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Tuesday, July 7, 2020

वह राह जिसकी कोई मंजिल नहीं - ✍ वीरेन्द्र बहादुर सिंह

बस में झटका लगा, तो नंदू की आंखें खुल गईं। उसने हाथ उठा कर कलाई में बंधी घड़ी देखी, ‘अरे अभी तो दो ही बजे हैं। बस तो दिल्ली सुबह साढ़े सात बजे पहुंचेगी। अगर बस पंख लगा कर उड़ जाती, तो यह पांच घंटे का सफर पांच मिनट में कट जाता। तब कितना अच्छा होता। घर छोड़े आज पूरे बाईस दिन हो गए हैं। पिछले एक सप्ताह से तो अश्वित से बात भी नहीं हुई। पता नहीं क्या करता रहता है। न तो घर का ही फोन लग रहा है, न ही उसका मोबाइल। निकलते समय बात हुई थी कि दिन में एक बार जरूर बात करेगा, पर यह लड़का’ नंदू को थोड़ा चिंता हुई, अश्वित कहीं बीमार तो नहीं पड़ गया? पर बीमार होता तो फोन तो लगना चाहिए था। एकदम बेवकूफ लड़का है। नंदू को सहज ही गुस्सा आ गसा। उसने बस में नजर फेरी हल्की रोशनी में बस की सवारिया गहरी नींद में सो रही थीं। उसने खिड़की से बाहर की ओर देखा, दुनिया जैसे गहरे अंधकार में डूबी थी। वैसा ही अंधकार उसके जीवन में भी तो समाया हुआ था। मां की मौत के बाद ही रंजना जी से उसकी मुलाकात हुई थी। रंजना उस समय अश्वित के जन्म के लिए इलाहाबाद अपने मायके आई हुई थीं। रंजना के मायके में नंदू की मामी काम करने आती थी। मां की मौत के बाद नंदू के मामा उसे अपने घर ले आए थे। उस समय नंदू की उम्र चौदह पंद्रह साल रही होगी। रंजना जी उसे बहुत अच्छी लगती थीं। जब कभी वह रंजना के पास बैठती, रो पड़ती। उसकी मां को मरे अभी छी सात महीने ही हुए थे। मामी के साथ रहना उसे अच्छा नहीं लगता था। दूसरा कोई सगा रिश्तेदार था नहीं। सारे रास्ते बंद हो गए थे। ऐसे में रंजना जी उसका सहारा बनीं। बच्चा पैदा होने के बाद जब वह दिल्ली आने लगीं, तो अश्वित के साथ नंदू को भी ले आईं।


नंदू दिल्ली आई तो यहां का नजारा देख कर दंग रह गई। चौड़ी चौड़ी सड़कें, ऊंचे ऊंचे मकान, कतारों में बड़ी बड़ी दुकानें, तमाम मोटर गाडि़यां और रंजना का शहर में उतना बड़ा घर। पांच कमरे नीचे और चार कमरे ऊपर। उसने पूछा, ‘‘दीदी, आप यहां अकेली रहती हैं?’’

‘‘मैं अकेली नही, हम दोनों रहते हैं। मैं और तुम्हारे साहब।’’
‘‘सिर्फ दो लोग और इतना बड़ा घर?’’
‘‘पर अब तो हम चार लोग हो गए हैं न।’’
‘‘तो भी तो यह बहुत बड़ा घर है।’’
रंजना जी हंस पड़ीं। नंदू को यह घर और दिल्ली, दोनों बहुत अच्छे लगे। धीरे धीरे रंजना ने उसे घर के कामकाज और खाना बनाना सिखा दिया। फिर तो जल्दी ही नंदू ने घर का सारा कामकाज संभाल लिया। प्रबोध जी उसे प्रेम से रखते थे। फुरसत पाते तो उसे थोड़ाबहुत पढ़ातेलिखाते भी। अश्वित तो पूरी तरह नंदू के सहारे हो गया था। नंदू को भी वह बहुत प्यारा था। वह जरा भी रोता, नंदू सारे काम छोड़ कर उसके पास आ जाती।

