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Sunday, May 31, 2020

साक्षात्कार : लेखक श्री नृपेंद्र कुमार शर्मा

सवाल - अपने बारे में कुछ बताएं।
नृपेंद्र जी - मेरा पूरा नाम  नृपेंद्र कुमार शर्मा है। जो साहित्य के क्षेत्र में अब नृपेंद्र शर्मा "सागर" करके जाना जाता है। मेरी बहुत सारी कहानियाँ कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे शब्दनगरी और प्रतिलिपि पर पढ़ी जा सकती हैं साहित्य मुरादाबाद के ब्लॉग पर मेरी कविताएं गज़लें और लघुकथा भी मिल जाएंगी। अब तक मेरी तीन किताबें फ्लाई ड्रीम पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई हैं। मेरी सबसे पहली किताब "तिलिस्मी खज़ाना" है जो मार्च 2019 में आयी थी। जिसमें रहस्य रोमांच के साथ-साथ तिलिस्म की विधा को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। उसके बाद मेरी अगली किताब 2019 में ही आयी थी "ज्वाला" जो प्रेम कथा और बदले पर आधारित थी। अब  मेरी तीसरी किताब फ्लाई ड्रीम की ही एक शाखा फ्लाई विंग्स से अमेज़ॉन पर किंडल वर्जन में प्रकाशित हुई है "भूतों के साये में"



सवाल - नई किताब 'भूतों के साये में' के बारे में बताएं।
नृपेंद्र जी - भूतों के साये में एक कहानी संग्रह है जिसमें कई कहानियां सत्य घटनाओं पर आधारित हैं जो मुझे खुद उन्ही लोगों या उनके परिजनों ने बतायीं जिनके साथ वह घटित हुआ। कुछ कहानियाँ मैंने मनोरंजन की दृष्टि से अपनी कल्पना से बनायी हैं।

सवाल - आपका बचपन कैसा रहा? कुछ यादें, दृश्य साझा करें।

नृपेंद्र जी - मेरा जन्म उत्तरप्रदेश के जिला मुरादाबाद के ग्राम रतूपुरा में 1977 में हुआ था। हमारा परिवार कृषि और पूजा-पाठ से जुड़ा हुआ था। हमारे दादा जी बैद्य थे। हमारे गांव में उस समय 8वीं से आगे स्कूल नहीं था। हमने 10वीं की पढ़ाई  (1994) रस्तौगी इंटर कालेज मुरादाबाद से की और इंटरमीडिएट की पढ़ाई राजकीय इंटर कालेज मुरादाबाद से। राजकीय इंटर कॉलेज की ईमारत किसी पुराने किले जैसी है। विद्यालय के एक साइड में बहुत बड़ा प्ले ग्राउंड है और उसके चारों ओर बहुत  चौड़ी बाउंड्रीवाल बनी है। उस चार दिवारी में एक जगह बहुत बड़ा सूखा हुआ कुआँ है जिसमे एक सुरँग साफ दिखाई देती थी।जिसका एक सिरा मैदान के नीचे और दूसरा राम गंगा  नदी में खुलता नज़र आता था।उस समय हमारे क्लास टीचर थे श्री पाठक सर। वही हमारे हिंदी के अध्यापक भी थे।

सवाल - लेखन की शुरुआत कैसे हुई और किस तरह यह सफर यहां तक पहुंचा?
नृपेंद्र जी - उस समय मेरी आदत थी तुकबन्दी करने की को आगे चलकर कविताएं लिखने में बदल गयी। मुझे बचपन से ही कहानी पढ़ने का बहुत शौक था। चम्पक, नंनद जैसी पत्रिकाएं मैं नियमित पढ़ता था। लायब्रेरी से मैंने प्रेमचंद जी की भी बहुत सी कहानियां पढ़ीं थीं। हमारे पिताजी रंगमंच (गाँव की रामलीला मंचन) से जुड़े थे तो उस समय हमारे घर में एक बक्सा भरकर नौटंकी-नाटक की किताबें थीं। जो लगभग सभी मैंने पढ़ डाली थीं। उन्हें पढ़कर ही मेरे मन में भी कहानी लिखने का विचार आया।मैंने सबसे पहली कहानी 1995 में लिखी थी जिसका शीर्षक था-"और वह मर गयी" जिसे हमारे हिंदी के सर पाठक जी और इंग्लिश के टीचर श्री अंजार हुसैन जी ने बहुत सराहा था। बस यहीं से कहानी लिखने का सिलसिला चल निकला।1995 में मैंने चार-पाँच कहानियाँ लिखीं। एक बार हमारी लिखी कहानियों की एक कॉपी हमारी माता जी ने गलती से रद्दी में बेच दी थी उन कहानियों को मैं फिर दोबारा नहीं लिख पाया। जिनमें एक कहानी खंडहर जो पूरी थी और एक अधूरा उपन्यास (कोई 25-40 पेज का) जख्म था।

