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Thursday, June 27, 2019

नज़रिया : ज़ोम्बियों का बढ़ता आतंक #सिफ़र #Sifar

ज़ोम्बी एक काल्पनिक किरदार जो अक्सर हमें फिल्मों और वीडियो गेम्स में नज़र आते हैं।  ज़ोम्बी शब्द सुनते या पढ़ते ही हमारे ज़ेहन में एक चलते फिरते मुर्दे की छवि बनती है। एक मुर्दा लाश जिसका सिर्फ एक ही काम है ज़िंदा इंसानों को मारना, उनका गोश्त खाना और खून पीना।  एक मुर्दा जिसकी सोचने समझने की सलाहियत ख़त्म हो चुकी है अब वो सिर्फ़ लोगों मरना चाहते है।  अब ये ज़ोम्बी काल्पनिक दुनिया से निकलकर हक़ीक़त में आ चुके हैं।  आज देश में एक बड़ा तबक़ा ऐसा है जो ज़ोम्बी बन चूका है। ये ज़ोम्बी बेगुनाह लोगों की जान ले रहे हैं।  कभी गाय के बहाने से, कभी चोरी के बहाने से और अब तो अपना धार्मिक नारा न लगाने पर भी बेगुनाह और मासूम लोगों की जान ले रहे हैं।  जब कोई किसी बेगुनाह की मौत पर खुशियां मनाये और नफ़रत फ़ैलाये तो समझ लीजिये उसकी इंसानियत मर चुकी है, उसकी आत्मा मर चुकी है।  वो अब इंसान नहीं रहा रहा एक ज़ोम्बी बन चूका है।

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सिर्फ़ ये हत्यारे ही ज़ोम्बी नहीं हैं बल्कि वो लोग भी ज़ोम्बी है खुलकर इनका समर्थन करते हैं और वो भी जो ख़ामोश रहकर इनका समर्थन कर रहे हैं।   कभी ये ज़ोम्बी भीड़ बनकर किसी बेगुनाह को पीटकर मार डालते है, तो कभी देश के अलग-अलग शहरों में पढ़ाई या काम करने आये बेगुनाह कश्मीरियों के साथ मारपीट करते हैं, कभी किसी रेपिस्ट के समर्थन में तिरंगा लेकर यात्रा निकालते हैं तो कभी किसी हत्यारे को हीरो की तरह पेश करके उसकी झांकी निकालते हैं, तो कभी सोशल मीडिया झुण्ड पर बनाकर लोगों को ट्रोल करते नज़र आते हैं।

काफी लोग इन्हें भीड़ कहकर इनका बचाव करते नज़र आते हैं लेकिन हक़ीक़त ये है की ये आम भीड़ नहीं है, हत्यारों का ये झुण्ड आम भीड़ से किस तरह अलग है उसके लिए हमें पहले समझने होगा की भीड़ होती क्या है ? आमतौर पर भीड़ को एक असंगठित लोगों का समूह माना जाता है।  ऐसा समूह जिसका कोई नेतृत्व नहीं होता, न ही कोई पूर्व निर्धारित लक्ष्य होता है।  आमतौर ऐसी पर भीड़ किसी घटना की त्वरित प्रतिक्रिया में इकट्ठी होती है।  जैसे की सड़क पर कोई एक्सीडेंट या ऐसी ही कोई अन्य असाधारण घटना।  ऐसी स्थिति में घटनास्थल पर मौजूद लोग भीड़ के रूप जमा हो जाते हैं।  लेकिन हत्यारों का ये झुण्ड उस आम भीड़ से काफी अलग है।  इस भीड़ के पास के पास अप्रत्यक्ष नेतृत्व भी है।  हत्या करने का पूर्व निर्धारित लक्ष्य भी है।  ये भीड़ अचानक हुई किसी असाधारण घटना की त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में इकठ्ठी नहीं होती बल्कि इसे पूर्व नियोजित लक्ष्य के तहत इकठ्ठा किया जाता है। कई घटनाओं में भीड़ को घोषणा करके इकठ्ठा किया गया है।  सोशल मीडिया (फेसबुक, टविटर , व्हाट्सप्प आदि), विभिन्न कार्यक्रमों, भाषणों आदि के माध्यम से लोगों को भड़काकर और उकसाकर उनका ब्रेनवाश किया जा रहा है। लोगों को झूठे ऐतिहासिक तथ्य, धर्म  और पुरानी घटनाओं के बारे में बताकर मानसिक रूप से ऐसा करने के लिए तैयार किया जा रहा है।



सवाल  उठता है की ये भीड़ आखिर अचानक खून की प्यासी क्यों बनती  रही है ? भीड़ को कानून का भी कोई डर नहीं है, कई बार तो हत्यारों द्वारा खुद ही वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया जाता है।  अगर इस सवाल का विश्लेषण करे तो समझ में आएगा की ये भीड़ अचानक नहीं बनने लगी है, भीड़ को ऐसा करने के लिए उकसाया जा रहा है।  सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प आदि) आदि के माध्यम से लोगों को भड़काकर और उकसाकर उनका ब्रेनवाश किया जा रहा है।  कहीं न कहीं इस हत्यारी भीड़ को अप्रत्यक्ष राजनैतिक समर्थन भी प्राप्त है।  बहुत से लोग इन हत्याओं का विरोध भी कर रहे हैं और बहुत से लोग इस पर खामोश हैं और कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो इन हत्याओं को धर्मरक्षा/संस्कृति रक्षा के नाम पर सही ठहराने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे ही हत्यारों को एक केंद्रीय मंत्री फूलमाला पहनकर स्वागत करते हैं। लोगों को कभी झूठे ऐतिहासिक तथ्य, धर्म  और पुरानी घटनाओं के बारे में बताकर मानसिक रूप से ऐसा करने के लिए तैयार किया जा रहा है।


भारत की पहचान दुनिया में अहिंसावादी गाँधी जी के देश के रूप में है आज उसी गाँधी के देश में ये ज़ोम्बी दिलों में नफ़रत और ज़हर लिए उस पहचान को नुकसान पहुंचने में लगे हैं।  ये ज़ोम्बी देश और समाज के दुश्मन हैं इनसे सतर्क रहना होगा और सरकार और प्रशासन को इन पर कठोर कार्यवाही करके इन पर अंकुश लगाना ज़रूरी है। सरकार सिर्फ निंदा करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझ लेती है। सिर्फ निंदा करने से काम नहीं चलेगा सरकार को कड़े क़दम उठाने होंगे।  सुप्रीम कोर्ट ने इस मांमले में कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को दिशा निर्देश जारी किये हैं साथ ही इसके लिए एक कठोर कानून बनाने की बात भी कही है।  सरकार को इस मामले में कठोर क़दम उठाने होंगे और न केवल हत्यारों के लिए कड़ी सजा बल्कि उनके साथ हत्यारों का समर्थन करने वालों के लिए भी नए कानून में सजा का प्रावधान करना होगा।  

लेखक  : शहाब  ख़ान 'सिफ़र'
  


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