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Tuesday, February 4, 2020

पंचर फ़रिश्ता ( लघुकथा ) - लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'

धुकधुक-धुकधुक... !  धुकधुक-धुकधुक... ! 

"अब क्या हो गया इस खचाड़ा बाईक को।"
"अभी तो सर्विसिंग करायी थी!"

खीझता हुआ बाईकसवार हाइवे की सड़क के किनारे अपनी बाईक रोकता है और उसके पिछले टायर को बड़े ही ध्यान से जाँचने लगता है।
"ओह हो!"
"इतनी  बड़ी कील!"
"और इस सुनसान हाइवे पर!"

कहता हुआ बाईकसवार अपनी बाईक के टायर से उस बड़ी-नुकीली कील को निकालकर सड़क के दूसरी तरफ़ झाड़ियों में फेंक देता है।

"हे भगवान!"
"इधर तो दूर-दूर तक कोई भी पंचर बनाने की दुकान नज़र नहीं आ रही है।"
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             ग़ुस्से में अपने पैर पटकता हुआ बाईकसवार पैदल ही बाईक को दोनों हाथों से हाइवे की सड़क पर खींचने लगता है। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई देती है जहाँ एक अधेड़ उम्र का आदमी लगभग बारह-तेरह वर्ष के लड़के के साथ बैठा दिखाई देता है।

झोपड़ी की छत से कुछ पुराने टायर-ट्यूब पतली रस्सी की सहायता से हवा में लटक रहे थे जो रह-रहकर तेज़ हवाओं के झोंकों की मार से हवा में पेंडुलम की भाँति तैरने लगते थे। इससे यह साफ़तौर पर अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि यहाँ पंचर बनाया जाता होगा।
          जिसे देखकर बाईकसवार अपनी बाईक को खींचता हुआ झोपड़ी की तरफ़ तेज़ी से बढ़ने लगा।
झोपड़ी के नज़दीक पहुँचते ही-
"का बाबू!"
"टायर पंचर हो गया।"

बड़े ही दृढ़ विश्वास के साथ फेंकूराम बाईकसवार की बाईक की ओर देखकर इशारा करता हुआ उससे मुस्कराकर कहता है।

"अरे, तुम्हें कैसे पता?"
"अभी तो मैंने कुछ भी नहीं बताया तुम्हें!"
"फिर कैसे?"

आश्चर्य से बाईकसवार फेंकूराम की ओर देखकर उससे पूछता है।

''का बाबू!"
"का बात करते हो!"
"सारी जिनगी बीत गई हमारी इसी हाइवे पर।"
"औरे इहे पंचर बनाते-बनाते।"
"और तुम हमही से पूछते हो पंचर कैसे बनता है!"
तीख़ा व्यंग्य कसता हुआ फेंकूराम।

थोड़ा झेंपता हुआ बाईकसवार-
"हमारा वो मतलब नहीं था।''
"हम तो बस।'
"अच्छा छोड़ो ये सब!''
"देखो हमारी बाईक का पिछला टायर पंचर है।"
"इसमें एक बड़ी नुकीली कील घुस गयी थी।"

थोड़ी देर तक एक पानीभरे बड़े बर्तन में ट्यूब उलटने-पलटने के बाद फेंकूराम बाईकसवार को उत्तर देता है-
"बाबू बड़ा पंचर है।"
"दो सौ रुपये लगेंगे।"
"बनवाना है तो बताओ!"

फेंकूराम की ना-जाएज़ माँग सुनकर बाईकसवार थोड़ा तैश में आकर बोला-
"अरे भाई!"
"ये क्या लूट मचा रखी है?'
"पंचर के चालीस रुपये बनते हैं।"
"ज़रा किफ़ायत से माँगो!"

फेंकूराम थोड़ा चुटीले अंदाज़ में-
"तो बाबू कोई किफ़ायत वाली दुकान खोज लो!"
"हम तो इतना ही लेंगे!"

बाईकसवार थोड़ी देर कुछ सोचकर-
"ठीक है!"
"पंचर बनाओ!"

थोड़ी देर बाद पंचर बनकर तैयार हो गया और बाईकसवार ने फेंकूराम को दो-सौ रुपये पकड़ाए और बाइक का एक्सीलेटर दबाता हुआ वहाँ से ढुर-ढुर की ध्वनि करते चलता बना।

"अरे बापू!"
"आपने उस बाईकवाले से इतने ढेर सारे पैसे क्यों लिये?"
"जबकि उसके बाईक का टायर हमारे द्वारा सड़क पर बिछायी गयी कीलों की वजह से ही पंचर हुआ था।"
"पैसे तो हमें उसे देने चाहिए थे।"

फेंकूराम का लड़का बड़े ही निश्च्छल मन से यह ज्वलंत प्रश्न उसकी तरफ़ दागता है।

फेंकूराम मंद-मंद मुस्कराता हुआ अपने किशोरवय लड़के से कहता है-
"बेटा,आजकल इसे ही दुनियादारी कहते हैं।"
"हमरे कुलही नेतागण भी तो यही कर रहे हैं ना।"
"ज़रा देख, आज वे कहाँ बैठे हैं!"
"वे भी तो एक फ़रिश्ते ही हैं हमारे लिये।"  
"चल जा!"
"और जाकर कोने में पड़े बक्से से दस-पंद्रह कील सड़क के बीचो-बीच फेंक आ!"
"इसी से तू एक दिन बड़ा आदमी बनेगा!"

कहता हुआ फेंकूराम अपने लड़के को कड़ी नसीहत देता है और लड़का अपने पिता द्वारा सुझाए मार्ग पर चलता हुआ बड़े ही ख़ुशी मन से सड़क पर कीलें बिखेरने लगता है। 

लेखक  : ध्रुव सिंह 'एकलव्य' 

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