तिलिस्मी खज़ाना की शुरुआत कोई 1996 में एक घटना से हुई थी-हमारे गाँव में एक अफवाह हम बचपन से सुनते आ रहे थे कि पुराने पिलखन के पेड़ पर परियाँ आती हैं। एक बार मैं और मेरा दोस्त उस पुराने पिलखन के नीचे बैठे यही बातें कर रहे थे कि क्या परियाँ  आती हैं। कई बार हम सूनी दोपहरी और अंधेरी रात में भी उस पकड़ के काफी पास तक गए लेकिन परियाँ तो नहीं मिली बस एक कहानी मिल गयी।ये कहानी 1998 में पूरी हो गयी थी जो मेरी हस्तलिखित दो गत्ते वाली केपिटल की कॉपी में लिखी हुई आज भी मेरे पास है। उसके बाद मैंने अपनी कहानियाँ छपवाने के लिए प्रकाशकों के चक्कर काटे लेकिन किसी नए लेखक को छापने को कोई तैयार नहीं था और मेरा कहानी लिखने का शौक बस शौक ही रह गया। लेकिन कभी-कभी अपने विचारों को पेपर पर उतारना चलता रहा कभी कहानी तो कभी कविता के रूप में। उसके बाद 2016 में एक दिन मैंने शब्दनगरी की वेबसाइट देखी जहाँ अपना लिखा प्रकाशित कर सकते थे। मैं उससे जुड़ा और मेरा लिखने का शौक वापस लौट आया। उसके बाद मैं प्रतिलिपि से जुड़ा जहाँ मिले लाखों पाठकों और हज़ारों समीक्षाओं ने आगे लिखने का मनोबल दिया।


सवाल - आप काव्य भी लिखते हैं? काव्य और कहानियों को लिखने में एक कवी और लेखक के बीच कैसा द्वन्द चलता है?
नृपेंद्र जी - कविता करना जितना मुश्किल है उतना ही आसान भी क्योंकि कुछ तुकान्त कुछ अतुकांत बस कुछ शब्दों में मन के किसी एक भाव को दर्शाना होता है। लघुकथा बहुत मुश्किल है क्योंकि उसमें कथ्य से अधिक अनकहा भाव छिपा होता है। कहानी मुझे सरल लगती है क्योंकि हम हर भाव हर किरदार के पक्ष को शब्द दे सकते हैं लेकिन उपन्यास फिर उतना ही मुश्किल हो जाता है। किसी घटना और कुछ पात्रों को लेकर एक ऐसी मंजिल पर निकलना उपन्यास है जिसकी मंज़िल हम तय कर लेते हैं लेकिन रास्ता और उसपर चलने के अपने नियम और घटनाएं कई बार किरदार अपने हिसाब से करवा लेते हैं। मेरा अपना सिद्धान्त तो उपन्यास लिखने का यही है। मंजिल अर्थात अंत और इस सफर पर चलने वाले आगे रास्ते में मिलने वाले किरदार तय करो उनका अच्छा या बुरा रूप दिमाग में बनाओ और चल पड़ो एक सफर पर।

सवाल - मुरादाबाद के बारे में कुछ ख़ास बातें बताएं?

नृपेंद्र जी - जहाँ तक मुरादाबाद शहर की बात है वहाँ मैंने 1993 से 1999 तक का समय बिताया है। उसके बाद फिर मैं अपनी नौकरी के चलते ठाकुरद्वारा लौट आया और आजकल पशुपति एक्रिलोन लिमिटेड में कार्यरत हूँ। मुरादाबाद पीतल के उद्योग के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहाँ के पीतल के सजावटी समान जैसे फूलदान, दिवारगिरी, फ़ोटो फ्रेम और मूर्तियां अमेरिका सहित कई देशों में एक्सपोर्ट होती हैं। साहित्य जगत में मुरादाबाद की पहचान काव्य रचनाओं "जिगर मुरादाबादी" और "हुल्लड़ मुरादाबादी" के नाम से है। लेकिन उपन्यास लेखन में मुझे मुरादाबाद का कोई नाम उतना नाम कमाता नज़र नहीं आया। उपन्यास लेखन और वह भी हॉरर और फेंटेसी बस मैंने शुरुआत कर दी है बाकी पाठकों का प्यार क्या कमाल दिखाता है ये तो वक़्त ही बताएगा।