नंदू ने एक बार फिर कलाई पर बंधी घड़ी देखी। ‘यह सुई आगे  क्यों नहीं बढ़ रही है?’ उसने पैर फैलाए। पैर अकड़ गए थे। पीछे सीट पर कोई बच्चा रोया। पर थोड़ी ही देर में शांत हो गया। शायद उसकी मां ने थपकी देकर सुला दिया था।

अश्वित की भी तो ऐसी ही आदत थी। कोई थपकी देता, तभी वह सोता था। और थपकी देने के लिए अक्सर नंदू ही आती थी। नींद आती तो वह उसका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर ले जाता, ‘‘नंदू थपकी दो न।’’ पूरा दिन नंदू के पीछे पीछे घूमता रहता, ‘‘नंदू नहलाओ, खाना खिलाओ, कपड़े पहनाओ। नंदू मैथ की नोटबुक नहीं मिल रही है। नंदू यहां तो मेरा एक ही मोजा है, दूसरा कहां गया?’’ यही नहीं, कभी कभी नंदू खाना बना रहा होती, तो वह आकर कहता, ‘‘नंदू खेलने चलो न।’’

‘‘कैसे खेलने चलूं? मैं खाना बना रही हूं न।’’
‘‘मम्मी हैं न, वह खाना बनाएंगीं। तुम चलो’’
‘‘जाओ मम्मी के साथ खेलो, मुझे खाना बनाने दो।’’


‘‘नहीं, उन्हें बॉल फेंकना नहीं आता, तुम चलो।’’ एक हाथ में बॉल और कंधे पर बैट रखे, जींस और चेक की शर्ट पहने, पैर पटकते हुए अश्वित की तस्वीर नंदू अभी भी जस का तस बना सकती थी। रंजना जी हमेशा खीझतीं, ‘‘नंदू, तुम इसकी हर जिद मत पूरी किया करो। देखो न, यह जिद्दी होता जा रहा है।’’
नंदू हंस देती। अश्वित रुआंसा होकर कहता, ‘‘मम्मी, मैं आपसे कहां जिद करता हूं। मैं तो नंदू से जिद करता हूं।’’
‘‘मैं देखती नहीें कि हर बात में जिद करता है, जो चाहता है, वही करवाता है।’’
‘‘हां, नंदू से मैं जो चाहूंगा, वही करवाऊंगा।’’
रंजना नंदू को डांटतीं, ‘‘तुम ने इसे बिगाड़ कर रख दिया है। याद रखना एक दिन पछताओगी।’’

रंजना जी की बात आखिर इतने दिनों बाद सच निकली। धीरे धीरे वह जिद्दी होता चला गया। आज इतना बड़ा हो गया, फिर भी मन में जो आ गया, वही करवाता हैं। नंदू के लिए चारधाम की इस यात्र का पैसा उसने जिद कर के ही जमा किया था। नंदू ने कितनी बार मना किया, पर वह कहां माना। उसने कहा, ‘‘नहीं तुम चारधाम की यात्र कर आओ। शायद फिर नहीं जा पाओगी।’’
‘‘पर मैं इस घर और तुम्हें किस के भरोसे छोड़कर जाऊं? तुम्हारी शादी के बाद’’
फालतू बात मत करो, अब मैं छोटा नहीं हूं। तुम जाओ। बीस बाईस दिन तो ऐसे ही बीत जाएंगे।’’
नंदू मना करती रही, पर वह माने तब न? आखिर अश्वित पैसा जमा ही कर आया। फिर तो नंदू को चारधाम की यात्र पर जाना ही पड़ा। ‘बड़ा जिद्दी है।’ नंदू के मुंह से एकाएक निकल गयाा। बगल वाली सीट पर बैठी महिला ने उसकी ओर चौंक कर देखा। पर तब तक उसने आंखें बंद कर ली थीं। आंखें बंद किए हुए ही नंदू सोचने लगी, ‘इस समय वह क्या कर रहा होगा? इस समय तो सो रहा होगा, और क्या करेगा।’

नंदू का वेतन प्रबोध जी सीधे बैंक के उसके खाते में पूरा का पूरा जमा कर देते थे। खर्च के लिए ऊपर से सौ, दो सौ रुपए दे देते थे। वह पैसा अश्वित अपने क्रिकेट बॉल, खिलौनों और चॉकलेट पर उड़ा देता था। रंजना बड़बड़ातीं, ‘‘तू नंदू का पैसा क्यों खर्च करता है? तुझे जरूरत हो, तो मुझसे मांग।’’

