HIGHLIGHTS

Friday, April 3, 2020

लोकतंत्र का मुर्दा ( लघुकथा ) - लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'

काली अँधेरी ख़ुशनुमा सर्दी की रात! हॉस्पिटल के बाहर अज़ीब-सी चहलक़दमी! शहर के लोगों का हुज़ूम! कोई अपने सर पटक रहा था तो कोई अपनी छाती! निरंतर हॉस्पिटल के मुख्य द्वार से एम्बुलेंस का आवागमन। जितनी बार एम्बुलेंस का दरवाज़ा खुलता उतनी बार घायलों और मृतकों की भीड़ हॉस्पिटल के अंदर वार्डबॉयों द्वारा प्रवेश करायी जाती। पुलिसबल उन मृतकों एवं घायलों के परिवारजनों को बलपूर्वक बाहर ढकेल रही थी। हॉस्पिटल परिसर के दूसरी तरफ़ नेताओं का चिरपरिचित आरोप-प्रत्यारोप का मंगलकार्य ज़ारी था। 
 
 

भीड़ से एक महिला वार्डबॉय धनेसर की बाँह पकड़कर खींचने लगी और एक तस्वीर दिखाती हुई पूछी-
"भईया!"
"तनिक ई फोटू देखो!
"का इसे हॉस्पिटल में देखा है?"
"दो दिन से घर नहीं आया।"
"शायद ग़लती से यहाँ आ गया हो।"

कहते हुए वह महिला धनेसर की बाँह पकड़ते-पकड़ते ज़मीन पर गिर गई और चीख़-चीख़कर रोने लगी। धनेसर उस महिला को सांत्वना दे पाता इसके पहले ही पुलिसवालों ने उसे हॉस्पिटल से खदेड़कर बाहर कर दिया।  धनेसर भी स्ट्रेचर को बलपूर्वक ढकेलता हुआ शवगृह की ओर चल दिया। 

"बड़ी बेरहमी से जलाया गया!"
"कितने हैवान हो गए हैं लोग!"
"ज़रा भी इंसानियत नहीं बची है लोगों में।"
"धनेसर!" 
"मृतकों को जल्दी काउंट कर लो!"
"कल सुबह तक हॉस्पिटल प्रशासन को हमें रिपोर्ट देनी है।" 

कहते हुए डा. देशमुख धनेसर को शख़्त हिदायत देते हैं। 

"एक"
"दो" 
"तीन"
"चार"......... ......... .......  सैंतीस। 

"साहेब कुल सैंतीस मुर्दे हैं अभी तक।" 

डा. देशमुख धनेसर पर ग़ुस्से से लाल-पीले होते हुए-

"बेवकूफ़!"
"हमें शख़्त आदेश दिया गया है कि मुर्दों की संख्या कम बतायें जिससे कि शांति बहाल हो सके।"

डा. देशमुख की कड़ी फटकार सुनकर धनेसर सैंतीसवें मुर्दे के पैर में लटक रहे नंबर टैग को खोलने लगा। 
तभी एकाएक उसके कान में एक खुसफुसाहट-सी हुई और वह अपनी नज़रें उठाकर देखा और देखता ही रह गया। सैंतीसवें नम्बर का मुर्दा स्ट्रेचर पर बैठा-बैठा हँसते हुए कह रहा था-
"साहेब आप से ग़लती हुई है।"
"मैं तो अड़तीसवें नंबर का मुर्दा था!"

घबराहट में धनेसर के मुँह से एक ज़ोर की चीख़ निकल गई और वह स्ट्रेचर से दूर हट गया। 

"क्या हुआ धनेसर?"
"तुझे इतना पसीना क्यों आ रहा है?"
"कहीं कोई भूत-वूत तो नहीं देख लिया!''

कहते हुए डा. देशमुख धनेसर की चुटकी लेते हैं। 
परन्तु भय से काँपता हुआ धनेसर-
"साहेब मैंने उस सैंतीस नंबर वाले मुर्दे को बोलते हुए सुना है।" 

धनेसर की बात सुनकर डा. देशमुख बड़े ज़ोर का ठहाका लगाकर हँसते हुए कहते हैं-
"अरे भई!"
"यह लोकतंत्र है।"
"यहाँ ज़िंदों का तो पता नहीं।'
"मुर्दे भी बोलते हैं!"
 
लेखक  : ध्रुव सिंह 'एकलव्य' 
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
 

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर.. लाजवाब
    मुर्दे ही बोलेंगे न जिन्दों को बोलने से पहले ही मुर्दा बना दिया जाता है...
    सच को छिपाकर खुशहाली बताना ।
    सारा सच उघाड़ कर रख दिया आपने
    वाह!!!

    ReplyDelete
  2. शासन-प्रशासन की वास्तविकता से पर्दा उठाने की हिमाकत करते इस 'लोकतंत्र के मुर्दे' के ज़रिये महतवपूर्ण संदेश देती आपकी यह लघुकथा शानदार है।
    बहुत खूब आदरणीय सर। हार्दिक बधाई ढेरों शुभकामनाओं संग सादर प्रणाम 🙏

    ReplyDelete
  3. 'यहाँ जिंदो का तो पता नहीं, मुर्दे भी बोलते हैं' वाह! मुर्दातंत्र!

    ReplyDelete
  4. वाह बेहतरीन लघुकथा 👌

    ReplyDelete