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Friday, February 7, 2020

गोदी साहित्यकार ( लघुकथा ) - लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'


रात का पहर! बरगद के वृक्ष के नीचे बैठा पूरा गाँव।  

"आज़ादी के सत्तर बरस गुज़र गये परन्तु यह गाँव आज भी किसी उजाले की प्रतीक्षा में है।" 
"ना जाने वो रात कब आयेगी, जब हर मड़ई और मिट्टी के कच्चे घरों में आशा का वह टिमटिमाटा पीला लाटू  नाचेगा!" 

कहते हुए गाँव के सबसे पढ़े-लिखे मनई होरी लाल मुखिया पंचायत की बैठकी पर बैठकर हुक़्क़ा गुड़गुड़ाते हुए अपनी प्रगतिवादी सोच पंचायत के सम्माननीय सदस्यों और गाँववालों के समक्ष रखते हैं। 
godi-sahitykar-laghukatha

"अरे मुखिया जी!"
"ग़ज़ब होइ गवा!"

तेज़ी से हाँफता हुआ रामेश्वर भरी पंचायत में आकर चिल्लाने लगता है।          

"का हुआ रे रामेश्वर!"
"तू इतना हाँफ क्यों रहा है?"
"का बात है?"
"का हो गवा?"
मुखिया जी कौतूहलपूर्वक रामेश्वर से खोज-ख़बर लेने लगते हैं।

रामेश्वर अपनी बाँह की कमीज़ में अपनी बहती हुई नाक को पौंछते हुए बोला-
"अरे मुखिया जी, गाँव के बाहर जंगलों में एक लाश मिली है जिसे जंगली जानवर बुरी तरह से चबा गये थे।"
"केवल उसके पास से एक सूती झोला और पहचान-पत्र बरामद किया गया है।"
"पहचान-पत्र से पुलिस ने उसकी शिनाख़्त की है।"
"ऊ अपने पटवारी का लड़का जम्बेश्वर रहा।"

"का बात करते हो रामेश्वर!"
"अबही पिछली रात मैंने उसे विधायक जी के आदमियों के साथ उनके आवास की तरफ़ जाते देखा था।"
"हो न हो यह विधायक जी का ही काम रहा हो!"

पनेसर महतो ने संदेह के आधार पर अपनी बानगी दो टूक शब्दों में कह दी।

"का मज़ाक करते हो पनेसर!"
"अरे, पिछली जनसभा में विधायक जी के कहने पर ही इहे जम्बेश्वर ससुर अपनी कविता में गा-गाकर उनकी हज़ारों तारीफ़ करा रहा!"
"औरे विधायक जी ने भी जम्बेश्वर को पूरे गाँव का श्रेष्ठ कवि घोषित कर रखा था।"
"और तुम तो उस धर्मात्मा पर ही गंभीर आक्षेप लगा रहे हो।"

मुखिया जी ने विधायक जी का पक्ष बड़ी ही मज़बूती के साथ रखा।

पनेसर महतो थोड़ा दबते हुए-
"अरे नाही मुखिया जी!"
"हम तो बस यही कहने की कोशिश करे रहे कि पिछले महीने उहे विधायक जी का लौंडा जड़ाऊ महतो की बहुरिया को जबरन खेतों में उठा ले गया रहा।"
"तब इहे ससुर कवि महाराज जम्बेश्वर, कोरट में उनके खिलाफ़ ग़वाही देवे पहुँच गये रहे।"
"तब जैसा किया था अब वैसा पा गये ससुर!"

"ठीक ही कह रहे हो पनेसर तुम।"
"जैसी करनी,वैसी भरनी!"

कहते हुए मुखिया जी अँगीठी की आग की तरफ़ अपना पैर कर पंचायत का हुक़्क़ा गुड़गुड़ाने लगते हैं,और एक लम्बी श्वास लेते हैं। मुँह से धुआँ निकालते हुए रामेश्वर से दोबारा पूछते हैं

"अरे रामेश्वर!"
"पुलिस से तूने कछु बका तो नहीं ना।"

रामेश्वर-
"अरे नाही मुखिया जी!"
"हम तोहे कउनो भंगेड़ी दिखते हैं!"
"लेना एक न देना दुइ!"
"हम काहे ई बेकार के झंझट में पड़ें।"
"औरो हमें कउनो सुपरमैन बनने की कोई विशेष इच्छा नाही है!"
"हाँ पर पुलिवाले गाँव में तफ़्तीश के लिये आ रहे हैं।"

इतना सुनते ही पंचायत के सभी सम्मानित सदस्य और गाँववाले वहाँ से एक-एक करके खिसकने लगे। 


लेखक  : ध्रुव सिंह 'एकलव्य' 
वाराणसी, उत्तर प्रदेश


  

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