 ‘‘आप मुझे जल्दी कहां पैसा देती हैं। पचास सवाल करती हैं। नंदू तो तुरंत पैसा दे देती हैं।’’

‘‘पर तुम नंदू का पैसा इस तरह खर्च करते हो, यह अच्छा नहीें लगताा।’’

‘‘क्यों अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘हे भगवान, यह लड़का।’’रंजना जी सिर पीट लेतीं।

ऐसा नहीं था कि रंजना जी नंदू के बारे में कुछ नहीं सोचती थीं। न जाने कितनी बार उन्होंने नंदू से शादी के लिए कहा था, पर नंदू ने हमेशा सिर झटक दिया था, ‘‘अब यही मेरा घर और आप ही लोग मेरे सब कुछ हैं। अब मुझे शादी नहीं करना। मेरा जीवन इसी घर में कटेगा।’’

‘‘भला इस तरह कहीं होता है नंदू? शादी तो करनी ही पड़ेगी।’’ रंजना उसे समझाने की कोशिश करतीं। पर नंदू उनकी बात पर ध्यान न देती। प्रबोध जी ने नंदू के मामा से भी उसकी शादी के लिए कहलवाया, पर उसने कोई जवाब नहीें दिया। आखिर एक दिन रंजना जी ने कहा, ‘‘नंदू अब तू अट्ठाईस साल की हो गई है। कब तक शादी के लिए मना करती रहेगी। अंत में बैठी रह जाएगी इसी घर में, कोई नहीं मिलेगा।’’

‘‘पर मुझे शादी करनी ही कहां है।’’

‘‘आिखर क्यों नहीं करनी शादी? तू जहां कहे, हम वहां कोशिश करें। मैरिज ब्यूरो में, तेरी जाति में, तू जहां कहे, वहां। तू कहे, तो एक बार इलाहाबाद चलते हैं। अब तुम पांच साल बाद कहोगी, तो’’

मैं कभी नहीं कहने वाली, पांच साल ही नहीं, पचास साल बाद भी नहीं, बस।’’

अट्ठाईस साल उस समय नंदू अट्ठाईस साल की थी और इस समय अश्वित अट्ठाईस साल का है। इस बीच कितने साल बीत गए। ये बीते साल उसका कितना कुछ ले गए। नंदू के बाल, अब उन्हें काले रखने के कितनी कोशिश करनी पड़ती है। आंखें बिना चश्मे के कुछ पढ़ ही नहीं पातीं। अश्वित के हाथों में स्कूल बैग की जगह लैपटॉप आ गया है। उछाल मारती समुद्र की लहरों जैसी उसकी सहज प्रवृत्ति शांत हो कर पैसा कमाने की ओर घूम गई है। और रंजना जी तथा प्रबोध जी? वे अब कहां हैं? समय का बहाव दोनों को बहा ले गया। प्रबोध जी की अचानक हार्टअटैक से मौत हो गई। रंजना जी पति की मौत के गम को सहन न कर सकीं और तीन महीने बाद ही एक सुबह बिस्तर पर मरी हुई मिलीं। मां की मौत के बाद अश्वित का इंजीनियरिंग का रिजल्ट आया। उस दिन दोनों खूब रोए। अश्वित का रोना बंद ही नहीं हो रहा था। नंदू ने किसी तरह उसे चुप कराया।

इंजीनियरिंग का रिजल्ट आने के बाद एक दिन सुबहसुबह अश्वित नंदू के पास आया, ‘‘नंदू, अब मैं आगे क्या करूं?’’

‘‘क्या करना चाहते हो तुम?’’

‘‘मैं एमबीए करना चाहता हूं।’’

‘‘तो करो न, कौन मना करता है। जितना पढ़ना, हो पढ़ो।’’

‘‘हां, पर अब पापामम्मी नहीं हैं, इसलिए  नंदू मैं पैसों की बात कर रहा हूं। मैं जिस इंस्टीट्यूट से एमबीए करना चाहता हूं, उसकी फीस ज्यादा है। अगर हम जमा पैसे से फीस जमा कर देते हैं, तो घर का खर्च का क्या होगा?’’