सवाल - जहाँ से आप हैं वहां की भाषा-बोली इस तरह की है कि कई लोग आपका नाम सही नहीं ले पाते होंगे। ऐसे कुछ अनुभव बताएं।
नृपेंद्र जी - मेरा नाम लेने में अक्सर लोग गलती करते हैं, कई लोग नृपेन्द्र की जगह निपेन्दर बोलते हैं तो कई नरेंद्र कह देते हैं। नौकरी में लोग अक्सर मुझे N.K.Sharma,  ही कहते हैं वहाँ तो कई लोगों को मेरा नाम पता तक नहीं है। फ़्लाई ड्रीम से जुड़ी शोभा जी और मशहूर शायरा मोनिका मासूम (मुरादाबाद) मुझे अक्सर नरेंद्र नाम से ही बुलाते हैं। हमारे साथी कवि राजीव "प्रखर" जी हमेशा मुझे "हॉरर भाई" ही कहते हैं।

सवाल - आपको लेखन में कौनसी श्रेणियां, विधाएं ज़्यादा पसंद हैं?
नृपेंद्र जी - कहानी विधा में सामाजिक विषय और कविता में प्रेम और समसामयिक घटनाएं मेरा पसंदीदा विषय है, लेकिन उपन्यास में मुझे हॉरर और फेंटेसी ही लिखने में मज़ा आता है।

सवाल - FlyDreams Publications के साथ कैसे जुड़े और अबतक उनके साथ कैसा सफ़र रहा?
नृपेंद्र जी - फ़्लाई ड्रीम से मैं प्रितिलिपि पर मेरी कहानी पर की गयी एक समीक्षा के माध्यम से जुड़ा था। फ़्लाई ड्रीम प्रकाशन में मैं बिल्कुल परिवार जैसा महसूस करता हूँ। पूरी टीम बहुत हेल्पफुल है। हमारी कई गलतियों को कई कई बार बताकर ठीक करवाते हैं। बिखरी कहानियों को एक सुंदर किताब में लाने तक सभी बहुत मेहनत करते हैं। मेरी अभी तक तीन किताबें आ चुकी हैं। अभी इसी साल तिलिस्मी ख़ज़ाने के किरदारों को लेकर एक उपन्यास आने वाला है। उसके आगे भी अर्जुन-पण्डित के कारनामे लेकर आपके सामने किताबे लाते रहेंगें। फ़्लाई ड्रीम जैसा नाम है सच में हम जैसे नए लेखकों के सपनों को पँख देने का काम कर रहे हैं।मुझे खुशी है कि मैं उनकी टीम का हिस्सा हूँ।



सवाल - इस प्रकाशन में कौनसे दूसरे लेखक/लेखिका के काम ने आपको प्रभावित किया?
नृपेंद्र जी - प्रकाशन में सीनियर लेखकों में श्री मनमोहन जी और श्रीमती शोभा जी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। साथियों में देवेंद्र प्रसाद और अरविंद भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं। श्रीमती मंजरी जी, मोहित शर्मा जी, आलोक जी का अभी जर्नी टू द सेंटर ऑफ अर्थ का अनुवाद पढ़ा था, मिथलेश जी की भी किताब आयी है। बाकी भी बहुत सारे लोग फ्लाई ड्रीम से जुड़े हुए हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं।

सवाल - दिल्ली में पुस्तक मेले का अनुभव कैसा रहा?
नृपेंद्र जी - जनवरी में विश्व पुस्तक मेले में मैं पहली बार फ्लाई ड्रीम की टीम और लेखकों से रु ब रु मिला। मुझे बहुत खुशी हुई। जयंत जी और देवेंद्र प्रसाद से मिलकर लगा जैसे हम लोग वर्षों से एक दूसरे को जानते हैं। पुस्तक मेले में नई पीढ़ी को किताबें खरीदते देखकर मन बहुत खुश हुआ। वहाँ एक बात समझ में आई कि किताबों की भूख अभी लोगों में बहुत बाकी है बस हमारे अंदर उनके स्वादानुसार लिखने की क्षमता होनी चाहिए।

