होता है और कार्रवाई होती है 7 से 9 के बीच. अपराध में शामिल आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है. क्या चुनाव के कारण कार्रवाई नहीं हुई. इस रिपोर्ट में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पुलिस की गलती मानी है. एसपी अलवर का तबादला कर दिया गया है. अब इसे लेकर प्रधानमंत्री मोदी और मायावती ने कांग्रेस सरकार को निशाना बनाया लेकिन अब प्रधानमंत्री मोदी मायावती को भी निशाना बना रहे हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि मायावती कांग्रेस को समर्थन क्यों कर रही हैं जब राजस्थान सरकार कुछ कर नहीं रही है. मायावती ने जवाब तो दिया मगर भाषा आपत्तिजनक हो गई.
प्रधानमंत्री राजस्थान की घटना का ज़िक्र भाषणों में कर रहे हैं, उन्हें गुजरात में अनुसूचित जाति की बारात पर हो रहे हमले की भी चर्चा करनी चाहिए. राजनेता भले न करें लेकिन हमें आपको चर्चा करनी चाहिए कि हमने कैसा समाज बनाया है जहां हिंसा की इन परतों को मान्यता मिली हुई है. फरीदाबाद चलते हैं. यहां के असावटी गांव में बीजेपी का एक पोलिंग एजेंट गिरिराज सिंह कई महिलाओं का वोट अपनी पार्टी के पक्ष में करवाता वीडियो में पकड़ा गया. वीडियो वायरल होने के बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया. फिलहाल वो ज़मानत पर है. इस बीच चुनाव आयोग ने मतदान केंद्र के पीठासीन अधिकारी को भी सस्पेंड कर दिया है और इस मतदान केंद्र पर 19 मई को फिर मतदान कराने का फ़ैसला किया गया है.
✍ रवीश कुमार   

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