दो पल नंदू ने सोचा। फिर अंदर गई और अपनी पासबुक लाकर बोली, ‘‘इसमें जितने पैसे हैं, उतने में हो जाएगा।’’

अश्वित ने पासबुक लेकर देखा, ‘‘हां, हो जाएगा, पर यह तो तुम्हारा पैसा है।’’

‘‘अब तुम्हारा पैसा और मेरा पैसा क्या? सब एक ही है। ये सब तुम्हारा ही तो है। तुम यह लो, अच्छी नौकरी मिल जाएगी, उसके बाद कोई चिंता ही नहीं रहेगी जाओ, अपनी फीस भर दो।’’

खुश हो कर अश्वित ने नंदू को गोद में उठा लिया। ‘‘

‘‘छोड़ो मुझे अरे गिर जाऊंगी।’’

नंदू ने बस की अगली सीट पर लगे हैंडिल को पकड़ लिया, ‘ओह क्या क्या याद आ रहा है।’ उसने एक बार फिर घड़ी देखी। बस, दो ही घंटे बचे हैं। पहुंचते ही उसके कान पकड़ूंगी, ‘कहीं इस तरह लापरवाही की जाती है। एक तू ही नौकरी करता है।’ जब से उसकी नौकरी लगी है, एक भी दिन मेरे पास नहीं बैठा। पूरे दिन नौकरी, घर आता है, तो लैपटॉप और मोबाइल फोन। न खाने का ध्यान न सोने का। यह भी कोई जिंदगी है। मुझे तो लगा था, एमबीए हो गया, पढ़ाई खत्म हो गई। पर राम जाने यह कितनी परीक्षाएं देता रहता है। और कंपनी वाले भी कैसे हैं। कहीं बाहर का कोई काम होगा, तो उसे ही भेजते हैं। अभी जल्दी ही दो बार मुंबई भेजा। शायद उन्हें पता है कि अश्वित अकेला है। शादी नहीं हुई है। इसलिए उसे ही भेजते हैं। कहीं ऐसा होता है। अब तो इसे खूंटे से बांधना ही पड़ेगा। लोग कहते होंगे कि मांबाप नहीं हैं, इसलिए छुट्टा सांड़ की तरह घूम रहा है। आखिर कौन ध्यान दे? पर जब भी उससे शादी की बात करो, वह सिर झटक देता है। रमा जी कई बार अपनी बेटी के लिए की चुकी हैं। लड़की डाक्टर है। अच्छा घर है। फिर क्या दिक्कत है। पर ये महादेव माने तब न। अट्ठाईस साल के हो गए हैं, पर अक्ल नहीं है। कभी घर का भी ख्याल नहीं रहता। यह भी पता नहीं है कि रात को कितने ताले लगाने पड़ते हैं। इतना बड़ा घर और वह अकेला। रात में चार आदमी घुस आएं, तो क्या कर लेगा? मैं भी बेकार उतावल कर के चली आई। उसकी तो जिद करने का आदत है। मुझे तो समझना चाहीए था। फान भी नहीं लग रहा है। हे भगवान, रक्षा करना। आखिर यह बात पहले दिमाग में क्यों नहीं आई, वरना मैं कतई न आती। उसकी अच्छी नौकरी के लिए ही तो ईश्वर से मन्नत मांगी थी। उसे पूरी करने के लिए ही तो ईश्वर आप के धाम आई थी। अब घर पहुंच कर उसका मुंह देख लूंगी, तभी मन को शांति मिलेगी। दो घ्ांटे की ही तो बात है। किसी तरह ये भी बीत जाएं। नंदू ‘शिव शरणं मम’ का जाप करने लगी।

साढ़े सात बजे के करीब बस दिल्ली पहुंची। ऑटो घर के सामने आकर रुका, तो दिल को कुछ तसल्ली मिली। धारती के एक छोर पर? कुछ गलत तो नहीं कहा। अभी तो वह सोता होगा। मैं आऊंगी उसे याद ही कहां होगा। मुझे देख कर चौंक जाएगा। क्या कहते हैं उसे, हां सरप्राइज। फिर वह खुश हो कर कहेगा, ‘‘अच्छा हुआ नंदू तुम आ गईं। तुम्हारे बिना तो यार मजा ही नहीं आता था। चलो अब कड़क चाय और कुछ गरमागरम नाश्ता बनाओ, तुम्हारे जाने के बाद से तो कुछ अच्छा खाने को नहीं मिला। पर तुम गई ही क्यों? मैं जो  भी कहूं, तुम करने को तैयार हो जाती हो। मैं जिद्दी हूं, यह तो तुम्हें पता ही है।’’