सवाल - अपनी कहानियों और उपन्यास के कथानक में किस तरह के प्रयोग करते हैं?
नृपेंद्र जी - कहानियों और कथानक में महत्वपूर्ण है भाषा शैली। हमारी लेखनी की भाषा उस कहानी के देशकाल के अनुरूप होनी चाहिए, और कथानक पात्रों की मनोदशा को दर्शाने में चित्रण का काम करे बस मेरी तो यही कोशिश रहती है। मैं नई कहानियों की तलाश में घूमता भी बहुत हूँ या कहो कि मुझे यात्राओं का शौक है जहां से मुझे विभिन्न भाषा के शब्द और कहानियां मिल जाती हैं।

सवाल - अब तक किसी पाठक से मिली सबसे अच्छी या दिल को छू लेने वाली टिप्पणी हमसे साझा करें।
नृपेंद्र जी - एक टिप्पणी तिलिस्मी ख़ज़ाना पर किसी पाठक ने लिखी थी कि अर्जुन-पंडित के कारनामे उन्हें बहुत अच्छे लगे और अब आगे भी वे इसी तरह की किताबें पढ़ना चाहते हैं। एक और टिप्पणी भाई गुरप्रीत जी ने अपने ब्लॉग पर लिखी थी तिलिस्मी ख़ज़ाना को लेकर। पाठकों की ऐसी समीक्षाएं  ही एक एक लेखक का वास्तविक पारितोषिक होती हैं।

सवाल - आने वाले समय में पाठकों को आपका लिखा क्या पढ़ने को मिलेगा?

नृपेंद्र जी - आगे मैं एक कहानी संग्रह (प्रेम कहानियों का) लाने पर विचार कर रहा हूँ। अर्जुन-पण्डित सीरीज की भी एक किताब लगभग पूरी हो चुकी है जो जल्दी ही प्रकाशित होगी और अर्जुन पंडित को लेकर ही एक किताब लिख रहा हूँ अभी।

सवाल - उभरते लेखकों, रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
नृपेंद्र जी - नए लेखकों को यही कहना चाहूँगा की जो भी लिखो मन से लिखो मज़े लेते हुए डूब कर लिखो। क्योंकि जितना डूबकर आप लिखोगे उतना ही पाठक को डुबा पाओगे कथानक में। जल्दबाजी में कुछ न लिखें और लिखने के बाद कहीं भी भेजने से पहले कमसे कम दो बार जरूर पढ़ें।

सवाल - हमें अपना समय देने के लिए धन्यवाद, अंत में पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?

नृपेंद्र जी - एक बात मैं कहना चाहूँगा की मेरा कविता का शौक मेरी कहानियों में भी कभी कभी गीत बनकर नज़र आता है। इस किताब में भी आप मोहिनी की कहानी में पढ़ेंगे। भूतों के साये की ज्यादातर कहानी वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं। अगर आपको हॉरर और हॉरर रोमांस पसन्द है तो एक बार "भूतों के साये में" किताब जरूर पढ़ें और अपनी समीक्षा भी जरूर लिखें। आपका आभार!
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- मोहित शर्मा ज़हन

3 comments:

  1. नृपेंद्र जी के निजी जीवन और साहित्यिक सफर में विस्तृत जानकारी के लिए मंच का आभार। नृपेंद्र जी के उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

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  2. प्रिय नृपेन्द्र , तुमसे परिचय पर आज मुझे अपार गर्व है |

    आज तुम्हारे बारे में बहुत सी नयी चींजें जानी | इस साक्षात्कार में शामिल तुम्हारी रचना यात्रा और उपलब्धियों का आंकडा मुझे दूसरी बार हैरान और खुश कर रहा है | मुझे याद आता है वो नव रचनाकार नृपेन्द्र ,जो एक दिन हताश हो कह बैठा था कि वह शब्द नगरी छोड़ना चाहता है , क्योंकि वहां पाठकों का आंकडा उत्साहजनक नहीं था | उसके बाद प्रतिलिपि पर तुम्हारी लोकप्रियता देखकर मुझे अपने अनुमान पर गर्व हुआ क्योंकि तुम्हारी लगन पर मुझे विशवास था कि तुम आगे जरुर जाओगे | तुम्हारा यश देखकर आह्लादित हूँ अनुज | ईश्वर करे तुम यूँ ही आगे बढ़ते जाओ और साहित्य में अपना नाम उंचा करो | देखती हूँ समय अनुकूल रहते ही किताबें भी मंगवाऊँगी | हमेशा खुश रहो |

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