इसी तरह अश्वित न जाने क्या क्या बड़बड़ाएगा। यही सोचते सोचते नंदू ने गेट खोला। देखे तो पेड़ों में पानी तक नहीं डाला। मेरे सारे गुलाब सूख रहे हैं। कितना कहा था कि माली को आने दो, अभी उसे पैसे मत दो। पेड़ों को देखते हुए नंदू ने डोरबेल पर उंगली रख दी। एक मिनट तक मधुर लय में घंटी बजती रही। थोड़ी देर में दरवाजा खुला। दरवाजे के बीच एक सुंदर युवती खड़ी थी। उसने पूछा, ‘‘बहन जी आपको किससे मिलना है?’’

‘‘अश्वित और आप?’’ नंदू उसे देख कर हैरान रह गई। यह कौन है?

‘‘अश्वित तो आप कौन?’’

‘‘मैं नंदू।’’

‘‘ओह नंदू जी, आइए आइए, अंदर आइए।’’ रास्ता देते हुए उसने कहा

वहीं खड़े खड़े नंदू ने सामने कमरे में नजर दौड़ाई। मेरा प्रिय पीतल की जंजीर वाला झूला, वह कढ़ाई वाला सोफ, रंजना जी की आराम कुर्सी, प्रबोध जी की बनाई पेंटिंग? अश्वित की बड़ी सी फोटो, कुछ दिखाई नहीं दे रहा? वह दरवाजे के पास खड़ी हो गई।

‘‘अंदर आइए नंदू जी, आप तो चारधाम की यात्र पर गई थीं?’’ कहते हुए वह युवती अंदर गई। सकुचाते हुए नंदू कमरे में पड़े सोफे पर एक कोने में बैठ गईं। ‘यह क्या, यह लड़की कौन है, अश्वित कहां है? उसे कुछ पता नहीं।’ तभी वह युवती ट्रे में एक गिलास पानी और एक लिफाफा ले कर आई। ट्रे सेंट्रल टेबल पर रख कर उसने कहा, ‘‘अश्वित तो पिछले शुक्रवार को ही चले गए हैं। आप उनके यहां काम करती थीं न? उन्होंने बताया था। आपके लिए वह यह चिट्ठी छोड़ गए हैं।’’ इतना कह कर उसने लिफाफा नंदू की ओ बढ़ाया। लिफाफा ले कर नंदू ने कांपते हाथों से खोला। उसमें लिखा था,

‘नंदू,

मैं अमेरिका जा रहा हूं। मुझे वहां बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है। मैं तुम से इसलिए बिना मिले जा रहा हूं,  क्योंकि मिलने पर तुम मुझे जाने न देती। अब कब वापस आऊंगा, यह निश्चित नहीं है। मकान की अच्छी कीमत मिल गई थी, इसलिए इसे बेच दिया है। तुम ने मेरी एमबीए की पढ़ाई के लिए बारह लाख रफ़पए दिए थे। उसमें सात लाख मिला कर बीस लाख रफ़पए तुम्हारे खाते में जमा कर दिए हैं। पासबुक चिट्ठी के साथ ही है। देख लेना। अमेरिका का मेरा पता और फोन नंबर मेरे दोस्त अमित के पास है। तुम उससे ले लेना। अगर कभी किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो जरूर कहिएगा। अश्वित।’

दो पल के लिए नंदू वहां बैठी रही। फिर धीरे से उठी और अपना सामान लेकर गेट के बाहर आ गई। आगे बढ़ते हुए उसने पलट कर देखा, क्या यही उसका घर था। वह उस राह पर बढ़ गई, जिसकी कोई मंजिल नहीे थी।

✍ वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जेड 436ए  सेक्टर 12
नोएडा  201301

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